अमेरिका: क्या है राष्ट्रपति चुनाव की पूरी प्रक्रिया और कब वोटिंग?

अमेरिकी चुनाव (USA election) को समझने के लिए ये याद रखना जरुरी है कि 244 साल पुराने इस लोकतंत्र में हर चीज के लिए तारीख निर्धारित है. यानी चुनाव किस साल में होंगे. चुनाव किस तारीख को होंगे. नतीजे कब आएंगे और नए राष्ट्रपति शपथ कब लेंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव (US presidential election) की प्रक्रिया का पहला चरण ही भारत से अलग है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 12, 2020, 4:10 PM IST
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अमेरिका: क्या है राष्ट्रपति चुनाव की पूरी प्रक्रिया और कब वोटिंग?
अमेरिका में इस बार राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प को जो बाइडन से चुनौती मिल रही है.
दुनिया के सबसे मजबूत और पुराने लोकतंत्र में चुनावी पर्व का मौसम है. इस साल अमेरिका अपना नया राष्ट्रपति चुनेगा. वैसे तो दुनियाभर में चार तरह की शासन प्रणाली है. अध्यक्षात्मक शासन, संसदीय शासन, स्विस शासन और कम्युनिस्ट शासन. जैसा कि नाम से ही पता चलता है, अमेरिका में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली है. यानी अमेरिकी सरकार के केंद्र में अध्यक्ष (राष्ट्रपति) होता है. आज हम समझेंगे कि अमेरिका में चुनाव कैसे होता है.

अमेरिकी चुनाव को समझने के लिए ये याद रखना जरुरी है कि 244 साल पुराने इस लोकतंत्र में हर चीज के लिए तारीख निर्धारित है. यानी चुनाव किस साल में होंगे. चुनाव किस तारीख को होंगे. नतीजे कब आएंगे और नए राष्ट्रपति शपथ कब लेंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया का पहला चरण ही भारत से अलग है. भारत में आपको नहीं पता होगा कि 2024 में जब संसदीय चुनाव होंगे तो किन तारीखों को होंगे, लेकिन अमेरिका में जब अगला चुनाव होगा तो वो तारीख आप अभी से बता सकते हैं.

अमेरिका में चुनाव कौन से साल में होता है?
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव हर लीप ईयर में होते हैं. लीप ईयर यानी की जो साल की संख्या है वो 4 से अगर पूरी तरह विभाजित हो जाए तो उसे लीप ईयर करते हैं. लीप ईयर में फरवरी 29 दिन की होती है. वैसे आपको जानकर आश्चर्य होगा कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव निर्धारित तारीख पर ही हुई.
वैसे तो अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया पूरे साल चलती है लेकिन संविधान द्वारा मतदान और शपथ की तारीख तय है. मतदान नवंबर महीने के पहले मंगलवार को होता है और नया राष्ट्रपति शपथ अगले साल 20 जनवरी को लेता है. ये तारीखें तय हैं. एक बात और है, अगर आपको ज्यादा वोट मिलते हैं तो भी आप चुनाव जीत जायें ये जरूरी नहीं है. 2016 में हिलेरी क्लिंटन को डॉनल्ड ट्रंप से ज्यादा वोट मिले लेकिन वो हार गईं.

अमेरिकी राष्ट्रपति को कौन चुनता है?
अमेरिकी जनता सीधे राष्ट्रपति को नहीं चुनती है, वोटर पहले इलेक्टोरल कॉलेज के लिए मतदान करते हैं. यानी की निर्वाचक मंडल के लिए पहले वोटिंग होती है. इलेक्टोरल कॉलेज में उतने ही सदस्य होते हैं जितने अमेरिकी कांग्रेस में होते हैं. अमेरिकी कांग्रेस यानी की अमेरिकी संसद. अमेरिकी संसद के दो सदन है.  सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव. सीनेट, उच्च सदन यानी की Upper House है जबकि हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव, निम्न सदन यानी Lower House है.हालांकि यहां उच्च सदन का चुनाव भारत से अलग है. भारत में राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव जहां अप्रत्यक्ष रूप से होता है वहीं अमेरिका में सीनेट के सदस्यों का चुनाव जनता प्रत्यक्ष रूप से करती है.

हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 435 प्लस 3 सदस्य होते हैं. विशेष प्रावधान के तहत वॉशिंगटन डीसी के 3 सदस्य हैं. सीनेट में 100 सदस्य होते हैं. इलेक्टोरल कॉलेज में हर राज्य का कोटा उतना ही होता है जितना हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट में होता है.


वैसे तो अमेरिका में भारत की तरह ही मल्टी पार्टी सिस्टम है लेकिन दो पार्टियां इतनी प्रभावी हैं कि उन्हीं दोनों के बीच पूरे अमेरिका की राजनीति घूमती रहती है. डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी.

लिस्ट सिस्टम क्या है?
अमेरिकी इलेक्टोरल कॉलेज के चुनाव में लिस्ट सिस्टम होता है. यानी चुनाव में लिस्ट हारती और जीतती है. आइये इसको आसान भाषा में समझते हैं. डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी कैफोर्निया राज्य के लिए 55 लोगों की लिस्ट जारी करेगी. मतदाता उन 55 लोगों के लिए अलग-अलग वोट नहीं करेगा. वो रिपब्लिकिन पार्टी की पूरी लिस्ट और डेमोक्रेटिक पार्टी की पूरी लिस्ट के लिए वोट करेगा. यानी या तो पूरे 55 लोग जीतेंगे या फिर पूरे 55 लोग हारेंगे. यही वजह है कि ट्रंप कम वोट पाकर भी इलेक्टोरल कॉलेज में जीत गये.

प्रेसिडेंसी प्राइमरीज़ सिस्टम क्या है?
एक और मामले में अमेरिकी चुनाव भारत या दूसरे देशों के मुकाबले अलग है. बीजेपी या कांग्रेस से अगला प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा ये कौन तय करता है? क्या जनता तय करती है? नहीं. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी या डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति का उम्मीदवार कौन होगा यह जनता तय करती है. इसमें पार्टी की भूमिका नहीं होती है. भारत में तो पार्टी के 10 बड़े नेता ही आपस में तय कर देते हैं. हालांकि अमेरिका में एक ही पार्टी के कई नेता खुद की घोषणा कर सकते हैं लेकिन उस पार्टी की तरफ से फाइनल उम्मीदवार कौन होगा यह जनता ही तय करती है.

अमेरिका में चेन सिस्टम है. राष्ट्रपति का प्रत्याशी कौन होगा, ये जनता और पार्टी के सदस्य तय करते हैं. इसको प्रेसिडेंसी प्राइमरीज़ कहते हैं. यह प्रक्रिया साल 1970 में शुरू हुई. इसके पहले भारत की तरह ही वहां भी बड़े-बड़े नेता आपस में ही उम्मीदवार तय कर लेते थे. अमेरिका के 34 राज्यों में प्रेसिडेंसी प्राइमरीज़ सिस्टम है जबकि 16 राज्यों में कॉकस सिस्टम है. प्रेसिडेंसी प्राइमरीज़ में जनता तय करती है और कॉकस सिस्टम में बड़े नेता तय करते हैं.


अमेरिका में इसके लिए 1970 में कमीशन बना, उस कमीशन ने सुझाव दिया तब कुछ पार्टियों ने इसे माना और कुछ ने नहीं माना. इसके लिए कोई संवैधानिक लॉ नहीं है. प्रेसिडेंशियल प्राइमरीज के कार्यकर्ता अपने लीडर को चुनते हैं यानी नेशनल कन्वेंशन के लिए चुनाव होता है. नेशनल कन्वेंशन में डेलिगेट्स और सुपर डेलिगेट्स होते हैं. यह दोनों पार्टियों के लिए अलग-अलग होता है.

डेलिगेट्स और सुपर डेलिगेट्स में क्या अंतर है?
नेशनल कन्वेंशन में जो लोग राज्यों से चुनकर आते हैं उन्हें डेलिगेट्स कहते हैं. जबकि सुपर डेलिगेट्स वो होते हैं जो उस पार्टी से पहले राष्ट्रपति बन चुके हैं यानी पूर्व राष्ट्रपति और उस पार्टी के संसद के सदस्य सुपर डेलिगेट्स होते हैं. यह चुनाव अगस्त महीने में होता है. नेशनल कन्वेंशन में फाइनल उम्मीदवार का चुनाव होता है यानी डेमोक्रेटिक पार्टी या रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से कौन राष्ट्रपति का उम्मीदवार होगा यह दोनों पार्टियों के नेशनल कन्वेंशन में निर्धारित होता है. नेशनल कन्वेंशन अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तारीखों को होती है. यह प्रक्रिया पूरे महीने तक चलती रहती है.

जो भी व्यक्ति राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना जाता है वो अपने मन मुताबिक उप राष्ट्रपति के उम्मीदवार का चुनाव कर सकता है. इसके बाद प्रचार के लिए दो महीने का ही वक्त मिलता है. सितंबर और अक्टूबर का. इन दो महीनों में अमेरिकी चुनाव में अरबों रुपये खर्च होते हैं. खर्च के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव दुनिया का सबसे महंगा चुनाव है.

अमेरिका में चुनाव प्रचार कैसे होता है?
हालांकि वहां भारत जैसी बड़ी – बड़ी रैलियां नहीं होती हैं. वहां बहस टीवी पर होती है. दोनों पार्टियों के उम्मीदवार अपनी बात बहस के जरिये लाइव टीवी डिबेट में रखते हैं.

इसके बाद नवंबर महीने के पहले मंगलवार को यानी इस बार 3 नवंबर को वोट होंगे. उस दिन अमेरिकी जनता इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्यों के लिए वोट करेगी. पूरे देश में एक ही दिन चुनाव होता है. इसी दिन राष्ट्रपति पद के लिए, संसद के सदस्य के लिए, सभासद या काउंसलर्स या फिर गवर्नर पद हो सबके लिए चुनाव होता है.

इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्यों पर कोई संवैधानिक बंदिश तो नहीं है लेकिन जो भी चुनकर आते हैं वो अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को वोट करते हैं. जिसको भी 270 या उससे ज्यादा मत मिलते हैं वो चुनाव जीत जाता है. इसके बाद शपथ ग्रहण अगले साल 20 जनवरी को होती है.

2020 में रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार कौन है?
इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से जो बिडेन और रिपब्लिकन पार्टी से डोनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति उम्मीदवार हैं. जो बाइडन ने कमला हैरिस को और डाेनाल्ड ट्रंप ने माइक पेंस को उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है.
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First published: October 12, 2020, 3:39 PM IST
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