धरती पर उतरेगा सूरज!

बिजली (Electricity) पर हमारी बढ़ती निर्भरता के कारण भविष्य में ऊर्जा की खपत और भी बढ़ेगी. मगर इतनी ऊर्जा आएगी कहां से? यह तो हम सब जानते हैं कि धरती पर कोयले और पेट्रोलियम के भंडार सीमित हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 7, 2020, 1:15 PM IST
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धरती पर उतरेगा सूरज!
वैज्ञानिक सूर्य जैसी ऊर्जा उत्‍पन्‍न करने का प्रयास कर रहे हैं.
मानव विकास के लिए ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है. बिजली (Electricity) पर हमारी बढ़ती निर्भरता के कारण भविष्य में ऊर्जा की खपत और भी बढ़ेगी. मगर इतनी ऊर्जा आएगी कहां से? यह तो हम सब जानते हैं कि धरती पर कोयले और पेट्रोलियम के भंडार सीमित हैं. ये भंडार ज़्यादा दिनों तक हमारी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकते. और इनसे प्रदूषण भी होता है. आप कह सकते हैं कि अब तो नाभिकीय रिएक्टरों (Nuclear reactors) का इस्तेमाल बिजली पैदा करने में किया जाने लगा है तो कोयले और पेट्रोलियम के खत्म होने की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. मगर ऐसा नहीं है, जिस यूरेनियम या थोरियम से नाभिकीय रिएक्टर में परमाणु क्रिया सम्पन्न होती है, उनके भंडार भी भविष्य में हमारी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए बेहद कम हैं. नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन में रेडियोधर्मी या रेडियोएक्टिव उत्पाद (Radioactive products) भी उत्पन्न होते हैं जो पर्यावरण और मनुष्य दोनों के लिए बेहद घातक हैं.

वैज्ञानिक लंबे अर्से से एक ऐसे ईंधन की खोज में हैं, जो पर्यावरण और मानव शरीर को नुकसान पहुंचाए बगैर हमारी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम हो. वैज्ञानिकों की यह तलाश नाभिकीय संलयन (Nuclear fusion) पर समाप्त होती दिखाई दे रही है.


नाभिकीय संलयन प्रक्रिया ही हमारे सूर्य तथा अन्य तारों की ऊर्जा का स्रोत है. जब दो हल्के परमाणु नाभिक (Atomic nucleus) जुड़कर एक भारी तत्व के नाभिक का निर्माण करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं. अगर हम हाइड्रोजन के चार नाभिकों को जोड़ें तो हीलियम के एक नाभिक का निर्माण होता है. हाइड्रोजन के चार नाभिकों की अपेक्षा हीलियम के एक नाभिक का द्रव्यमान कुछ कम होता है. इस प्रक्रिया में द्रव्यमान में हुई कमी ही ऊर्जा के रूप में निकलती है.

हाइड्रोजन के संलयन द्वारा इतनी विशाल ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है, यह बात सबसे पहले साल 1938 में जर्मन वैज्ञानिक हैन्स बैथे के अनुसंधान कार्यों से पता चली. इसी नाभिकीय संलयन के सिद्धांत पर हाइड्रोजन बम का निर्माण किया गया, जिसमें बैथे की महत्वपूर्ण भूमिका थी. वैज्ञानिक कई वर्षों से सूर्य में होने वाली संलयन अभिक्रिया को पृथ्वी पर कराने के लिए प्रयासरत हैं, जिससे बिजली पैदा की जा सके. अगर इसमें सफलता मिल जाती है तो यह सूरज को धरती पर उतारने जैसा ही होगा!
हाल ही में अमेरिका के प्रसिद्ध प्रौद्योगिकी संस्थान एमआईटी (Massachusetts Institute of Technology) ने निजी स्टार्टअप कॉमनवेल्थ फ़्यूजन सिस्टम्स (सीएफएस) के सहयोग के साथ स्पार्क (Soonest/Smallest Private-Funded Affordable Robust Compact) नाम का एक छोटा नाभिकीय संलयन रिएक्टर जून 2021 से बनाने की शुरुआत करने की घोषणा की है, जिसमें 2025 में ही संलयन कराकर 2035 तक बिजली उत्पादन शुरू किया जा सकता है. एमआईटी के वैज्ञानिकों ने जर्नल ऑफ प्लाज्मा फिजिक्स के हालिया अंक में प्रकाशित सात शोधपत्रों के जरिए उक्त घोषणा की है. दरअसल, एमआईटी अपने इस नाभिकीय विकास कार्यक्रम (न्यूक्लियर डेवलपमेंट प्रोग्राम) के तहत पृथ्वी पर नाभिकीय संलयन प्रक्रिया द्वारा सूर्य जैसा एक ऊर्जा स्रोत बनाने की कोशिश शुरू करने जा रहा है.

कृत्रिम संलयन को लेकर आईटीईआर (इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर) पूरी दुनिया का साझा सपना है. इस परियोजना के तहत एक नाभिकीय रिएक्टर का निर्माण किया जाना है जिसमें नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया के आधार पर ऊर्जा से जुड़े अनुसंधान संपन्न होने हैं. लंबे योजना काल के बाद आईटीईआर की असेंबलिंग इसी साल 28 जुलाई को शुरू हुई है. इस परियोजना में रूस, जापान, अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया, यूरोपीय संघ के साथ भारत भी शामिल है. हालांकि यह प्रोजेक्ट काफी खर्चीला है और इसमें लगने वाली कुल लागत 22 अरब डॉलर से 65 अरब डॉलर तक आंकी जा रही है. एमआईटी के हालिया घोषित स्पार्क रिएक्टर और आईटीईआर दोनों ही प्रोजेक्ट्स में एक ही टोकामक प्रणाली का उपयोग होने वाला है, जिसमें हाइड्रोजन के भारी समस्थानिकों की पतली धार को शक्तिशाली चुंबकों से साधकर लेजर के जरिये 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है.

नाभिकीय विखंडन (Nuclear fission) पर आधारित वर्तमान रिएक्टरों की आलोचना का सबसे बड़ा कारण है इनसे ऊर्जा के साथ रेडियोएक्टिव अपशिष्ट पदार्थों (Waste materials) का भी उत्पन्न होना. नाभिकीय विखंडन के सिद्धान्त के आधार पर ही परमाणु बम बना. विखंडन रिएक्टर मनुष्य तथा पर्यावरण के लिए बहुत घातक होते हैं. इनसे डीएनए में उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) तक हो सकते हैं. इससे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आनुवंशिक (जेनेटिक) दोषयुक्त संतानें पैदा हो सकती हैं. वहीं संलयन रिएक्टर से उत्पन्न होने वाले रेडियोएक्टिव कचरे बहुत कम होते हैं तथा इनसे पर्यावरण को कोई भी नुकसान नहीं होता.तारों पर होने वाली नाभिकीय संलयन प्रक्रिया को सर्वप्रथम मार्क ओलिफेंट ने 1932 में पृथ्वी पर दोहराने में सफलता प्राप्त की थी. अभी दो साल पहले तक वैज्ञानिकों को इस प्रक्रिया को पृथ्वी पर नियंत्रित रूप से सम्पन्न कराने में कामयाबी नहीं मिली थी. मगर साल 2018 में चीन के चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ प्लाज़्मा फिज़िक्स के न्यूक्लियर फ्यूज़न रिएक्टर ईस्ट में सूरज की सतह के तापमान से 6 गुना ज़्यादा तापमान (तकरीबन 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस) उत्पन्न कर लिया था. इस तापमान को तकरीबन 10 सेकंड तक स्थिर रखा गया. नाभिकीय संलयन क्रिया को सम्पन्न कराने के लिए इतना उच्च ताप और दाब ज़रूरी है.

रिएक्टर ईस्ट में कृत्रिम संलयन करवाने लिए हाइड्रोजन के दो भारी समस्थानिकों (आइसोटॉप्स) ड्यूटेरियम और ट्रिटियम को ईधन के रूप में प्रयोग किया गया था. धरती के समुद्रों में ड्यूटेरियम काफी मात्रा में मौजूद है. जबकि ट्रिटियम को लीथियम से प्राप्त किया जा सकता है जो धरती पर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है. इसलिए नाभिकीय संलयन के लिए ईधन की कभी कमी नहीं होगी. ड्यूटेरियम में एक न्यूट्रॉन होता है और ट्रिटियम में दो. अगर इन दोनों में टकराव हो तो उससे हीलियम का एक नाभिक बनता है. इस प्रक्रिया में ऊर्जा मुक्त होती है.

भविष्य में इसी ऊर्जा का इस्तेमाल टर्बाइन को चलाने में किया जाएगा, जिसके फलस्वरूप बिजली उत्पादन शुरू की जा सकेगी.


संलयन के मूल में प्लाज्मा भौतिकी (Plasma physics) है. अत्यधिक तापमान पर इलेक्ट्रॉनों को नाभिक से अलग कर दिया जाता है और एक गैस-एक प्लाज्मा बन जाती है. आवेशित कणों से बना प्लाज्मा बहुत ही सूक्ष्म वातावरण है. सरल शब्दों में कहें तो जिस हवा में हम सांस लेते हैं उससे तकरीबन दस लाख गुना घना है. प्लाज्मा ऐसे वातावरण पैदा करते हैं जिसमें हल्के तत्व फ्यूज हो सके और ऊर्जा दे. एक प्रयोगशाला में सफलतापूर्वक संलयन करवाने के लिए तीन शर्ते पूरी होनी चाहिए.

पहला- बहुत अधिक तापमान ताकि उच्च ऊर्जा टकराव हो सके. दूसरा- पर्याप्त प्लाज्मा कण घनत्व ताकि टकराव होनी की संभावना बढ़ाई जा सके. तीसरा- प्लाज्मा को एक जगह स्थिर बनाए रखने के लिए पर्याप्त परिरोध समय (Confinement time). संलयन रिएक्टर की दीवारों को प्लाज़्मा के उच्च ताप से बचाने के लिए चुंबकीय क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाता है जिससे प्लाज़्मा पात्र की दीवारों को बिना स्पर्श किए चक्कर काटता रहता है. ड्यूटेरियम और ट्रिटियम से बने हीलियम कण प्लाज़्मा के चुंबकीय क्षेत्र में कुछ देर तक कैद रहते हैं. बाद में इन्हें डाइवर्टर पम्प से बाहर कर दिया जाता है. चुंबकीय क्षेत्र से न्यूट्रॉन कण निरंतर दूर होते जाते हैं क्योंकि वे आवेश रहित होते हैं. भविष्य में इन्हें एक ऊर्जा संयंत्र में पकड़कर ऊर्जा बनाना संभव होगा. हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि नाभिकीय संलयन कार्यक्रम ऊर्जा संकट को दूर करने में और वैश्विक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा. (यह लेखक के निजी विचार हैं. वह विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: October 7, 2020, 1:15 PM IST
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