MP में ‘अपनों को नौकरी’: क्या शिवराज के लिए आसान होगा कानून में बदलाव

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (CM Shivraj Singh Chouhan) की सिर्फ 'अपनों को नौकरी' देने की घोषणा के बाद देश में मौलिक अधिकारों पर बहस छिड़ सकती है. जन्मस्थान और क्षेत्रवाद के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव को लेकर सवाल उठ सकते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: August 20, 2020, 4:15 PM IST
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MP में ‘अपनों को नौकरी’: क्या शिवराज के लिए आसान होगा कानून में बदलाव
मध्य प्रदेश के हजारों सरकारी स्कूलों को बंद करने की तैयारी में है शिवराज सरकार.
क्या कोई सरकार अपने राज्य के लोगों के लिए सौ फीसदी नौकरियां आरक्षित कर सकती है या यह कह सकती है कि सिर्फ स्थानीय लोगों को ही नौकरी देगी, बाहरियों यानी अन्य राज्यों के बेरोजगारों को नहीं? क्या ऐसा कोई ऐलान देश के संविधान (Constitution of India) के प्रावधानों के विपरीत नहीं है, जो यह कहता है कि भारत के नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में बसने और निवास करने, काम करने का अधिकार है? जन्म स्थान के आधार पर भारतीय नागरिक से कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता? दरअसल, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह (CM Shivraj Singh Chouhan) ने एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश के संसाधनों पर पहला हक राज्य के बच्चों का है. मप्र में सरकारी नौकरियां केवल मप्र के छात्रों को दी जाएंगी. इसके लिए कानून में बदलाव किया जाएगा. उन्हें दूसरे राज्यों में नौकरी के लिए नहीं जाना पड़ेगा. शिवराज सिंह चौहान की इस घोषणा के बाद देश में मौलिक अधिकारों पर बहस छिड़ सकती है. सवाल उठ सकता है कि क्या यह जन्मस्थान और क्षेत्रवाद के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं है?

क्या कहता है संविधान    

शिवराज की घोषणा के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू की आई. उन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा कि धरती का लाल (जन्म स्थान के आधार पर) सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)ई का उल्लंघन करता है. संविधान में उल्लेख है कि भारत के सभी नागरिकों को भारत के किसी भी हिस्से में निवास करने और बसने का अधिकार है. उल्लेखनीय है कि इसी तरह संविधान के अनुच्छेद 16(2) में प्रावधान है कि किसी भी रोजगार, कार्यालय के संबंध में देश का कोई भी नागरिक केवल धर्म, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान, निवास या इनमें से किसी के लिए भी अयोग्य नहीं माना जाएगा या उससे भेदभाव नहीं किया जाएगा. संविधान का आर्टिकल 14 सबको समानता का अधिकार देता है. किसी से भी भेदभाव नहीं करने की बात आर्टिकल 14 से जुड़े एक अन्य आर्टिकल 15 में भी कही गई है. भारत का संविधान भारत के नागरिकों को भारत में कहीं भी (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) रोजगार एवं कारोबार करने का अधिकार देता है. यहां बता दें कि क्षेत्रवाद के आधार पर आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी सख्त रहा है.

शिवराज की घोषणा कहीं चुनावी शिगूफा तो नहीं
राज्य में जल्द ही 27 सीटों पर उपचुनाव होने हैं. इनमें से अधिकांश वो सीटें हैं, जिन पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते ज्योतिरादित्य समर्थक विधायकों की बगावत और उनके भाजपा में शामिल होने की वजह से 20 मार्च 2020 को कमलनाथ की सरकार गिर गई थी और शिवराज सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन गई थी. शिवराज का लंबा वक्त कोरोना महामारी से जूझते और बिना मंत्रियों के सरकार चलाते बीता. राज्य में कोई कामकाज नहीं हुआ. अर्थव्यवस्था की हालत बेहद खस्ता है, बेरोजगारी अपने चरम पर है और चुनाव सिर पर हैं. राजनीति के जानकार मानते हैं कि शिवराज की मप्र के लोगों को सरकारी नौकरियों में रोजगार देने की घोषणा बहुत अच्छी है, लेकिन ऐन चुनाव से पहले शिवराज का “लोकल के लिए वोकल” होना याने स्थानीयों को नौकरी देने का ऐलान चुनावी शिगूफे से ज्यादा कुछ नहीं लगता है. विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा कर वह युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि बेरोजगार युवाओं में सरकार के प्रति भारी गुस्सा और नाराजगी है.

उधर, मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद कांग्रेस ने भी सियासी संग्राम छेड़ दिया है. बीते दिनों पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक के बाद एक कई ट्वीट किए. एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि मैंने अपनी 15 महीने की सरकार में प्रदेश के युवाओं को प्राथमिकता से रोजगार देने के लिए उद्योग नीति बदली और निजी क्षेत्रों में 70 फीसदी युवाओं को रोजगार देना अनिवार्य किया. युवा स्वाभिमान योजना लागू कर रोजगार देने की दिशा में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए. एक ट्वीट में कमलनाथ ने शिवराज पर व्यंग्य करते हुए लिखा कि चलिए आप 15 वर्ष बाद युवाओं के रोजगार को लेकर नींद से तो जागे और आपने प्रदेश के युवाओं को प्राथमिकता से नौकरी देने के हमारे निर्णय के अनुरूप घोषणा की. इस बात का ध्यान रखा जाए कि उपचुनावों को देखते हुए आपकी घोषणा केवल घोषणा न रह जाए, अन्यथा कांग्रेस चुप बैठने वाली नहीं है.


अन्य राज्यों में क्या हैं नियमबता दें कि मप्र ने स्थानीय नागरिकों को नौकरियों में प्राथमिकता देने की कोई अनोखी पहल नहीं की है. कुछ राज्यों में नौकरियों के लिए मूल निवासी होने, कुछ वर्ष राज्य में रहने, बोर्ड परीक्षाएं राज्य से उत्तीर्ण करने को आधार बनाया गया है, तो कुछ ने भाषा जानने की अनिवार्यता रखी है. उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में 15 साल से ज्यादा रह चुके और मराठी के जानकार युवा ही नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं. इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में नौकरी के लिए मूल निवासी होना अनिवार्य किया गया है. सिर्फ राज्य के बस्तर संभाग के सभी सात जिलों में सरकारी नौकरियों में केवल तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के लिए शत-प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू है. वहीं  गुजरात में गुजराती भाषा जानना, यूपी में 5 वर्ष निरंतर और स्थायी निवासी होना अनिवार्य है. वहीं जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरियां वहां रहने वालों के लिए ही आरक्षित है. बंगाल में कुछ पदों पर नियुक्ति के लिए बंगाली लिखना-पढ़ना आना अनिवार्य है. उत्तराखंड में कुछ पदों के लिए दसवीं बोर्ड, बिहार में 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण होना जरूरी है. हरियाणा में निजी क्षेत्र में 70 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था स्थानीय नागरिकों के लिए की गई है. आंध्रप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने अपने यहां स्थानीय लोगों को नौकरी में 75 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी.

हो सकता है मप्र सरकार भी अन्य राज्यों के नक्शे कदम पर चलते हुए नौकरियों में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने के लिए राज्य का मूल निवासी होने या राज्य से 10वीं, 12वीं बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण होने, राज्य में एक निश्चित अवधि तक निवास करने की अनिवार्यता का नियम लागू कर दे. साथ ही यह भी हो सकता है कि वह केवल तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के लिए नए प्रावधान लागू करे.


कोर्ट में फंस सकता है मामला

अगर पूर्व प्रमुख सचिव मुक्तेश वार्ष्णेय की माने तो किसी भी तरीके से मध्य प्रदेश के लोगों के लिए स्थान सुरक्षित रखना आरक्षण की श्रेणी में आ जाएगा. वह कहते हैं कि ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के 50 फीसदी आरक्षण के नियम से ज्यादा होगा. सरकार चाहे कोई भी रास्ता निकालें, कोर्ट में तो चुनौती दी ही जा सकती है. राज्य सेवा आयोग के पूर्व सचिव मनोहर दुबे के मुताबिक तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों को लेकर कोई नियम बनता है, तो इसमें कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन पहली और दूसरी श्रेणी की नियुक्तियों के लिए क्या नियम बनते हैं, यह उस पर निर्भर करेगा. लोग अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं, जिससे मसला उलझ सकता है. बता दें कि राज्य सरकार ने कुछ साल पहले नर्सों की भर्ती के लिए भी स्थानीय को प्राथमिकता वाला नियम लागू किया था, जिसे प्रदेश भर में विरोध के बाद वापस लेना पड़ा था.

विवेक तन्खा के तल्ख तेवर

राज्यसभा सांसद, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा ने शिवराज की नौकरियों वाली घोषणा को लेकर बेहद सख्त पत्र लिखा है. उन्होंने पत्र में लिखा “लोकलुभावन फैसलों का इस वक्त पागलपन चरम पर है.“ उन्होंने पूछा है कि दूसरे राज्यों में मध्य प्रदेश के करीब एक करोड़ लोग काम करते हैं, ऐसे में मप्र के भीतर सिर्फ राज्य के निवासियों को ही सरकारी नौकरी देने का प्रावधान कहां तक सही है. तन्खा ने कहा है कि कानून में भी 100 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान नहीं है. उन्होंने कहा, 'अगर नेता आम जनता को जुमलों के जरिए खुश रखते रहेंगे तो ये लोकतंत्र की हार है.'

मप्र में साल दर साल बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है. रोजगार दफ्तर के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या 30 लाख से ऊपर है. मप्र के सरकारी महकमों में डेढ़ लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं. अधिकांश विभागों में या तो काम ठप पड़ा है या आउटसोर्सिंग पर चल रहा है. पुलिस महकमे में 22 हजार, बिजली विभाग में 30 हजार, वन विभाग में 24 हजार, स्वास्थ्य विभाग में 20 हजार, विश्वविद्यालयों में 5 हजार, नगर निगमों में 25 हजार और जिला प्रशासन में करीब 10 हजार समेत कई विभागों में हजारों पद खाली हैं, जिन पर भर्ती होना है.


कर्ज के भयावह होते हालात

मप्र सरकार लगातार कर्ज में डूबती जा रही है. वित्तीय वर्ष 2002-2003 में जहां मप्र पर 23 हजार करोड़ का कर्ज था, जो वर्ष 2019-20 तक बढ़कर 2 लाख 10 हजार करोड़ से ऊपर जा पहुंचा है. राज्य में पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार ने 2 हजार करोड़ का कर्ज लिया था और सत्ता संभालने के बाद पिछले तीन महीनों में कोरोना महामारी के दौरान शिवराज सरकार बाजार से 4 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले चुकी है. यह पैसा रुके हुए कामों को पूरा करने के नाम पर लिया गया. कंगाली के हालात इस कदर भयावह हैं कि गुजरे वित्तीय वर्ष तक प्रदेश के हर नागरिक, यहां तक कि पैदा हुआ बच्चा भी 29 हजार रुपए से ज्यादा का कर्जदार हो चुका है. ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियां देने और नौकरी पानेवालों को वेतन सरकार कहां से देगी, ये कोई नहीं जानता.

पिछले डेढ़ दशक में हमने कई चुनावों में पैसा पानी की तरह बहते देखा. नेताओं की खरीद-फरोख्त, सरकारें बनाने-गिराने की उठापटक, योजनाओं में लूट-खसोट, भ्रष्टाचार में गले-गले डूबे नेता, फलते-फूलते माफिया, लोकलुभावन नारे-वादे खूब देखा. प्रदेश में दर्जनों इन्वेस्टर मीट्स और लाखों करोड़ों के निवेश की घोषणाएं सुनी, लेकिन युवाओं को रोजगार देने वाला बुनियादी ढांचा तैयार होते नहीं देखा. लाखों पढ़े-लिखे युवा प्रदेश में नौकरी न होने की वजह से अन्य राज्यों में चले जाते हैं, क्योंकि जिंदा तो रहना है ना. ऐसे में शिवराज सिंह की घोषणा के मायने तलाशना लाजिमी ही है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

सामाजिक, विकास परक, राजनीतिक विषयों पर तीन दशक से सक्रिय. मीडिया संस्थानों में संपादकीय दायित्व का निर्वाह करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र लेखन. कविता, शायरी और जीवन में गहरी रुचि.

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First published: August 20, 2020, 4:15 PM IST
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