सुनो सरकार, सेनेटरी पैड्स भी तो अत्यावश्यक वस्तु है...

लंबी दूरी तय करके लौट रही, इन मजदूरों के समूह में हमारी आधी आबादी याने बड़ी संख्या में महिलाएं, लड़कियां भी शामिल हैं, जिनके सामने चुनौती कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के साथ ही माहवारी में असावधानी से पैदा होने वाले संक्रमण से निपटने की भी है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 30, 2020, 2:09 PM IST
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सुनो सरकार, सेनेटरी पैड्स भी तो अत्यावश्यक वस्तु है...
भारत में 36 फीसदी महिलाएं ही सेनेटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं
कोरोना वायरस (Coronavirus) से जूझ रही पूरी दुनिया के लोग भयानक तनाव और डिप्रेशन के दौर से गुजर रहे हैं. ऐसे में देश में उन महिलाओं के तनाव और डिप्रेशन के बारे में सोचिए जो लॉकडाउन (Lockdown) के चलते काम छिन जाने के बाद लंबी दूरी के लिए पलायन करते हुए सड़क पर हैं, बेघर हैं और मासिक धर्म (माहवारी) की मुश्किल पीड़ा से गुजर रही हैं, जिसे संभालने के लिए उनके पास न कोई साफ कपड़ा है, न सेनेटरी पैड्स. इसके लिए उनके पास राख, रेत या अखबारी कागज के टुकड़े हैं, जो संक्रमण की दोहरी मार दे सकते हैं, बीमारी देकर जान भी ले सकते हैं. यह वो हकीकत है, जिन्हें देश लॉकडाउन के घोषणा के बाद पिछले 5 दिनों से देख रहा है. घर लौटने की आपाधापी और सड़कों पर पैदल मार्च की तस्वीरें और जो जहां है, उसे वहीं रोक दीजिए की अपीलें और आदेश टीवी, डिजिटल, सोशल, अखबारी मीडिया की सुर्खियां हैं, लेकिन सेनेटरी पैड्स की अहम जरूरत पर किसी का ध्यान नहीं है.

इसे अदूरदर्शिता ही कहेंगे कि कोरोना वायरस से लडऩे के लिए अचानक 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा करने से पहले यह किसी ने नहीं सोचा कि उन करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों का क्या होगा, जो गांवों, कस्बों से दूसरे राज्यों के शहरों में मेहनत-मजदूरी करने गए हैं. पिछले रविवार को जनता कर्फ्यू और थाली-ताली बजाने के 2 दिन बाद लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही देश में सब कुछ बंद हो गया. कारखाने, फैक्ट्रियां, दफ्तर सहित घर-बाहर के हर काम पर तालाबंदी हो गई. एकदम से करोड़ों दिहाड़ी मजदूर बेकार हो गए. कामबंदी से जिन मजदूरों के सिर से छत भी छिन चुकी थी, वह बेघर थे, सड़क पर थे, उनके लिए न रोजी का इंतजाम था, न रोटी का, वो कहां जाते? ट्रेन-बस सहित आवागमन के सारे साधन बंद थे और जिलों की सीमाएं सील, लिहाजा ये श्रमिक अपने गांव, शहर, सूबे की ओर पैदल मार्च करते हुए निकल पड़े. कोरोना से बचने सोशल डिस्टेंसिंग का फार्मूला इस भीड़ में तार-तार था.

लंबी दूरी तय करके लौट रही, इन मजदूरों के समूह में हमारी आधी आबादी याने बड़ी संख्या में महिलाएं, लड़कियां भी शामिल हैं, जिनके सामने चुनौती कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के साथ ही माहवारी में असावधानी से पैदा होने वाले संक्रमण से निपटने की भी है. इस दौरान कई महिलाएं माहवारी के साथ चल रही हैं. पैदल मार्च करती यह महिलाएं किस तकलीफ से गुजर रही होंगी, इसका तो अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. ये मुश्किल उन महिलाओं के सामने में भी है, जो शहरी इलाकों में कई घरों में झाड़ू-पोछा, बर्तन धोने, खाना बनाने, बच्चे खिलाने आदि का काम करती थीं. कोरोना के संक्रमण के भय से उन्हें भी आने से मना कर दिया गया. काम छिना तो उनके सामने संकट पैदा हो गया है कि वो रोटी की जुगाड़ करें या मासिक धर्म के समय में खुद के लिए कपड़ा या सेनेटरी पैड्स की व्यवस्था को प्राथमिकता दें. ये स्थिति अचानक लॉकडाउन से भोपाल ही नहीं, पूरे देश में उन छात्राओं के सामने भी खड़ी हुई, जिनके पीजी बंद कर दिए गए. वह भी बड़ी संख्या में लॉकडाउन के चलते समूहों में पैदल अपने घरों के लिए चल दीं.

संकोची समाज
अभी भारतीय समाज में बड़ी संख्या में लड़कियां, महिलाएं माहवारी को लेकर कई मिथकों के साथ संकोचों का भी सामना करती हैं. यहां सामान्य घरों की युवा बहन, बेटियां, महिलाएं मासिक धर्म और संक्रमण से बचाव और सेनेटरी पैड्स जैसे शब्दों का जिक्र करने में भी पिता-भाई, डॉक्टर, दुकानदार और टीचर्स के सामने झिझकती हैं. यही वजह है कि स्कूलों में पानी और शौचालय की व्यवस्था न होने की वजह से ड्रॉपआउट्स की सबसे ज्यादा संख्या छात्राओं की होती है. लॉकडाउन के इस दौर में उनकी सैनटरी पैड्स की समस्या का समाधान कैसे होगा सबसे बड़ा सवाल है.

 

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सरकार सेनेटरी पैड्स को आवश्यक वस्तु मानती ही नहीं

केन्द्र हो या राज्य सरकारें महिलाओं के स्वास्थ्य के मामले में कितनी संवेदनशील हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में लॉकडाउन के दौरान सरकार ने राशन, दूध, दवाएं समेत कई वस्तुओं को अत्यावश्यक वस्तुओं को सूची में रखा है, लेकिन महिलाओं की सेहत के लिए सबसे ज्यादा जरूरी सैनेटरी पैड्स जैसी वस्तु सरकार की सूची से बाहर है. सरकार की इस अदूरदर्शिता का नतीजा यह है कि कि देश में सैनटरी पैड्स फैक्ट्रियां बंद कर दी गई हैं. दवा दुकानों, जनरल स्टोर्स, शापिंग मॉल्स में सैनेटरी पैड्स खत्म हो रहे हैं. ये बात चेताने वाली है कि जानलेवा कोरोना वायरस माहवारी के दौरान सुरक्षित सेनेटरी पैड्स के इस्तेमाल नहीं करने की स्थिति में अपने संक्रमण से भी महिलाओं को शिकार बना सकता है.

सेनेटरी पैड्स आएंगे कहां से

फेमेनाइन एंड इन्फेंट हाईजीन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफआईएचए) के प्रेसिडेंट राजेश शाह के मुताबिक भारत में सेनेटरी पैड्स की 10 से 15 फीसदी मांग की आपूर्ति चीन से होती है और यह पैड्स जॉनसन एंड जॉनसन जैसी बड़ी कंपनियों से भी आयात किए जाते हैं. यहां यह बता देना जरूरी है कि देश लॉक है, इसलिए चीन, अमेरिका या अन्य किसी देश से सेनेटरी पैड्स की आपूर्ति बंद है. चूंकि सरकार इसे अत्यावश्यक नहीं मानती, इसलिए देश में इसकी फैक्ट्रियां भी बंद हैं. जब सेनेटरी पैड्स का उत्पादन और आपूर्ति दोनों ही बंद हैं, तो महिलाओं को माहवारी के दौरान सेहत की सुरक्षा कैसे मिलेगी, यह सबसे बड़ा सवाल है. सरकार ने वैसे भी सेनेटरी पैड्स को कभी गंभीरता से नहीं लिया, इसलिए पूर्व में सिंदूर, बिंदी, आलता जैसी वस्तुओं को तो जीएसटी से बाहर रखा, लेकिन सेनेटरी पैड्स पर 12फीसदी जीएसटी लगा दिया. बाद में कई महीनों तक जनता, विपक्ष, सामाजिक संगठनों के हल्ले के बाद इस पर से जीएसटी घटाया गया.

देश की स्थिति पर एक नजर

नेशनल फैमिली हेल्थ के दो सर्वे के आंकड़ों में अंतर है. एक सर्वे बताता है कि भारत में 36 फीसदी महिलाएं ही सेनेटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं, दूसरा सर्वे कहता है ग्रामीण क्षेत्रों में 48.5 फीसदी और शहरों में 77.5 फीसदी महिलाएं तथा औसतन कुल 57 फीसदी महिलाएं सेनेटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं.

क्या बीमारियां हो सकती हैं

माहवारी के मुश्किल दौर में कपड़ा, राख, रेत या कागज के इस्तेमाल से संक्रमण हो सकता है और महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर, यूट्रस इंफेक्शन, मूत्र या मूत्राशय संबंधी बीमारियां हो सकती हैं. संक्रमण से सुरक्षित न करने पर महिला की जान भी जा सकती है.

हकीकत पर एक नजर

लॉकडाउन की वजह से अपने घर भोपाल लौटीं दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और सेनेटरी पैड्स को लेकर बात करो-छुपाओ मत-सेनेटरी पैड्स का इस्तेमाल करो मैसेज के साथ कैंपेन चलाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता यशस्वी कुमुद बताती हैं कि भोपाल के ईदगाह हिल्स क्षेत्र में गुजरात से यहां आकर काम करने वालों की झोपडिय़ां हैं, इनके पास न तो कपड़ा है न सेनटरी पैड्स. लॉकडाउन में सब बंद है. यहां की एक महिला कहती है कि उन (माहवारी) दिनों के लिए कपड़ा कहां से जुटाएं. दूसरी महिला कहती है कि दो वक्त का खाना मुश्किल से मिलता है, सड़क किनारे रात बिताते हैं, सेनेटरी पैड्स खरीदना उसके बस की बात नहीं. फिर क्या करोगी, यह पूछने पर वह कहती है कि हम माहवारी तो बंद नहीं कर सकते, जैसे-तैसे संभल कर चलना होता है.

पुराने कपड़ों या राख, रेत या अखबार के कागज से काम चलाएंगे. मदर इंडिया कालोनी में रहने वाली पूनम(बदला हुआ नाम) की मां कहती है कि बेटी जिद करती है कि वो तो पैड्स का इस्तेमाल करेगी, लेकिन इस गरीबी में पैड लाएं कहां से. सेनेटरी पैड का पैकेट 50 से 100 रुपए तक आता है, हम तो घर में दो महिलाएं हैं, इतना खर्च हम नहीं उठा सकते. पैड्स सस्ते या मुफ्त में कहां मिलते हैं, यह मालूम नहीं. कई बार तो कपड़े की रगड़ से चमड़ी छिल जाती है, जलन होती हैै, तकलीफें तो बहुत हैं, पर सह जाते हैं, आखिर करें तो क्या करें?

सामाजिक संगठनों की मांग

लॉकडाउन के दौरान कुछ सामाजिक धार्मिक संगठन भोजन, नमक, हल्दी, आटा, दाल, चावल बांट कर राहत तो पहुंचा रहे हैं, लेकिन माहवारी के मुश्किल दौर में सेनेटरी पैड्स भी बहुत जरूरी है. इसलिए सरकार इसे अत्यावश्यक वस्तुओं की सूची में शामिल कर उत्पादन शुरू कराए और जरुरतमंद महिलाओं तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करे.

 

ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं और कई संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है.

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First published: March 30, 2020, 1:53 PM IST
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