ब्रह्मांड संबंधी प्राचीन धारणाएं

वैदिक ऋषियों को सूर्य, चन्द्र, ग्रहों एवं तारों की गतिविधियों का अच्छा ज्ञान था. परन्तु सूर्य, चन्द्र, ग्रहों और तारों की दूरियों के संबंध में बिलकुल भी ज्ञान नहीं था.

Source: News18Hindi Last updated on: June 8, 2020, 9:01 AM IST
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ब्रह्मांड संबंधी प्राचीन धारणाएं
ब्रह्मांड. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
आकाश तथा खगोलीय पिंडों को मनुष्य प्राचीनकाल से निहारता आया है. अत्यंत सीमित प्रमाणों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हमारे पूर्वज भी ब्रह्मांड के प्रति उतने ही जिज्ञासु थे जितने कि आज हम हैं. मनुष्य सभ्यता के प्रारंभ से ही दिन में आँखों को चकाचौंध कर देने वाले सूर्य और रात में निरभ्र आकाश को अपनी मुलायम चांदनी से सुशोभित कर देने वाले चन्द्रमा तथा उसके साथ-साथ आकाश में असंख्य टिमटिमाते तारों एवं अन्य खगोलीय घटनाओं को देखकर रोमांचित और भयभीत होता रहा है. प्राचीन मनुष्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त, चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं और ऋतु परिवर्तन जैसी प्राकृतिक घटनाओं के जरिए समय का हिसाब-किताब रखने का प्रयास किया. इन आकाशीय घटनाक्रमों ने मनुष्य के सामाजिक और धार्मिक जीवन को भी काफी हद तक प्रभावित किया. दरअसल ब्रह्मांड की व्याख्या करने के आरंभिक दौर में आदिम मनुष्य के तथ्य इस धारणा पर आधारित थे कि सारी भौतिक और प्राकृतिक क्रियाएं पंचमहाभूतों और देवताओं की कृपा पर ही निर्भर हैं. इसका कारण यह रहा होगा कि उस समय आदिमानव प्रकृति की अजीबोगरीब लीलाओं को जानने-समझने में असमर्थ था. बादलों की कड़कड़ाहट, बिजली की चमक, तेज बारिश, जंगलों में लगने वाला भयंकर आग, भूकम्प आदि मनुष्य के मन को भय और आश्चर्य से भर देता था. जन्म, मृत्यु, स्वप्न, बिमारी आदि तत्कालीन मनुष्य के समझ से परे की बातें थीं.

आदिम मनुष्यों की सबसे बड़ी समस्या थी- मौसम के बदलाव. जहां अच्छा मौसम उनके लिए सुख लाता था, वहीं खराब मौसम में उनका जीना ही दूभर हो जाता था. वैज्ञानिकों ने यह खोज लिया है कि कभीकभार एक लंबे समय, हजारों वर्षों के लिए पृथ्वी बहुत ठंडी हो जाती थी. इस लंबे कालखंड को हिमयुग कहते हैं. आज से तकरीबन तीस हजार वर्ष पहले पृथ्वी पर आखिरी हिमयुग शुरू हुआ था. हिमयुग में पृथ्वी का ज्यादातर हिस्सा बर्फ से ढक गया. हिमयुग के दौरान मनुष्य को सूर्य का ही सहारा था, इसलिए दुनियाभर के लोगों ने सूर्य को खुश करने के लिए उसे पूजना शुरू कर दिया. लेकिन जैसे-जैसे मनुष्य का मस्तिष्क विकसित होता गया वैसे-वैसे ही मनुष्य ने प्रकृति को स्वयं के अनुरूप ढाल लिया और बताया कि कुछ घटनाएं निश्चित हैं, जैसे सूर्योदय हमेशा पूरब में तथा सूर्यास्त हमेशा पश्चिम में ही होता है. जिज्ञासा और अवलोकन की तीव्र भावना रखने वाले मनुष्य ने तारों भरे आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के बारे में और अधिक जानने के लिए जाँच-पड़ताल करने का प्रयास किया. इस प्रकार प्राकृतिक नियमों की खोज का सिलसिला शुरू हुआ. मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृत्ति तथा तर्कसंगत कुशलता से ही कालांतर में विज्ञान का जन्म हुआ.

वास्तव में शुरुवाती सभ्यताओं ने अपनी कोरी आँखों से आकाश का जितना भी अवलोकन किया, वह पृथ्वी, आकाश और ब्रह्मांड संबंधी उनके उर्वर कल्पना शक्ति और सत्य के बारे में उनकी जिज्ञासा का ही परिणाम था. प्राचीन विश्व के अलग-अलग कोनों में ब्रह्मांड विषयक अलग-अलग विचारधाराएं प्रचलित थीं. ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा संचालन जिन नियमों से हुई है, ऋग्वेद में उसे ऋत् की संज्ञा दी गयी है. ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का वर्णन ऋग्वेद के एक सृजन स्रोत से मिलती है, जिसे नासदीय सूक्त कहते हैं. यह सूक्त वैदिक सोच की पराकाष्ठा को दर्शाती है. एक वैदिक ऋषि कहता है :

‘प्रलयकाल में पंच-महाभूत सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और न ही असत् का अस्तित्व था. उस समय भूलोक, अंतरिक्ष तथा अन्तरिक्ष से परे अन्य लोक नहीं थे. सबको आच्छादित करने वाले (ब्रह्मांड) भी नहीं थे. किसका स्थान कहाँ था? अगाध और गम्भीर जल का भी अस्तित्व कहाँ था?’
सूक्त के अंत में संदेहवादी ऋषि सृष्टि सृजन की अगम्यता के बारे में कहते हैं :

‘यह सृष्टि किससे उत्पन्न हुई, किसलिए हुई, इसे वस्तुतः कौन जानता है? क्योंकि देवता भी इस सृष्टि के उत्पन्न होने बाद ही पैदा हुए. इसलिए जिससे यह सृष्टि उत्पन्न हुई, उसे कौन जानता है?’

‘इस सृष्टि की रचना किसने की और वह कहाँ रहता है, इसे कौन जानता है? इस सृष्टि का अध्यक्ष परमाकाश में है, वह शायद इसे जानता है. सम्भव है कि वह भी नही जानता हो!’यही वे मूलभूत प्रश्न हैं जिनके उत्तर आधुनिक वैज्ञानिक जानना चाहते हैं. मगर उत्साहवश वेदों को आधुनिक विज्ञान का अक्षय भंडार मानना बड़ी गलतफहमी है, क्योंकि हमे याद रखना चाहिए कि वेद लगभग साढ़े तीन से चार हजार साल पहले की कृतियाँ हैं. इनमें उतना ही विज्ञान है जितना की तत्कालीन मानव समाज ने खोजा था. नासदीय सूक्त के आधार पर यह कहना कि वैदिक ऋषियों ने अपने महाशक्तिशाली दिव्यदृष्टि से सम्पूर्ण ब्रह्मांड का अवलोकन करके सृष्टि की उत्पत्ति के मूलभूत प्रश्नों को खोजा था, भी एक गलतफहमी है. वैदिक ऋषियों को कृत्तिका नक्षत्र में केवल सात तारे दिखाई देते थे, जबकि आधुनिक दूरबीनों से यह पता चला है कि इस नक्षत्र में तीन सौ से अधिक तारे हैं. हमारी पड़ोसन देवयानी आकाशगंगा हमें कोरी आँखों से भी कभी-कभार दिखाई देती है, परन्तु वैदिक ऋषि इसे भी नहीं देख पाए जबकि यह हमसे सर्वाधिक निकट की आकाशगंगा है. इसी से पता चलता है कि वैदिक ऋषियों की दिव्यदृष्टि कितनी शक्तिशाली थी. संक्षेप में कहें तो इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता है कि हमारे वैदिक पूर्वज उसी प्रकार से ब्रह्मांड को जानने-समझने के लिए लालायित थे, जिस प्रकार से वर्तमान में आधुनिक खगोल वैज्ञानिक हैं. ‘वे सबकुछ जानते थे’ यह कहना गलत होगा, हाँ यह जरुर कह सकते हैं कि वे ईमानदार-प्रबुद्ध जिज्ञासु थे, जो ब्रह्मांड के बारे में अधिकतम ज्ञान अर्जित करना चाहते थे.

वैदिक काल की कोई भी लिपि नहीं थी, इसलिए वेदों को श्रुति कहा गया है. प्राचीन भारत में इन्हें रट-रटकर यानी मौखिक रूप से प्रसारित करने की परम्परा थी, जिसके कारण इनकी मौलिकता को क्षति पहुंची. वैदिक ऋषियों को सूर्य, चन्द्र, ग्रहों एवं तारों की गतिविधियों का अच्छा ज्ञान था. परन्तु सूर्य, चन्द्र, ग्रहों और तारों की दूरियों के संबंध में बिलकुल भी ज्ञान नहीं था. ऋग्वेद में 12 महीनों का चन्द्रवर्ष माना गया है. वैदिक ऋषियों को सात ग्रहों, 27 नक्षत्रों, खगोलीय परिघटना उत्तरायण-दक्षिणायण का ज्ञान था. वैदिक ऋषियों को ग्रहणों की बारंबारता का ज्ञान था, परन्तु ग्रहणों के कारण का ज्ञान नहीं था. हमारे प्राचीन भारतीय पूर्वजों को खगोलविज्ञान की महत्ता के बारे में ज्ञान था, उनका कहना था : ‘वेदस्य निर्मलं चक्षु: ज्योति: शास्त्रामनुत्त्तमम्.’ अर्थात् ज्ञान के सर्वाधिक निर्मल चक्षु के रूप में हमें खगोलविज्ञान को देखना चाहिए.


वास्तव में ब्रह्मांड की उत्पत्ति की अवधारणा सीमित अवलोकनों, आलंकारिक उदाहरणों, मिथकों, रूपकों एवं आख्यानों के आधार पर प्रस्तुत करने के प्रयास प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं एवं धर्मों में हुए. अधिकांश धर्मों मे ब्रह्माण्ड के रचयिता के रूप में ईश्वर की परिकल्पना भी की गई. बेबीलोन (मेसोपोटामिया) के महाकाव्य ‘एनूमा एलिस’ जिसे ईसा के दो हजार वर्ष पहले का माना जाता है, में ब्रह्मांड के शुरुवात का वर्णन निम्न प्रकार से किया गया है-

‘जब आकाश का नामोनिशान नहीं था
और जमीं का नाम तक नहीं सोचा गया था
जमीन की भीतरी ठोस सतह का काम नहीं सोचा गया था
जब केवल आदिम लोग और उनके पूर्वज थे
मुम्मु और तिमात वे जिन्होंने उन सभी को पैदा किया था-
उनका जल परस्पर मिलकर प्रवाहित था;
तब दलदल नहीं था, न ही कोई टापू
कोई ईश्वर भी मौजूद नहीं था;
तभी नामकरण का सिलसिला शुरू हुआ-
तभी उन्हीं के बीच ईश्वर की उत्पत्ति हुई.’

प्राचीनकाल में ब्रह्मांड संबंधी अनेक सिद्धांत आए, जैसेकि ब्रह्मांड एक अंडा है, जिसमें मनुष्य, पृथ्वी, आकाश, सूर्य आदि सबकुछ विद्यमान है. उसके बाद यह भी माना जाने लगा कि पूरा ब्रह्मांड वृक्ष रूपी संरचना की शाखाओं पर टिका हुआ है. वास्तव में इस प्रकार की धारणाएं तत्कालीन समाज को सही प्रतीत होती होंगी, इसलिए इन पर आधारित परम्परा चल पड़ती है, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते-चलते ये परम्पराएँ कालांतर में किवदंतियों और मिथकों का रूप धारण कर लेती हैं. हमारी विभिन्न प्रकार की मान्यताएं जैसे- पृथ्वी जल पर है, वृक्ष से पृथ्वी उत्पन्न हुई है या फिर ब्रह्मा ने ब्रह्मांड का निर्माण किया, सूर्य ब्रह्मांड का नेत्र है, पृथ्वी चपटी है और ढेरों सारी मान्यताएं इसी प्रकार की किवदंतियाँ और मिथक हैं.

अलग-अलग संस्कृतियों की भांति भारत में भी (नासदीय सूक्त के रचयिताओं के द्वारा ईमानदारी से यह स्वीकार कर लेने के बावजूद की वे सृष्टि सृजन के रहस्य को नहीं जानतें) बाद के पौराणिक कथाकारों ने ब्रह्मांड और पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में एक से बढ़कर एक गप्प छोड़ी है. इस प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि प्राचीन काल में ब्रह्मांड संबंधी जो भी सिद्धांत थे वे अवैज्ञानिक थे, क्योंकि वे वैज्ञानिक जांच के प्रथम सोपान पर ही खरे नहीं उतरते! लेकिन ये सभी मिथक रूपी सिद्धांत उन्ही सवालों के जवाब ढूढ़ने की कोशिश करते थे, जिनके जवाब ढूढ़ने के लिए आजकल के वैज्ञानिक जद्दोजहद करते नज़र आ रहें हैं.

मनुष्य ने विकास के साथ-साथ तर्कसम्मत दार्शनिक और वैज्ञानिक अवधारणाओं को विकसित करने के निरंतर प्रयास किए. पहली वैज्ञानिक परिकल्पना थेल्स ने ईसा के जन्म के पांच सौ पचीस साल पहले दी थी. थेल्स मूलतः एक ग्रीस दार्शनिक थे, उन्होंने सूर्यग्रहण लगने की सही तिथि की भविष्यवाणी की थी. ग्रहण लगने की सही तिथि को बताना भारत, बेबीलोन और मिस्र के पुरोहित भी जानते थे, तो फिर हम उन्हें क्यों वैज्ञानिक नहीं कहतें? क्योंकि प्रकृति के नियम-कानून को ही समझना विज्ञान नहीं है, बल्कि धर्मविश्वास के चंगुल से मुक्त होकर वैज्ञानिक परिकल्पनाएँ करना सही अर्थों में विज्ञान है. जहाँ पहले के पुरोहितों को लगता था कि ग्रहण अलौकिक घटना हैं, वही थेल्स ने ग्रहण लगने का कारण भी बताया था. थेल्स के अनुसार चंद्रमा जब सीधा सूर्य को पार कर जाता है तब सूर्यग्रहण लगता है. इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि सूर्यग्रहण लगने का जो कारण आधुनिक विज्ञान हमें बताता है, उससे थेल्स का कहना हूबहू मिल जाता है. विज्ञान का मतलब यह तो नहीं है कि रातोंरात सारी जानकारी प्राप्त हो जाए, आज का विज्ञान सदियों के सोच-विचार और जाँच-पड़ताल का परिणाम है.

थेल्स की कई परिकल्पनाएं गलत थीं, जैसे वे जल को एकमात्र परम पदार्थ तथा सृष्टि की रचना का आधार मानते थे, जबकि आज हम जानते हैं कि जल एकमात्र परम पदार्थ होना तो दूर रहा, मौलिक पदार्थ ही नहीं है, बल्कि ऑक्सीजन और हाइड्रोजन से मिलकर बना है. गौरतलब है कि थेल्स ने ब्रह्मांड की सृष्टि के लिए किसी स्रष्टा या सृजनकर्ता की कल्पना नहीं की, बल्कि उन्होंने सबकुछ का जन्म जड़-वस्तु जल को माना. थेल्स से पहले प्राचीन बेबीलोनवासियों की सृष्टि विषयक कल्पना में भी यह बात तो आती थी कि मर्दुक देवता के आदेश से ब्रह्मांड का निर्माण जल से हुआ, मगर थेल्स ने क्या किया कि मर्दुक को बाहर छोड़ दिया! थेल्स से यूरोपीय दर्शन और विज्ञान परंपरा की शुरुवात मानी जाती है.

भारत में भौतिकवादी दार्शनिकों यानी लोकायत (चार्वक) ने पौराणिक मान्यताओं और कपोल-कल्पनाओं से भारतीय दर्शन को छुटकारा दिलाने की कोशिश की थी लेकिन हमारे दर्शनिकों को परंपरागत मान्यताओं और धार्मिक अंध-कर्मकांडों से पीछा छुड़ाने की बिलकुल भी इच्छा न थी. वास्तव में प्राचीन भारतीय दर्शन की एक निजी विशेषता यह थी कि भारत में जिन मतवादों का जन्म काफी पहले हो चुका था, आने वाले समय में उनका खंडन या समीक्षा न करके बाकी के मतवाद उनके हामी बनकर रह गए. यानी अपने यहाँ उस समय मर्दुक ही मर्दुक थे! बहरहाल, थेल्स ने विज्ञान के लिए जो राह बनाई, उसी परम्परा में आगे चलकर एनेक्सिमेंडर, पाईथागोरस, हेराक्लाईटस, यूक्लिड, आर्किमिडिज़ आदि दार्शनिक व वैज्ञानिक हुए....शेषमग्रे.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं. यह लेख 'विज्ञान और मानव संस्कृति में ब्रह्मांड' सीरीज का हिस्सा है और यह पहला लेख है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: June 8, 2020, 9:01 AM IST
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