APJ Abdul Kalam's birthday: विज्ञान और विकास को जोड़ती ‘कलाम दृष्टि’

Dr APJ Abdul Kalam birth day special: रामेश्वरम के एक बेहद गरीब परिवार में जन्म लेने के बावजूद अपनी मेहनत, अध्ययनशीलता और समर्पण की बदौलत बड़े-से-बड़े सपनों को साकार करने के प्रमाण हैं डॉ. कलाम (Dr APJ Abdul Kalam). उनका कहना था, ‘महान सपने देखने वालों के महान सपने हमेशा पूरा होते हैं.’

Source: News18Hindi Last updated on: October 15, 2020, 5:53 AM IST
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APJ Abdul Kalam's birthday: विज्ञान और विकास को जोड़ती ‘कलाम दृष्टि’
मद्रास (चेन्नई) में स्नातक की पढ़ाई: उन्होंने 1950 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की. वर्ष1969 में इन्हें भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में प्रवेश मिला और उन्हें Satellite Launch Vehicles का project director बना दिया गया. प्रोजेक्ट सफल रहा और भारत ने पृथ्वी की कक्षा में रोहिणी उपग्रह भेजने में सफलता प्राप्त की. भारत को बैलेस्टिक मिसाइल टेक्नोलोजी में बनाया आत्मनिर्भर: भारत को बैलेस्टिक मिसाइल और लॉन्चिंग टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनाने के कारण ही डॉ. कलाम को मिसाइलमैन कहा जाता हैं. वर्ष 1982 में इन्हें डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट लेबोरेट्री का डायरेक्टर बनाया गया. इसके बाद इन्होनें भारत के लिए पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश, नाग, ब्रह्मोस समेत कई मिसाइल बनाईं. देश की पहली मिसाइल इन्हीं की देख रेख में ही बनी हैं.
किसी भी व्यक्ति के नाम, काम, गुण, स्वभाव एक चुंबक की तरह होते हैं. इनकी प्रतीति से मन आकर्षणवश उसकी ओर चला जाता है. ऐसे व्यक्तित्व का प्रभाव देश, धरा और दिशा-दिशा में होने लगता है, वह मृत्यु के बाद भी अपने उपलब्धियों, त्याग और सादगी की बदौलत अमर रहता है. यह बात शत-प्रतिशत खरी उतरती है महान स्वप्नद्रष्टा, वैज्ञानिक, शिक्षक तथा पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम पर. 15 अक्टूबर यानी आज डॉ. अब्दुल कलाम का जन्मदिन है. यह अवसर उनके कार्यों, उपलब्धियों, मूल्यों तथा आदर्शों के याद करने का है. शिक्षक के रूप में डॉ. कलाम के योगदान को मान्यता देते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने साल 2010 में कलाम के जन्मदिन को ‘अंतराष्ट्रीय छात्र दिवस’ (इंटरनेशनल स्टूडेंट्स डे) के रूप में मनाने की शुरुआत की.

डॉ. कलाम अपने जीवन-काल में ही किवदंती यानी लेजेंड बन गए थे. वे भारत के अघोषित मार्गदर्शक थे. वे एक प्रेरणादायी शिक्षक थे. आधुनिक भारत के निर्माण में विशेष तौर पर अंतरिक्ष कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय सुरक्षा में उनका योगदान अविस्मरणीय है. डॉ. कलाम एक बहुमुखी प्रतिभा थे- इनोवेटिव टेक्नोक्रैट, प्रेरणादायी शिक्षक, प्रबुद्ध विचारक, विज्ञान संचारक, समाज सुधारक एवं प्रभावशाली और स्वप्नद्रष्टा नेता. जिसका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं था, कोई राजनीतिक आकांक्षा नहीं थी. आकांक्षा यदि थी तो देश को 2020 तक सर्वगुण संपन्नता की ओर ले जाने की. साल 2020 इसलिए और भी प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि देश की उन्नति और खुशहाली के लिए उनका दिया हुआ रोडमैप- ‘विजन-2020’, सन् 2020 को ध्यान में रखते हुए ही तैयार किया गया था. डॉ. कलाम की आकांक्षा थी बच्चो को, युवाओं को सक्षम वैज्ञानिक, व्यवसायी और श्रेष्ठ प्रगतिशील नागरिक बनाने की. शहरों के साथ-साथ गांवों के उत्थान की और क्षेत्र में फिर चाहे वह कृषि हो, सूचना हो, सामरिक प्रौद्योगिकी हो सब में सक्षम, स्वयंसिद्ध, शक्तिशाली भारत के निर्माण की. देश के विकास को लेकर उनके पास एक स्पष्ट और समग्र दृष्टि थी, जिसका तानाबाना विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ईर्द-गिर्द बुना गया था.

रामेश्वरम के एक बेहद गरीब परिवार में जन्म लेने के बावजूद अपनी मेहनत, अध्ययनशीलता और समर्पण की बदौलत बड़े-से-बड़े सपनों को साकार करने के प्रमाण हैं डॉ. कलाम. उनका कहना था, ‘महान सपने देखने वालों के महान सपने हमेशा पूरा होते हैं.’ उनका मानना था कि देश के युवा अपनी नई सोच, जोश और ऊर्जा से देश के भविष्य को संवार सकते हैं. इसलिए वे अपनी अंतिम सांस तक युवाओं को राष्ट्र के प्रति समर्पण के लिए उत्साहित और प्रेरित करते रहे.


21 नवंबर, 1963 की शाम को थुंबा, केरल के एक चर्च से भारत के पहले रॉकेट ‘नाइक अपाचे’ का परीक्षण किया किया गया. यह रॉकेट हमें अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्था ‘नासा’ ने दिया था. इसी परीक्षण के साथ भारतीय रॉकेट विज्ञान का उदय होता है. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक डॉ. विक्रम साराभाई ने डॉ. कलाम को 6 महीने की विशेष प्रशिक्षण के लिए नासा भेजा था. कलाम के सामने ही यह रॉकेट बनाया गया था. वास्तव में भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान की सफलता की शुरुवात रोहिणी रॉकेटों के परीक्षणों से हुई.
20 नवंबर, 1967 को पहला रोहिणी-75 रॉकेट प्रक्षेपित किया गया. ये रॉकेट वायुमंडल के ऊपरी क्षेत्रों सहित पृथ्वी के आस-पास के वातावरण का अध्ययन करके सूचनाएँ भेजते थे. यह रॉकेट किसी ऊँचाई तक कुछ भार ले जाने में तो समर्थ थे पर उसे किसी कक्षा में स्थापित नहीं कर सकते थे. रोहिणी-75 के 1967 में छोड़े जाने के कुछ समय बाद 1968 में भारतीय रॉकेट सोसाइटी का गठन हुआ. अब तक भारत के स्वदेशी उपग्रह छोड़ने की योजना बन चुकी थी. इसके लिए चेन्नई से 100 किलोमीटर दूर पूर्वी तट पर श्रीहरिकोटा नामक द्वीप को प्रक्षेपण स्थल के रूप में चुना गया. तब तक 1962 और 1965 के युद्धों के अनुभव से भारत को रक्षा प्रणाली में आत्मनिर्भर होने की कड़वी सीख मिल चुकी थी. इसलिए इस संबंध में रॉटो प्रोजेक्ट (रॉकेट असिस्टेड टेक ऑफ सिस्टम) पर तेज़ी से काम हो रहा था. 1972 में बरेली के एयर फोर्स स्टेशन पर इस प्रणाली का सफलतापूर्वक परीक्षण हुआ. इस परीक्षण में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के सुखोई विमान की भी मदद ली गई. इस बीच रक्षा मंत्रालय ने मिसाइल कार्यक्रम को अनुमति दे दी थी. जब रक्षा अनुसंधान विभाग ने ज़मीन से हवा में मार करने वाली स्वदेशी मिसाइल को विकसित करने की ‘डेविल’ नाम से एक प्रोजेक्ट की शुरुवात की, तब डॉ. कलाम भी उसके अंग थे हालांकि आगे चलकर इस प्रोजेक्ट में उनका सहयोग अन्य व्यस्तताओं के चलते कम होता गया.1975 से 1978 के बीच भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के विकास की दिशा में अपने कदम काफी तेजी से बढ़ाए.

भारतीय रॉकेटों के विकास का अगला बड़ा मौका तब आया जब डॉ. कलाम को सैटेलाइट लॉंच व्हिकल प्रोजेक्ट (एसएलवी) का मैनेजर बनाया गया. सैटेलाइट लॉंच व्हिकल टेक्नोलोजी के विकास तथा नियंत्रण, प्रणोदन (प्रोपोलेंट) और वायुगतिकी (एयरोडायनामिक्स) में विशेषज्ञता हासिल करने में डॉ. कलाम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. 17 अप्रैल, 1983 को एसएलवी-3 के सहारे एक कृत्रिम उपग्रह ‘रोहिणी-आरएसडी2’ को पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया. इसी के साथ भारत स्पेस क्लब का छठा सदस्य राष्ट्र बन गया. यह भारत और डॉ. कलाम के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी.

डॉ. कलाम का कहना था कि मिसाइल कार्यक्रम से जुड़ना उनके व्यवसायिक जीवन का दूसरा पड़ाव था, जोकि स्वदेशी मिसाइल विकसित करने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए बहुत जरूरी था. मिसाइलों के निर्माण के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने जुलाई 1983 में एक परियोजना की आधारशिला रखी, जिसका अगुआ डॉ. कलाम को ही बनाया गया. डॉ. कलाम और उनके सहकर्मियों ने छह साल से भी कम अवधि में 5 मिसाइलों- पृथ्वी, अग्नि, नाग, आकाश और त्रिशूल का विकास और सफल परीक्षण कर दिखाया. इसके साथ ही डॉ. कलाम पूरी दुनिया में भारत के ‘मिसाइलमैन’ के रूप में प्रसिद्ध हो गए. 1997 में डॉ. कलाम को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत-रत्न’ से विभूषित किया गया.
डीआरडीओ ने परमाणु ऊर्जा विभाग के साथ मिलकर 11 मई, 1998 को ‘ऑपरेशन शक्ति’ के तहत राजस्थान के पोखरण में एक साथ तीन परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक सम्पन्न किए. उनमें से एक परमाणु बम था, एक छोटी युक्ति (सब-क्रिटिकल) थी और तीसरा हाईड्रोजन बम था. ऑपरेशन शक्ति में डॉ. कलाम ने महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई थी. इन सफल परीक्षणों के बाद देश ने खुद को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र घोषित कर लिया. इस अवसर को डॉ. कलाम अपने जीवन का सर्वधिक आनन्दायक पड़ाव मानते थे.


25 जुलाई, 2002 में डॉ. कलाम ने भारत के ग्यारहवे राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली. राष्ट्रपति बनने के बाद भी वह बच्चो और युवाओं से मुख़ातिब होते रहे. डॉ. कलाम ने राष्ट्रपति पद की गरिमा को बढ़ाने के साथ-साथ राष्ट्रपति भवन को आम जनता के करीब लाने के लिए कई सार्थक प्रयास किए.

अंत में मैं 25 जुलाई 2002 में राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करते समय डॉ. कलाम के भाषण से उद्धृत करना चाहूंगा, ‘विगत 50 वर्षो में खाद्य उत्पादन, स्वास्थ्य, उच्च शिक्षा, पत्रकारिता व जन संचार, विज्ञान व प्रौद्योगिकी तथा प्रतिरक्षा क्षेत्रों में हमने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है. हमारा देश प्राकृतिक संसाधनों, संवेदनशील लोगों तथा पारंपरिक नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण है. इन प्रचुर संसाधनों के बावजूद हमारे देश की एक बड़ी जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है. उनमें कुपोषण व्याप्त है तथा उन्हें प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पाती. गरीबी एवं बेरोजगारी को दूर करने के लक्ष्य को लेकर तीव्र विकास के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा को हर भारतीय को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्वीकार करना होगा. वास्तव में भारत को आर्थिक, सामाजिक व सामरिक रूप से आत्मनिर्भर एवं शक्तिशाली बनाना, अपनी मातृभूमि तथा अपने व भावी पीढ़ियों के प्रति हमारा प्रमुख कर्तव्य है.’ कलाम त्याग, सादगी और उपलब्धियों के पर्याय थे. आज वे भले ही हमारे बीच में नहीं हैं मगर उनके आदर्श, जीवन मूल्य तथा कार्य आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेंगी.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: October 15, 2020, 5:53 AM IST
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