प्रवासी श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा सबसे बड़ा सवाल

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के उन दर्जन भर से ज्यादा जिलों में ये समस्या ज्यादा विकट होने वाली है, जहां से सबसे ज्यादा पलायन होता है. शिक्षा का अधिकार (Right to Education) पा सकना इन बच्चों के लिए फिलवक्त दूर की कौड़ी लगती है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 2, 2020, 6:35 PM IST
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प्रवासी श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा सबसे बड़ा सवाल
कोरोना की महामारी की वजह से मप्र में मार्च में स्कूलों को बंद कर दिया गया था (सांकेतिक फोटो, AP)
लॉकडाउन (Lockdown) में रोजगार गंवाकर, सारी कमाई लुटाकर बीवी, बच्चों संग जैसे-तैसे अपने घर-गांव लौटे लाखों प्रवासी मजदूरों (Migrant Workers) के सामने अब अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ के साथ ही बच्चों की शिक्षा को लेकर बड़ा सवाल आ खड़ा हुआ है. इन बच्चों के लिए शिक्षा का इंतजाम सरकारों के सामने बड़ी चुनौती है. इस संकट को भांपकर यूपी (UP) में तो बच्चों के दाखिले के लिए सर्वे, सूची बनाने का काम शुरू कर दिया गया है, लेकिन मप्र (MP) में अभी इसकी कोई सुगबुगाहट भी नहीं दिखाई दी है.

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के उन दर्जन भर से ज्यादा जिलों में ये समस्या ज्यादा विकट होने वाली है, जहां से सबसे ज्यादा पलायन होता है. शिक्षा का अधिकार (Right to Education) पा सकना इन बच्चों के लिए फिलवक्त दूर की कौड़ी लगती है. राज्य में अभी शिक्षा विभाग का सारा फोकस ऑनलाइन एजुकेशन पर है, लेकिन इसके लिए उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर, संसाधनों, तरीकों और कामयाबी को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं.

66.27 लाख स्कूली बच्चों के खातों में मिड डे मील की राशि खातों में डाली गई
कोरोना की महामारी की वजह से मप्र में मार्च में स्कूलों को बंद कर दिया गया था. अधिकांश स्कूलों में वार्षिक परीक्षाएं में नहीं हो पाईं. यहां तक की सीबीएसई बोर्ड भी परीक्षाएं पूरा नहीं कर पाया. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मप्र की जनता के नाम बीती 31 मई के संबोधन में भरोसा दिया कि सब कुछ ठीक रहने की स्थिति में जुलाई में विचार विमर्श के बाद स्कूल खोलने का फैसला लिया जा सकता है. उन्होंने अपने संबोधन में यह जरूर बताया कि प्रदेश के 66.27 लाख स्कूली बच्चों के खातों में मई-जून के मिड डे मील की राशि सिंगल क्लिक से खातों में डाल दी गई है. स्कूलों में पांच-आठवीं तक अध्ययनरत सभी बच्चों को किताबें-यूनिफार्म देने की बात भी सीएम ने कही, लेकिन अन्य राज्यों से घर वापसी कर चुके प्रवासी मजदूरों के बच्चों की शिक्षा के इंतजाम को लेकर कोई घोषणा, कोई आदेश, कोई कदम या रूपरेखा सामने नहीं आई है.
सरकारी दावों को मानें तो लॉकडाउन में फंसे 5 लाख 74 हजार प्रवासी श्रमिकों को 30 मई तक बसों और ट्रेनों के जरिए गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश वापस लाया जा चुका है. इसके अतिरिक्त गोवा, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, केरल, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना से भी लाखों श्रमिक वापस आए हैं. महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान से तो बड़ी संख्या में श्रमिक कोई सुविधा न मिलने से पैदल भी चलकर पहुंचे. बता दें कि मप्र के ग्वालियर, भिंड, मुरैना, छतरपुर, पन्ना, निवाडी झाबुआ, मंडला, धार, खरगोन, खंडवा, रतलाम, शाजापुर, जबलपुर, रीवा, सतना, शहडोल आदि जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में पलायन होता है. इन इलाकों में न रोजगार हैं, न पीने का पानी, न अन्य सुविधाएं. यही पलायन की सबसे बड़ी वजह है. परिवार के साथ बच्चे भी जाते हैं तो न तो उनकी पढ़ाई हो पाती है और न ही उनका ठीक से पोषण हो पाता है. घरवापसी के बाद यह श्रमिक अपने बच्चों के शिक्षा को लेकर बहुत चिंतित है. जाहिर है प्रवासी बाहुल्य वाले जिलों में अब प्राथमिक, माध्यमिक स्कूलों में दाखिले को लेकर अतिरिक्त बोझ और मारामारी की स्थिति बनने वाली है. मजदूरों की कमाई के रास्ते बंद हैं, आर्थिक रूप से उनकी कमर टूट चुकी है, इसलिए बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला नहीं दिला सकते हैं, उनका इकलौती उम्मीद सरकारी स्कूल हैं.

राज्य के शिक्षा विभाग ने प्रवासी कामगारों के बच्चों के विद्यालयों में दाखिले के लिए फिलहाल अभी कोई कवायद नहीं शुरू की है. विभागीय सूत्र बताते हैं कि इन प्रवासी श्रमिकों के बच्चों को जुलाई-अगस्त तक इंतजार करना पड़ेगा. सत्र शुरू होने के बाद ही सर्वे, नामांकन दाखिले जैसे काम हो सकेंगे.

किताबें, यूनिफार्म का इंतजामराज्य शिक्षा केन्द्र के एक परियोजना अधिकारी संतोष तिवारी के मुताबिक प्रदेश में स्कूलों में अभी जो बच्चे अध्ययनरत हैं, उनके लिए किताबें तो छपकर तैयार हैं, कई जिलों के पाठ्य पुस्तक निगम के डिपो में पुस्तकें पहुंचा दी गई, सत्र शुरू होते ही उनका वितरण शुरू हो जाएगा, लेकिन समस्या प्रवासी बच्चों को सकती है. इस समस्या को पुरानी किताबों के संग्रह और वितरण से दूर करने की कोशिश की जाएगी.

क्या कहता है शिक्षा का अधिकार कानून
शिक्षा के अधिकार के कानून के तहत 6 से 14 साल तक के हर बच्चे को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा देने का प्रावधान है, लेकिन इस बार तो स्कूल बंद होने से सत्र ही संकट में है. यह काफी विलंब से शुरू होगा. इस साल लॉकडाउन के कारण स्कूल चलो अभियान शुरू ही नहीं हो पाया. हर साल जब अभियान के बाद भी प्राथमिक, माध्यमिक स्कूलों में नामांकित बच्चों को ही स्कूल तक लाना मुश्किल होता है, तब पलायन से लौटे बच्चों को स्कूलों की चौखट तक लाना, उनके लिए किताबें, यूनिफार्म के अलावा मिड डे मील का इंतजाम करना बड़ी चुनौती होगा. खतरा इस बात का है कि यदि बच्चों को सरकार स्कूल तक नहीं ले जा पायी, तो उनको बाल श्रम की खाई में धकेला जा सकता है. समस्या यह भी है कि अगर जुलाई या अगस्त तक स्कूल खोल भी दिए गए, तो दो गज की दूरी के सोशल डिस्टेंसिंग के फार्मूले पर अमल के लि कक्षा में केवल 50 फीसदी बच्चों को बुलाया जा सकेगा. मप्र बाल अधिकार आयोग ने सरकार को सोमवार को सौंपी अपनी गाइडलाइंस में कोरोना की स्थिति पूरी तरह सामान्य होने तक कक्षा 5वीं तक बच्चों की छुट्टी रखने की सिफारिश की है.

एक रोचक सुझाव
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के मध्य भारत प्रांत के प्रांत संयोजक ओमप्रकाश शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि जिस प्रकार प्रवासी मजदूरों की राशन सुविधा के लिए एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड, योजना केन्द्र ने लागू की है, उसी प्रकार प्रवासी मजदूरों के बच्चों की शिक्षा के लिए भी ऐसी ही किसी योजना को अमलीजामा पहनाया जाए, ताकि ये बच्चे अपने पालकों के साथ जहां भी जाएं, वहीं पर अपनी शिक्षा को न्यूनतम दस्तावेजी आवश्यकताओं के साथ जारी रख सकें.

ऑनलाइन एजुकेशन पर फोकस
मप्र शिक्षा विभाग का सारा फोकस अभी ऑनलाइन शिक्षा पर है. राज्य शिक्षा केन्द्र के प्रतिनिधियों ने ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन के साथ मिलकर कुछ बेसिक कोर्स के प्रोग्राम तैयार किए हैं. शिक्षकों को घर बैठे पाठ्यक्रम को ऑनलाइन माध्यम से व्यवस्थित करने के दिशानिर्देश दिये जा रहे हैं. बच्चों को व्हाट्सऐप और स्काइप के जरिये वर्कशीट भेजकर होमवर्क दिया जा रहा है. शिक्षक अपने छोटे-छोटे वीडियो भेजकर बच्चों को होमवर्क के बारे में बता रहे हैं. प्रत्येक जिला, ब्लाक स्तर एवं जनशिक्षा केन्द्र पर कक्षा एक से 9 तक के लिए डिजिटल ग्रुप बने हैं. साथ ही अभिभावकों और विशेषज्ञ शिक्षकों को भी इस ग्रुप का सदस्य बनाया गया है. इस ग्रुप में रोज सुबह 10 से 11 बजे तक पोस्ट किया जाता है. रेडियो, टीवी से भी बच्चों के पाठ का प्रसारण किया जा रहा है.

ई-लर्निंग पर सवाल
सरकारी स्कूलों में ई-लर्निंग यानी ऑनलाइन एजुकेशन का फंडा कितना सफल है, उस पर भी सवाल है, क्योंकि ऑनलाइन सीखने के लिए मोबाइल, लैपटाप या कम्प्यूटर की जरूरत होती है. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे गरीब होते हैं, जिनके माता-पिता 10-10 रुपए के रिचार्ज पर मोबाइल को चार्ज कराते हैं. लॉकडाउन की वजह से खाने तक के लाले पड़े हुए है, ऐसे में वह क्या डाटा रिचार्ज कराए, क्या बच्चों के पढ़ाए. कम्प्यूटर या लैपटॉप कराना तो बहुत दूर की बात है. ई-लर्निंग के लिए इंटरनेट (Internet) और बिजली की उपलब्धता जरूरी है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में सहज उपलब्ध नहीं है. भोपाल की एक शिक्षिका मधु द्विवेदी ने बताया कि ई-लर्निंग को भोपाल, इंदौर जैसे बड़े शहरों में तो कुछ हद तक कामयाबी मिल सकती है, लेकिन गांवों में वर्चुअल तरीकों से शिक्षा संभव नहीं हैं. उदाहरण के तौर प्रदेश में 9वीं कक्षा से लेकर 12वीं तक करीब 19 लाख छात्र हैं, इनमें से 5 लाख के पास तो आवश्यक संसाधन ही नहीं हैं.

द्विवेदी बताती हैं कि हमसे कुछ पाइंट्स के आधार पर फीड बैक मांगा जाता है, लेकिन हकीकत बताने या नकारात्मक फीडबैक देने पर समस्या, कारण और निदान के उपाय पूछे जाते हैं, इसलिए झंझट में उलझने की बजाय अधिकांश टीचर्स अपने फीड बैक में 3 से कम अंक तो देते ही नहीं, जो प्रदर्शित करता है कि सब ठीक चल रहा है. वास्तव में कुछ भी ठीक नहीं है, अव्यवस्थाओं से घिरे सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए ई-लर्निंग व्यवहारिक नहीं है. कड़वा सच यह भी है मप्र को छोड़ भी दें, तो भारत जैसे देश में ई-लर्निंग का इंफ्रास्ट्रक्चर अधिकांश स्थानों पर नहीं है. हजारों स्कूल कॉलेजों में सामान्य सुविधाओं का अभाव है. लाखों छात्र बुनियादी एवं जरूरी सुविधाओं से वंचित हैं. भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार राजेश पांडे का मत है कि एक माह पहले हुए हजारों स्कूलों, कालेजों के सर्वे में ई-लर्निंग (E-learning) की तुलना में क्लासरूम की पढ़ाई को बेहतर बताया गया है. छात्रों, शिक्षकों के साथ पालक भी असहमत हैं. पालक इसे तनावपूर्ण और असुविधाजनक मानते हैं.

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ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं और कई संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है.

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First published: June 2, 2020, 6:35 PM IST
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