OPINION: बिहार लौटे प्रवासी मजदूर किसका खेल बनाएंगे, किसका बिगाड़ेंगे

लॉकडाउन में बिहार लौट रहे अप्रवासी मजदूरों (Migrant Workers) को सत्तारूढ़ दल और विपक्ष (opposition) दोनों ही लुभाने में लगा है. सत्तारूढ़ दल मजदूरों को बेहतर सुविधा देकर अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है, वहीं विपक्ष लगातार प्रवासी मजदूरों के दर्द को कुरेद रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 17, 2020, 7:21 PM IST
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OPINION: बिहार लौटे प्रवासी मजदूर किसका खेल बनाएंगे, किसका बिगाड़ेंगे
प्रवासी मजदूर अपने गांव की ओर निकल पड़े हैं (File Photo)
पटना. पटना से दिल्ली की दूरी एक हजार किलोमीटर, पटना से मुंबई की दूरी लगभग 18 सौ किलोमीटर, पटना से लुधियाना की दूरी 15 सौ किलोमीटर, पटना से हरियाणा की दूरी 14 सौ किलोमीटर है. बिहार के प्रवासी मजदूरों ने जब चलना शुरू किया तो उन्होंने इस दूरी को किलोमीटरों में नहीं देखा. वे बस चलते रहे, चलते रहे, चलते रहे. जब प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों से अपने राज्य के लिए चले तो उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि वे अपने राज्य, अपने जिले या फिर अपने गांव पहुंच पाएंगे या नहीं.

कोरोना काल में सबसे ज्यादा परेशान हुए प्रवासी मजदूर

टीवी पर और अखबारों में लगातार आ रहीं प्रवासी मजदूरों की विचलित करने वाली तस्वीरें मन को झकझोर देती है. लगता है इस कोरोना संकट में सबसे ज्यादा व्यथित और दुखी कोई है तो ये प्रवासी मजदूर ही हैं. प्रवासी मजदूर जो अपने राज्य के लिए कूच कर चुके हैं, उनको इस बात का जरा भी एहसास नहीं है कि उनके ऊपर एक बड़ी राजनीति की जा रही है. वे न चाहते हुए भी राजनीति की सबसे प्रमुख भूमिका में चल रहे हैं. चाहे सत्तापक्ष हो या विपक्ष दोनों की तरफ से उन को लुभाने का बड़ा दांव खेला जा रहा है.

कल तक जो मजदूर सिर्फ कमाने खाने के लिए दूसरे राज्य में मजदूरी कर रहा था, आज उसे पता ही नहीं चला कि वह अचानक इतना महत्वपूर्ण हो गया कि राजनेता उसे हाथों-हाथ लेने लगे, लेकिन इन सबके बीच बड़ी हकीकत तो ये है कि इन मजदूरों के हाथ कुछ नहीं आया.
प्रवासी मजदूरों की अर्थव्यवस्था

एक मजदूर जब रोजी-रोटी की जुगाड़ में पलायन कर जहां जाता है वहां उसकी पूरी व्यवस्था होती है. मसलन जहां वह काम करता है वहां रहने खाने-पीने और थोड़ी सुविधा की व्यवस्था कर ही लेता है. लेकिन, कोरोना संकट में जिस तरह से प्रवासी मजदूरों ने पलायन करना शुरू किया उन्होंने अपने पीछे एक व्यवस्था को छोड़ दिया और बिना कुछ लिए पलायन कर गए. मानों जैसे किसी ने उन्हें उनके घर से भगाया हो या फिर किसी ने घर छोड़ने पर मजबूर किया हो और घर छोड़ते हुए जो कुछ हाथ लगा उसे ही वह अपने साथ लेकर निकल गए हों.

यदि आप सबकुछ छोड़छाड़ कर अपने गृह राज्य (घर) आते हुए इन मजदूरों को गौर से देखेंगे तो आपको इनके पीछे की अर्थव्यवस्था और आने वाली अर्थव्यवस्था दोनों का अंदाजा लग जाएगा. आपको पता चल जाएगा कि ये पहले किस हालात में थे और आने वाले समय में किस हालात में रहने वाले हैं.प्रवासी मजदूर अपने साथ अपने परिवार के अलावा कुछ लेकर नहीं निकले. वे इसलिए निकले हैं कि उनके पास कोई काम नहीं है. कल अगर उनको कोई पैसा नहीं देगा तो वे क्या करेंगे ,यही सोचकर वे निकल पड़े. उन्होंने सोचा कि चलो अपने गांव चलते हैं. जैसे भी हालात होंगे अपने गांव में उसी में गुजारा कर लेंगे. गांव तो गांव होता है गांव में कोई भूख से नहीं मरता है.

सरकार ने प्रवासी मजदूरों को लाने की व्यवस्था की

जब प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों से अपने-अपने राज्यों के लिए पैदल निकल चुके थे तो सरकारों पर चौतरफा दबाव बना. पहला दबाव, विपक्ष ने इस पर हंगामा शुरू किया कि बिहार सरकार तमाम प्रवासी मजदूरों को अपने राज्य में वापस बुलाए, मजदूर बेबस हैं. दूसरा दबाव, जिनके परिजन बाहर के राज्य में रहते थे, वे अपने लोगों को वापस अपने पास बुलाना चाहते थे. तीसरा दबाव, मीडिया लगातार यह तस्वीरें दिखा रहा था कि मजदूर दूसरे राज्य से निकल चुके हैं. पैदल चल रहे हैं. उनके हालात दिखा रहे थे कि किस स्थिति में वो कहां तक पहुंचे हैं.  चौथा दबाव, उन राज्यों का बना जिन राज्यों में बिहार के प्रवासी मजदूर रहते थे. दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों ने बिहार के मजदूरों को अपना समझा ही नहीं और बिहार सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह अपने मजदूरों को वापस बुला ले.

बिहार सरकार शुरुआत में प्रवासी मजदूरों को वापस नहीं बुलाना चाहती थी, इसलिए बिहार सरकार ने पहले प्रवासी मजदूरों के खाते में आपदा राशि के रूप में एक हजार रुपए डाल दिए लेकिन ये एक हजार रुपए प्रवासी मजदूरों के लिए नाकाफी थे.

दबाव लगातार बढ़ता गया. बिहार सरकार ने पूरा दांव केंद्र सरकार पर फेंका, तो केंद्र सरकार ने आनन-फानन में ट्रेन की व्यवस्था कर दी. इसके बाद तो बिहार सरकार को अपने प्रवासी मजदूरों को वापस बुलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखा. बिहार सरकार ने प्रवासी मजदूरों को बुलाने के लिए ट्रेनें चलानी शुरू कर दीं. अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा मजदूर ट्रेन से बिहार पहुंच चुके हैं.

सरकार के लिए मुसीबत बने प्रवासी मजदूर

अब सरकार के सामने एक बड़ी समस्या यह हो गई कि जो प्रवासी मजदूर आ रहे हैं उन्हें ट्रेन से तो लाया जा रहा है, लेकिन उन्हें सीधे उनके गांव तक नहीं पहुंचाया जा सकता. कोरोना वायरस का संक्रमण कहीं पूरे गांव को संक्रमित ना कर दे ये डर लगातार सरकार को सता रहा था. ऐसे में बिहार सरकार ने एक व्यवस्था यह की कि जो प्रवासी मजदूर आ रहे हैं उनको आरम्भ में 21 दिनों तक क्वारंटाइन किया जाएगा. हर जिले के हर प्रखंड में एक क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया जिसमें प्रवासी मजदूरों के रहने की व्यवस्था की गई.

बिहार सरकार यह दावा करती रही है कि उनके क्वारंटाइन सेंटर आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं. हर तरह की सुविधा इन सेंटरों में दी जा रही है. हर मजदूर को थाली, बाल्टी, मग, सर्फ, साबुन, सैनिटाइजर दिया जा रहा है. सुबह से रात तक खाने की व्यवस्था की जा रही है. जब ये मजदूर क्वारंटाइन की 21 दिन की अवधि पूरी कर लेंगे तो उन्हें जाते समय पांच सौ रुपए भी दिए जाएंगे.

बिहार सरकार के मुताबिक ये सुविधाएं काफी हैं. सरकार के नुमाइंदे इन सुविधाओं को आधुनिक भी बता रहे हैं. कहते हैं सरकार ने कोरोना संकट में बहुत बेहतर इंतजाम किया है, यह व्यवस्था इतनी बेहतर है कि इसमें 21 दिन आराम से गुजर जाएंगे.

विपक्ष का आरोप: बदइंतजामी है बिहार में

बिहार के विपक्ष के रूप में सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी है. आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने प्रवासी मजदूरों को वापस बुलाने की आवाज को बुलंद किया था. जब प्रवासी मजदूर वापस बिहार आ गए, तो तेजस्वी यादव लगातार उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड कर रहे हैं.
तेजस्वी यादव लगातार यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकार कोरोना संकट में पूरी तरह से विफल है.

तेजस्वी यादव मजदूरों ने अपने ट्विटर हैंडल की बदली तस्वीर

मजदूरों को लेकर तेजस्वी यादव इतने इमोशनल हो गए कि उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल की तस्वीर तक बदल दी. तेजस्वी यादव ने अपने ट्विटर पर एक रोते हुए मजदूर की तस्वीर डाल दी और बताया कि बिहार के हालात काफी खराब हैं. सरकार काम नहीं कर रही है. मजदूरों को कोई देखने वाला नहीं है. जो मजदूर प्रखंड के क्वारंटाइन सेंटर में पहुंचे हैं, उनको खाने के लिए नमक और चावल दिया जा रहा है. सोशल डिस्टेंसिंग का कोई ख्याल नहीं रखा जा रहा है. ऐसे हालात में सरकार पर विफल होने का एक बड़ा ठप्पा लगाने की तैयारी तेजस्वी यादव कर रहे हैं.

तेजस्वी यादव के साथ कांग्रेस भी सवाल खड़े कर रही है. कांग्रेस के नेता प्रेमचंद्र मिश्रा कहते हैं कि प्रवासी मजदूरों से बिहार सरकार नफरत करती है इसलिए उनकी व्यवस्था बेहतर ढंग से नहीं कर रही है. कांग्रेस का आरोप यह भी है कि बिहार सरकार पहले तो प्रवासी मजदूरों को वापस नहीं बुलाना चाहती थी लेकिन जब विपक्ष ने दबाव बनाया तो बिहार सरकार को झुकना ही पड़ा औरअंततः प्रवासी मजदूरों को वापस बुलाना पड़ा. सरकार प्रवासी मजदूरों को पूरी तरह से विपक्ष के रूप में देखती है इसीलिए उनकी सुविधाओं का कोई ध्यान नहीं रख रही है.

अब पूरा खेल प्रवासी मजदूरों के हाथ में

जो मजदूर पैदल ही निकल पड़े थे और जिन्होंने हजार-दो हजार किलामीटर की कष्ट भरी पैदल यात्रा की है और दूसरी तरफ वे मजदूर जो ट्रेनों से आए और सीधे क्वारंटाइन सेंटर में गए, दोनों की स्थितियों में फर्क होगा और दोनों के हालात अलग-अलग होंगे. जिन मजदूरों ने एक से डेढ़ हजार किलोमीटर पैदल यात्रा की हो, उन्हें बिहार सरकार की क्वाराटाइन सेंटर की वो सुविधाएं बिल्कुल बेमानी लगेगी. उन्हें तो बस यही याद होगा कि उन्होंने रास्ते में कई रातों तक खाना नहीं खाया होगा, उनके बच्चे पैदल चलते चलते रोते होंगे. उनके पांवों में छाले पड़ गए होंगे. जाहिर है वे बिहार सरकार के इस दावे को वह पूरी तरह से खारिज करेंगे और कहेंगे कि उनके लिए कोई सरकार नहीं है.

दूसरी ओर जो मजदूर ट्रेनों से चलकर अपने गांव के नजदीक प्रखंड के क्वारंटाइन सेंटर में पहुंचे, उनको सरकार की व्यवस्था पर विश्वास तो जरूर हुआ होगा. वे इस बात को भी समझेंगे कि सरकार ने उनके लिए किस तरह से क्या-क्या व्यवस्था की है.

प्रवासी मजदूरों का यह दो भागों में बंट जाना सरकार और विपक्ष के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है. अब विपक्ष उन लोगों की राजनीति कर रहा है जो मजदूर दूसरे राज्य से पैदल निकले हैं. उनके दर्द को विपक्ष लगातार कुरेद रहा है. साथ ही विपक्ष इन लोगों पर अपना हक भी जता रहा है जो क्वारंटाइन सेंटर से निकलने को बेचैन हैं या फिर उनसे यात्रा के दौरान पैसे लिए गए है. इसके उलट सरकार इस बात को लेकर निश्चिंत है कि उन्होंने प्रवासी मजदूरों को बेहतर सुविधा दी है और उन्हें सुरक्षित उनके गांवों तक पहुंचा पाया है.

चूंकि आने वाले कुछ महीनों के बाद बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हो जाएगी. जो लाखों मजदूर बाहर के राज्यों से बिहार पहुंचे हैं, उनके परिवार को जोड़ दिया जाए तो यह करोड़ों की संख्या हो जाएगी और इस करोड़ों के वोट बैंक को लुभाने का यह एक बेहतर तरीका पक्ष और विपक्ष के सामने है. ऐसे में यह मजदूर किसी का खेल बिगाड़ भी सकते हैं तो किसी के लिए खेल बना भी सकते हैं.

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ब्लॉगर के बारे में
प्रभाकर कुमार

प्रभाकर कुमारसीनियर एडिटर, News18 बिहार-झारखंड | News18Hindi

प्रभाकर कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें 22 साल से ज्यादा का अनुभव है. प्रभाकर जी ने अपना करियर हिंदुस्तान टाइम्स के साथ शुरू किया था इसके बाद काफी समय तक NDTV में काम किया. इसके बाद उन्होंने @Cnnnews18 साथ अपना सफर शुरू किया और वर्तमान में आप News18 के सीनियर एडिटर हैं.

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First published: May 17, 2020, 2:19 PM IST
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