OPINION: असाधारण उपचुनाव में दांव भी असाधारण, चेहरों की लड़ाई में मुद्दे गुम

MP By-election : एमपी चुनाव के प्रचार में हाथरस कांड से लेकर बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत और कंगना रनौत तक और चीन से खतरे और धारा 370 जैसे मुद्दों को लेकर जुमलेबाजी चल रही है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 31, 2020, 1:33 PM IST
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OPINION: असाधारण उपचुनाव में दांव भी असाधारण, चेहरों की लड़ाई में मुद्दे गुम
एमपी उपचुनाव मूल मुद्दों से हटकर अब दो चेहरों की लड़ाई पर केंद्रित हो गया है.
मध्य प्रदेश के इतिहास में पहली बार 28 विधानसभा सीटों पर 3 नवंबर को होने जा रहे बेहद असाधारण उपचुनाव (Extraordinary By-election) में राजनीतिक दांव भी बड़े और असाधारण हैं. वास्तव में इस चुनाव में एक ही मुद्दा है, वो है दलबदल कर एक दल की सरकार गिराने और दूसरे की सरकार बनाने वालों की नैतिकता, विश्वसनीयता और राजनीतिक शुचिता (Ethics, Credibility and Political Purity) का. इसी मुद्दे की वजह से “गद्दार चाहिए या ईमानदार, बिकाऊ चाहिए या टिकाऊ” जैसे नारे सियासी फिजाओं, रैलियों और सभाओं में गूंज रहे हैं. यह चुनाव व्यक्ति केन्द्रित (Person Centered) हो गया है, न कि मुद्दा आधारित. मुद्दे अपना वजूद खो चुके हैं. दांव पर चुनाव के तीन झंडाबरदार शिवराज, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के चेहरे और उनकी सियासी हैसियत लगी है. देखना है कि इनमें से किन सूरमाओं की खिसकेगी जमीन और किसके लिए बिछेगा सत्ता का लालकालीन?

चुनाव प्रचार बस खात्मे की ओर है. आखिरी दौर में नेता रोड शो (last round road show) में अपनी ताकत झोंक रहे हैं. गांव, गरीब, किसान, रोजगार, सड़क, पानी, बिजली जैसे बुनियादी सवाल (Basic issues) “आइटम, रखैल, भूखा-नंगा, मारीच, कंस, शकुनि” मामा बना रहा मामू, ” जैसे बदजुबान जुमलों से भरे चुनावी शोर में पूरी तरह गुम हो चुके हैं और टोकन की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं. 10 नवंबर को नतीजे आने पर पता चलेगा, कि किसकी होगी जीत, किसकी हार, कौन बनाएगा सरकार? इसी दिन यह भी सामने आ जाएगा कि जनता की नजर में विश्वसनीयता का सवाल बड़ा रहा या चेहरा?

कई मायनों में ये चुनाव आसाधारण
ये चुनाव कई मायनों में असाधारण (Extraordinary) कहे जा सकते हैं. पहला-इतने बड़े पैमाने पर यानी 28 सीटों पर शायद ही किसी प्रदेश में एक साथ उपचुनाव होने जा रहे हैं. यह स्थिति मार्च में तब बनी थी, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उनके 22 समर्थक विधायक, मंत्रियों ने बगावत कर मध्य प्रदेश की 15 महीने पुरानी कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार गिरा दी थी और भाजपा में शामिल होकर शिवराज सिंह चौहान की सरकार बनवा दी थी. उसके बाद कांग्रेस के 3 विधायकों के पाला बदलकर भाजपा के शामिल होने और 3 विधायकों के निधन के बाद राज्य में 28 सीटों पर उपचुनाव की स्थिति बनी है. दूसरा-इस उपचुनाव की जंग सीधे तौर पर कमलनाथ बनाम शिवराज सिंह की बन चुकी है. कमलनाथ की सत्ता गिराने के मुख्य किरदार रहे राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया भी चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में अब किनारे पड़ते दिख रहे हैं. तीनों नेताओं की राजनैतिक हैसियत इन उपचुनावों में दांव पर है, जो 10 नवंबर को नतीजे तय करेंगे. इसीलिए तीनों ही नेता चुनाव प्रचार पर पूरा जोर लगा रहे हैं. तीसरा-इन उपचुनावों में मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुसलमान में बांटने की कोशिश भी अब तक परवान नहीं चढ़ पाई.
सवालों ने चुप्पी साध रखी
चुनाव में कोई नहीं पूछ रहा कि कर्ज न चुका पाने की वजह से हर साल औसतन 1100 से ज्यादा किसान क्यों खुदकुशी कर लेते हैं? क्यों उनकी फसल का वाजिब बीमा नहीं मिल पा रहा? क्यों किसानों को एमएसपी से कम पर फसल बेचना पड़ रही? पहले 15 साल और फिर 7 महीने तक भाजपा की सरकार के बावजूद ग्वालियर-चंबल का विकास क्यों नहीं हुआ? क्यों लाखों युवा बेरोजगार है? क्यों महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं? क्यों सांवेर विधानसभा क्षेत्र की सिंचाई परियोजना ठप्प पड़ी है? क्यों अन्य विधानसभा क्षेत्रों में बुरे हाल हैं?

बस छाया गद्दार या खुद्दारउपचुनाव के सियासी रण में भाजपा और कांग्रेस के बीच प्रमुख मुद्दा “गद्दार बनाम खुद्दार” ही है. कांग्रेस का पूरा चुनाव अभियान ही “गद्दार” के आसपास टिका है, तो दूसरी ओर भाजपा, सिंधिया के साथ उनके समर्थक नेताओं के कांग्रेस छोड़ने का कारण उनकी खुद्दारी बता रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके साथी नेता कहते हैं कि गद्दारी तो कांग्रेस और उसके नेताओं ने की है. कमलनाथ ने सरकार बनने पर 10 दिन के भीतर किसानों का कर्जा माफ करने की बात कही थी, जो 15 महीनों में नहीं किया. वादे के अनुसार बेरोजगारों को भत्ता नहीं दिया, उल्टे गरीबों के हक, महिलाओं के अधिकार छिन गए थे. प्रदेश में विकस अवरुद्ध और राजनीतिक अराजकता का माहौल था, इससे दुखी होकर सिंधिया के समर्थक भाजपा के साथ आए, तो इसमें गद्दारी की क्या बात है.


चुनाव में किसान कहां?
शुरुआत में उपचुनाव के दौरान किसान फसल बीमा, किसान कर्जमाफी, एमएसपी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों को उठाया जा रहा था. कमलनाथ अपने 15 महीने के कार्यकाल में राज्य के 26 लाख किसानों के कर्जमाफ करने को अपनी उपलब्धि बता रही थी, तो भाजपा इसे छलावा कह रही थी.  चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों को लुभाने की कोशिश करते हुए पीएम किसान सम्मान निधि योजना में मिलने वाली 6 हजार रुपए सालाना राशि में राज्य की ओर से 4 हजार रुपए अतिरिक्त जोड़ने का ऐलान किया. अब जब चुनाव प्रचार खत्म होने में केवल 3 दिन शेष हैं, बुधवार को भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में किसानों के लिए किए अपने वादों और उपलब्धियों को याद “गद्दार बनाम खुद्दार” कराया, दोहराया है. संकल्प पत्र में कहा गया है कि फसल बीमा योजना के साल 2018-19 के 31 लाख किसानों को, जिसका भुगतान कमलनाथ सरकार ने रोक रखा था, उसे शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री बनते ही जारी करने के आदेश दिए. किसानों के लिए शून्य फीसदी ब्याज पर ऋण की योजना फिर से शुरू की गई है. वहीं कांग्रेस ने भी 28 सीटों के लिए 28 वचन पत्र बनाए हैं, जिसमें किसानों की कर्जमाफी करने, मुफ्त बिजली की बात कही गई है.

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शिवराज, कमलनाथ और सिंधिया तीनों नेताओं की नजर जीत पर.


ध्रुवीकरण की कोशिश, जुमलों पर जोर
भाजपा रामशिला पूजन और रामशिला यात्राएं निकालकर मतदाताओं के ध्रुवीकरण का प्रयास करते दिखी, लेकिन वह चुनाव में हिन्दू-मुस्लिम का तड़का लगाने में कामयाब नहीं हो पायी. चुनाव प्रचार में हाथरस कांड से लेकर बालीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत और कंगना रानौत तक और चीन से खतरे और धारा 370 जैसे मुद्दों को लेकर जुमलेबाजी चल रही है, लेकिन उपचुनावों के असल मुद्दों और जनता की जरूरतों का जिक्र कोई नेता या पार्टी नहीं कर रहे.

हद दर्जे की बदजुबानी
प्रचार की गाड़ी तब पटरी से उतरती और बाजी कांग्रेस के हाथ से फिसलती दिखी, जब कमलनाथ ने अपनी सरकार में मंत्री रहीं और अब भाजपा से प्रत्याशी इमरती देवी को “आइटम’ कह डाला. जवाब में इमरती देवी ने कमलनाथ को “कपटनाथ, राक्षस, शराबी-कबाड़ी, महिलाओं को छेड़ने वाला गली छाप गुंडा, लुच्चा-लफंगा” सहित न जाने क्या-क्या कह डाला. कमलनाथ की मां, बहन को बंगाल की ‘आइटम’ कह दिया. वहीं शिवराज की मौजूदगी में रही-सही कसर दूसरे मंत्री एवं दिमनी से भाजपा प्रत्याशी गिर्राज दंडोतिया ने यह कह कर पूरी कर दी कि ‘कमलनाथ दिमनी में बोलते तो यहां से उनकी लाश जाती.’ दंडोतिया ने कमलनाथ को बूढ़ा कहते हुए दिग्विजय सिंह पर भी टिप्पणी की. कहा कि ‘उनके यहां बहू पहले आ गई और सास बाद में’. एक अन्य मंत्री बिसाहूलाल ने कांग्रेस प्रत्याशी की पत्नी को ‘रखैल’ बोल दिया. इसके बाद कांग्रेस के एक नेता दिनेश गुर्जर ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को “भूखे-नंगे परिवार” का बोलकर कमलनाथ-शिवराज के बीच सियासी लड़ाई को अमीर-गरीब, उद्योगपति-किसान की लड़ाई में बदल दिया. कांग्रेस बैकफुट पर और भाजपा आक्रामक हो गई, उसने मौके का फायदा उठाकर शिवराज की ब्रांडिंग शुरू कर दी. गुर्जर के बयान पर राजनीतिक विश्लेषक वरिष्ठ पत्रकार राजेश पांडे इसे कांग्रेस के लिए सेल्फ गोल जैसा बताते हुए कहते हैं कि प्रदेश में जिन हिस्सों में उपचुनाव हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश वे इलाके हैं, जहां की 80 फीसदी आबादी गरीब, किसान और गांव की है. भाजपा इसे गांव गरीब की अस्मिता से जोड़ेगी. श्री पांडे की बात सच भी लगती है, क्योंकि शिवराज अपनी हर सभा में कह रहे हैं कि कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि “कमलनाथ तो देश के नंबर दो उद्योगपति है, शिवराज तो नंगे भूखे है. तुम्हारी अमीरी तुम्हें ही मुबारक हो कमलनाथ, लेकिन हम नंगे-भूखों पर ऊंगली मत उठाओ. हम ऐसे ही ठीक हैं, हमें नंगे भूखे ही रहने दो, ताकि हम गरीबों का दर्द महसूस कर सकें और उनकी जिंदगी भर सेवा करते रहें."

भाजपा जीत को लेकर आशंकित
इन उपचुनावों में शिवराज, सिंधिया से लेकर भाजपा के सारे नेता सभी 28 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं और कुछ कदमों से लग रहा है कि पार्टी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं, बल्कि आशंकित है. इसलिए मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि भाजपा एक सीट जीते या दो सीट, तब भी सरकार उसकी ही रहेगी. दमोह से कांग्रेस विधायक राहुल सिंह लोधी के भाजपा में शामिल हो गए. इससे पहले यह खबर प्रसारित की गई कि दो निर्दलीय विधायकों केदार डाबर और सुरेन्द्र सिंह शेरा ने अपने समर्थन की चिट्ठी विधानसभा को भेज दी है. आईबी और एक एनजीओ के सर्वे के बाद भाजपा ने चुनाव में किसी विपरीत स्थिति के लिए एक प्लान बी भी तैयार कर रखा है. बताते हैं कि कांग्रेस के कुछ और विधायक पाला बदल कर भाजपा में जा सकते हैं. यह सब देख कर सवाल उठ रहा है कि भाजपा को अपनी जीत पर शक है, इसलिए ही वह इस तरह के हथकंडे अपना रही है.

बसपा बिगाड़ सकती है खेल
ग्वालियर चंबल की 16 में दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं. यहां 16 में से 2 सीटों पर 2018 के चुनाव में बसपा प्रदेश में दूसरे नंबर पर रही थी और 7 सीटों पर काफी निर्णायक और सम्मानजनक वोट हासिल किए थे. कई सीटों पर भाजपा का खेल बिगाड़ा था और इसका फायदा कांग्रेस को मिला था और इसी की बदौलत कांग्रेस सत्ता हासिल करने में कामयाब हो पाई थी. उसने सभी 28 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे है. बसपा को गेमचेंजर माना जा सकता है. भले ही वह चुनाव न जीत पाए, लेकिन वोट जरूर काटने में अपनी भूमिका निभा सकती है.


अलग-थलग पड़ रहे सिंधिया
सिंधिया ने अपने समर्थक मंत्री, विधायकों के साथ भाजपा में शामिल होकर भले ही कमलनाथ की सरकार गिराई और शिवराज सिंह की सरकार बनवाई हो, लेकिन उपचुनावों में उनकी भूमिका अब केन्द्र में नहीं रह गई है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले उन्हें भाजपा के हाईटेक प्रचार रथ से दरकिनार किया गया. उसमें सिर्फ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा के फोटो लगाए गए. उसके बाद भाजपा के स्टार प्रचारकों की लिस्ट में उन्हें 10वें नंबर पर रखा गया और लिस्ट में किसी अन्य सिंधिया समर्थक को कोई जगह नहीं दी गई. अब भाजपा का जो संकल्प पत्र जारी किया गया, उसमें भी सिंधिया का कोई जगह नहीं दी गई याने उनकी कोई फोटो नहीं है. सिंधिया घराने के प्रभाव वाली ग्वालियर-चंबल की 16 सीटों पर भी चुनावी लड़ाई के चेहरे के रूप में शिवराज और कमलनाथ ही हैं. कांग्रेस के मुताबिक सिंधिया भाजपा में अतिरिक्त की भूमिका में रह गए हैं.

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सिंधिया समर्थक विधायकों के कमलनाथ सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद एमपी में 28 सीटों पर हो रहे हैं उपचुनाव.


अब तस्वीर यह है कि सिंधिया हर सभा में खुद को आगे रखते हुए बोल रहे हैं. मुरैना के कार्यकर्ता सम्मेलन में वह एक कार्यकर्ता से बोले तुम्हारे सामने खुद महाराज खड़े हैं, खुल कर बोलो. भांडेर की चुनावी सभा के बाद कार्यकर्ताओं से कहा कि गांव-गांव जाकर बता दो, ये चुनाव महाराजा सिंधिया का है. मंत्री महेंद्र सिंह सिसौदिया के लिए एक चुनाव में सिंधिया ने कहा कि ये चुनाव बीजेपी-कांग्रेस का नहीं है. ये चुनाव मेरा है. पूरा देश देख रहा है कि ग्वालियर चंबल में सिंधिया परिवार का झंडा बुलंद होगा या नहीं. दूसरी ओर खबरें मिल रही हैं कि भविष्य में सिंधिया के दखल से मुक्त रहने के लिए पार्टी नई रणनीति पर काम कर रही है. दरअसल इस रणनीति के तहत सिंधिया समर्थक मंत्रियों को मझधार में छोड़ने का काम चल रहा. भाजपा को विश्वास है कि सरकार बनाने के लिए जितनी सीटें जरूरी हैं, उतरी मिल जाएं, तो सिंधिया के दबाव से मुक्ति मिल जाएगी. ग्वालियर-चंबल संभाग में सीटें कम आने पर शिवराज सिंह से ज्यादा ज्योतिरादित्य सिंधिया की किरीकिरी होगी और उनकी राजनैतिक हैसियत प्रभावित होगी.

पूरा चुनाव कमलनाथ अकेले दम लड़ रहे
उपचुनाव की जंग में कमलनाथ अकेले ही तलवारें भांज रहे हैं. उनके अलावा एक कद्दावर नेता के रूप पूर्व मुख्यमंत्री अजय सिंह ने कई चुनावी सभाएं लीं है. दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज सिर्फ बयान जारी करने तक सीमित हैं. प्रचार सामग्री में न कहीं उनका नाम दिख रहा है, न फोटो.


पायलट सभाओं में सिंधिया पर चुप
हाल ही मंगलवार को ग्वालियर चंबल संभाग में कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार करने राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ग्वालियर पहुंचे. वह उपचुनाव में कांग्रेस के स्टार प्रचारकों में से एक है. चूंकि ग्वालियर-चंबल संभाग में गुर्जर मतदाता बड़ी संख्या में हैं, इसलिए उन्हें रिझाने की जिम्मेदारी पायलट को दी गई. पायलट बीते मंगलवार को जब ग्वालियर पहुंचे तो ज्योतिरादित्य उनसे विमानतल पर मिले और जोरदार स्वागत किया. सिंधिया उनके जिगरी दोस्त माने जाते हैं. ग्वालियर, जौरा, भांडेर, सुवारसा सहित जहां-जहां पायलट की सभाएं हो रहीं, वहां पायलट सिंधिया की न तो घेराबंदी कर रहे, न हमलावर हो रहे, न उनका नाम ले रहे, अलबत्ता शिवराज को निशाना बनाते हुए कह रहे कि यह चुनाव धर्म और अधर्म के बीच है. 2018 में जनता ने उन्हें हरा दिया था, लेकिन उन्होंने तिकड़म से सत्ता हथियाई है.

इसके बाद पायलट की जितनी सभाओं की खबर है, उनमें उन्होंने शिवराज सिंह और पीएम मोदी को निशाना बनाकर भाजपा पर तो जोरदार हमला बोला, लेकिन सिंधिया को लेकर न कोई घेराबंदी की, न हमलावर हुए, न सिंधिया का नाम लिया.
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार गुप्ता

सुनील कुमार गुप्तावरिष्ठ पत्रकार

सामाजिक, विकास परक, राजनीतिक विषयों पर तीन दशक से सक्रिय. मीडिया संस्थानों में संपादकीय दायित्व का निर्वाह करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र लेखन. कविता, शायरी और जीवन में गहरी रुचि.

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First published: October 31, 2020, 1:33 PM IST
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