MP क्राइसिस: संकट की घड़ी में नियुक्तियों के तोहफे, फैसलों की बारिश

'मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) को लेकर राजनीतिक विश्लेषको का स्पष्ट मानना है कि कमलनाथ को राज्य में सरकार जाने और मध्यावधि चुनाव का आसन्न संकट दिख रहा है.'

Source: News18Hindi Last updated on: March 18, 2020, 3:48 pm IST
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MP क्राइसिस: संकट की घड़ी में नियुक्तियों के तोहफे, फैसलों की बारिश
मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ.
मध्यप्रदेश में मौकापरस्त विधायकों की बगावत के चलते राज्य की कमलनाथ सरकार पर संकट के बादल लगातार गहरे ही होते जा रहे हैं. पिछले 15 दिनों से तेजी से सियासी घटनाक्रम पल-पल बदल रहा है. सरकार पर फ्लोर टेस्ट कराने के राज्यपाल के दबाव को दो बार खारिज करने और विधानसभा का सत्र 26 मार्च तक टाल दिए जाने के बाद महामहिम-मुख्यमंत्री और स्पीकर के बीच खतो-किताबत के माध्यम से छिड़े त्रिकोणीय संघर्ष के साथ ही सरकार की किस्मत कर्नाटक और गोवा की तर्ज पर देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर है. सरकार बचेगी या गिरेगी ये तो चंद दिनों में तय हो जाएगा, लेकिन पिछले दो-तीन दिनों से जिस तरह से ताबड़तोड़ नियुक्तियां और फैसले किए  जा रहे हैं, उसे राजनीतिक विश्लेषकों का यह स्पष्ट मत है कि बहुमत होने के तमाम दावों के बावजूद  कमलनाथ सरकार यह मान चुकी है कि वह बस चंद दिनों की मेहमान है. उपचुनाव होंगे या मध्यावधि चुनाव या फिर सरकार भंग होगी, कुछ भी हो सकता है.  भाजपा लगातार कमलनाथ सरकार पर अल्पमत में होने का आरोप लगाते हुए नियुक्तियों और फैसलों को असंवैधानिक करार देते हुए राज्यपाल से इन पर रोक लगाने की मांग करते हुए आक्रमण की मुद्रा में है.



अचानक मेहरबानी क्यों?

डेढ़ साल की कमलनाथ सरकार कांग्रेस के नेताओं, कार्यकर्ताओं और जनता पर अचानक मेहरबान कैसे हो गई, यह सवाल उठना तो लाजिमी है.  2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कर्ज में डूबी सरकार ने किसानों की कर्जमाफी की प्रक्रिया को कई हिस्सों में लटका दिया था, जबकि वादा था सरकार बनने के 10 दिन के भीतर कर्ज माफ करने का. बेरोजगारों को भत्ता देने का वादा भी खजाने में पैसा न होने के कारण अटका था. राज्य के निगम-मंडलों और आयोगों में पद इसी कंगाली के चलते खाली पड़े थे. खर्च वाले बड़े फैसले रुके पड़े थे. बजट सत्र में शिवराज सिंह सरकार के कार्यकाल में दो हजार से ज्यादा योजनाओं को इस बजट सत्र में बंद कर दिए जाने की योजना थी, केन्द्र पर राज्य के हिस्से का 14 हजार करोड़ रुपए रोकने का आरोप लगाया जा रहा था. जनहित की बात कहकर  राज्य के भविष्य को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही थी,  लेकिन अब जब कर्ज के बादल छंटे नहीं है. अर्थव्यवस्था में भयावह मंदी का दौर है, कोरोना वायरस से जिंदगी के साथ ही अर्थव्यवस्था के और अधिक गर्त में जाने का खतरा मंडरा रहा है, राज्य राजनीतिक अस्थिरता के दौर के गुजर रहा है, अपने साथ छोड़ रहे हैं, तब ऐसा कौनसा खजाना हाथ लग गया, जो राजनैतिक नियुक्तियों और जनता के लिए खजाना खोलते हुए फैसलों की बारिश होने लगी .



नियुक्तियों की बारिश

राजनीतिक विश्लेषको का स्पष्ट मानना है कि कमलनाथ को राज्य में सरकार जाने और मध्यावधि चुनाव का आसन्न संकट दिख रहा है. इसलिए सबसे पहले फैसले के रूप में 31 मार्च को रिटायर होने वाले मुख्यसचिव एस आर मोहन्ती को मप्र प्रशासन अकादमी का डीजी बना कर आइएएस एम गोपाल रेड्डी को मुख्यसचिव बनाकर पद्भार भी दिलवा दिया गया. विवेक जौहरी राज्य के डीजीपी बना दिए गए. संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों की बानगी देखिए कि कांग्रेस नेत्री- शोभा ओझा मप्र महिला आयोग की अध्यक्ष, अभय तिवारी- मप्र युवा आयोग के अध्यक्ष, कांग्रेस प्रवक्ता-जेपी धनोपिया, राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष, गजेन्द्र सिंह राजूखेड़ी-अनसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष, डॉ. आलोक चंसोरिया-निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग के अध्यक्ष, रामू टेकाम और राशिद साहिल सिद्दीकी-मप्र लोक सेवा आयोग के सदस्य, सुभाष शुक्ला-पशासक भोपाल को-आपरेटिव बैंक बना दिए गए. संवैधानिक पदों पर बैठाए गए इन लोगों को तब तक नहीं हटाया जा सकता, जब तक वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर लेते. सरकार ने भाजपा का दामन थाम लेने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी अंकुर मोदी को हटाकर राजीव शर्मा को अतिरिक्त महाधिवक्ता बना दिया. 11 सरकारी वकीलों को हटाकर 8 नए वकील तैनात कर दिए और इंदौर खंडपीठ के 12 वकीलों को हटा दिया.



याद आया वचन पत्र

सरकार पर संकट के बीच कमलनाथ कैबिनेट की 3 दिनों में दो  बैठके ं हो चुकी हैं. बीते रविवार को हुई कैबिनेट की बैठक में संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों के अलावा राज्य के 10 लाख कर्मचारियों को फायदा पहुंचाते हुए सरकार ने 5 फीसदी डीए बढ़ाने का ऐलान किया तो मंगलवार की बैठक में प्रदेश के मैहर, चाचौड़ा और नागदा को नया जिला बनाने का ऐलान कर दिया. इस तरह मप्र में अब 55 जिले हो जाएंगे. कर्मचारियों से जुड़े कुछ मदुदों पर इस बैठक मे चर्चा तो हुई, लेकिन फैसला अगली कैबिनेट मीटिंग के लिए टाल दिया गया. सरकार ने जल्द ही बेरोजगार युवाओं को 4 हजार रुपए बेरोजगारी भत्ता, अतिथि विद्वानों, अतिथि शिक्षकों और किसानों को गेंहूं खरीदी पर 160 रुपए क्विंटल बोनस देने की घोषणा की तैयारी भी कर रखी है. चूंकि मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में कुछ ही मंत्री शामिल थे, क्योंकि वित्त मंत्री तरूण भनोट से लेकर करीब 7 मंत्री बगावती सिंधिया गुट के विधायकों को मनाने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिगिवजय सिंह के साथ बेंगलुरु गए थे, इसलिए फैसले अगली कैबिनेट मीटिंग के लिए आगे बढ़ा दिए गए.



भविष्य की चिंता, विपक्ष का आक्रमण

वास्तव में कमलनाथ सरकार ने अपने डेढ़ साल के कार्यकाल में इतनी सारी नियुक्तियां और फैसले कभी एक साथ नहीं किए, अब जब यह सब हो रहा है, तो चौंकना स्वाभाविक है, जाहिर है भविष्य की स्थितियों और राजनीतिक संभावनाओं को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. उधर विपक्षी पार्टी भाजपा सरकार पर पूरी तरह आक्रामक है. भाजपा नेता शिवराज सिंह चौहान, गोपाल भार्गव, नरोत्तम मिश्रा, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा सहित पार्टी के की प्रतिनिधियों ने राजभवन जाकर राज्यपाल से इन नियुक्तियों और फैसलों को लेकर शिकायत की और  कहा कि संवैधानिक संकट से जूझ रही कमलनाथ सरकार संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां कैसे कर सकती है, इन्हें तत्काल रोका जाए.



सियासी नाटक

बता दें कि राज्य में 15 दिन से सियासी नाटक चल रहा है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीते हफ्ते भाजपा का दामन थाम लेने के बाद उनके गुट के 22 कांग्रेस विधायक बेंगलुरू की होटल में डेरा डाले हैं,  जिन्हें मनाने की कोशिशें लगातार चल रही है.  कांग्रेस सरकार सियासी दांवपेंचों से वक्त गुजार रही है, तो विपक्ष सरकार को हर हाल में नेस्तनाबूद करने पर आमादा है. राजभवन, विधानसभा, बेंगलुरू, सीएम हाउस और अब कोर्ट सियासी दांव-पेंचों की लड़ाई के सेंटर प्वाइंट बने हुए.



जनता का नुकसान

जरा सोचिए कि जनता जिस दल को शासन करने का अधिकार दे, वह अपने विधायकों की मौकापरस्त बगावत के चलते सत्ता से बाहर हो जाए. साथ ही ऐसी सरकारें भी जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकतीं, जो अपनी स्थिरता को लेकर लगातार चिंतित बनीं रहें. मध्यप्रदेश में चल रहे अभूतपूर्व राजनीतिक अस्थिरता और पक्ष-विपक्ष की सत्ता पर काबिज रहने या हो जाने की होड़ में सारे जमीनी काम ठप्प पड़े हैं. विकास पूरी तरह से अवरूद्ध हो चुका है, आखिरकार इन सबका नुकसान सबसे ज्यादा जनता को ही हो रहा. आखिरकार अब तक के चुनाव सुधार चुनी हुई सरकार को बचाने और उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करने की सुनिश्चितता तय करने में असफल साबित हुए. कुछ तो होना चाहिए, कि ये सूरत बदले और सियासी लड़ाई में जनता ने पिसे.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

सामाजिक, विकास परक, राजनीतिक विषयों पर तीन दशक से सक्रिय. मीडिया संस्थानों में संपादकीय दायित्व का निर्वाह करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र लेखन. कविता, शायरी और जीवन में गहरी रुचि.

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First published: March 18, 2020, 3:48 pm IST
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