Daughters Day: नजरिया बदलिए, बेटियों की दुनिया बदल जाएगी

Daughter’s Day 2020: हम बदलेंगे, तब सब बदलेंगे..इस भावना के साथ ये संकल्प लेकर कन्या को दान की वस्तु नहीं इंसान समझो, मत बनाओ देवी की भावना का स्वयं से शुरू कर विस्तार करना होगा. कोई भी संस्कार जब बेटी के बिना पूरा नहीं होता तो अंतिम संस्कार भी करने पर रोक क्यों? इस धारणा को भी मान्य करना होगा.

Source: News18Hindi Last updated on: September 27, 2020, 5:26 AM IST
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Daughters Day: नजरिया बदलिए, बेटियों की दुनिया बदल जाएगी
राजनीति हो या खेल का मैदान, अंतरिक्ष हो या हिमालय की चोटी या फिर प्रतियोगिता परीक्षाओं की जंग, शायद ही जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र हो, जहां देश की बेटियों ने नाम ना रोशन किया है.
जब तक बेटी के जन्म का बेटे के जन्म की तरह स्वागत नहीं किया जाता, उत्सव नहीं मनाया जाता, हमें यह मान लेना चाहिए कि भारत आंशिक अपंगता से पीड़ित है- महात्मा गांधी

आज डॉटर्स डे (Daughters Day) यानी बेटी दिवस है. आप भी बेटियों के जन्म का उत्सव मनाइये, उन्हें खुश करने के लिए उपहार दीजिए, लेकिन उसके साथ ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की लिखी इन चंद लाइनों को पढ़ते हुए खुद से यह सवाल जरूर कीजिए कि क्या हम बेटियों को देवी दुर्गा, लक्ष्मी की तरह महिमा मंडित करने की बजाय वास्तव में उन्हें जन्म लेने, पढ़ने, बढ़ने और स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में खुद को गढ़ने का अवसर दे रहे हैं? यह केवल हमारी, आपकी ही नहीं, दुनिया की उन तमाम बेटियों की खुशियों का भी सवाल है, जिनकी बेहतरी के लिए हमें लंबा सफर तय करना है. बस बेटियों के हक में अपना नजरिया बदल डालिए, फिर देखिये उनकी दुनिया ही बदल जाएगी.

दुनिया के तमाम देशों में हर साल सितंबर महीने के चौथे रविवार (Sunday) को डॉटर्स डे मनाया जाता है. जिस प्रकार से हम मदर्स डे, फादर्स डे अपने माता-पिता को सम्मान देने के लिए मनाते हैं, उसी प्रकार से बेटियों को सम्मान देने के लिए डॉटर्स डे मनाया जाता है. अलग-अलग देशों में अलग-अलग दिनों में यह दिवस मनाया जाता है. लोग इस दिन अपनी बेटी के साथ समय बिताते हैं, उपहार देते हैं या उसकी कोई इच्छा पूरी करते हैं. सोशल मीडिया पर पेरेंट्स (Parents) अपनी बेटियों के साथ तस्वीरें, मीठी यादें, उसकी उपलब्धियों को शेयर करते हैं. सबसे जरूरी ये है कि बेटियों को महसूस करवाएं कि वो आपके जीवन में बहुत खास (Special) हैं.

क्या है डाटर्स डे का महत्व
यूनिसेफ (UNICEF) और चाइल्ड राइट्स एंड यू (CRY) नामक संस्थाओं ने वर्ष 2007 के सितंबर माह के चौथे रविवार यानी 23 सितंबर 2007 को पहली बार डाटर्स डे मनाया था, तभी से इसे हर साल मनाया जा रहा है. भारत में रूढ़िवादी पितृसत्तामक मानसिकता (patriarchal mindset) के चलते बेटियों को बोझ समझने, जन्म से पहले कोख में ही मार देने, घरेलू हिंसा, दहेज, दुष्कर्म से बचाने और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के विरूद्ध लोगों को जागरूक करने के मकसद से ही डाटर्स डे मनाने की शुरूआत हुई थी. कोख में पलने वाली बेटी से लेकर शतायु स्त्री तक, वो चाहे जिस स्वरूप में हो, उसे जीवन का हर अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए, यही वास्तव में डाटर्स डे का मकसद है.

जो देश की हर बेटी को कुछ बड़ा करने के लिए प्रेरित करती रही हैं.


बेटियां बनीं प्रेरणाराजनीति हो या खेल का मैदान, अंतरिक्ष हो या हिमालय की चोटी या फिर प्रतियोगिता परीक्षाओं की जंग, शायद ही जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र हो, जहां देश की बेटियों ने नाम ना रोशन किया है. ओलंपिक खेलों में पदक जीतने वाली मुक्केबाज मैरीकाम, वेटलिफ्टर कर्णम मल्लेश्वरी, बैंडमिंटन में साइना नेहवाल, पीवी सिंधु, कुश्ती में साक्षी मलिक को कौन नहीं जानता. अंतरिक्ष में छलांग लगाने वाली कल्पना चावला और भारतीय मूल की सुनीता विलियम्स, हिमालय में विजय पताका फहराने वाली अरूणिमा सिन्हा, देश की पहली फाइटर प्लेन पायलट वनने वाली अवनि चतुर्वेदी, भावना कंठ, मोहना सिंह, राफेल उड़ाने वाली बनारस की शिवांगी सिंह, महिला क्रिकेट टीम की कप्तान रहीं मिताली राज क्या किसी पहचान की मोहताज हैं. दरअसल ये वो बेटियां हैं, जो देश की हर बेटी को कुछ बड़ा करने के लिए प्रेरित करती रही हैं. बेटियां परंपरागत भूमिकाओं से अलग अपनी नई पहचान बना रही हैं. आज की बेटियां घर के आंगन में अच्छी परवरिश पाकर शादी कर घर बसाने भर तक सीमित नहीं हैं. बस उन्हें चाहिए मां-बाप, सरकार और समाज का साथ, ताकि वह भी सुरक्षा और सम्मान का जीवन जीते हुए बुलंदियों को हासिल कर सकें.

एक हकीकत यह भी
बेटियों के जन्म को लेकर भारतीय समाज में कैसी मानसिकता है, इसका अंदाजा आप एकेडिमिक्स किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी आफ साइंस एंड टेक्नालाजी के देश के सभी राज्यों में किए गए एक शोध से लगा सकते हैं कि लिंग चयन आधारित गर्भपात के कारण 2030 तक भारत में 6.8 मिलियन बेटियों का जन्म कम होगा. यूपी में तो ये आंकड़ा 20 लाख लड़कियों के जन्म से पहले गायब यानि कम हो जाने का है. इसकी जड़ों में बेटियों को बोझ समझने वाला रूढ़िवादी सिस्टम है, जिसे खत्म करने के लिए तेजी से जेंडर समानता (Gender Equity) का अभियान चलाने की बात कही गई है.
यह शोध यह भी कहता है कि भारत में एक हजार लड़कों पर 900 से 930 लड़कियां तक का लिंगअनुपात है, जो यहां के लोगों के लड़कियों के प्रति व्यवहार को प्रदर्शित करता है. लड़के जहां कमाऊ पूत समझे जाते हैं, वहीं लड़कियां बोझ. लड़कों को लड़कियों से ज्यादा बेहतर खाना, कपड़े, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती हैं.
वहीं दूसरी ओर सच्चाई यह है कि कोख में मारी जा रही बेटियों से बहुत अधिक तादाद उन बेटियों, उन महिलाओं की है, जो कुपोषण, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के चलते, अशिक्षा, भूख और गरीबी के चलते दम तोड़ रहीं हैं. देश की 16 फीसदी लड़कियों की 8वीं से पहले ही पढ़ाई छूट जाती है. पिछड़े इलाकों में 30 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती है. लड़कियों के कपड़ों, उनके खेलने-कूदने, घर से बाहर निकलने, उनकी स्वतंत्रता को लेकर तमाम पाबंदियां निराशा के भाव पैदा करते हैं. आप अंदाजा लगा लगा सकते हैं कि मध्यप्रदेश में करीब एक दशक से बेटी बचाओ अभियान चल रहा है. केन्द्र की मोदी सरकार 2015 से बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान चला रही है और 2007 से देश में लोगों को जागरूक करने “डाटर्स डे” यानी बेटी दिवस मनाया जा रहा है. इस बीच केन्द्र सरकार ने सुकन्या समृद्धि योजना, बालिका समृद्धि योजना, मध्यप्रदेश सरकार ने लाड़ली लक्ष्मी योजना, कन्या विवाह योजना, महाराष्ट्र ने माझी कन्या भाग्यश्री योजना, राजस्थान में मुख्यमंत्री राजश्री योजना जैसी कितना योजनाएं चलाईं, लेकिन सब योजनाएं कहीं उदासीनता, तो कहीं भ्रष्टाचार के चलते अपने मकसद को हासिल नहीं कर सकीं.

सोच बदलें, भरोसा जताएं
आज बेटियों के अपने सपने हैं, अपना भविष्य बनाने, अपने शौक पूरे करने, ऊंची शिक्षा पाने या किसी खास क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के. इसके लिए परिवारों को अपनी सोच बदलना होगी, जिससे उपजी समझ बेटियों की संघर्ष की राह आसान करने के साथ नई राहें खोलेगी और हौसला बढ़ाएगी. सबसे जरूरी है आपको उस पर भरोसा करना होगा. उसे यह विश्वास दिलाना होगा कि हम हर परिस्थिति, हर हाल में उसके साथ हैं. परंपरागत रिवाजों की बेवजह बंदिशों और भेदभाव को उनपर थोपने से बचना होगा.

तब सार्थक होगा डाॅटर्स डे

-जब बेटियों को जन्म लेने से पहले ही गर्भ में नहीं मारा जाएगा.

-जब बेटियों के जन्म पर भी उतनी ही खुशियां होंगी, जितनी बेटों के जन्म पर.

-जब बेटों के समान ही बेटियों को भी भेदभाव से मुक्त समान परिवेश, व्यवहार और शिक्षा मिलेगी.

-जब बेटियां पराया धन होती हैं, वंश पुत्रों से ही चलता है, की सोच से समाज मुक्त होगा.

-जब बेटियों को दहेज के लिए प्रताड़ित करने और जिंदा जलाने जैसी मानसिकता से समाज बाहर निकलेगा.

-जब बेटियों को नुमाइश की चीज मानने की बजाय, घर-परिवार और देश, समाज संवारने वाला व्यक्तित्व माना जाएगा.

हम क्या कर सकते हैं?
व्यक्तिगत स्तर परः
 हम बदलेंगे, तब सब बदलेंगे..इस भावना के साथ ये संकल्प लेकर कन्या को दान की वस्तु नहीं इंसान समझो, मत बनाओ देवी की भावना का स्वयं से शुरू कर विस्तार करना होगा. कोई भी संस्कार जब बेटी के बिना पूरा नहीं होता तो अंतिम संस्कार भी करने पर रोक क्यों? इस धारणा को भी मान्य करना होगा.

सामाजिक स्तर परः पितृसत्तामक समाज में बेटियों को दोयम दर्जे पर रखने वाले चिन्हों जैसे कन्या पूजन, कन्यादान की परंपराओं को खत्म करने, पिता की संपत्ति में बराबर की भागीदार बनाने के लिए समाज को तैयार करना होगा. ताकि बेटियों को समाज में बराबरी का दर्जा मिल सके. समान अवसर, समान शिक्षा , समान भोजन, समान अधिकार के साथ बेटियों को सक्षम बनाने की भावना का विकास करना होगा.

चिकित्सकों के स्तर पर : चिकित्सक अपने उन साथियों का सामाजिक स्तर पर बहिष्कार करें, जो लिंग जांच या लिंग चयन अथवा लिंग चयन आधारित भ्रूण हत्या के दोषी पाए जाते हैं.
चिकित्सक अपने उन सहयोगियों के प्रति शिकायत दर्ज करवाने का साहस दिखाते हुए पहल करें, जो कोख में कत्ल के कारोबार में लिप्त हैं .

कानून के स्तर परः पुलिस और वकील बेटियों के कोख में कत्ल, लिंग जांच से लेकर जीवन में रक्षा , सम्मान तक के स्तर पर कोई भी प्रकरण सामने आने पर इस तरह से केस बनाएं, और अभियोजन अदालत के सम्मुख पेश करें कि ताकि उसका जल्द निराकरण हो और दोषी के बचने की गुंजाइश न रहे.

सरकार के स्तर परः सरकार बेटियों के शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण के अलावा बाल विवाह जैसी कुरीतियों को खत्म करने की योजनाओं में बजट कटौती न करे और योजनाओं व कानून पर सख्ती से अमल सुनिश्चित करे. बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच के लिए अभियान सतत् रूप से पूरी गतिशीलता के साथ चलवाए.
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

सामाजिक, विकास परक, राजनीतिक विषयों पर तीन दशक से सक्रिय. मीडिया संस्थानों में संपादकीय दायित्व का निर्वाह करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र लेखन. कविता, शायरी और जीवन में गहरी रुचि.

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First published: September 27, 2020, 5:26 AM IST
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