मजदूरों की घर वापसी: सड़कों पर दर्द लाइव

Lockdown: पुणे से इलाहाबाद अपने गांव लौट रहे लव कुमार शर्मा का कहना है कि 'कोरोना (Coronavirus) से ज्यादा खतरा भूख से मरने का हो गया था, इसलिए सोचा चलो वापस चले, एक उम्मीद तो है कि अपने गांव की मिट्टी दो वक्त की रोटी तो दे ही देगी.'

Source: News18Hindi Last updated on: May 15, 2020, 8:28 PM IST
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मजदूरों की घर वापसी: सड़कों पर दर्द लाइव
भारी संख्‍या में प्रवासी अपने घर लौट रहे हैं.
इन दिनों सड़कों पर दर्द लाइव देखना हो तो देश के किसी भी राजमार्ग पर, किसी भी कोने में खड़े हो जाइए. सैकड़ों मील का सफर नापते हजारों-लाखों कदम, पसीने से नहाए जिस्म, आंसुओं से भरी आंखें, भूख-प्यास से लड़ते चेहरे देखने को मिल जाएंगे. कोई अकेले या हुजूम में पैदल चला जा रहा है, तो कोई साइकिल, मोटर साइकिल पर सवार है. कोई भीड़ ढुलाई वाहनों में ऐसे भरी है, जैसे जानवरों को भरकर कांजीहाउस ले जाया जा रहा हो.

न भूख की फिक्र है, न प्यास की चिंता. न भीषण गर्मी के थपेड़े, न आसमानी बिजली इन्हें डरा पा रही है. इनमें तो बस एक ही बेताबी है कि चाहे जैसे हो, हम वापस अपने घर पहुंच जाएं. जी, हां, ये हैं मुल्क के प्रवासी मजदूर, जो खेत-खलिहान, गांव-गली घर छोड़कर गए तो थे दूसरे राज्यों में रोजी रोटी, दो पैसा कमाने, लेकिन अब अपना सब कुछ लुटा कर, जान बचाकर घर लौट रहे हैं. कोरोना महामारी के संकट की वजह से करीब दो महीने पूरे करने जा रहे लंबे लॉकडाउन और सिस्टम की बेदर्दी, बदइंतजामी ने इनका हौसला तोड़ दिया है. इस रेले में दो गज की दूरी बनाए रखने की पीएम की हिदायत या सोशल डिस्टेंसिंग जैसा शब्द पूरी तरह से बेमानी है. बिना जांच पड़ताल के हो रही इन प्रवासी श्रमिकों की घरवापसी अपने साथ कोरोना संक्रमण का खतरा लेकर भी आ रही है, सभी को सावधान रहने की जरूरत है.

पुणे से इलाहाबाद अपने गांव लौट रहे लव कुमार शर्मा का कहना है कि 'कोरोना से ज्यादा खतरा भूख से मरने का हो गया था, इसलिए सोचा चलो वापस चले, एक उम्मीद तो है कि अपने गांव की मिट्टी दो वक्त की रोटी तो दे ही देगी.' भोपाल-ब्यावरा नेशनल हाइवे पर हमारी मुलाकात महाराष्ट्र के मुंबई, नासिक, औरंगाबाद, पुणे जैसे शहरों से लौट रहे ऐसे सैकड़ों लोगों से हुई, जो मप्र के कटनी, रीवा-सीधी शहडोल, यूपी के इलाहाबाद, प्रतापगढ़, बांदा, कौशाम्बी, बिहार के पटना, गया, खगडिय़ा आदि जिलों में अपने घर वापस लौट रहे थे.

यह ऐसा नेशनल हाईवे है, जहां से गुजर रहे मजदूरों का रेला पिछले कई दिनों से वक्त के 24 घंटे लगातार देखा जा सकता है. पुणे से लौट रहे एक मिनी ट्रक में 60 लोग मवेशियों की तरह भरे हुए थे. बायपास चौराहे पर पानी लेने रुके इस समूह में शामिल मनोज कुमार ने बताया कि "हममें से सब मजदूरी करते थे. कोई सैलून में काम करता था, कोई सिलाई कारखाने में, कोई कपड़ा कारखाने में. कोई सड़क बनाने, कोई मकान बनाने के काम में मजदूरी में लगा था. लॉकडाउन में सबकी नौकरी चली गई. मकान मालिकों ने किराया न दे पाने की वजह से घर से निकाल दिया. कई रातें सड़कों पर गुजारनी पड़ी. सरकार या किसी से कोई मदद नहीं मिली, तो वहां रहकर क्या करते. मिनी ट्रक वाले ने हर व्यक्ति से इलाहाबाद तक पहुंचाने के लिए किराए के 4-4 हजार रुपए वसूले हैं."
मनोज के साथी शिवलाल मिश्रा आंखों में आंसू भरे कहते हैं कि "कोरोना ने हमसे सब कुछ छीन लिया, जो कुछ कमाया था, लुट गया. गुजरे मंगलवार को खाना खाया था, उसके बाद से किसी के दिए बिस्किट के सहारे काम चल रहा है. पता नहीं घर कब पहुंचेंगे. गौर करने वाली बात यह है कि वापस लौट रहे इन मजदूरों में से की किसी जांच नहीं हुई है. पूछने पर कहते हैं कि इलाहाबाद पहुंचने पर जांच कराएंगे, फिर वहां एक दिन रुकने के बाद अपने-अपने घर जाएंगे."

एक अन्य मिनी ट्रक में अपने 24 साथियों के साथ घर लौट रहा नीरज कहता है कि "यहां पूरे रास्ते हजारों लोग चले आ रहे है. दर्द क्या होता है, जरा रुककर देखिए तो साहब. मैनें इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है, काम ढूंढने कौशाम्बी से नासिक गया था, लॉकडाउन में फंस गया. रास्ते में लोग खाने-पीने में मदद न करते, तो भूखे मर जाते."

चौराहे पर कुछ परिवार भी डेरा डाले थे, जिनमें करीब 6 महिलाएं, 8 बच्चे और घर के पुरुष और दो बुजुर्ग थे. यह सभी लोग मुंबई के धारावी की खोलियों में रहते थे और मेहनत मजदूरी कर अपना जीवनयापन करते थे. बता दें कि महाराष्ट्र का मुंबई शहर कोरोना वायरस का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट है, महाराष्ट्र में कोरोना से मौतों का आंकड़ा हजार पार कर गया है, जिसमें से 60 फीसदी मौतें अकेले मुंबई में हुई हैं और इसी मुंबई में एशिया के सबसे बड़े स्लम धारावी में 30 से ज्यादा मौतें कोरोना की वजह से हो चुकीं है. धारावी से चले इन परिवारों के मुखिया ललनराम ने बताया कि जान बचाकर भागना पड़ा, क्योंकि धारावी में कोरोना तेजी से फैल रहा है. मुंबई से इंदौर तक तो ट्रक में बैठकर आ गए. पैसे खत्म हो गए, तो इंदौर से पैदल निकल पड़े, 185 किलोमीटर का सफर करके आज भोपाल पहुंचे हैं. यूपी के बांदा तक जाना है, देखते हैं, कैसे पहुंच पाते हैं. इन्हीं में से एक देवेन्द्र सिंह अपना दर्द बयां करते हुए कहते हैं कि "जिस कपड़ा कंपनी में मैंने अपनी जिंदगी के 10 साल दिए, उसी के मालिक ने नौकरी से निकाल दिया. एक सवाल के जवाब में वो कहते हैं अब भूखे-प्यासे उसी गांव लौट रहे हैं, जहां जाने की फुर्सत न थी."भोपाल-ब्यावरा बायपास का यह चौराहा रोज दर्दनाक और बेबसी की हजारों तस्वीरों और कहानियों को अपने दामन में समेटे है, जिन्हें देख-सुन किसी का दिल दर्द से तड़प सकता है. चौराहे पर महाराष्ट्र से आए लोगों को रीवा, सतना कटनी ले जाने के लिए तैयार खड़ी एक बस भी दिखी, लेकिन राज्य से बाहर प्रवासियों को ले जाने का कोई इंतजाम नजर नहीं आया.

ये कैसा सफर है
सरकार की ओर से पुख्ता इंतजाम न होने से घर लौटने को लेकर बदहवासी का आलम है. लोग सड़कों पर दम तोड़ रहे हैं. 4 दिन पहले मप्र के ही इंदौर-देवास बायपास रोड पर पानी मांगते-मांगते झारखंड के एक मजदूर की मौत हो गई थी. देवास में ही मुंबई के भिवंडी से अपने भाई, पत्नी के साथ इलाहाबाद लौट रहे असगर अली नाम के मजदूर की रास्ते में भीषण गर्मी की वजह से अचानक तबीयत खराब हुई. न डॉक्टर मिला, न इलाज, असगर ने अपने भाई की गोद में दम तोड़ दिया. 13 मई की एक और मार्मिक घटना पर नजर डालिए, जहां महाराष्ट्र के नासिक से मप्र के सतना जिले की ओर लौट रही एक गर्भवती महिला श्रमिक ने रास्ते में ही अपने बच्चे को जन्म दिया और दो घंटे के आराम के बाद ही उसे 150 किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ी. इसी तरह गुरूवार को गुना में 60 प्रवासी मजदूरों से भरी बस एक कंटेनर से टकरा गई.

इस हादसे में 9 मजदूरों की मौत हो गई, 50 लोग घायल हो गए. मप्र के ही धार जिले के पिपल्दा में मजदूरों को लेकर जा रहा मिनी ट्रक पेड़ से टकरा गया, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई. अभी पैदल घर लौट रहे और औरंगाबाद में रेल पटरियों पर सो जाने से मप्र के 16 मजदूरों के कट मरने की डरा देने वाली खबरें हम पढ़ चुके हैं. इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर भी लोगों को काफी हैरानी हुई थी, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि कोई सड़क पर चलने की बजाय पटरी पर सो जाए, तो क्या किया जा सकता है, पटरियों की निगरानी तो नहीं की जा सकती. कोर्ट की यह टिप्पणी तो सही है, लेकिन सवाल यह है कि जब मजदूरों को सड़कों पर चलने से खदेड़ा जाएगा, उनसे उठक-बैठक लगवाई जाएगी, तो वह किस रास्ते पर चलकर अपने घर पहुंचें? क्या अपने जलसे-सभाओं के लिए एक ही दिन में गांव-गांव में बस-ट्रकों के जरिए भीड़ जुटा लेने वाले दल, सरकारें मजदूरों के लिए उसी तत्परता से बस नहीं चला सकते?

सरकारी कोशिशें नाकाफी
गृह मंत्रालय ने राज्यों से कहा है कि प्रवासी मजदूरों को स्टेशन तक पहुंचाने के लिए बसें किराए पर ले सकते हैं, लेकिन मैदानी हकीकत साफ बता रही हैं कि मप्र में लोगों को घर तक पहुंचाने की सरकारी कोशिशें कितनी मैदानी हैं, वरना सड़कों पर बदहवास भागते इन प्रवासी मजदूरों के हजारों चेहरे नहीं दिखते. यहां यह भी बता दें कि देश के रेल मंत्रालय ने प्रवासियों को घर पहुंचाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई हैं, लेकिन इनके अलावा आवागमन की कोई व्यवस्था नहीं की गई है. राज्य अपने-अपने स्तर पर जो प्रयास कर रहे हैं, वह नाकाफी हैं. यही वजह है कि अभी भी हजारों मजदूर पैदल ही घर लौटने को बेबस हैं. ऐसे में उन्हें कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा रहा है.

गांव तक पहुंचा कोरोना
मप्र में भोपाल, इंदौर, उज्जैन, खरगोन जैसे हॉटस्पॉट सेंटरों तक ही कोरोना कहर नहीं ढा रहा, बल्कि यह वायरस गांवों तक पहुंच चुका है. गांवों में कोरोना मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. दरअसल लॉकडाउन में प्रवासियों के बिना जांच के या वाहनों में या पैदल गांवों में पहुंचने पर यह खतरा बढ़ा है. ग्वालियर में पत्रकार आशेन्द्र सिंह भदौरिया ने हमें बताया कि भिंड, मुरैना, ग्वालियर और इनसे सटे गांवों में पिछले एक हफ्ते के भीतर दर्जनों कोरोना के मरीज मिले हैं, जो अन्य प्रदेशों से लौटे हैं. इधर भोपाल से सटे रायसेन, होशंगाबाद, बैतूल जिले के गांवों में तेजी से कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ी है. जैसे-जैसे अन्य राज्यों से प्रवासी वापस आ रहे हैं, यह खतरा और बढता जा रहा है. बता दें कि मप्र में अब तक कोरोना के शिकार मरीजों की संख्या साढ़े 4 हजार के आंकड़े को छू रही है.

प्रवासी श्रमिकों के दर्द से भरी तस्वीरें, दास्तानें 1983 में आई कालका फिल्म के एक गीत की याद दिलाती हैं, जिसमें मजदूर व्यथा के साथ गा रहे हैं.. ..
गांव गली सब बिछड़े हमसे,छूटी खेती-बाड़ी
दो रोटिन की आस में देखो, का दुर्गत भईल हमारी.

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ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं और कई संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है.

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First published: May 15, 2020, 8:17 PM IST
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