ब्रह्मांड: विज्ञान ने सुलझाया ‘आदि और अंत’ का रहस्य

महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरिक्ष का स्वयं विस्फोट हुआ था न कि पहले से मौजूद किसी अंतरिक्ष में विस्फोट हुआ था. आज के फैलते इस ब्रह्मांड आकाशगंगाओं के बीच की रिक्तता ही है जो विस्तृत हो रही है. दरअसल बिग बैंग से पहले कोई अंतरिक्ष नहीं था, यह तो खुद ही बिग बैंग के बाद में अस्तित्व में आया था.

Source: News18Hindi Last updated on: September 2, 2020, 9:23 AM IST
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ब्रह्मांड: विज्ञान ने सुलझाया ‘आदि और अंत’ का रहस्य
ब्रह्मांड की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, इस चुनौती को स्वीकार करने में वैज्ञानिक हाल ही में समर्थ हुए हैं. (प्रतीकात्मक)
ब्रह्मांड की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, इस चुनौती को स्वीकार करने में वैज्ञानिक हाल ही में समर्थ हुए हैं. पिछली सदी के दौरान वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई, इस प्रश्न के उत्तर स्वरूप अनेक मनोमुग्धकारी सिद्धांत प्रतिपादित कियें हैं, जो सृष्टि सृजन को समझाने का प्रयास करते हैं.

ब्रह्माण्ड का विकास इस प्रकार से हुआ है कि समय के साथ इसमें ऐसे जीव (मनुष्य) उपजें जो अपनी उत्पत्ति के रहस्य को जानने में समर्थ थे. ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कब और कैसे हुई? क्या यह सदैव से अस्तित्व में था या इसका कोई प्रारम्भ भी था? इसकी उत्पत्ति से पूर्व क्या था? क्या इसका कोई जन्मदाता भी है? यदि ब्रह्माण्ड का कोई जन्मदाता है तो पहले ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ या उसके जन्मदाता का? यदि पहले ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ तो उसके जन्म से पहले उसका जन्मदाता कहाँ से आया? इस विराट ब्रह्माण्ड की मूल संरचना कैसी है? ब्रह्माण्ड का भावी परिदृश्य (भविष्य) क्या होगा? - ये कुछ ऐसे मूलभूत प्रश्न हैं जो आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने सदियों पूर्व थे. ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से सम्बंधित इन मूलभूत प्रश्नों में धर्माचर्यों, दार्शनिकों, और वैज्ञानिकों की दिलचस्पी रही है. इन प्रश्नों के उत्तर सीमित अवलोकनों, आलंकारिक उदाहरणों, मिथकों, रूपकों एवं आख्यानों के आधार पर प्रस्तुत करने के प्रयास प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं एवं धर्मों में हुए. अधिकांश धर्मों मे ब्रह्माण्ड के रचयिता के रूप में ईश्वर की परिकल्पना भी की गई.

ब्रह्मांड की उत्पत्ति का बिग बैंग सिद्धांत
जैसाकि हम जानते हैं कि हब्बल ने यह खोज की थी कि ब्रह्मांड का विस्तार (फैलाव) हो रहा है. उस समय अन्य वैज्ञानिकों के साथ-साथ हब्बल को भी अपनी इस असाधारण खोज के मायने स्पष्ट नहीं थे. इस मुद्दे पर विचार स्वरूप जोर्ज लेमाइत्रे और जोर्ज गैमो ने गंभीर प्रयास किए. इन दोनों वैज्ञानिकों के अनुसार यदि आकाशगंगाएं बहुत तेज़ी से हमसे दूर भाग रहीं हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि अतीत में किसी समय जरुर ये आकाशगंगाएं एक साथ रहीं होंगी.
वस्तुतः ऐसा लगा कि 10 से 15 अरब वर्ष पहले ब्रह्मांड का समस्त द्रव्य एक ही जगह पर एकत्रित रहा होगा. उस समय ब्रह्मांड का घनत्व असीमित था तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक अति-सूक्ष्म बिंदू में समाहित था. इस स्थिति को परिभाषित करने में विज्ञान एवं गणित के समस्त नियम-सिद्धांत निष्फल सिद्ध हो जाते हैं. वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को गुरुत्वीय विलक्षणता नाम दिया है. किसी अज्ञात कारण से इसी सूक्ष्म बिन्दू से एक तीव्र विस्फोट हुआ तथा समस्त द्रव्य इधर-उधर छिटक गया. इस स्थिति में किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रह्मांड का विस्तार शुरू हुआ और दिक्-काल की भी उत्पत्ति हुई. इस घटना को ब्रह्माण्डीय विस्फोट का नाम दिया गया. अंग्रेज ब्रह्मांड विज्ञानी सर फ्रेड हॉयल ने इस सिद्धांत की आलोचना करते समय मजाक में ये शब्द गढ़े- ‘बिग बैंग’.

आप पूछ सकते हैं, ‘बिग बैंग’ क्या वह धमाका जो बहुत तेज आवाज के साथ होता है. नहीं, किसी भी कम या अधिक आवाज की ध्वनि तरंगों को ले जाने के लिए एक माध्यम की जरूरत होती है (जबकि अंतरिक्ष के गहन निर्वात में आपकी चीख कोई भी नहीं सुन सकता) इसलिए उस विस्फोट को बिग बैंग कहना बिलकुल भी उचित नहीं नहीं है. इतना निश्चित है कि अगर यह धमाका आपके घर के किसी कमरे में हुआ होता, तो बेशक इससे जोरदार आवाज होती क्योंकि यह एक ऐसी चीज थी जो असीमित घनत्व वाली थी और जिसमें अचानक बेहद तीव्र गति से विस्तार हुआ था.
महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरिक्ष का स्वयं विस्फोट हुआ था न कि पहले से मौजूद किसी अंतरिक्ष में विस्फोट हुआ था. आज के फैलते इस ब्रह्मांड आकाशगंगाओं के बीच की रिक्तता ही है जो विस्तृत हो रही है. दरअसल बिग बैंग से पहले कोई अंतरिक्ष नहीं था, यह तो खुद ही बिग बैंग के बाद में अस्तित्व में आया था.
1960 के दशक में स्टीफन हॉकिंग, जार्ज एलिस और रोजर पेनरोज ने आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत को दिक् और काल की गणना में प्रयुक्त करते हुए यह बताया कि दिक् और काल सदैव से विद्यमान नहीं थे, बल्कि उनकी उत्पत्ति ‘महाविस्फोट’ के साथ हुई. हॉकिंग को एहसास हुआ कि महाविस्फोट दरअसल ब्लैक होल का उलटा पतन ही है. स्टीफ़न हॉकिंग ने पेनरोज के साथ मिलकर इस विचार को और विकसित किया और दोनों ने 1970 में एक संयुक्त शोधपत्र प्रकाशित किया और यह दर्शाया कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति ब्लैक होल के केंद्रभाग में होने वाली ‘विलक्षणता’ (सिंगुलैरिटी) जैसी स्थिति से ही हुई होगी. दोनों ने यह दावा किया कि महाविस्फोट से पहले ब्रह्मांड का समस्त द्रव्यमान एक ही जगह पर एकत्रित रहा होगा.

बिग बैंग सिद्धांत ब्रह्मांड की उत्पत्ति का सबसे अधिक मान्य सिद्धांत है. परंतु जिस सैद्धांतिक स्थिति पर भौतिकी या गणित प्रकाश डालने में असमर्थ है, उसको मानने के हमारे पास क्या सबूत है? दरअसल भौतिकी को अपने सिद्धांतों पर उस समय संदेह हो जाता है, जब वह उसे अनंत की तरफ ले जाते हैं. बहरहाल, बात सबूत की. वैज्ञानिक जोर्ज गैमो ने 1940 के दशक में यह अनुमान लगाया कि बिग बैंग ने उत्पत्ति के कुछ समय में ब्रह्मांड को उच्च तापमान विकिरण से भर दिया होगा! उन्होंने यह भी अंदाज़ लगाया था कि ब्रह्मांड के विस्तार ने उच्च तापमान विकिरण को धीरे-धीरे ठंडा कर दिया होगा और उसके अवशेष माइक्रोवेव के रूप में देखे जा सकते हैं. वर्ष 1965 में आर्नो पेंजियाज और रोबर्ट विल्सन ने अनजाने में ही माइक्रोवेव विकिरण की खोज की. इस बड़े सबूत के कारण ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बिग बैंग सिद्धांत को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है.

दूसरा महत्वपूर्ण सबूत है ब्रह्मांड में ड्यूटीरियम, लीथियम और हीलियम के परमाणुओं की पाई जाने वाली संख्या. हॉट बिग बैंग मॉडल का तापीय इतिहास यह दर्शाता है कि ब्रह्मांड के विकास के दौरान केवल ड्यूटीरियम, लीथियम और हीलियम के नाभिक ही निर्मित हुए. उनके परिमाणों (एमाउंट) की गणना भी गैमो और उनके सहयोगियों ने की. यह भी पाया गया कि जहां अन्य तत्वों के परमाणुओं की उत्पत्ति तारों के अंदर होने वाली नाभिकीय संलयन से हुआ, वहीं ड्यूटीरियम का सृजन तारों में संभव नहीं है. अवलोकनों में यह पाया गया है कि ब्रह्मांड में मौजूद ड्यूटीरियम की संख्या गैमो के अवलोकन से बिलकुल मेल खाती है. इसी प्रकार हीलियम की मौजूदगी भी गैमो के अवलोकन से मेल खाता है.

स्थायी अवस्था सिद्धांत
बीसवीं सदी के प्रतिभाशाली ब्रह्माण्डविज्ञानी फ्रेड हॉयल ने अंग्रेज गणितज्ञ हरमान बांडी और अमेरिकी वैज्ञानिक थोमस गोल्ड के साथ संयुक्त रूप से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रस्तुत किया. यह सिद्धांत ‘स्थायी अवस्था सिद्धांत’ के नाम से विख्यात है. इस सिद्धांत के अनुसार, न तो ब्रह्माण्ड का कोई आदि है और न ही कोई अंत. यह समयानुसार अपरिवर्तित रहता है. यद्यपि इस सिद्धांत में प्रसरणशीलता समाहित है, परन्तु फिर भी ब्रह्माण्ड के घनत्व को स्थिर रखने के लिए इसमें पदार्थ स्वत: रूप से सृजित होता रहता है. जहाँ ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सर्वाधिक मान्य सिद्धांत (बिग बैंग सिद्धांत) के अनुसार पदार्थों का सृजन अकस्मात हुआ, वहीं स्थायी अवस्था सिद्धांत में पदार्थों का सृजन हमेशा चालू रहता है.

हॉयल ने बिग बैंग सिद्धांत के अवधारणाओं के साथ असहमति क्यों प्रकट की? दरअसल हॉयल जैसे दार्शनिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए ब्रह्माण्ड के आदि या आरम्भ जैसे विचार को मानना अत्यंत कष्टदायक था. क्योंकि ब्रह्माण्ड के आरम्भ (सृजन) के लिए कोई कारण और सृजनकर्ता (कर्ता) होना चाहिए. वर्तमान में इस सिद्धांत के समर्थक न के बराबर हैं.

दोलायमान ब्रह्मांड सिद्धांत
ब्रह्मांड की उत्पत्ति का यह एक नया सिद्धांत है. इस सिद्धांत के अनुसार हमारा ब्रह्मांड करोड़ों वर्षों के अंतराल में विस्तृत और संकुचित होता रहता है. डॉ. एलन संडेज इस सिद्धांत के प्रवर्तक हैं. उनका मानना है कि आज से 120 करोड़ वर्ष पहले एक तीव्र विस्फोट हुआ था और तभी से ब्रह्मांड फैलता जा रहा है. 290 करोड़ वर्ष बाद गुरुत्वाकर्षण बल के कारण इसका विस्तार रुक जाएगा. इसके बाद ब्रह्मांड संकुचित होने लगेगा और अत्यंत संपीडित और अनंत रूप से बिंदुमय आकार धारण कर लेगा, उसके बाद एक बार पुनः विस्फोट होगा तथा यह क्रम चलता रहेगा! इस सिद्धांत को दोलायमान ब्रह्मांड सिद्धांत कहते हैं.
बहरहाल, महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए दैवीय शक्तियों से परे तर्कसंगत वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित व्याख्या के लिए विज्ञान निरंतर प्रयत्नशील है.

ब्रह्मांड का अंत
वर्तमान में ब्रह्माण्ड के फैलाव तथा अंत के विषय में चार प्रमुख सम्भावनाएं व्यक्त की गई हैं -

1) महा-विच्छेद (द बिग रिप):
इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड तब तक विस्तारित होता रहेगा जब तक प्रत्येक परमाणु टूट कर इधर-उधर फ़ैल नही जायेगा. यह ब्रह्माण्ड के अंत का सबसे भयानक घटना होगी लेकिन ब्रह्मांड को इस अवस्था में देखने के लियें हम जीवित नही रहेंगे क्योंकि इस अवस्था तक पहुचने से पहले से हमारी आकाशगंगा, ग्रह और हम नष्ट हो चुके होंगे. वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना आज से लगभग 23 अरब वर्ष बाद होगी.

2) महा-शीतलन (द बिग फ्रीज़):
इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड के विस्तार के कारण सभी आकाशगंगाएँ एक दूसरे से दूर चले जायेंगी तथा उनके बीच कोई भी सम्बंध नहीं रहेगा. इससे नये तारों के निर्माण के लिये गैस उपलब्ध नहीं होगा. इसका परिणाम यह होगा कि ब्रह्माण्ड में उष्मा के उत्पादन में अत्याधिक कमी आयेगी और समस्त ब्रह्माण्ड का तापमान परम-शून्य (एब्सोल्यूट जीरो) तक पहुँच जायेगा. और महा-शीतलन के अंतर्गत हमारे ब्रह्माण्ड का अंत हो जायेगा. वैज्ञानिकों के अनुसार यह ब्रह्माण्ड के अंत की सबसे अधिक सम्भावित अवस्था है. कुछ भी हों लेकिन यह भी पूरी तरह से निश्चितता से नहीं कहा जा सकता कि इसी अवस्था से ब्रह्माण्ड का अंत होगा.

3) महा-संकुचन (द बिग क्रंच): इस सम्भावना के अनुसार एक निश्चित अवधि के पश्चात् इसके फैलाव का क्रम रुक जायेगा और इसके विपरीत ब्रह्माण्ड संकुचन करने लगेगा अर्थात् सिकुड़ने लगेगा और अंत में सारे पदार्थ बिग-क्रंच की स्थिति में आ जायेगा. उसके बाद एक और बिग-बैंग होगा और दूबारा ब्रह्माण्ड का जन्म होगा. क्या पता कि हमारा ब्रह्माण्ड किसी अन्य ब्रह्माण्ड के अंत के पश्चात् अस्तित्व में आया हो?

4) महाद्रव-अवस्था (द बिग स्लर्प): इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड स्थिर अवस्था में नही है. और हिग्स-बोसॉन ने ब्रह्माण्ड को द्रव्यमान देने का काम किया है. जिससे यह सम्भावना है कि हमारे ब्रह्माण्ड के अंदर एक अन्य ब्रह्माण्ड का जन्म हो और नया ब्रह्माण्ड हमारे ब्रह्माण्ड को नष्ट कर देगा .

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: September 2, 2020, 9:23 AM IST
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