एक जोगी हजार अफसाने

राजनीति की बिसात पर कई खाने आगे की सोच रखने वाले अजीत जोगी (Ajit jogi) अपनी तिकड़म, जुगाड़ और अपने मकसद के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए भी पहचाने जाते थे. उनके साथ जीवन भर कई विवाद भी जुड़े रहे.

Source: News18Hindi Last updated on: May 29, 2020, 5:33 PM IST
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एक जोगी हजार अफसाने
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का शुक्रवार को निधन हो गया.
छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के पहले मुख्यमंत्री और राज्य की राजनीति में अब तक के सबसे लोकप्रिय नेता रहे अजीत जोगी (Ajit Jogi) की जिंदगी का सितारा अस्त हो गया. 9 मई को दिल का दौरा पड़ने के बाद रायपुर के श्री नारायणा अस्पताल में 19 दिन तक जिंदगी के लिए मौत से संघर्ष करते हुए जोगी ने दुनिया को अलविदा कह दिया. उन्हें पिछले 3 दिन में दो बार दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ा. जोगी 2000 से 2003 तक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे.

राजनीति की बिसात पर कई खाने आगे की सोच रखने वाले जोगी अपनी तिकड़म, जुगाड़ और अपने मकसद के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए भी पहचाने जाते थे. उनके साथ जीवन भर कई विवाद भी जुड़े रहे. छत्तीसगढ की सियासत में जोगी को सियासत के एक नहीं, बल्कि कई अच्छे-बुरे अफसानों के साथ याद किया जाएगा. भीषण हादसे और बीमारी के दौरान मौत को अपनी मजबूत इच्छाशक्ति से कई बार मात देने वाले अजीत जोगी की जिंदगी इस बार जंगल जलेबी यानि गंगा इमली के एक छोटे से बीज ने ले ली. बीज सांस की नली में फंस गया और उन्हें दिल का दौरा पड़ गया. डाक्टरों ने सांस नली से बीज तो निकाल लिया, लेकिन जोगी की जान नहीं बचा सके.

एक नाम लेकिन छवि कई
अजीत जोगी  (Ajit Jogi) का नाम आते ही एक प्रतिभावान आईएएस, एक दिगगज नेता की छवि उभरती है. जुलाई 2017 का आखिरी हफ्ता शुरू होने के ठीक एक दिन पहले की बात है, जोगी ने अपना इलाज करने वाले श्री नारायणा अस्पताल की एक कांफ्रेंस में मौत के शिंकजे से बार-बार बच निकलने के किस्से सुनाते हुए कहा था कि डॉक्टर्स के प्रयासों, अपनी मजबूत इच्च्छा शक्ति, सकारात्मक सोच और परिवार के सहयोग के बूते हर बार वह सलामत रहे. वो यह भी कहते थे कि मुझे इच्छा शक्ति का वरदान मिला है, मैं ऐसे नहीं जाऊंगा. बता दें कि सन 2004 में चुनाव प्रचार के दौरान एक खतरनाक सड़क हादसे में अजीत जोगी चलने में अक्षम हो गए थे. देश-विदेश सभी जगह तमाम नाकाम कोशिशों के बाद जिंदगी भर के लिए व्हील चेयर के सहारे हो गए.
19 अप्रैल 1946 में बिलासपुर के पेंड्रा में जन्मे अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने भोपाल के मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में गोल्ड मैडल हासिल किया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी रायपुर में पढ़ाया भी. इसके बाद वह यहीं से आईपीएस बने और फिर आईएएस. 1980-90 के दशक में इंदौर में कलेक्टरी के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह (Arjun Singh) ने कांग्रेस (Congress) में आकर राजनीति का ऑफर दिया. सियासी चक्षुदर्शियों के मुताबिक साधने की कला में माहिर जोगी ने अर्जुन सिंह को तब साध लिया था, जब सीधी में कलेक्टर थे और राजीव गांधी को तब साध लिया था, जब रायपुर में कलेक्टर थे.

इंडियन एयर लाइंस में पायलट रहते हुए राजीव गांधी का रायपुर जब भी जाना होता, तब कलेक्टर जोगी टिफिन में घर का बना खाना लेकर हाजिर रहते थे. कहा जाता है इसीलिए सियासत की कक्षा में दाखिले में कोई दिक्कत नहीं हुई. जोगी ऐसे शख्स साबित हुए जिसने शिक्षा, सिस्टम और सियासत में सभी जगह अपनी काबलियत का झंडा बुलंद किया. अविभाजित मध्यप्रदेश में वह पृथक छत्तीसगढ़ के लिए संघर्ष का झंडा नवंबर 2000 में नए राज्य के अस्तित्व में आने तक थामे रहे और तिकड़म और जुगाड़ में केन्द्रीय मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल जैसे प्रतिद्ंद्वी को पीछे छोड़ते हुए प्रथम मुख्यमंत्री बने. जोगी को नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ कांग्रेस विधायक दल का नेता चुने जाने के ऐलान के बाद जनता ने सियासी हिंसा का वो नजारा देखा कि सबकी आंखें फटी रह गई थीं. हुआ ये था कि घोषणा के बाद जब दिगविजय सिंह रूठे विद्याचरण शुक्ल को मनाने उनके फार्म हाउस पहुंचे, तो वापस निकलते वक्त दिगविजय के कपड़े फट चुके थे और चेहरा धूल से सना हुआ था. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि गुस्साए विद्याचरण समर्थकों ने क्या सलूक किया होगा.

लोकप्रियता का चरम, बदनामी के दाग1 नवंबर 2000 में नए छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने और मुख्यमंत्री बनने के बाद अजीत जोगी के समय को उनकी राजनीति के चरमोत्कर्ष का साल कहा जा सकता है, क्योंकि इसके बाद ही पतन की शुरूआत भी हो गई थी. जनता को उनकी ही मीठी छत्तीसगढिय़ा भाषा और शैली में बात करने वाला, उनके साथ चुनाव के दौरान साथ बैठकर खाना खाते दिखने वाला मुख्यमंत्री मिला. राज्य गठन के बाद छत्तीसगढ़ को जोगी के नेतृत्व में सुव्यवस्थित विकास का मौका मिला और उन्होंने किया भी.

लेकिन इसके साथ ही भ्रष्टाचार के आरोपों के दाग सीएम जोगी पर लगने लगे. घेरे में पत्नी डॉ. रेणु जोगी, बेटे अमित जोगी (Amit Jogi) भी आए. जोगी के शासनकाल में कांग्रेस के ही मंत्री कहने लगे थे, कि चपरासी के नीचे के तबादले तक छोड़कर ऊपर के सारे तबादलों के अधिकार जोगीजी के पास हैं. सारा काम सीएम हाउस से और फैमिली की हां के बाद ही होता है.

-अजीत जोगी की बेटी ने इंदौर में आत्महत्या कर ली थी. इंदौर में ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया था. सन 2000 में अजीत जोगी जब मुख्यमंत्री बनें तो उन्होंने अपनी बेटी की कब्र खुदवा डाली और शव को ताबूत सहित गृहग्राम ले जाकर वहां उसका दोबारा अंतिम संस्कार किया.

-पिता के मुख्यमंत्री रहते हुए बेटे अमित जोगी पर जून 2003 में एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष रामअवतार जग्गी की हत्या का आरोप लगा.

-कहा जाता है कि उनके मुख्यमंत्री रहने के दौरान छत्तीसगढ में डर का माहौल अपनी जड़ें जमा चुका था. सरकारी दफ्तर हो या राजनीतिक दल या फिर अखबार के दफ्तर, जोगी का नाम खुसपुसाने से भी लोग डरा करते थे. डर इस बात का था कि खिलाफ बोला तो वो कुछ भी हो सकता है.

विवादों की लंबी फेहरिस्त

-2013 में दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले में नंदकुमार पटेल समेत करीब एक दर्जन कांग्रेस के बड़े नेता मारे गए थे, केवल अजीत जोगी बच गए थे. तब घटना के बाद अफवाहें चलने लगीं थीं इस हत्याकांड के पीछे अजीत जोगी हैं. इन अफवाहों के बाद जोगी ने दो भाजपा नेताओं पर मानहानि का मुकदमा भी ठोंका था.

-जोगी की जाति को लेकर विवाद ताजिंदगी हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चलता रहा. दरअसल जोगी जिस परिवार से आते हैं, वह अनुसूचित जाति से है. अजीत जोगी के पास इसका प्रमाण पत्र भी है. आरोप है कि जोगी ईसाई बन चुके हैं. प्रमाणपत्र तिकड़म से जुगाड़ा गया है, ताकि उनके परिवार वाले आरक्षण का लाभ ले सकें, क्योंकि धर्मपरिवर्तन की स्थिति में संबंधित व्यक्ति आरक्षण की पात्रता खो देता है. कहा तो यह भी जाता रहा है अजीत जोगी कांग्रेस की ओर से जब तक राज्यसभा में रहे, तब तक दिल्ली में उसी चर्च में प्रार्थना करने जाते थे, जहां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) जाती थीं.

-2003 में अजीत जोगी के नेतृत्व में जब कांग्रेस चुनाव हार गई, जोगी भाजपा विधायकों को तोडऩे की कोशिश में एक स्टिंग में पकड़े गए, जिसमें वह सोनिया गांधी का नाम भी ले रहे थे. ऐसे में कांग्रेस से निकाल दिए गए, लेकिन फिर वह कुछ ही समय में वापस आ गए, इसके सोनिया गांधी और उनके परिवार से जोगी की नजदीकियों और ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है.

-अजीत जोगी का पूरा परिवार यानी पत्नी डॉ. रेणु जोगी, बेटा अमित जोगी और बहू सब राजनीति में हैं.

अलग पार्टी भी बनाई
एक बार फिर कांग्रेस से अलग होने के बाद अजीत जोगी ने 2018 में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ बनाई, जिसने मायावती की बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा. जोगी की आन-बान शान में कई गीत लिखे गए, जैसे...
जोगी जगाए छत्तीसगढ़ ला
गांव-गांव ला शहर बनाए.
चले जोगी जनसेवा खातिर
सबो समाज ऊपर उठाए.

लेकिन चुनाव में तमाम गाने और जोगी के व्हीलचेयर के जरिए धुंआधार प्रचार भी कुछ न कर पाया. जनता ने न जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़, न जोगी, न बसपा, किसी पर भरोसा नहीं किया, चुनाव में पार्टी पिटा हुआ मोहरा साबित हुई.

गंगा इमली के बीज ने ली जान
- 9 मई से अजीत जोगी का रायपुर के श्री नारायणा अस्पताल में इलाज चल रहा था. वह कोमा में चले गए थे. उनकी मस्तिष्क की गतिविधियां नहीं के बराबर थी, डॉक्टरों ने दवाओं के अलावा म्यूजिक थैरेपी से भी उनके इलाज की कोशिश की, उनके मनपसंद गाने सुनाए, ताकि दिमाग में सक्रियता पैदा की जा सके. डॉक्टरों ने बताया कि जोगी के श्वसन नली में गंगा इमली का बीज अटक गया था, जिसकी वजह से हार्टअटैक आया. पूर्व सीएम शनिवार सुबह अपने बंगले के लॉन में गंगा इमली खा रहे थे. इसी दौरान उसका बीज उनकी सांस नली में अटक गया, जिसके कारण उन्हें दिल का दौरा पड़ा. डॉक्टरों ने उनकी सांस नली से वह बीज निकाल दिया था, लेकिन वह जोगी की जान नहीं बचा सके.

क्या होती है गंगा इमली
किसने सोचा था कि कई स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए प्रसिद्ध गंगा इमली अजीत जोगी की मौत का सबब बन जाएगी. इसका वानस्पितक नाम पिथेलेल्लोबिम डुल्स जो रायपुर में भी पाया जाता है. गुजराती में इसे गोरस अंबली और अन्या स्थानों पर जंगल जलेबी या गंगा इमली के नाम से जाना जाता है. मूलरूप से जंगल जलेबी मैक्सिको में उत्पन्न हुई और अमेरिका, मध्य एशिया और फिर भारत में फैल गई. इसके पेड़ शहरों, गांवो, राजमार्गो पर सभी जगह मिल जाते है. गंगा इमली वैसे तो दिखने में इमली जैसी दिखती है, इसका पेड़ 10 से 15 मीटर ऊंचाई का होता है.

इसके बीज की फली में एक मीठा और खट्टा गूदा होता है. इसे सीधे खाने के साथ ही मांस के व्यंजनों के साथ भी खाया जाता है. चीनी और पानी के साथ पेय के रूप में भी इसका उपयोग होता है. कई रूपों में इसका उपयोग किया जाता है. इसके बीजों का तेल भी निकाला जाता है. आयुर्वेद में इसका उपयोग पीलिया, मलेरिया, बुखार के इलाज में किया जाता है, वहीं रक्त संचरण को दुरूस्त रखने के साथ ही ब्लड शुगर स्तर का नियंत्रित रखने में काफी उपयोगी माना जाता है.

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ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं और कई संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है.

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First published: May 29, 2020, 5:13 PM IST
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