रक्त संबंधों में शादी के आनुवंशिक खतरे

भारत में 11 प्रतिशत शादियां रक्त संबंधियों या करीबी रिश्तेदारों में होती हैं. भले ही शादियाँ पारंपरिक, व्यक्तिगत, धार्मिक और सामाजिक मामलें हों, लेकिन फिर भी हमें इस मुद्दे (रक्त संबंधों में विवाह के आनुवंशिक जोखिम) को पर्याप्त वैज्ञानिक व चिकित्सकीय निगाह से देखने और जागरूकता के साथ संबोधित करने की जरूरत है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 26, 2022, 3:46 pm IST
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रक्त संबंधों में शादी के आनुवंशिक खतरे
एनएफएचएस-5 के मुताबिक भारत में 11% शादियां रक्त संबंधियों या करीबी रिश्तेदारों में होती हैं.

2019 से 2021 के दरम्यान देश भर में व्यापक स्तर पर किए गए ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5’ (एनएफएचएस-5) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में 11 प्रतिशत शादियां रक्त संबंधियों या करीबी रिश्तेदारों में होती हैं. एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि सिर्फ मुस्लिमों में ही नहीं बड़ी संख्या में बौद्धों, हिंदुओं, ईसाइयों और अन्य धर्मों में भी रक्त संबंधों में विवाह (consanguineous marriage) का चलन है. हालांकि विवाह एक सामाजिक-धार्मिक संस्था है, लेकिन इस संदर्भ में चिकित्सकों, जीव विज्ञानियों और समाजशास्त्रियों के लिए चिंता की एक बड़ी वजह यह है कि कि कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अध्ययनों ने पुख्ते तौर पर यह साबित कर दिया है कि रक्त संबंधियों के बीच विवाह या कज़िन मैरिज नवजात शिशुओं में जन्मजात विकलांगता के जोखिम को दोगुना कर सकता है.


रक्त-संबंध या कॉन्सैन्ग्विनिटी (Consanguinity) लैटिन भाषा का एक शब्द है जो कॉन (साझा) + सैंन्ग्विन (रक्त) से मिलकर बना है, जिसका इस्तेमाल उन समूहों या जोड़ों के लिए किया जाता है जिनके कम से कम एक पूर्वज साझे या कॉमन होते हैं. कॉन्सैन्ग्विनियस मैरिज (रक्त संबंध विवाह) का मतलब है, ऐसे दो लोगों के बीच शादी, जिनके पूर्वज साझे अथवा कॉमन हों. यह एक तरह का अंत: प्रजनन या इन्ब्रीडिंग है.


मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि विवाह एक ऐसा सामाजिक-धार्मिक अनुबंध है जिसका मुख्य उद्देश्य आनुवंशिक उत्पाद (genetic products) अर्थात परिवार बनाना होता है. परिवार के पास तमाम तरह के रीति-रिवाज, विश्वास, आस्था, पूर्वाग्रह, संपत्ति, निष्ठाएँ और मिथक होते हैं. इन्हीं के द्वारा यह तय होता है कि किसका किससे विवाह होगा. इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्यों प्राचीन मिस्र के शासक वर्ग (फैरो) भाई-बहन की शादी करते थे. हरियाणा के खाप तंत्रों को ही लीजिए क्यों वे लोग अपनी जाति के बाहर शादी करने वाले जोड़ों को मार डालते हैं. कई जगहों पर ऐसा है कि अगर कोई अपने समुदाय के बाहर किसी से शादी करेगा तो उसे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ेगा.


दुनिया भर के कई संस्कृतियों में सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर रक्त संबंधों में शादी का समर्थन किया जाता है और कुल शादियों में से तकरीबन 25 से 30 फीसदी शादियाँ ऐसी ही होती हैं. एनएफएचएस-5 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में भी 11 फीसदी शादियां रक्त संबंधियों के बीच होती हैं. लगभग दो-तीन दशक से वैज्ञानिक खून के रिश्ते और शादी के बीच स्वास्थ्य संबंधी खतरों पर शोध कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हुआ है कि इस तरह की शादी से जन्में बच्चे को एक से ज्यादा जन्मजात जेनेटिक डिसऑर्डर्स (आनुवंशिक विकारों) का सामना करना पड़ सकता है.


रक्त संबंधों में शादी से जन्में बच्चों में अप्रबल जीन (recessive gene) के वंशावली या वंश-परंपरा में आ जाने की घोर संभावना की वजह से मृत्यु दर, बीमारी (morbidity) और जन्मजात आनुवंशिक विकारों का जोखिम काफी बढ़ जाता है. करीबी रिश्तेदारों में शादी की वजह से पुनरावर्ती या हानिकारक लक्षणों में बढ़ोत्तरी के कारण लोगों का स्वास्थ्य (fitness) खराब होता है, जिसे ‘इन्ब्रीडिंग डिप्रेशन’ के नाम से जाना जाता है.


सजीवों में सूचना की बुनियादी इकाई जीन होती है. जीन इस लिहाज से स्वार्थी होते हैं कि उनका एकमात्र उद्देश्य होता है स्वयं की ज्यादा से ज्यादा प्रतिलिपियों को अगली पीढ़ी में पहुंचाना. इसलिए जीन माता-पिता और पूर्वजों के गुण और रूप-रंग संतान में पहुंचाते हैं. कह सकते हैं कि काफी हद तक हम वैसा ही दिखते हैं या वही करते हैं, जो हमारे शरीर में छिपे सूक्ष्म जीन तय करते हैं. हमारे भीतर मौजूद ज़्यादातर जीन या तो लाभदायक होते हैं या फिर निष्क्रिय.


हमारे शरीर में स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले जीन भी होते है. ये जीन अप्रबल (recessive) होते हैं, जो केवल तभी सक्रिय होते हैं जब किसी समान अप्रबल जीन के साथ मिलकर काम करते हैं. सक्रिय या प्रबल (dominant) एलिल (allele) की मौजूदगी में किसी एलिल का अप्रबल रूप अभिव्यक्त नहीं हो सकता. दरअसल एलिल जीन के वैकल्पिक रूपों की एक जोड़ी होती है जो एक विशेष गुणसूत्र पर एक ही निश्चित बिंदु पर काबिज हो सकता है और उसी के लक्षणों को नियंत्रित करता है.


रक्त संबंधियों में विवाह करने पर समस्या तब पैदा होती है जब दो लोगों (पति-पत्नी) में कोई एक किसी आनुवंशिक रोग के जीन का वाहक होता है. जब आपकी शादी समुदाय में ही किसी ऐसे व्यक्ति से होती है, जो इसी तरह के दोष से पीड़ित है तब संतान (बच्चे) को इस तरह के जीन की दो प्रतिलिपियाँ विरासत में मिलती हैं. ऐसी स्थिति में संतान में आनुवंशिक रोग होने का जोखिम बढ़ जाता है. इस तरह की शादी से जन्मे बच्चे आमतौर पर अंधेपन, बांझपन (सिस्टिक फाइब्रोसिस), ब्लड कैंसर, बहरापन, थैलेसीमिया, हृदय, स्नायु (Muscle) और श्वास संबंधी विकारों आदि से पीड़ित पाए जा सकते हैं.


1994 में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक रक्त संबंधियों के बीच विवाह से जन्मे नवजात शिशुओं की मृत्यु दर लगभग 4.4 फीसदी ज्यादा होती है. जर्नल ऑफ जेनेटिक काउंसिल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार रक्त संबंधियों के बीच विवाह नवजात शिशुओं में जन्मजात विकलांगता के जोखिम को 1 से 2 फीसदी तक बढ़ा देता है.


मेडिकल जर्नल दी लैंसेट में 4 जुलाई 2013 को प्रकाशित एक शोधपत्र के मुताबिक रक्त संबंधियों के बीच विवाह से जन्मे तकरीबन ग्यारह हजार बच्चों का विस्तृत अध्ययन करने पर पाया गया कि 386 बच्चे जन्मजात विकृतियों से पीड़ित थे. यह आंकड़ा रक्त संबंधियों के बीच विवाह से इतर विवाहों से जन्मे बच्चों में 1.6 फीसदी है और रक्त संबंधों के संदर्भ में 3 फीसदी है. ऐसा ही एक अध्ययन दक्षिण भारत में भी रक्त संबंधियों के बीच विवाह से जन्मे 400 बच्चों पर किया गया था, जिनमें से 63 बच्चों में 35 प्रकार के आनुवंशिक विकार पाए गए थे.


अक्सर ऐसा दावा किया जाता है कि हिंदुओं में गोत्र परंपरा को आनुवंशिक दूरी बनाए रखने के लिए निर्मित गया था. गोत्र परंपरा के अनुसार एकसमान गोत्र के स्त्री और पुरुष के बीच शादी नहीं हो सकती है, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि हिंदुओं में ज़्यादातर शादियाँ जाति की सीमाओं में बंधी होती हैं जो अपने आप में अंतर्विवाह (endogamy) है और इसके अपने आनुवंशिक खतरे हैं. लब्बोलुआब यह है कि किसी भी जनसंख्या में आनुवंशिक विविधता महत्वपूर्ण है और रक्त संबंध विवाह व अंतर्विवाह इसे कमजोर करते हैं.


प्रसिद्ध जैवभौतिक विज्ञानी डॉ. दोरैराजन बालासुब्रमण्यम रक्त संबंधों में शादी के संदर्भ में ‘द हिंदू’ में प्रकाशित अपने लेख ‘द बायोलॉजी ऑफ फ़र्स्ट कज़िन मैरिज’ में लिखते हैं – “जब विकास के क्रम में लैंगिक प्रजनन (sexual reproduction) की शुरुआत हुई, तो विविधता उभरने लगी. संक्षेप में, प्यार-वार की बात छोड़ दें, तो संभोग का अर्थ है – जीनों का मिश्रण. जब नए जीन जुड़ते हैं, तो नए गुणधर्म अर्जित हो जाते हैं. इस विविधता ने ही जीवों को नई-नई क्षमताएं दी हैं. इस तरह जीव विज्ञान की निगाह से देखें तो संतान को ज्यादा और स्वस्थ जीन मिलना चाहिए. इसका अर्थ यह है कि आप पर कोई पाबंदी नहीं होना चाहिए कि आप किससे संभोग करते हैं. जीव विज्ञान तो कहेगा कि जाओ और बच्चे पैदा करो. जीवन का रस विविधता में है.”


बहरहाल भले ही शादियाँ पारंपरिक, व्यक्तिगत, धार्मिक और सामाजिक मामलें हों, लेकिन फिर भी हमें इस मुद्दे (रक्त संबंधों में विवाह के आनुवंशिक जोखिम) को पर्याप्त वैज्ञानिक व चिकित्सकीय निगाह से देखने और जागरूकता के साथ संबोधित करने की जरूरत है. अस्तु!

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: May 26, 2022, 3:46 pm IST
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