क्या हम डिजिटल रूप से अमर हो सकते हैं?

सरल शब्दों में कहें तो डिजिटल अमरता की परिभाषा यह है कि हमारे दिमाग को (जो कि असल में हमारी पहचान है) या तो किसी परमानेंट मीडियम में जिंदा रखा जाए या फिर चेतना, अहसास और यादों को डिजिटल बनाकर कंप्यूटरों में अपलोड कर दिया जाए. इसका मतलब यह है कि हमारे शरीर भले ही मर जाएंगे पर हमारी चेतना कंप्यूटर या रोबोट में हमेशा के लिए सुरक्षित रहेगी.

Source: News18Hindi Last updated on: October 3, 2020, 11:28 PM IST
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क्या हम डिजिटल रूप से अमर हो सकते हैं?
सरल शब्दों में कहें तो डिजिटल अमरता की परिभाषा यह है कि हमारे दिमाग को (जो कि असल में हमारी पहचान है) या तो किसी परमानेंट मीडियम में जिंदा रखा जाए या फिर चेतना, अहसास और यादों को डिजिटल बनाकर कंप्यूटरों में अपलोड कर दिया जाए.
सफलता महत्वाकांक्षा को जन्म देती है और मानव जाति की असाधारण उपलब्धियां उसे और भी ज्यादा साहसिक लक्ष्य निर्धारित करने की दिशा में प्रेरित करती रही हैं. समृद्धि, आरोग्य और समरसता (Prosperity, healing and harmony) के अपूर्व स्तरों को प्राप्त करने के बाद, और इतिहास के रिकॉर्ड एवं मौजूदा मूल्यों की बदौलत मानवता के अगले संभावित लक्ष्य अमरता, सुख और दिव्यता होंगे. प्रसिद्ध लेखक, इतिहासकर और भविष्यवादी (Futurist) युवाल नोआ हरारी अपनी किताब होमो डेयस में लिखते हैं कि इक्कीसवी सदी में इन्सानों द्वारा अमरत्व हासिल करने के गंभीर प्रयास किए जाने की पूर्ण संभावना है. वृद्धावस्था (Senility) और मौत के खिलाफ लड़ते रहना महज़ अकाल और बीमारियों के खिलाफ लड़ी गई परंपरागत लड़ाई को जारी रखना होगा.

यह समकालीन संस्कृति के सबसे बड़े मूल्य को प्रकट करता है: मानव जीवन का मूल्य. हमें हमेशा यह याद दिलाया जाता रहा है कि मानव जीवन इस संसार की सबसे पवित्र वस्तु है. यह बात हर कोई कहता है, स्कूलों में अध्यापक कहते हैं, संसद में नेता कहते हैं, अदालतों में वकील कहते हैं और नाटक के मंचों पर अभिनेता कहते हैं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्वीकृत मानवाधिकारों का वैश्विक घोषणा-पत्र (Global Declaration of Human Rights), जो कि हमारे वैश्विक संविधान (Global constitution) की सबसे नजदीकी चीज है, स्पष्ट तौर पर कहता है कि जीवन का अधिकार मानवता का सबसे बुनियादी मूल्य है. चूंकि मृत्यु इस अधिकार का स्पष्ट तौर पर उल्लंघन करती है, इसलिए मृत्यु मानवता के विरुद्ध एक अपराध है, और हमें इसके खिलाफ मुकम्मल युद्ध छेड़ना चाहिए.

क्या इंसान सच में अमर हो सकता है?
विज्ञान की मानें तो यह पूरी तरह से मुमकिन नहीं है. जिस प्रकार से प्रत्येक चीज के नष्ट होने की एक निर्धारित समय सीमा है, उसी प्रकार इंसान का शरीर भी एक उम्र के बाद कमजोर होकर नष्ट होने लगता है. बूढ़े होने की प्रक्रिया में शरीर के विभिन्न अवयवों (Components) की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और इंसान मृत्यु की ओर अग्रसर होने लगता है. फिलहाल यही लगता है कि विज्ञान भले ही इंसान को अमर न बना सके. बस इंसान की औसत आयु में 20 से 40 साल का इजाफा कर सकता है. इसलिए निकट भविष्य में ऐसा कोई तरीका नहीं दिखाई देता है जिससे हम जैविक रूप से अमर हो सकें. परंतु अमरता हासिल करने का दूसरा अजैविक तरीका भी है जिसके प्रति वैज्ञानिक न सिर्फ आशावाना हैं बल्कि उनका मानना कि 2045 तक हम इस अजैविक अमरता को हासिल भी कर लेंगे.
वह अजैविक तरीका है : डिजिटल अमरता (Digital immortality) या ब्रेन अपलोड.

सरल शब्दों में कहें तो डिजिटल अमरता की परिभाषा यह है कि हमारे दिमाग को (जो कि असल में हमारी पहचान है) या तो किसी परमानेंट मीडियम में जिंदा रखा जाए या फिर चेतना, अहसास और यादों को डिजिटल बनाकर कंप्यूटरों में अपलोड कर दिया जाए. इसका मतलब यह है कि हमारे शरीर भले ही मर जाएंगे पर हमारी चेतना कंप्यूटर या रोबोट में हमेशा के लिए सुरक्षित रहेगी. जब इंसान का दिमाग किसी कंप्यूटर या विशाल रोबोट में डाल दिया जाए तो शरीर के नहीं रहने पर भी वह जिंदा रहेगा. इंसान का दिमाग अमर हो जाएगा!

यह काम न तो विज्ञान की काल्पनिक कथा की परिधि में आता है और न ही यह अति महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक कार्य है. ऐनली न्यूइट्ज न्यू साइंटिस्ट में प्रकाशित अपने लेख में बताती हैं कि ब्रेन अपलोड का विचार नया नहीं है. विलियम गिब्सन ने 5 साल पहले न्यूरोमैंसर नाम के उपन्यास में सायबरस्पेस में लोगों के खुद को अपलोड करने की बात लिखी थी. इससे तकरीबन 100 साल पहले 1923 में ई. वी. ऑडल ने द क्लॉकवर्क नाम का उपन्यास लिखा था. इसमें उन्होंने लोगों के वर्चुअल वर्ल्ड में रहने का वर्णन किया था. दिमाग के डिजिटल वर्जन में इधर वैज्ञानिकों और दार्शनिकों की रुचि भी बढ़ी है. इंसानी दिमाग को अपलोड करने को लेकर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं. ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के एंडर्स सैंडबर्ग और उनके साथी इस पर काम कर रहे हैं कि माइंड अपलोड का काम नैतिक तरीके से कैसे हो.
दिमाग को कंप्यूटर में अपलोड करने के लिए हमें दो चीजों की जानकारी होना जरूरी है. पहला, दिमाग की सॉफ्टवेयर प्रोसेसिंग और हार्डवेयर स्टोरेज के आंकड़े. दूसरा, दिमाग का विस्तृत नक्शा या मानचित्र. मानव मस्तिष्क में तकरीबन 1000 खरब कनैक्शन मौजूद होते हैं. यदि प्रत्येक कनैक्शन को एक लॉजिक ऑपरेशन माना जाए तो इस तरह मस्तिष्क में 1000 खरब बाइनरी ऑपरेशन अंजाम देने में सक्षम होता है.
वैज्ञानिकों द्वारा मानव मस्तिष्क की हार्डवेयर स्टोरेज क्षमता लगभग दस हजार-खरब जीबी (1015 GB) आंकी गई है. वर्तमान में हमारे सुपर कंप्यूटर 1016 बाइनरी ऑपरेशन प्रति सेकंड अंजाम देने में सक्षम हो चुके हैं. चूंकि माइक्रोचिप्स में ट्रान्जिस्टर की संख्या तकरीबन हर दो वर्ष में दुगुनी हो रही है और कंप्यूटर का आकार निरंतर छोटा होता जा रहा है इसलिए वैज्ञानिकों को यकीन है कि अगले कुछ सालों में हमारे पर्सनल कंप्यूटर भी मस्तिष्क को अपलोड करने के लिए जरूरी सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर क्षमताओं से लैस होंगे. समस्या वैसे भी स्टोरेज या प्रोसेसिंग की है ही नहीं, असल समस्या तो नक्शे की है.

दिमाग को अपलोड करने के लिए हमें दो तरह के नक्शों की जरूरत पड़ेगी- स्थान-संबंधी नक्शा और समय-संबंधी नक्शा. इसे इस तरह समझिए कि अगर हमारे मस्तिष्क की तुलना किसी शहर से की जाए तो हमें सिर्फ शहर की सड़कों का नक्शा नहीं बनाना है, बल्कि हमें यह भी जानकारियां चाहिए कि सड़क पर कितनी गाडियां हैं, कितने रफ्तार से चल रही हैं, कौन-सी गाड़ी कब और कहां टर्न ले रही है, वगैरह-वगैरह. इसी तरह सिर्फ न्यूरोन्स का चित्र खींचने से बात नहीं बनेगी. अगर हमें स्वबोध (Sense of self) से युक्त मानव चेतना (Consciousness) को अपलोड करना है तो हमें यह जानना जरूरी है कि विभिन्न हालातों में न्यूरोन्स किस क्रम में फायरिंग करते हैं. फिलहाल ह्यूमन कनेक्टोम नामक एक ऐसी ब्रेन अपलोडिंग विधि मौजूद है, जिसके लिए मस्तिष्क के मानचित्र की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. पिछले दिनों वैज्ञानिकों को बायोलोजिकल न्यूरोंस की तर्ज पर काम करने वाले आर्टिफ़िशियल न्यूरोन्स को निर्मित करने में सफलता हासिल हुई है. अगर इन सिंथेटिक न्यूरोन्स का कनैक्शन दिमाग से जोड़ दिया जाए तो मस्तिष्क के बायोलोजिकल न्यूरोन्स इन आर्टिफ़िशियल न्यूरोन्स को बिना किसी परेशानी के स्वीकार लेते हैं और मस्तिष्क सुचारु रूप से काम करता रहता है.

तो बेसिक आइडिया यह है कि आपको प्रयोगशाला में लिटाया जाएगा और आपके मस्तिष्क को कंप्यूटर से इंटरफ़ेस (जोड़) कर दिया जाएगा. आपके दिमाग से एक बायोलोजिकल न्यूरोन हटाया जाएगा और उसकी जगह पर कंप्यूटर में मौजूद सिंथेटिक न्यूरोन का कनैक्शन मस्तिष्क से जोड़ दिया जाएगा. फिर दूसरा न्यूरोन हटाया जाएगा और एक अन्य सिंथेटिक न्यूरोन को जोड़ा जाएगा. इसी क्रम में एक-एक करके, आपके मस्तिष्क के बायोलोजिकल न्यूरोन हटते जाएंगे और कंप्यूटर में मौजूद सिंथेटिक न्यूरोन उनकी जगह लेते जाएंगे. जैसे ही आखिरी न्यूरोन को रिप्लेस किया जाएगा, आप अपनी आंखे खोल सकेंगे और पाएंगे कि आपका जैविक शरीर मेज पर पड़ा है और आप खुद (आपकी चेतना) एक टीन के डिब्बे के अंदर मौजूद है.

वर्तमान में यूएस ब्रेन प्रौजेक्ट, ईयू ब्रेन प्रौजेक्ट लाखों न्यूरोन्स से दिमाग़ में होने वाली हरकतों को रिकॉर्ड कर इसके मॉडल तैयार कर रहे हैं. साल 2014 में वैज्ञानिकों ने सी. एलीगंस नामक एक गोलकृमि के मस्तिष्क में मौजूद 302 न्यूरोन्स तथा उनके कनैक्शन को कॉपी करके एक रोबोट में अपलोड कर दिया था. आपको जानकार आश्चर्य होगा कि रोबोट बिना किसी कमांड के अपनी इच्छा से इधर-उधर विचरण कर रहा था. वैज्ञानिकों के मुताबिक रोबोट पूरी तरह से सी. एलीगंस की तरह व्यवहार कर रहा था!


डिजिटल अमरता या ब्रेन अपलोड के क्षेत्र में हो रही वर्तमान प्रगति के आधार पर वैज्ञानिकों का आकलन है कि वर्ष 2045 तक हम इन्सानों की चेतना को रोबॉट्स के भीतर अपलोड करने में सक्षम होंगे, जिससे इंसान के मरने के बाद भी उसकी चेतना अमर रहेगी! वैज्ञानिक 2045 को डिजिटल सिंगुलैरिटी (Digital singularity) के युग का सूत्रपात मान रहे हैं. अमेरिकी अविष्कारक और उद्योगपति रे कुर्जवेल का भी दावा है कि वर्ष 2045 तक इंसान अपना मस्तिष्क मशीनों में अपलोड करने में सक्षम हो जाएगा.
(लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: October 3, 2020, 11:28 PM IST
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