सिस्टम ? संवेदना? सवालों का घेरा

लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने यह सब समय रहते क्यों नहीं देखा? क्यों देश के शीर्षतम वकील, सामाजिक कार्यकताओं की प्रवासी मजदूरों को लेकर दायर याचिकाएं खारिज की जाती रहीं, क्यों केन्द्र सरकार के झूठ पर विश्वास किया जाता रहा, इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 29, 2020, 4:11 PM IST
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सिस्टम ? संवेदना? सवालों का घेरा
(प्रतीकात्मक फोटो)
नई दिल्ली. जब सिस्टम नाकाम हो, अदालतें अपना भरोसा खो रही हों, मातम के वक्त देश में उत्सव मनाने की तैयारी चल रही हो और साइकिल पर पिता को बैठाकर 1200 किलोमीटर की सड़क नाप देने वाली किशोरी ज्योति के नाम पर डाक टिकट जारी कर देने व उसे देश का ब्रांड एंबेसडर बनाकर वाहवाही लूटने की बात चल रही हो, तो मान लीजिए कोरोना महामारी के इस विकट संकट के दौर में हमारी मानवीय संवेदनाएं मर चुकी हैं. हमें अब किसी कृत्य पर शर्म नहीं आती. दरअसल पिछले दो-तीन दिन में जो खबरें और फैसले सामने आए, उनसे यह सवाल उठना लाजिमी है. मंगलवार को सुप्रीमकोर्ट ने प्रवासी श्रमिकों की घर वापसी में आ रही तकलीफों पर स्वत: संज्ञान लिया और सुनवाई के बाद गुरूवार को केन्द्र सरकार को महत्वपूर्ण आदेश दिया. अपने आदेश में सुप्रीमकोर्ट ने टिप्पणी कि इस मामले में राज्यों और केन्द्र सरकार से गलतियां हुईं. अब केन्द्र और राज्य सरकारें प्रवासी श्रमिकों को घर तक पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित करें. उनसे बस-ट्रेन का किराया नहीं लिया जाए. जो श्रमिक जहां हैं, वहां उनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था की जाए.

सवाल तो उठेंगे
आप सुप्रीमकोर्ट के आदेश को देर से आए दुरुस्त आए वाला फैसला कह सकते हैं, लेकिन यह चार घंटे के नोटिस पर अचानक घोषित देशव्यापी लॉकडाउन के दो महीने अब जाकर आया है, जब अलग-अलग राज्यों से सैकड़ों किलोमीटर की सड़क नापते 500 से ज्यादा श्रमिक, बच्चे, बूढ़े, औरतें भूख-प्यास, थकान, बीमारी और हादसों के शिकार हो कर मारे जा चुके हैं. पूरे देश ने सरकारी बदइंतजामी भुगतते लाखों श्रमिकों को अपने परिवारों और सामान के साथ रोते-बिलखते, गर्भवती महिला को सड़क पर बच्चे को जन्म देते और उसके तत्काल बाद उसेे सैकड़ों किलोमीटर चलते देखा है. कहीं अपने मृत बच्चे को गोद में लिए मां को और कहीं मृत मां का आंचल खींचकर उसे जगाने की कोशिश करते बच्चे का दिल दहला देने वाला मंजर भी हमने देखा है. दुनिया में सबसे बेहतरीन रेलवे सिस्टम में शुमार भारतीय रेलवे की 40 से ज्यादा श्रमिक ट्रेनों को मुकाम तक पहुंचने की बजाय कहीं और पहुंचने, 2 दिन के सफर को 9 दिन में पूरा करने की लापरवाही भी देश के सामने है. लाखों श्रमिक अभी भी विभिन्न राज्यों में फंसे हैं और जैसे -तैसे घर वापसी का इंतजार कर रहे हैं.

लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने यह सब समय रहते क्यों नहीं देखा? क्यों देश के शीर्षतम वकील, सामाजिक कार्यकताओं की प्रवासी मजदूरों को लेकर दायर याचिकाएं खारिज की जाती रहीं, क्यों केन्द्र सरकार के झूठ पर विश्वास किया जाता रहा, इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है. 25 मार्च को लॉकडाउन शुरू होने के साथ ही हालात बिगड़ने लगे थे, जब प्रवासी मजदूरों की सुव्यवस्थित घरवापसी और उनके खाने-पानी के इंतजाम के लिए याचिका लगी, तो 31 मार्च को सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि मजदूरों की वापसी तीन महीने तक लॉकडाउन रहने की फर्जी खबरों के कारण हुई है. कोर्ट का यह नतीजा महाधिवक्ता तुषार मेहता द्वारा पेश केन्द्र सरकार के दावे पर आधारित था कि कोई भी मजदूर सड़क पर नहीं है, सब घर लौट चुके हैं. मजदूरों के पलायन के लिए फर्जी खबरें दोषी हैं. कोर्ट ने यह जांचने की कोशिश ही नहीं की कि बेरोजगारी, भूख, रहने का ठिकाना न होने की वजह से प्रवासी हताशा के शिकार हुए हैं.
8 मई को औरंगाबाद जिले में रेलवे ट्रेक पर थक कर सोए मप्र के 16 मजदूरों के ट्रेन से कटकर मरने की खबर आई और फिर मजदूरों की निशुल्क, व्यवस्थित घरवापसी के लिए याचिकाएं लगीं तो सुप्रीमकोर्ट ने कहा-कौन कहां से जा रहा है, कहां चल रहा है, इसकी निगरानी कोई नहीं कर सकता, न किसी को रोका जा सकता है. राज्यों द्वारा आश्रय स्थलों में मजदूरों को रोकने के बाद वहां से भी भूख, प्यास और हंगामों की खबरें निकलीं, तो प्रधानमंत्री द्वारा राहत के लिए घोषित हजार-हजार रुपए की राशि सीधे प्रवासी मजदूरों के खाते में डालने की मांग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता हर्षमंदर की याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि जब मजदूरों को खाना मिल रहा है तो उनको पैसों की क्या जरूरत है. बीते सोमवार को भी कपिल सिब्बल, इंदिरा जयसिंह, पी. चिदंबरम, प्रशांत भूषण सहित कई लोगों ने सुप्रीमकोर्ट को याचिका देकर केन्द्र सरकार की गलत बयानी पर फैसले न देने और प्रवासी मजदूरों की घरवापसी के लिए भोजन, पानी के साथ अधिक ट्रेनें-बसें चलाने की मांग की. इस याचिका को तो सुप्रीमकोर्ट ने नहीं सुना, अलबत्ता मुद्दे पर स्वत:संज्ञान लेते हुए आदेश दिए.

(प्रतीकात्मक फोटो)


इन राज्यों की हिमाकत तो देखिएगुरूवार को जब सुप्रीमकोर्ट श्रमिकों की सुव्यवस्थित घरवापसी के लिए केन्द्र और राज्यों को आदेश दे रहा था, तभी कर्नाटक में भाजपा के नेतृत्व वाली येदियुरप्पा सरकार ने महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और राजस्थान से आने वालीं ट्रेनों-बसों की आवाजाही पर रोक लगा दी. मतलब कर्नाटक में फंसे श्रमिक अब वहीं अटके रहने वाले हैं. दूसरी ओर हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने भी दिल्ली से लगी राज्य की सभी सीमाएं पूरी तरह से सील करने के आदेश जारी कर दिए. यानी एनसीआर के शहर गुड़गांव और फरीदाबाद से भी लोग दिल्ली नहीं आ-जा पाएंगे, अन्य राज्यों से आने-जाने की बात तो छोड़ ही दीजिए. इधर मध्यप्रदेश सरकार ने 1 जून से राज्य में 35000 यात्री बसें चलाने का ऐलान किया तो प्राइवेट रूट बस आनर्स एसोसिएशन ने बसें चलाने से इंकार कर दिया. बस संचालकों ने दलील दी कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न हो पाने से ग्रीन जोन और यलो जोन में भी बसें नहीं चलाएंगे. हम यात्रियों के साथ ही अपने स्टाफ की सुरक्षा को खतरे में नहीं डाल सकते. संचालक इस बात पर भी अड़े हैं कि सरकार पहले लॉकडाउन पीरियड का हमारा टैक्स माफ करे, फिर बसें चलाने पर विचार किया जाएगा.

संकट के दौर में गुणगान क्यों?
जरा बताइए कि यह किस संवेदनशीलता की परिचायक है कि जब पूरा देश कोरोना संकट से जूझ रहा है, तब 30 मई को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की पहली सालगिरह का डिजिटल जश्न मनाने की तैयारी की जा रही है. सरकार कोरोना के बीच डिजिटल रैली करेगी, उपलब्धियां गिनाने के लिए 1000 से ज्यादा ऑनलाइन कान्फ्रेंस होंगी. बड़े राज्यों में 2 और छोटे राज्यों में एक रैली होगी, हर रैली में कम से कम 750 लोग होंगे. यह समय तो लाखों श्रमिकों के बेहतर जीवन के लिए सुविधाएं जुटाकर उपलब्धियां हासिल करने का है, न कि पिछली सच्ची-झूठी उपलब्धियों का गुणगान करने का.

ज्योति के नाम पर
देशव्यापी लॉकडाउन में अपने बीमार पिता को साइकिल पर बैठाकर गुरुग्राम से बिहार के दरभंगा तक लाने वाली 15 साल की ज्योति कुमारी की हर कोई प्रशंसा कर रहा है. मीडिया में तस्वीर आने के बाद ट्रंप की बेटी इंवाका ट्रंप ने भी ट्विटर के माध्यम से ज्योति के हौसले और जज्बे को सराहा था. इसके बाद ज्योति का घर पीपली लाइव फिल्म की तरह छा गया. उसकी बढ़ती प्रसिद्धि की गंगा में अब हर कोई हाथ धोने को तैयार है. दरभंगा डाक विभाग ने उसके नाम पर डाक टिकट जारी कर दिया है. केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि उनका मंत्रालय इस किशोरी को ब्रांड एंबेसडर बनाने पर विचार करेगा. ज्योति के घर पर सम्मान और ऑॅफर देने वालों की भीड़ लग गई है. दरअसल हौसले की मिसाल बनी ज्योति पर पिता को बैठाकर गुरूग्राम से दरभंगा बिहार तक ले जाना उसकी मजबूरी थी, क्योंकि सरकारी सिस्टम ने ऐसा कोई इंतजाम नहीं किया था, जिससे वह बिना तकलीफ अपने बीमार पिता को घर तक ले जा सके. ज्योति की यह जीवटता मिसाल के साथ ही सिस्टम और उस बेशर्म राजनीति के मुंह पर तमाचा है, जो जयकारे लगाकर वाहवाही लूटने की कोशिश कर रहे हैं. इन्हें शर्म नहीं आती?
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं और कई संस्थानों के साथ जुड़ाव रहा है.

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First published: May 29, 2020, 4:09 PM IST
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