कोविड-19 के साथ-साथ विश्व एक और महामारी से भी लड़ रहा है!

World is Fighting With Infodemic: संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के मुताबिक, "हमारा साझा दुश्मन कोविड-19 है, लेकिन दुष्प्रचार के माध्यम से जो 'इंफोडेमिक' फैला है, वह भी दुश्मन है."

Source: News18Hindi Last updated on: May 6, 2021, 2:40 PM IST
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कोविड-19 के साथ-साथ विश्व एक और महामारी से भी लड़ रहा है!
सोशल मीडिया
आज संपूर्ण विश्व कोरोना वायरस (Corona virus) के दुष्चक्र में फंसा हुआ है. भारत भी कोरोना महामारी की दूसरी घातक लहर का सामना कर रहा है. चिंता की बात यह है कि इस समय कोरोना के हर दिन आने वाले नए मामलों में भारत सबसे ऊपर है. संक्रमण की व्यापकता के आगे हमारी सारी तैयारियां नाकाफी साबित हो रही हैं. भारत को इस दुष्चक्र से निकालने और हालात को काबू में करने के लिए असाधारण कदमों और उपायों की जरूरत है. कोरोना वायरस से उपजे ‘कोविड-19’ महामारी (Pandemic) के साथ-साथ भारत सहित पूरी दुनिया एक और महामारी से भी जूझ रही है, जिसे ‘इंफोडेमिक’ (Infodemic) या ‘सूचना महामारी’ कहा जा रहा है. सही सूचनाएं जहां आम लोगों की चिंताएँ कम करती हैं, वहीं डिजिटल माध्यमों से फैलनेवाले दुष्प्रचार और अधकचरी जानकारियाँ लोगों की परेशानियां बढ़ाने की वजह बनते हैं. दुनिया भर में कोरोना से जुड़ी अफवाह के कारण हजारों लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी है.

इस सूचना महामारी के चलते कुछ लोग कोविड-19 की गंभीरता और प्रभाविता को कम करके आंकते हैं, इससे बचाव के उपायों की अनदेखी करते हैं और यहाँ तक इसके वजूद को ही नकारते हैं. मसलन, ऐसे मिथकों और कॉन्सपिरेसी-सिद्धांतों (Conspiracy theories) को सोशल मीडिया और इंटरनेट के अन्य माध्यमों पर कुछ लोगों द्वारा खूब प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है, जिनमें दावा किया जाता है कि कोरोना वायरस को चीन की प्रयोगशाला में बनाया गया है, उच्च वर्ग के लोगों ने ताकत और मुनाफे के लिए वायरस का झूठा प्रचार किया है, चाइनीज फूड या मांस खाने से लोग कोरोना की गिरफ्त में आ जाते हैं, कोविड-19 मौसमी फ्लू से ज्यादा खतरनाक नहीं है या मामूली सर्दी-जुकाम के जैसा ही है, सभी वैक्सीन असुरक्षित हैं और वे कोविड-19 से ज्यादा घातक हैं, धूम्रपान, शराब और गांजा के सेवन से कोरोना से बचा जा सकता है, कोरोना 5जी टेस्टिंग का परिणाम है वगैरह-वगैरह. कुल मिलाकर हमारे चारों ओर कोविड-19 पर सूचनाओं और खबरों का एक विस्फोट हो रहा है.

कोरोना वायरस उन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जो अपने अज्ञान और अंधविश्वास को समझ एवं ज्ञानरूपी हथियार के तौर पर पेश करके, अक्सर धार्मिक, रूढ़िवादी और सांस्कृतिक गर्व की चासनी चढ़ाकर दुनिया के समक्ष अपने ज्ञान का भौंडा प्रदर्शन करना चाहते हैं. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने कई लोगों को डॉक्टर, वैज्ञानिक, महामारी विशेषज्ञ (Epidemiologist) और सर्वज्ञानी बना दिया है. वे डिजिटल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके भ्रामक सूचनाएँ या जानकारियाँ फैला कर शिक्षित और अशिक्षित दोनों ही लोगों को बेहद खतरनाक तरीकों से गुमराह कर रहे हैं. मिसाल के तौर पर अभी जब देश के कई राज्यों में ऑक्सीजन की किल्लत है, तो कई स्वयंभू विशेषज्ञों और विद्वानों द्वारा व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब वगैरह पर लोगों को ऑक्सीजन सैचुरेशन लेवल बढ़ाने के लिए ऐसे कई घरेलू नुस्खे बताए जा रहे हैं जो बिल्कुल भी कारगर नहीं हैं. जड़ी-बूटियों, नींबू के रस, नेबुलाइजर, ध्यान-योग से ऑक्सीजन लेवल बढ़ाने के दावे कुछ ऐसी ही बेतुकी और भ्रामक सूचनाएँ हैं, जो आज़माने वालों के लिए जानलेवा हो सकती हैं. यहाँ तक कि सबसे विकसित और शिक्षित देशों में शुमार अमेरिका में एक काफी प्रचलित सलाह है कि ब्लीच वायरस का सफाया कर सकता है. जानकारी के लिए बता दें कि यह आपका भी सफाया हमेशा के लिए कर सकता है और न जाने कितनों का कर भी चुका है!

संक्रामक रोगों का फैलाव अपने साथ अनिश्चितता, भय और घृणा का भी फैलाव करता है. समाज अपने ही वर्ग-विशेष या व्यक्ति-विशेष को बलि का बकरा चुन लेता है और उसे शाब्दिक प्रताड़ना देने पर उतर आता है. वुहान (चीन) के पशु मांस बाजार से इस वायरस का प्रसार शुरू हुआ था, यह सही है. जंगली पशुओं के मांस के सेवन के कारण जूनोटिक वायरस इंसानी शरीर में दाखिल होते हैं, इसके भी प्रमाण हैं. लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस से भी ज्यादा तेजी से फैलते कॉन्सपिरेसी-सिद्धांतों के आधार पर मांसाहारियों को टार्गेट किया जा रहा है और शाकाहार को सर्वश्रेष्ठ आहार बताया जा रहा है. हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि दाल-चावल और सब्ज़ियां जंतु प्रोटीन का विकल्प नहीं हो सकतीं. जानवरों के मांस में पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं. शरीर के लिए जंतु प्रोटीन भी उतना ही ज़रूरी है, जितना कि दूसरे पोषक तत्व. निर्धनों के लिए तो प्रोटीन का सबसे सस्ता ज़रिया ही जानवरों का मांस है. अगर सारी दुनिया शाकाहारी हो जाएगी, तो सबसे बड़ा संकट विकासशील देशों के लिए हो जाएगा. थोड़ा-थोड़ा मांस, मछ्ली और दूध उन्हे कुपोषण से बचाए रखता है. हालांकि अंधाधुंध मांसाहार, और मांस को पोषण की वस्तु न मानकर स्वाद के लिए बिना भलीभाँति पकाएं खाने की प्रवृत्ति जलवायु परिवर्तन और जूनेटिक बीमारियों के प्रसार का भी कारण बनता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि हर तरह के मांसाहार से कोरोना वायरस हो सकता है.
इंटरनेट गलत सूचनाओं से अटा पड़ा है, जिनसे आप चलते-चलते टकरा जाएंगे. भ्रामक सूचनाओं तक संयोगवश पहुंचना कहीं सरल है बजाए प्रामाणिक जानकारी तक पहुंचने के, जिसे खोजना पड़ता है और प्रामाणिकता को जाँचने के लिए प्रयास करने पड़ते हैं. कोविड-19 के बीच इस तरह के भ्रामक सूचनाओं के प्रसार को इंफोडेमिक कहा जा रहा है. पहली बार इस शब्द को साल 2003 में सार्स (सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रोम) के प्रकोप के समय इस्तेमाल किया गया था. 'इंफोडेमिक' शब्द 'सूचना और महामारी' के मिश्रण से बना है. इसका मतलब है 'लोगों के बीच महामारी के बारे में गलत सूचनाओं का प्रचार-प्रसार.' संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के मुताबिक, "हमारा साझा दुश्मन कोविड-19 है, लेकिन दुष्प्रचार के माध्यम से जो 'इंफोडेमिक' फैला है, वह भी दुश्मन है." ऐसा ही कुछ वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख टेडरोस गेब्रेयसस ने भी पिछले साल कहा था कि 'हम न सिर्फ महामारी से लड़ रहे हैं, बल्कि इंफोडेमिक से भी लड़ रहे हैं.'

इंफोडेमिक के फैलाव और हालात को जटिल व खतरनाक बनाने वाले चार मुख्य कारक हैं: पहला, इंटरनेट और सोशल मीडिया की बदौलत सूचना प्रसार की तीव्र गति. जिस तेजी से इंटरनेट की पहुंच बढ़ी है, वह अखबार, टीवी, रेडियो जैसे संचार माध्यमों की तुलना में अप्रत्याशित कही जा सकती है. दूसरा, इंटरनेट पर अप्रमाणिक अथाह ज्ञान के भंडार तक सबकी आसान पहुँच. मौजूदा वक्त में इंटरनेट सभी के लिए आसानी से उपलब्ध है और इंटरनेट के जरिए पल भर में ही सूचनाएं मीलों का सफर तय कर लेती हैं. जाहिर है, खबर के रूप में मनगढ़ंत बातें, दुष्प्रचार, अफवाह, फेक न्यूज वगैरह इंटरनेट पर वायरल करके मौजूदा वक्त में कोई भी अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने में सक्षम है. तीसरा, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए कॉन्सपिरेसी-सिद्धांतों का प्रचार. ज़्यादा गहरे स्तर पर दक्षिणपंथी और वामपंथी जमात वायरस के कारण और उसकी उत्पत्ति के बारे में कॉन्सपिरेसी (षड्यंत्रकारी)-छद्मवैज्ञानिक-सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे हैं, और इन मनगढ़ंत कहानियों का मंतव्य अप्रवासियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों या उदारवादी लोगों को बलि का बकरा बनाना है. चौथा, सोशल मीडिया पर भ्रामक पोस्ट और वीडियो चिंता और आशा के चलते फैल रही हैं, और ज़िंदा रहने के लिए हमारे दिमाग की एक प्रवृत्ति खतरों को बड़े रूप में देखने की है. ऐसा हमेशा महामारी, आपदाओं, अकाल और युद्ध के समय होता है.

भारत सरकार के नेशनल हेल्थ पोर्टल के मुताबिक इंफोडेमिक लोगों के स्वास्थ्य को कई तरह से प्रभावित करता है. उदाहरण के लिए- यह लोगों के लिए सटीक, साक्ष्य-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य जानकारी और सलाह की पहचान को मुश्किल बनाता है. इंफोडेमिक चिंता, अवसाद और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ाने में योगदान देता है. यह लोगों को भ्रामक या खतरनाक सलाह दे सकता है. यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों के प्रति थकान, अरुचि और विद्वेष का निर्माण करता है. यह भेदभाव, घृणा, कलंक और बहिष्कार को प्रोत्साहित करता है आदि-इत्यादि. गौरतलब है कि अक्सर ये भ्रामक सूचनाएँ ऑफिशियल डॉक्युमेंट्स और सील-मुहरों के साथ इंटरनेट पर प्रसारित की जाती हैं, जिसकी वजह से शिक्षित व्यक्ति भी उसे सच मानकर स्वीकार लेता है.इंफोडेमिक को कैसे समाप्त किया जा सकता है? दरअसल इंफोडेमिक को खत्म नहीं किया जा सकता है, हालांकि इसे प्रबंधित (Manage) जरूर किया जा सकता है. इंफोडेमिक प्रबंधन के विज्ञान को ‘इंफोडेमियोलॉजी’ (Infodemiology) के नाम से जाना जाता है. नेशनल हेल्थ पोर्टल के मुताबिक सही समय पर और सटीक तकनीकी मार्गदर्शन, वैज्ञानिक सारांश, स्थिति की रिपोर्ट, नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस (संवाददाता सम्मलेन), प्रशिक्षण और शैक्षणिक वीडियो, मिथ बस्टर्स, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय जुड़ाव तथा अन्य क्षेत्रों के अनुरूप मार्गदर्शन गलत सूचनाओं की समस्या से निपटने और जीवन बचाने के लिए महत्वपूर्ण हैं, ये सब इंफोडेमिक प्रबंधन के तहत आते हैं.

इस लेख का अंत मैं एक विनती (Request) के साथ करना चाहता हूँ. इस समय देश ही नहीं सारी दुनिया एक मुश्किल दौर से गुजर रही है. मौजूदा वक्त में अनहोनी का डर, आशंका, घबराहट-बेचैनी लोगों में घर कर गई है, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस डर और बेचैनी को बढ़ाने में हमारा कोई योगदान न हो. किसी भी जानकारी को सोशल मीडिया पर साझा करने से पहले खुद से ये सवाल जरूर करें कि क्या यह सूचना विश्वसनीय या प्रामाणिक है? इस सूचना का स्रोत क्या है? अगर सूचना किसी विशेष विषय से जुड़ी हुई है तो क्या मैं इसे जाँचने के लिए पर्याप्त जानकार हूँ? सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बारे में क्या कहता है? अगर तनिक भी संदेह हो, तो हमें पोस्ट करने या मैसेज फॉरवर्ड करने से निश्चित रूप से बचना चाहिए. ध्यान रखिए लोगों को गलत जानकारी देकर हम उनकी पीड़ा को बढ़ा सकते हैं और हमारे द्वारा फॉरवर्ड की गई गलत सूचना किसी के लिए प्राणघातक भी सिद्ध हो सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: May 6, 2021, 2:40 PM IST
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