कोपरनिकस का सूर्य केंद्रित ब्रह्मांड

अरस्तू-टॉलेमी के पृथ्वी केंद्रित ब्रह्मांड व्यवस्था को चुनौती देने का साहस किया 16वीं शताब्दी के खगोलविज्ञानी निकोलस कोपरनिकस ने। कोपरनिकस द्वारा एक आसान सूर्यकेंद्री मॉडल प्रस्तुत किया गया जिसमे यह बताया गया था कि पृथ्वी व अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 2, 2020, 11:15 AM IST
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कोपरनिकस का सूर्य केंद्रित ब्रह्मांड
(प्रतीकात्मक तस्वीर)
अरस्तू-टॉलेमी का भूकेंद्री मॉडल अत्यधिक जटिल होने के साथ-साथ ब्रह्मांड का सही चित्रण करने में असमर्थ सिद्ध हो रहा था, जिससे खगोलविज्ञानियों में निराशा फैलने लगी मगर धार्मिक रूप से ईसाई चर्च ने भूकेंद्री मॉडल को स्वीकृति दे दी थी क्योंकि ब्रह्मांड का यह मॉडल बाइबिल के उत्पत्ति अध्याय के अनुरूप था। चूँकि तत्कालीन यूरोप में चर्च और बाइबिल द्वारा प्रसारित ज्ञान और अरस्तू की मान्यताओं के अनुसार ही सत्य और असत्य का निर्धारण होता था, इसी कारण विज्ञान की उन्नति रुक-सी गयी थी। इसलिए वैज्ञानिक रूप से अनेक खामियों के बावजूद अरस्तू-टॉलेमी के मॉडल को चुनौती देने का साहस कोई नहीं कर सका था।

अरस्तू-टॉलेमी के पृथ्वी केंद्रित ब्रह्मांड व्यवस्था को चुनौती देने का साहस किया 16वीं शताब्दी के खगोलविज्ञानी निकोलस कोपरनिकस ने। कोपरनिकस द्वारा एक आसान सूर्यकेंद्री मॉडल प्रस्तुत किया गया जिसमे यह बताया गया था कि पृथ्वी व अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं। कोपरनिकस के इस मॉडल से खगोलविज्ञान में क्रांति आ गई। हालाँकि सूर्यकेंद्री मॉडल प्रस्तुत करनेवाले कोपरनिकस पहले व्यक्ति नहीं थे; उनसे लगभग ग्यारह सौ वर्ष पहले समोसवासी यूनानी खगोलविज्ञानी अरिस्टारकस इस बारे में अपने विचार रख चुके थें। मगर कोपरनिकस ने अरिस्टारकस की भांति केवल विचारों का ही प्रतिपादन नहीं किया बल्कि उन्होंने गणितीय गणनाएं भी करके अपने मॉडल की जाँच-पड़ताल की। उन्होंने खगोलीय अवलोकनों द्वारा यह भी जानने का प्रयास किया कि क्या उनका सिद्धांत सही और यथार्थ भविष्यवाणी करता है या नहीं।

निकोलस कोपरनिकस का जन्म 19 फरवरी, 1473 को थोर्न, पोलैंड में हुआ था। कोपरनिकस जब 10 वर्ष के तभी उनके माता और पिता दोनों की मृत्यु हो गई। उनके लालन-पोषण की जिम्मेदारी मामा पादरी ल्यूकस वाटजेंरोद ने संभाल ली, सम्भवतः यह उन्हीं का प्रभाव था कि बालक कोपरनिकस ने धर्म प्रचारक बनने का निर्णय किया। 18 वर्ष की उम्र उन्होंने क्रकाओ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा वहां से लैटिन, दर्शन, कानून, ज्यामिति, खगोलविज्ञान और भूगोल का आरंभिक ज्ञान प्राप्त किया। 30 वर्ष की उम्र में चिकित्सा की पढ़ाई के लिए वे पदुआ विश्वविद्यालय गए। इससे पहले वे इटली में धर्मशास्त्र तथा चर्च के कानूनों का अध्ययन कर चुके थे।

वर्ष 1499 में कोपरनिकस ने रोम विश्वविद्यालय में खगोलशास्त्र के अध्यापक के रूप मे कार्य प्रारंभ किया। हालाँकि वहाँ उन्होंने ब्रह्मांड की व्याख्या का पारम्परिक अरस्तू-टॉलेमी मॉडल ही पढ़ाया, मगर वे पृथ्वी केंद्रित ब्रह्मांड की धारणा से कभी भी पूर्णतया सहमत नहीं हुए। इससे संबंधित एक दंतकथा प्रचलित है। कहा जाता है कि 1502 में जब कोपरनिकस ने ब्रह्मांड विषयक व्याख्यान देते समय कहा, ‘‘पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र है। सूर्य, चन्द्रमा और ग्रह पृथ्वी के चारों ओर वृत्ताकार कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं। सबसे दूर के खगोल में अचर तारे जड़े हुए हैं। ये ही आधरभूत सत्य हैं, जिसके बारे में महान खगोलविज्ञानी टॉलेमी 1500 वर्ष पहले कह चुके हैं तथा ये इंद्रियों के लिए प्रत्यक्ष हैं।’’
तभी अचानक एक विद्यार्थी ने प्रश्न पूछने के लिए हाथ खड़ा किया। उस नवयुवक ने कहा,  ‘प्रोफेसर कोपरनिकस, क्या प्राचीन दार्शनिक पाइथागोरस ने इस बात का खंडन नहीं किया था कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है बल्कि कोई केंद्रीय अग्निपुंज है जिसकी परिक्रमा पृथ्वी करती है। तो बताइए महान टॉलेमी का मत कहाँ तक सही है?’ कोपरनिकस ने पृथ्वी केंद्रित मॉडल का समर्थन करते हुए टॉलेमी का बचाव करने के प्रयास किये। मगर इस घटना से उन्हें यह आभास हुआ कि कहीं उनकी और बाकी प्रोफेसरों की धारणा गलत तो नहीं है क्योंकि टॉलेमी का मॉडल कई खगोलीय घटनाओं की व्याख्या करने में असमर्थ था। आगे तीन वर्षों तक अध्यापन कार्य करने के पश्चात उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। विद्वानों का मानना है कि उनके इस्तीफा देने का प्रमुख कारण अरस्तू-टॉलेमी मॉडल के प्रति उनका अविश्वास था।

पोलैंड लौटकर कोपरनिकस फ्राएन्बर्ग के चर्च में पादरी नियुक्त हुए तथा साथ में उन्होंने चिकित्सक के रूप में भी अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। मगर वे अपना अधिकांश समय खगोलीय अध्ययन-अवलोकन के लिए ही देते थे, जिससे वे अरस्तू-टॉलेमी मॉडल की सत्यता की जांच कर सके। कोपरनिकस के समय में दूरबीन की खोज नहीं हुई थी। इसलिए दूरबीन के आविष्कार से पहले आकाशीय पिंडों के अध्ययन-अवलोकन के लिए हमारे पास एक ही साधन थी - हमारी आँखे। कोपरनिकस ने अपनी आँखों और सरल खगोलीय यंत्रों का उपयोग करते हुए महत्वपूर्ण खगोलीय आंकड़े प्राप्त किए। उन्होंने अपना सारा अनुसंधान चुपचाप और अकेले ही किया। जैसे-जैसे वे अपने अनुसंधान कार्य को आगे बढ़ाते गए, वैसे-वैसे सूर्यकेंद्री सिद्धांत में उन्हें अनेक विसंगतिया नज़र आने लगीं। ग्रहों की गतियों की सही व्याख्या न कर पाने तथा अधिचक्रों और डेफरेंट जैसी बोझिल धारणाओं के कारण अरस्तू-टॉलेमी का मॉडल बहुत अधिक जटिल हो गया था। वर्ष 1503 में कोपरनिकस के सामने एक बड़ी समस्या थी- सौर कैलेंडर और जूलियन कैलेंडर के वर्षों में 10 दिनों का अंतर! जिसके कारण से मुख्य ग्रहों की होने वाली युति के बारे में जो संभावना व्यक्त की गई थी वह निर्धारित तिथि के 10 दिनों के बाद घटित हुई। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए कोपरनिकस ने एक नए सरल मॉडल पर विचार करना शुरू कर दिया, जिससे प्रेक्षित तथ्यों को भलीभांति समझाया जा सके।

अनेक वर्षों के अध्ययन-अवलोकन के बाद कोपरनिकस ने यह धारणा बना ली कि अरस्तू-टॉलेमी का मॉडल ब्रह्मांड की संरचनात्मक व्याख्या करने में असमर्थ है। उन्होंने एक आसान मॉडल प्रस्तुत किया जिसके अनुसार पृथ्वी व अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं। कोपरनिकस ने पृथ्वी केंद्रित मॉडल को अपने सूर्य केंद्रित मॉडल से प्रतिस्थापित कर दिया! अपने सिद्धांत के समर्थन में उनके पास पर्याप्त प्रमाण और खगोलीय आंकड़े होने के बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांत को सार्वजनिक रूप से प्रचारित नहीं किया। दरअसल अरस्तू-टॉलेमी के मॉडल को बाइबिल सम्मत और ईसाई चर्च द्वारा ब्रह्मांड की सर्वोत्कृष्ट तस्वीर स्वीकार कर लेने के कारण कोपरनिकस अपने सिद्धांत को सार्वजनिक करने से हिचकिचा रहे थे। वे चर्च और धर्माधिकारियों से टक्कर नहीं लेना चाहते थे, वे एक शांतिप्रिय व्यक्ति थे। उन्होंने अपने सिद्धांत को गुमनाम तरीके से मित्रों और संबंधियों में प्रचारित-प्रसारित किया।किसी तरह से एक जर्मन युवक रैटिकस को कोपरनिकस के सिद्धांत के बारे में पता चला। वह कोपरनिकस के खोजों से अत्यधिक प्रभावित था, उसने कोपरनिकस को अपने सिद्धांत को सार्वजनिक करने के लिए मना लिया। कोपरनिकस का क्रांतिकारी सिद्धांत उनकी महान कृति ‘ऑन द रिवोल्यूशंस ऑफ द सेलेस्टियल स्फियर्स’ में प्रकाशित हुई। इस ग्रंथ की पहली मुद्रित प्रति कोपरनिकस को 24 मई, 1543 को प्राप्त हुई, इसी दिन उनकी मृत्यु भी हुई थी।

कोपरनिकस के सूर्यकेंद्री मॉडल की निम्न मान्यताएं थीं-

- ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी नहीं बल्कि सूर्य है। पृथ्वी सहित सभी खगोलीय पिंड सूर्य के चारों ओर वृत्ताकर पथ में परिक्रमा करते हैं। इसलिए पृथ्वी ब्रह्मांड की केंद्र नहीं है, बल्कि वह केवल चन्द्रमा की कक्षा का केंद्र है।

- पृथ्वी स्थिर नहीं है, वह सूर्य की परिक्रमा करने के साथ-साथ अपने अक्ष को भी बदलता रहता है। इसलिए आकाश में हम जो भी गतियां (सूर्य और ग्रहों की) देखते हैं वह दरअसल पृथ्वी की निजी गति के कारण होती है।

कोपरनिकस ने अपने सूर्यकेंद्री मॉडल द्वारा सदियों पुराने भूकेंद्री मॉडल का खंडन कर दिया। था। हालाँकि यह देखने के लिए कोपरनिकस जीवित नहीं रहे थे कि उनके सिद्धांत के प्रति चर्च की क्या प्रतिक्रिया रही। जैसाकि हम जानते हैं कि अरस्तू-टॉलेमी मॉडल को धार्मिक रूप से भी अपना लिया गया था, इसलिए चर्च ने शीघ्र ही कोपरनिकस के सिद्धांत को प्रचारित तथा प्रसारित करने पर रोक लगा दिया। चर्च के साथ-साथ महान धर्म सुधारक मार्टिन लूथर ने भी सूर्य को केंद्र मानने का विरोध किया, उन्होनें कोपरनिकस पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि, “यह बेवकूफ आदमी समूचे खगोलविज्ञान को उलट देना चाहता है। परंतु पवित्र धर्मग्रंथ से हमें यह पता चलता है कि जोशुआ ने पृथ्वी को स्थिर रहने का आदेश दिया, न कि सूर्य को।”

ऐसा भी नहीं था कि पूरा यूरोप धर्म का अंधभक्त था, कुछ विचारक कोपरनिकस के मॉडल के समर्थक भी थे। इन्हीं समर्थकों में से एक रोमन प्रचारक ज्योदार्न ब्रूनो भी थे। ब्रूनो ने कोपरनिकस से भी एक कदम और आगे जाकर यह बताया कि पृथ्वी ही नहीं, सूर्य भी अपने अक्ष पर घूमता है तथा सूर्य एक सामान्य तारा है और ब्रह्मांड में अनगिनत तारे हैं। उन्होंने यहाँ तक कहा कि आकाश अनंत है, तथा हमारे सौरमंडल की तरह अनेक और भी सौरमंडल इस ब्रह्मांड में अस्तित्वमान हैं। ब्रूनो बड़े निर्भीक और क्रांतिकारी विचार वाले व्यक्ति थे। उनको अपने विचारों के कारण काफी विरोध का सामना करना पड़ा। वास्तव में, वे अपने समय से बहुत आगे थे। प्रसिद्ध भारतीय खगोलविज्ञानी जयंत नार्लीकर के अनुसार, ‘विज्ञान का समाजशास्त्र हमें यह सिखाता है कि अपने समकालीनों से थोड़ा आगे रहना श्रेय और सम्मान कारण बनता है, मगर उनसे बहुत ज्यादा आगे रहना श्रेय और सम्मान से वंचित रहने का कारण भी बनता है। उन्हें अपने समकालीनों के उपहास का पात्र बनना पड़ता है।’ यही आर्यभट, कोपरनिकस और ब्रूनों के साथ भी हुआ। ब्रूनो ने अपने विचारों का जोर-शोर के साथ सम्पूर्ण रोम में प्रचार-प्रसार किया। ब्रूनो के विचार धर्म विरुद्ध थे, इसलिए उन्हें जीवन भर चर्च की कठोर यातनाएँ सहते रहना पड़ा। ब्रूनो ने अपने जीवन के लगभग 8 वर्ष जेल में बिताए, मगर उन्होंने कभी भी अपने विचारों के साथ समझौता नहीं किया। उन्हें न हारता देखकर आख़िरकार रोमन धर्म न्यायाधिकरण ने उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई। 17 फरवरी, 1600 को धार्मिक कट्टरपंथियों ने ब्रूनो को खूंटे से बांधकर जिंदा जला दिया गया! सम्भवत: कोपरनिकस को चर्च की इसी प्रतिक्रिया की आशंका थी, इसी कारण उन्होंने अपने सिद्धांत को उस समय सार्वजनिक किया जब वे मृत्युशैया पर थे।

कोपरनिकस को आधुनिक खगोलविज्ञान का जनक माना जाता है। जर्मन कवि वोल्फगांग गेटे के अनुसार, “कोपरनिकस के सिद्धांत ने मानव-चिंतन को जितना प्रभावित किया है, उतना किसी भी अन्य आविष्कार या विचार ने नहीं किया। बड़ी मुश्किल से जब यह पता चला  था कि पृथ्वी गोल और स्वयं में परिपूर्ण हैं, तब कहा गया कि इसके ब्रह्मांड के केंद्र में होने के विशिष्ट अधिकार को तिलांजलि दे दो। मानव जाति के सामने इतनी बड़ी मांग संभवत: पहले कभी पेश नहीं की गई थी। इसे स्वीकार कर लेने से बहुत सारी बातें धुंध और धुएँ में विलीन हो गई हैं!” कोपरनिकस और ब्रूनो ने खगोलविज्ञान के लिए जो राह बनाई, उसी परम्परा में आगे चलकर टाइको ब्राहे, जोहांस केप्लर, गैलीलियो गैलिली और सर आइजक न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक हुए, इन सभी ने अपने तर्कसंगत चिंतन, प्रयोगों और अवलोकनों द्वारा खगोलविज्ञान को उत्कर्ष पर पहुंचा दिया।

(यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं. यह लेख 'विज्ञान और मानव संस्कृति में ब्रह्मांड' सीरीज का हिस्सा है और यह पहला लेख है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: July 2, 2020, 11:15 AM IST
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