जन्‍मदिन विशेष: अवसरों और औपचारिक शिक्षा का मोहताज नहीं था वैज्ञानिक माइकल फैराडे का विज्ञान प्रेम

शुरूआत में फैराडे के सभी आविष्कार रसायन विज्ञान पर ही आधारित थे. सन् 1824 में उन्होने बेन्जीन की खोज की और क्लोरीन गैस का द्रवीकरण किया. सन् 1823 में वे रॉयल सोसाइटी के सदस्य और सन् 1825 में सोसाइटी की प्रयोगशाला के निदेशक बना दिए गए.

Source: News18Hindi Last updated on: September 22, 2021, 7:00 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
जन्‍मदिन विशेष: अवसरों और औपचारिक शिक्षा का मोहताज नहीं था वैज्ञानिक माइकल फैराडे का विज्ञान प्रेम


सर हंफ्री डेवी अपने समय के एक महान और प्रतिष्ठित ब्रिटिश रसायनशास्त्री (केमिस्ट) थे. उन्होने कोयले की खदानों में रोशनी पैदा करने के लिए एक खास सुरक्षा लैंप का आविष्कार किया था. इसके अलावा डेवी ने विद्युत अपघटन (इलेक्ट्रोलिसिस), मैग्नीशियम, सोडियम, पोटैशियम, बेरियम, बोरोन, नाइट्रस ऑक्साइड, कैल्शियम आदि की भी खोजें की थीं. साथ ही यह भी साबित किया कि हीरा वास्तव में एक शुद्ध कार्बन है.


सर डेवी से उनके जीवन के आखिरी दिनों में जब पूछा गया कि उनकी महान खोजें क्या-क्या हैं तो उन्होंने जवाब दिया: ‘कोयले की खानों में जलने वाला सुरक्षा लैंप, कुछ विद्युतीय एवं रासायनिक आविष्कार और माइकल फैराडे.’ सवाल उठता है कि आखिर कौन था यह माइकल फैराडे?


माइकल फैराडे भी एक अंग्रेज़ वैज्ञानिक थे, जिन्होंने सन् 1831 में प्रयोगों के आधार पर विद्युत चुंबकीय अभिप्रेरण (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन) का आविष्कार कर उसके नियम प्रतिपादित किए और अपने प्रयोगों का प्रदर्शन किया. इन्हीं प्रयोगों के आधार पर उन्होंने इलैक्ट्रिक मोटर और डायनेमो बनाया. विद्युत (इलेक्ट्रिसिटी) के आविष्कार का श्रेय फैराडे को ही जाता है. आज संपूर्ण विश्व में उन्हीं के सिद्धान्त के आधार पर विद्युत उत्पादन किया जा रहा है.


जिल्दसाज़ से असाधारण वैज्ञानिक बनने तक का सफर

एक बेहद निर्धन परिवार में आज ही के दिन सन् 1791 में जन्मे माइकल फैराडे ने किसी स्कूल में शिक्षा नहीं ली थी. चर्च में इतवार को लगने वाली पाठशाला में ही उन्होने लिखना और पढ़ना सीखा. 14 साल की छोटी-सी उम्र में उन्होने अखबार बांटना शुरू कर दिया और एक जिल्दसाज़ के यहां नौकरी कर ली. यहीं पर फैराडे को रसायन विज्ञान (कैमिस्ट्री) की कई किताबें पढ़ने को मिलीं जिसके फलस्वरूप उनकी दिलचस्पी इस विषय में बढ़ती गई.


सन् 1812 में उन्हें रॉयल इंस्टीट्यूशन और रॉयल सोसाइटी के प्रसिद्ध रसायनशास्त्री सर हंफ्री डेवी और सिटी फिलोसोफिकल सोयायटी के अध्यक्ष सर जॉन टैटम के व्याख्यान सुनने का मौका मिला. हंफ्री डेवी के कुछ व्याख्यानों पर फैराडे ने विस्तृत नोट तैयार कर उन्हें एक पत्र के साथ भेजा जिससे वह काफी प्रभावित हुए और एक मुलाक़ात की भी व्यवस्था की. लेकिन उस मुलाक़ात का कोई खास नतीजा नहीं निकला.

डेवी ने फैराडे को जिल्दसाजी करते रहने की सलाह दी. उनका कहना था–‘विज्ञान एक शुष्क प्रेमिका है और धन के मामले में तो वह अपनी सेवा में समर्पित लोगों के प्रति काफी कंजूसी बरतती है.’ लेकिन फरवरी 1813 में एक घटना घटी जिसने किताबों की बाइंडिंग करने वाले एक लड़के को सर्वकालिक महान वैज्ञानिक बना दिया. रॉयल इंस्टीट्यूशन के एक सहायक सार्वजनिक विवाद में फंस गए जिसकी वजह से उन्हें बर्खास्त कर दिया गया.


डेवी ने इस पद के लिए फैराडे का नाम प्रस्तावित किया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें रॉयल इंस्टीट्यूशन में बतौर सहायक नियुक्ति मिल गई. गौरतलब है कि फैराडे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, उनके पास कोई संस्थागत प्रमाण पत्र भी नहीं था. इस दौरान फैराडे ने बतौर सहायक काम शुरू किया और उसके साथ ही खुद भी स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने शुरू कर दिए थे. सन् 1833 में वे रॉयल इंस्टीट्यूशन में रसायनशास्त्र के लेक्चरर बन गए.


इसलिए डेवी ने कहा होगा फैराडे को अपना महान आविष्कार

माइकल फैराडे का मुख्य काम विद्युत चुम्बकीय प्रेरण पर था. सन् 1820 में हैंड्स ओर्स्टेड ने यह अवधारणा दी थी कि विद्युत धारा से चुम्बकीय क्षेत्र (मैग्नेटिक फील्ड) पैदा किया जा सकता है. इससे उन्हें विचार आया कि अगर विद्युत धारा के प्रवाह से चुम्बकीय प्रभाव पैदा हो सकता है तो चुम्बकीय प्रभाव से विद्युत धारा भी पैदा की जा सकती है. बाद में, इसी आधार पर उन्होंने सन् 1831 में विद्युत चुम्बकीय अभिप्रेरण का नियम (लॉ ऑफ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन) दिया था.


इसी नियम के आधार पर ही आज पूरी दुनिया में विद्युत का उत्पादन किया जा रहा है. ट्रांसफार्मर भी फैराडे के इसी सिद्धांत पर काम करता है. उन्होंने इसी वैज्ञानिक नियम के आधार पर डायनमो और विद्युत जनरेटर का आविष्कार किया था. शुरुवात में फैराडे के सभी आविष्कार रसायन विज्ञान पर ही आधारित थे. सन् 1824 में उन्होने बेन्जीन की खोज की और क्लोरीन गैस का द्रवीकरण किया. सन् 1823 में वे रॉयल सोसाइटी के सदस्य और सन् 1825 में सोसाइटी की प्रयोगशाला के निदेशक बना दिए गए.


सन् 1839 में फैराडे बीमार पड़ गए और उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया. इस बीमारी के इलाज में चार साल का लंबा वक्त लगा. मगर इसके बाद उनकी याददाशत काफी कम हो गई. सन् 1861 में जब फैराडे की उम्र 70 साल की थी तो वे रॉयल इंस्टीट्यूशन से अवकाश-ग्रहण कर हैंप्टन कोर्ट के मकान में चले गए.  यह मकान उन्हें महारानी विक्टोरिया ने उपहार स्वरूप दिया था. इस समय तक उनका स्वास्थ्य काफी खराब हो चुका था. 25 अगस्त, 1867 को 76 वर्ष की आयु में इस सर्वकालिक महान वैज्ञानिक की मृत्यु हो गई.

जॉर्ज पोर्टर ने उन्हें श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा था कि फैराडे उन लोगों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बना रहेगा जिनका विज्ञानप्रेम अवसरों और औपचारिक शिक्षा की प्राप्ति का मोहताज नहीं है. इस लेख का समापन हम प्रसिद्ध ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी अर्नेस्ट रदरफोर्ड के इस कथन से करना चाहेंगे, “फैराडे के दौर को ध्यान में रखते हुए हम उनके कार्यों का जितना अध्ययन करते हैं, एक प्रयोगकर्ता और प्रकृति चिंतक के रूप में उनकी अप्रतिम प्रतिभा से उतना ही अधिक प्रभावित होते हैं.


जब हम उनकी खोजों और विज्ञान तथा उद्योग के विकास पर उनके प्रभाव की मात्रा और विस्तार पर चर्चा करते हैं तो कोई भी सम्मान इतना बड़ा नहीं लगता जिसे महानतम सर्वकालिक आविष्कारकों में से एक—माइकल फैराडे की स्मृतियों को अर्पित किया जा सके.” अस्तु!




(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: September 22, 2021, 7:00 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर