महिला हिंसा के लिए मैं, तुम, हम सब जिम्मेदार

यूएन पॉपुलेशन फंड (UNFPA) ने 193 सदस्य देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिसमें उसने कहा है कि कोविड-19 वायरस (Covid-19) की महामारी के बाद से दुनिया भर में घरेलू हिंसा में 20 फीसदी इजाफा हुआ है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 25, 2020, 3:06 PM IST
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महिला हिंसा के लिए मैं, तुम, हम सब जिम्मेदार
(सांकेतिक तस्वीर)
नई दिल्ली. आज पूरी दुनिया जब अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस (international day of violence against women) मनाते हुए 16 दिवसीय अभियान की शुरूआत करने जा रही है, तब महिलाओं के प्रति हमारे व्यवहार की दिल दहला देने वाली तस्वीर पर भी नजर डालना और अपने गिरेबां में झांककर देखना बेहद जरूरी है. संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) की एक रिपोर्ट बताती है 'दुनिया में रोज हर तीन में एक महिला किसी न किसी प्रकार की हिंसा का शिकार होती है. हर साल 3 अरब महिलाएं वैवाहिक बलात्कार भुगतती हैं. 33 फीसदी महिलाओं और लड़कियों को शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है. 15 से 19 वर्ष की डेढ़ करोड़ लड़कियां कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं. महिलाओं की हत्या के 50 फीसदी से ज्यादा मामलों में यह हत्याएं उनके परिजनों द्वारा की जाती हैं. मानव तस्करी के शिकंजे में फंसी 50 फीसदी महिलाएं वयस्क हैं.

अब जरा भारत की बात करें तो एनसीआरबी (NCRB) की सन 2019 की रिपोर्ट कहती है 'यहां हर तीसरे मिनट एक औरत घर में पिटती है. सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर हर दूसरे मिनट कोई न कोई लड़की छेड़छाड़ का निशाना बनती है. 2017 में रोज 90, 2018 में रोज 91 और 2019 में रोज 88 महिलाएं और लड़कियां बलात्कार का शिकार हुईं. दुष्कर्म का शिकार होने वालों में हर चौथी लड़की नाबालिग और 11 फीसदी महिलाएं दलित वर्ग से थी. 'कोरोना महामारी से जूझता यह साल 2020 तो महिलाओं के लिए और भी भयावह है, जब घरेलू हिंसा, बलात्कार, यौन प्रताड़ना (Domestic violence, rape, sexual assault) और साइबर क्राइम की घटनाएं बेइंतहा बढ़ी हैं, जिसने महिला हिंसा को रोकने के लक्ष्यों और प्रयासों को एक दशक पीछे धकेल दिया है.

दुनिया को महिलाओं के लिए कैसे महफूज और उनके बेखौफ रहने लायक बनाया जाए, इसी मकसद से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 17 दिसंबर 1999 को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर हर साल 25 नवंबर को विश्व महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाने का फैसला किया था और सन् 2000 से इसे मनाने की शुरूआत की गई थी. संयुक्त राष्ट्र वर्ष 2009 से 2030 तक करीब 193 देशों के साथ महिला हिंसा को खत्म करने के लिए साझा अभियान (Unite to End Violence against Women) चला रहा है. 25 नवंबर से 10 दिसंबर मानव अधिकार दिवस तक 16 दिवसीय अभियान इसी का हिस्सा है. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य लोगों में लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता फैलाना है और इसके तहत लोगों का समर्थन जुटाना है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2020 की थीम है, 'I am Generation Equality: Realizing Women’s Rights', यानि दुनिया का हर व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, समुदाय, लिंग या देश का क्यों न हो, सब बराबर हैं, खास तौर से महिलाएं. इस अवधि में लोगों को महिला हिंसा के विभिन्न रूपों को लेकर जाग्रत किया जाता है, लेकिन अफसोस यह है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है.

कोरोना काल में बेइंतहा बढ़ी हिंसा
यूएन पॉपुलेशन फंड (UNFPA) ने 193 सदस्य देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिसमें उसने कहा है कि कोविड-19 वायरस (Covid-19) की महामारी के बाद से दुनिया भर में घरेलू हिंसा में 20 फीसदी इजाफा हुआ है. यूएन का अनुमान है कि पहले लंबे चलते लाकडाउन और उसके बाद से चली आ रही पाबंदियों की वजह से इस साल के अंत तक हिंसा के 1.5 करोड़ मामले सामने आ सकते हैं. इन आंकड़ों ने अगले दशक में महिलाओं की जिंदगी की उम्मीदों भरी तस्वीर को धुंधला कर दिया है.

हिंसा सहती औरतें रिपोर्ट तक नहीं करतीं
एनसीआरबी की रिपोर्ट कहती है कि भारत में हर तीसरे मिनट एक औरत अपने घर में पिटती है. घरेलू हिंसा की शिकार 86 फीसदी औरतें कभी हिंसा की रिपोर्ट नहीं करतीं, न पुलिस के पास जाती हैं और न ही मदद मांगती हैं. हिंसा की रिपोर्ट करने और मदद मांगने वाली औरतों का प्रतिशत सिर्फ 14 है और उनमें से भी सिर्फ 7 फीसदी औरतें पुलिस और न्यायालय तक पहुंच पाती हैं. महिलाओं और लड़कियों के साथ यौन हिंसा के मामले में राजस्थान, यूपी, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र ने देश के सारे राज्यों में पीछे छोड़ दिया है. कुछ साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था – यूं तो पूरी दुनिया में औरतें मारी जाती हैं, लेकिन भारत में सबसे ज्यादा बर्बर और क्रूर तरीके से लगातार लड़कियों को मारा जा रहा है.” यूपी में हाथरस, बुलंदशहर, मेरठ, मध्यप्रदेश में भोपाल, रतलाम, हरियाणा में रोहतक जैसे शहरों में हैवानियत से भरी दुष्कर्म की घटनाओं को कोई भूला नहीं है.2012 में निर्भया कांड (Nirbhaya Case) के बाद ऐसा लगा था कि महिलाओं की सुरक्षा का सवाल देश की प्रमुख चिंता बन गया है. तब बनाई गई जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी की 29 दिन में रिपोर्ट आने के तीन महीने के भीतर अप्रैल 2013 में संसद के दोनों सदनों से पास होते हुए रेप के खिलाफ सख्त कानून भी बन गया, लेकिन अगले साल जब फिर से एनसीआरबी ने अपनी रिपोर्ट जारी की, तो पता चला कि औरतों के साथ हिंसा और बलात्कार की घटनाएं 13 फीसदी बढ़ चुकी थीं. 2019 तक घटनाओं में 7.1 फीसदी का और इजाफा हो गया. यह एक तथ्य है कि 2017 के अंत तक देश की अदालतों में में बलात्कार के 1.27,800 केस पेंडिंग थे, जिनमें से 18,300 प्रकरणों का ही निपटारा हो सका था. यह आंकड़े देश की न्याय व्यवस्था की हालत बयां करते हैं.

साइबर क्राइम की घटनाएं बढ़ीं
राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य चंद्रमुखी देवी के मुताबिक महिलाओं को लेकर हिंसा पहले भी होती थी, लेकिन कोरोना काल में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा बहुत अधिक बढ़ गई है, अगस्त 2020 तक 1415 शिकायतें मिलीं. सबसे ज्यादा शिकायतें यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु से आईं. यह शिकायतें ईमेल या व्हाट्सएप नंबर 7217735372 पर आयोग द्वारा जारी मोबाइल नंबर पर आईं. महिलाओं के खिलाफ साइबर क्राइम की शिकायतें बढ़ गईं. महिलाओं को फोन लगा कर अश्लील बातें करना, उन्हें गंदी तस्वीरें भेजने आदि की घटनाएं बढ़ी हैं. आयोग इन दिनों 24x7 काम कर रहा है.

सड़कें नहीं सुरक्षित
लड़कियों के लिए भारत की सड़कें सुरक्षित नहीं हैं. वह किसी भी काम से रात को घर से बाहर नहीं निकल सकतीं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में एम ए कर रही अंकिता कहती हैं कि रात कितनी भी सुंदर या रूमानी क्यों न हो, रात उसकी नहीं हो सकती. कहीं भी रहूं, रात 9 बजे से पहले उसे हास्टल लौटना ही पड़ता है. सरकारों और सुरक्षा का सिस्टम महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता पर नहीं रखता, वह उनका रात में निकलना सुरक्षित नहीं कर सकता.

यही वजह है कि 2018 में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की एक रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क और सड़कों को असुरक्षित बताया गया था. 193 देशों में हुए फाउंडेशन के सर्वे में महिलाओं का स्वास्थ्य, शिक्षा, उनके साथ होने वाली यौन हिंसा, हत्या और भेदभाव जैसे कुछ पैमाने थे. रिपोर्ट में कहा गया था कि भारतीय समाज में स्त्री को छोटा समझने की मानसिकता रग-रग में समा चुकी है.

मानसिक हिंसा भी बड़ा मुद्दा
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी बैंगलूरु की एक छात्रा यशस्वी कुमुद सवाल उठाती हैं कि जब हम हिंसा की बात करते हैं तो केवल शारीरिक हिंसा को ही क्यों देखते हैं, जबकि मानसिक हिंसा भी बहुत बड़ा मुद्दा है. ये मानसिक हिंसा बहुत ही धरातल से शुरू होती है. रोज लड़की को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, चाहे वह घर हो या कालेज या दफ्तर. यह वो हिंसा है, जो बार-बार लड़की को उसके कमतर होने का अहसास कराती है. कोई भी काम वो करना चाहे, तो उससे कहा जाता है, रहने दो, तुमसे नहीं हो पाएगा. बार-बार समाज से यह आवाज आना कि रहने दो, तुमसे नहीं हो पाएगा, एक लड़की, एक महिला के आत्मविश्वास को कमजोर करता है. इससे बड़ी प्रताड़ना या मानसिक हिंसा क्या होगी? दूसरे- उसके सपने पहले अपने पिता पर, फिर उसके पति पर निर्भर रहते हैं. उसके सपने बहुत कम आजाद हो पाते हैं. सारे रिश्तों को बचाने का जिम्मा उस पर थोप दिया जाता है. अगर कोई भी समझ या बांडिंग में गड़बड़ी हो रही है, तो उसे ही जिम्मेदार ठहराया दिया जाता है .

कहा जाता है अरे तुम एक रिश्ते में संतुलन नहीं रख पाईं...वो मारता है तो क्या हुआ, प्यार भी तो करता है,... अरे तुम एडजस्ट नहीं कर पाईं. इस तरह औरत को यह अहसास करा दिया जाता है, कि यही उसकी जिंदगी है. जरा सोचिए कि अगर औरत भी पुरुष को वैसा ही पलटकर प्यार का जवाब देने लगे, तो क्या हाल होगा, उसकी सारी मर्दानगी धरी रह जाएगी. समन्यवय और समझौता और बर्दाश्त करना ही एक औरत की जिंदगी और औरत की परिभाषा बना दी गई है. यह मेरे हिसाब से बहुत बड़ी हिंसा है. यशस्वी कहती हैं कि दुष्कर्म, यौन हिंसा, शारीरिक शोषण सबसे बड़ी हिंसा तो है ही, यह इसलिए और भी घिनौने हो जाते हैं, क्योंकि शरीर पर जख्मों और मन पर आघात लेकर आते हैं, जो जिंदगी भर नहीं जाते. शारीरिक चोटें शायद आप ठीक भी कर पाओ, लेकिन मानसिक आघात से आप कभी मुक्त नहीं हो सकते.

दुष्कर्म तो बड़ी घटना है, हर लड़की के साथ जो छेड़खानी की पहली बार घटना होती हैं, वह अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं भूल पाती. वह चाहे कितनी भी छोटी लड़की हो या कितनी भी बड़ी. वह दुनिया की बड़ी से बड़ी बात भूल सकती है, उस आदमी का चेहरा कभी नहीं भूलेगी, जिसने उसे ईव टीजिंग किया था. यह उसके साथ एक मानसिक हिंसा ही है. इसके अलावा मुझे लगता है कि विशेष रूप से मां और बहनों की जरूरतों और इच्छाओं को तो आम घरों में कोई खास महत्व दिया ही नहीं जाता. अगर आप उसकी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा नहीं करते, आप गालियों या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हो, तो यह भी मानसिक हिंसा है. दरअसल औरत की कंडीशनिंग ऐसी कर दी गई है, कि उसे कुछ समय बाद लगने लगता है कि यह सब तो नार्मल है. हैरानी तो तब होती है, जब एक अध्ययन के मुताबिक पति के हाथों पिटने वाली 54 फीसदी महिलाएं इस पिटाई को सही मानती हैं. दरअसल यही औरत के दिमाग की कंडीशनिंग है, जिसने जुल्म, ज्यादती और पिटाई को सही मान लिया है.पितृसत्तात्मक मानसिकता की पैठ इससे ज्यादा क्या हो सकती है.

कैसे रुकेगी महिला हिंसा
सामाजिक कार्यकर्ता कुमुद सिंह का मानना है कि सरकार और सिस्टम को महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता पर रखना होगा. लैंगिक समानता बढ़ाने के साथ महिलाओँ को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना होगा, ताकि वह वह घर और अपने जीवन के फैसले खुद कर सके. इसके अलावा घर में लड़कों को भी महिलाओं का सम्मान करना सिखाना होगा, जिम्मेदार बनाना होगा.

पद्मश्री सामाजिक कार्यकर्ता जनक पलटा भी विश्व में महिलाओं में हिंसा बढ़ने के पीछे लैंगिक असमानता बड़ी वजह मानती हैं और कहती है कि सभी को इसके लिए प्रयास करना चाहिए. महिलाओं को आत्मनिर्भर बनना होगा. हिंसा के खिलाफ खुद मुंह खोलना होगा. मनोरोग चिकित्सक डा. रजनी कहती हैं कि कोरोना काल में महिला मनोरोगियों की संख्या बढ़ी हैं. इस समस्या की रोकथाम के लिए महिलाओं की सुरक्षा में सुधार, शिक्षा, जागरूकता, त्वरित न्याय प्रक्रिया और अनुकूल सामाजिक वातावरण बेहद जरूरी है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

सामाजिक, विकास परक, राजनीतिक विषयों पर तीन दशक से सक्रिय. मीडिया संस्थानों में संपादकीय दायित्व का निर्वाह करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र लेखन. कविता, शायरी और जीवन में गहरी रुचि.

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First published: November 25, 2020, 3:06 PM IST
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