मध्य प्रदेश में खुला चाइल्ड फ्रेंडली कोर्ट, जहां बच्चे जाकर खेल भी सकते हैं

सरकार और यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 53 फीसदी बच्चे बाल यौन अपराध के शिकार हैं. तीन साल पहले प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रन फ्राम सेक्सुअल आफेंसेस एक्ट के तहत 15 हजार मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन केवल 4 फीसदी आरोपियों को सजा हुई.

Source: News18Hindi Last updated on: August 26, 2020, 2:21 PM IST
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मध्य प्रदेश में खुला चाइल्ड फ्रेंडली कोर्ट, जहां बच्चे जाकर खेल भी सकते हैं
सरकार और यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 53 फीसदी बच्चे बाल यौन अपराध के शिकार हैं. तीन साल पहले प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रन फ्राम सेक्सुअल आफेंसेस एक्ट के तहत 15 हजार मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन केवल 4 फीसदी आरोपियों को सजा हुई.
2 साल से सुप्रीम कोर्ट के लगातार आदेशों और फटकार के बाद आखिरकार मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाल हितैषी न्यायालय (Child Friendly Court) की शुरूआत मंगलवार यानी 25 अगस्त 2020 को हो ही गई. बाल हितैषी न्यायालय में अपराधों के शिकार हुए पीड़ित बच्चों के मामलों की सुनवाई होगी. इस अदालत का मकसद है कि बच्चे सुरक्षित, दोस्ताना और पारिवारिक माहौल में बिना डरे गवाही दे सकें. इंतजाम कुछ ऐसे होंगे कि बच्चे उसके साथ वारदात को अंजाम देने के आरोपी को देख कर पहचान कर सकेंगे, लेकिन आरोपी बच्चे को नहीं देख सकेगा. बता दें कि बिहार, बंगाल, गोवा जैसे कई राज्यों में इस तरह की अदालतें पहले ही अपना काम शुरू कर चुकी हैं. एक चाइल्ड फ्रेंडली कोर्ट उज्जैन में चल रहा है.

देर आये, दुरुस्त आयद वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए बाल संरक्षण और न्याय के महत्वपूर्ण कदम के रूप में यह विशेष बाल हितैषी अदालत होशंगाबाद के जिला न्यायालय परिसर के नए भवन मे शुरू हुई है, जिसके पहले न्यायाधीश (Pocso Act) सुरेश चौबे होंगे. लोकार्पण के मौके पर न्यायाधीश को यह नसीहत भी दी गई कि वह पीड़ित बच्चों के साथ पूरी संवेदनशीलता से पेश आएं और अपने बच्चों की तरह व्यवहार करें. आधुनिक संसाधनों से लैस न्यायालय में बच्चों के बैठने के लिए सोफे लगवाए गए हैं. खेलने के लिए खिलौनों की व्यवस्था के साथ उनके खाने और शुद्ध पानी क लिए पेंट्री की व्यवस्था की गई है.

किशोर न्याय बोर्ड और बाल हितैषी न्यायालय में अंतर
किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) में 18 साल से कम उम्र के ऐसे बच्चे, जो किसी मामले में बाल अपचारी हैं, यानी ऐसे बच्चे जिन्होंने कानून का उल्लंघन किया है, वो विभिन्न अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं, उनके मामले सुने जाते हैं, वहीं बाल हितैषी न्यायालय में पॉक्सो एक्ट व अन्य बाल अपराधों के शिकार बने पीड़ित बच्चों (Victim Childrens) के मामलों की सुनवाई होती है.
बार-बार जगाता रहा सुप्रीमकोर्ट
यौन शोषण और अन्य बाल अपराधो में खतरनाक वृद्धि से चिंतित सुप्रीमकोर्ट एक के बाद एक दायर कई जनहित याचिकाओं सरकारों को जगाने का काम करता रहा है. एक जनहित याचिका पर सर्वोच्च अदालत ने 9 फरवरी 2018 को केन्द्र व राज्य सरकारों को निर्देश दिए थे, कि बाल अधिकार संरक्षण आयोग, किशोर न्याय बोर्ड और बाल कल्याण समितियों में रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए. बच्चों को जल्द न्याय मिले, इसके लिए किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) का सख्ती से पालन हो. उच्च न्यायालयों से कहा गया कि हर जिले में बाल हितैषी अदालतों और असुरक्षित गवाहों के लिए विशेष अदालतें बनाने पर विचार करें.

इसके बाद जुलाई 2019 में एक मामले में जनहित याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने पाक्सो एक्ट के 100 से अधिक लंबित मामलों पर जिलों में विशेष अदालतों के गठन का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में पीठ ने 60 दिन के भीतर ऐसी बाल हितैषी अदालतें बनाने के लिए कहा था. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि यह पूरा काम केन्द्र को अपने खर्चे पर करना होगा. पीठासीन अधिकारी से लेकर हर कर्मचारी के वेतन और बाल हितैषी बुनियादी ढांचे बनाने की सारी जिम्मेदारी केन्द्र की होगी.
कई राज्यों में कोर्ट खुले, लेकिन मध्य प्रदेश पिछड़ा
वैसे तो दिल्ली मे बाल हितैषी अदालत की स्थापना 2012 में होने की जानकारी सामने आई , लेकिन सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद से ही हैदराबाद, कोलकाता, पटना और गोवा समेत कई राज्यों में ऐसी अदालतों की शुरूआत कर दी गई थी, लेकिन यहां भी मप्र पिछड़ गया. जबकि मप्र में यह काम सबसे पहले होना चाहिए था, क्योंकि मप्र बाल अपराधों के मामले में देश में दूसरे स्थान पर है. यहां हालात बहुत गंभीर हैं. 15 सितम्बर 2019 को जब सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश मदन बी लोकुर कोलकाता में बाल हितैषी अदालत का लोकार्पण कर रहे थे, तब बाल अपराधों की स्थिति को लेकर उन्होंने कहा था कि देश में 40 फीसदी बच्चे हैं. देश में कुल बाल अपराधियों की संख्या 30 हजार है, लेकिन जिन किशोरों के साथ अपराध हुए उनकी संख्या 90 हजार है यानी तीन गुना ज्यादा. ऐसे में बच्चों के प्रति संवेदनशीलता और उनकी जरूरतों के हिसाब से बाल हितैषी अदालतों की स्थापना होनी चाहिए.
जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट में भी सीजेआई ने अपना आदेश सुनाते हुए सालिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा था कि बड़ी संख्या में बच्चे अपराधों से पीड़ित है. उनके मामले में कोई बहाना नहीं चलेगा. मि. मेहता आपकी सरकार से पोक्सो अदालतों की स्थापना के लिए धन उपलब्ध कराने को कहें. अदालत ने यह आदेश बाल शोषण के मामलों में खतरनाक वृद्धि और अदाततों में उनके लंबित होने के बाद दायर एक जनहित याचिका पर सुनाया था. याचिका में अपनी रिपोर्ट के आधार पर कहा गया था कि साल 2019 में 1 जनवरी से 30 जून 2019 तक पूरे भारत में 24,212 एफआईआर दर्ज की गई थीं. इनमें से केवल 12,231 मामलों में आरोप पत्र दाखिल हुए, जबकि 11,981 मामलों की जांच चल रही थी और ट्रायल केवल 6,449 मामलों में शुरू हो पाया. अब तक ट्रायल कोर्ट ने केवल 911 मामलों का ही फैसला किया यानी कुल दर्ज मामलों का लगभग 4 फीसदी.

सरकार और यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 53 फीसदी बच्चे बाल यौन अपराध के शिकार हैं. तीन साल पहले प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रन फ्राम सेक्सुअल आफेंसेस एक्ट के तहत 15 हजार मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन केवल 4 फीसदी आरोपियों को सजा हुई. कुछ राज्यों की तो स्थिति ऐसी है कि यदि आज के बाद बाल अपराध होना बंद हो जाएं तो लंबित केसों के निपटारे में ही 10 से 40 साल लग जाएंगे.

जस्टिस लोकुर की टिप्पणी
दो साल पहले इंदौर में बाल संरक्षण से जुड़े एक कार्यक्रम में सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश मदन बी लोकुर ने कहा था कि किशोर न्यायालयों में जब तक जजेस डायस पर बैठकर सुनवाई करना खत्म नहीं होगा, तब तक बच्चे कैसे खुलकर अपनी बात कह सकेंगे. किशोर न्यायालयों में डायस सिस्टम खत्म होना चाहिए. बचचों के साथ इतनी बड़ी संख्या में अपराध हो रहे हैं, कोई उनके बारे में क्यों नहीं सोचता?

राज्य को फटकार
ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है, पिछले साल के दिसंबर माह के अंतिक सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने बाल अपराधों की रोकथाम में ढीले रवैये को लेकर सुप्रीमकोर्ट ने फटकार लगाई थी और साथ ही 10 लाख रुपय़े का जुर्माना भी ठोंका था.

बच्चों के यौन उत्पीड़न क मामलों को लेकर सुप्रीमकोर्ट की पहल पर एक सूची तैयार कराई गई थी. इसमें यूपी 3457 मुकदमों के साथ सबसे ऊपर है, जबकि मप्र 2389 मामलों के साथ दूसरे नंबर पर है. नागालैंड 9 मुकदमों के साथ सबसे आखिरी पायदान पर है. एनसीआरबी की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों के साथ शारीरिक दुर्व्यहार के मामले में यूपी सबसे आगे है, वहां ऐसी 2,652 घटनाएं हुई. महाराष्ट्र में 2,370 और मप्र में 2,106 मामले सामने आए.

मध्य प्रदेश में 2001 से 2016 के भीतर 865 फीसदी बाल अपराध बढ़े. एनसीआरबी के आंकड़ों के आधार पर एक तुलनात्मक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है. रिपोर्ट के अनुसार 16 सालो में पूरे देश में 2,49,383 बच्चों का अपहरण हुआ. इसमें 9.4 फीसदी यानी 23563 बच्चे मप्र में अपहृत हुए. 2015 में भोपाल में 448 बच्चों का अपहरण किया गया यानी यहां से रोजाना एक बच्चा अगवा किया गया. प्रदेश में 2001 में बच्चों के प्रति अपराधों से जुड़े 2065 मामले अदालतों मे लंबित थे. 2016 में यह आंकड़ा बढ़कर 31392 हो गया, यानी लंबित प्रकरणों में ही 1420 फीसदी वृद्धि हुई.


बढ़ते बाल अपराधों की यह भयावह स्थिति बताती है कि हालात कितने गंभीर है, केवल एक बाल हितैषी अदालत बनाने से काम नहीं चलेगा. हर जिले में ऐसी अदालतों का गठन करना होगा. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

सामाजिक, विकास परक, राजनीतिक विषयों पर तीन दशक से सक्रिय. मीडिया संस्थानों में संपादकीय दायित्व का निर्वाह करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र लेखन. कविता, शायरी और जीवन में गहरी रुचि.

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First published: August 26, 2020, 2:21 PM IST
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