Madhya Pradesh By-Poll 2020: शिवराज को ताज, लेकिन चुनौतियां भी अपार

अब सत्ता को बचाने के लिए शिवराज को किसी सहारे की जरूरत नहीं है, राज्य में उनके नेतृत्व में पूर्ण बहुमत (Full Majority) की सरकार बन गई है. 19 सीटों पर जीत के साथ राज्य विधानसभा (State Assembly) में भाजपा के विधायकों की संख्या अब 126 हो गई है, जो बहुमत के लिए जरूरी 115 में से 11 सीटें ज्यादा है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 11, 2020, 9:44 PM IST
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Madhya Pradesh By-Poll 2020: शिवराज को ताज, लेकिन चुनौतियां भी अपार
नतीजों के बाद मंगलवार शाम को भाजपा कार्यालय में आयोजित जीत के जश्न में शिवराज ने कहा कि चुनाव में अहंकार और दंभ हारा है.
देश के इतिहास में पहली बार मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव (By-Election) के नतीजों और भाजपा को 19 सीटों पर मिली जीत ने बता दिया कि जनता की नजर में “गद्दार या खुद्दार”, “टिकाऊ चाहिए-बिकाऊ नहीं” जैसे मुद्दे या नारे कोई अहमियत नही रखते. वह नेताओं की खरीद-फरोख्त, उनके भ्रष्टाचार, दलबदल को सत्ता और राजनीति के खेल का अनिवार्य हिस्सा मान चुकी है. जनता को एक स्थिर और टिक कर काम कर करने वाली सरकार चाहिए, यह संभावना उसे कमलनाथ या कांग्रेस में नहीं दिखाई दी, लिहाजा उसने भरोसा जताते हुए इन उपचुनावों में जीत का सेहरा मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के माथे पर सजा दिया.

अब सत्ता को बचाने के लिए शिवराज को किसी सहारे की जरूरत नहीं है, राज्य में उनके नेतृत्व में पूर्ण बहुमत (Full Majority) की सरकार बन गई है. 19 सीटों पर जीत के साथ राज्य विधानसभा (State Assembly) में भाजपा के विधायकों की संख्या अब 126 हो गई है, जो बहुमत के लिए जरूरी 115 में से 11 सीटें ज्यादा है. लेकिन सत्ता का यह ताज मिलने के बावजूद शिवराज के सामने समस्याओं का अंबार, चुनौतियां का पहाड़ खड़ा है, जिनसे उन्हें अपने राजनीतिक कौशल से निपटना होगा, वहीं कांग्रेस के सामने अपने वजूद को कायम रखने के लिए नए सिरे से कायाकल्प की चुनौती है.

इन उपचुनावों में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को 11 फीसदी से अधिक वोट मिले हैं. कांग्रेस का तख्ता पलट करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के खेमे के 19 में से 13 प्रत्याशियों ने जीत हासिल की. सिंधिया के क्षेत्र में कांग्रेस सेंधमारी करने में सफल रही. वहां सिंधिया समर्थक तीन मंत्रियों समेत 7 दलबदल करने वाले हार गए. इसके विपरीत ग्वालियर-चंबल सहित शेष अंचलों में 12 सीटों में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया. सिंधिया अपने ही गढ़ में नेतृत्व का श्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर पाए. इन उपचुनावों में 28 में से 25 सीटें वे थीं, जो विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे. तीन सीटें विधायकों के निधन से रिक्त हुई थीं. 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने एक छोड़ बाकी सभी 27 सीटों पर जीत हासिल की थी. इन उपचुनावों में भाजपा को अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए 9 सीटों की जरूरत थी, जबकि कांग्रेस के लिए सभी 28 सीटें जीतना जरूरी थी, जो असंभव था.

और मजबूत हुई शिवराज की जनछवि
मप्र में उपचुनाव नतीजे यह बताते हैं कि कमलनाथ के “बिकाऊ नहीं, टिकाऊ चाहिए” के सामने सामने शिवराज का “माफिया के खिलाफ अभियान और बिजली बिल माफी” मुद्दा ज्यादा कारगर साबित हुआ. कांग्रेस चुनावी लड़ाई को “गद्दार, दलबदलू बनाम जनता” (Traitor, Defectors/public) बनाने में सफल नहीं हो पाई और मात्र 9 सीटों तक ही सिमट कर रह गई. सामाजिक सरोकारों के चलते शिवराज मतदाताओं से सीधा संबंध बनाने में कामयाब रहे. कांग्रेस की ओर से “भूखा-नंगा” कहे जाने पर शिवराज ने चुनाव में इसे मुद्दा बना दिया और जमकर सहानुभूति बटोरी, जो वोटों की शक्ल में नजर आई. शिवराज ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जनछवि वाले नेता हैं, इस मामले में कमलनाथ उनका मुकाबला नहीं कर सकते. कमलनाथ जमीनी स्तर पर जनता से जुड़ने पर नाकाम रहे. भाजपा की जीत के पीछे एक बड़ी वजह यह भी रही कि कांग्रेस में कमलनाथ वन मैन शो (One Man Show) की तरह पूरा चुनाव लड़ रहे थे. कांग्रेस का बूथ मैनेजमेंट (Booth Management) भी काफी कमजोर और लचर था, जबकि भाजपा की ओर से शिवराज के साथ ही पूरा संगठन चुनाव लड़ रहा था. हर बूथ पर भाजपा की पकड़ बेहद मजबूत नतीजों की शक्ल में ईवीएम से बाहर आई.

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कांग्रेस द्वारा सिंधिया और उनके परिवार पर किए गए जुबानी हमलों ने मतदाताओं पर नकारात्मक असर डाला. (फाइल फोटो)


ज्योतिरादित्य की कामयाबीदूसरी ओर भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया इस बात में सफल रहे कि उनके दलबदल के औचित्य पर वोटरों ने अपनी सहमति दे दी. बता दें कि चुनाव नतीजे घोषित होने के तत्काल बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक साक्षात्कार में कहा कि नतीजों से यह साबित किया कि गद्दार हम नहीं, बल्कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह है. दरअसल भाजपा में शामिल होने के बाद कांग्रेस के नेता उन्हें गद्दार कहते थे, ग्वालियर समेत कई चुनावी सभाओं में उन्हें गद्दार कहते हुए नारे लगाए और काल झंडे दिखाए गए थे. कांग्रेस द्वारा सिंधिया और उनके परिवार पर किए गए जुबानी हमलों ने मतदाताओं पर नकारात्मक असर डाला, यह संदेश भी स्पष्ट जनादेश के रूप में उभर कर सामने आया. भाजपा अध्यक्ष (BJP President) होने के नाते वीडी शर्मा ने अपनी सांगठनिक क्षमता का लोहा इन उपचुनावों में मनवाया है.

चुनाव में अहंकार और दंभ हारा 
नतीजों के बाद मंगलवार शाम को भाजपा कार्यालय में आयोजित जीत के जश्न में शिवराज ने कहा कि चुनाव में अहंकार और दंभ हारा है. कांग्रेस ने प्रदेश को भ्रष्टाचार और दलाली का अड्डा बना दिया था, ऐसी सरकार को ज्योतिरादित्य और उनके साथियों ने गिराने का जो काम किया था, उसे जनता ने सही माना है. हमें “गद्दार, कुत्ता, कमीना, भूखा-नंगा, आइटम” और पता नहीं क्या-क्या कहा गया, ऐसे दंभियों को जनता ने परास्त कर दिया है. हम जनता के हित में काम करते हुए आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश बनाने के लिए वचनबद्ध हैं. यह जीत विकास, जनता के कल्याण, हमारे विचार की जीत है.

शिवराज के सामने चुनौतियों का पहाड़

आर्थिक चुनौतीः उपचुनावों सत्ता का ताज सुनिश्चित करने के बावजूद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सामने समस्याओं का अंबार और चुनौतियों का पहाड़ है. पहली सबसे बड़ी चुनौती सरकार के सामने आर्थिक संकट से निपटने की है. सरकार का खजाना खाली है. शिवराज सरकार अपने 7 महीने के कार्यकाल में 11 हजार करोड़ का कर्ज ले चुकी है. सरकार और प्रदेश चलाने के लिए अभी उसे और भी कई हजार करोड़ का कर्ज लेना पड़ेगा. प्रदेश पर अब तक कुल 2 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज हो चुका है. जो लोग कांग्रेस से भाजपा में आए हैं, उनके क्षेत्रों में नए कार्य कराने का दबाव रहेगा. नए कार्यों के साथ सरकार की अपनी घोषणाएं भी हैं. इसके साथ ही तंत्र को चलाने के लिए जरूरी आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए शिवराज को कुछ नए और कड़े कदम उठाने होंगे.

राजनीतिक चुनौतीः सत्ता का ताज पहनने वाले शिवराज सिंह के सामने दूसरी चुनौती भाजपा संगठन-सरकार के बीच समन्वय बैठाने की होगी. बड़े पैमाने पर नेता कांग्रेस से टूटकर भाजपा में आए हैं. उन्हें भी सत्ता व संगठन में सम्मानजनक दायित्व देना होगा. संगठन में दर्जन भर से ज्यादा ऐसे पद हैं, जिन पर भाजपा के वरिष्ठ और कद्दावर नेता बैठे हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया यह जरूर चाहेंगे कि चुनाव हारने वाले मंत्रियों के स्थान पर अन्य समर्थकों को मंत्री बनाया जाए. इसके साथ ही हारे मंत्रियों को सरकार में संयोजित किया जाए. सिंधिया खुद के लिए भी केन्द्र में अच्छा स्थान चाहेंगे. इन सबके समन्वय और संतुलन (Coordination and balance) एक बड़ी चुनौती के रूप में भाजपा और शिवराज के सामने खड़े होंगे.

कांग्रेसी तेवरों की चुनौतीः शिवराज सरकार के सामने तीसरी बड़ी चुनौती विपक्षी कांग्रेस के आक्रामक रूख की होगी, क्योंकि विधानसभा में उनके 96 विधायक होंगे. बहुत संभव है कि किसान ऋण मुक्ति और रोजगार के मुद्दे को लेकर वह प्रदेश में बड़ा आंदोलन खड़ा करे. कमलनाथ ने चुनाव नतीजों के बाद मंगलवार को कहा था, कि उपचुनावों में जनता का फैसला शिरोधार्य हैं, वह विपक्षी पार्टी के रूप में विधानसभा और प्रदेश में पूरी ताकत से जनहित के मुद्दों को उठाएगी और शिवराज को जनता के हित, प्रदेश के विकास में काम करने के लिए मजबूर करेगी.

अब बढ़ेगी कमलनाथ की मुश्किल

इस पूरे उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अकेले ही मैदान में तलवार भांजते नजर आए. उपचुनावों में पार्टी की बड़ी हार के बाद कांग्रेस आलाकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को फिर से खड़ा करने की है. कमलनाथ पर नैतिक दबाव बढ़ेगा और नेतृत्व परिवर्तन के स्वर पार्टी में बढ़ेंगे. अब चुप कमलनाथ के धुर विरोधी कांग्रेसी फिर मुखर होने लगेंगे, युवा नेतृत्व को कमान सौंपने की मांग अब निश्चित रूप से तेज होगी, क्योंकि कांग्रेस में युवा चेहरों को कमी नहीं है, लेकिन देखना होगा कि पार्टी आलाकमान के स्तर पर क्या कदम उठाया जाता है.

कांग्रेस के कायाकल्प की जरूरत
उपचुनावों के नतीजों के बाद जैसा हर पार्टी करती हैं, वैसी समीक्षा निश्चत रूप से कांग्रेस भी करेंगी. उसके पास अब पूरा समय भी है कि अपनी गलतियों को तलाशे, नई-पुरानी गलतियों को सुधारे. संगठनात्मक ढांचे को मजबूती दे और उसे खेमों से बाहर निकाले. राजनैतिक मामलों के जानकार यह भी कहते हैं कि कांग्रेस का कायाकल्प करने के लिए पुराने चेहरों को सत्ता का मोह छोड़कर नए लोगों के लिए जगह खाली कर देनी चाहिए. नए युवा नेतृत्व को जगह देकर पार्टी में नयापन लाना चाहिए.  (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

सामाजिक, विकास परक, राजनीतिक विषयों पर तीन दशक से सक्रिय. मीडिया संस्थानों में संपादकीय दायित्व का निर्वाह करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र लेखन. कविता, शायरी और जीवन में गहरी रुचि.

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First published: November 11, 2020, 9:40 PM IST
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