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    पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्र के लिए वरदान बना कोरोना

    इस महामारी ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि संकट की घड़ी में सारी दुनिया एक साथ खड़ी होकर एक-दूसरे का साथ देने के लिए तैयार है. तो फिर क्या यही जज़्बा, जोश और इच्छा शक्ति हम पर्यावरण बचाने के लिए ज़ाहिर नहीं कर सकते?

    Source: News18Hindi Last updated on: April 18, 2020, 3:23 PM IST
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    पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्र के लिए वरदान बना कोरोना
    (News18 क्रिएटिव)
    वर्तमान में देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया कोरोना वायरस नामक एक ऐसे दुष्चक्र में फंसी है जिससे निकलने के लिए असाधारण कदमों और उपायों की जरूरत है. जहाँ एक ओर कोरोना वायरस (कोविड-19) की वजह से मानव जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त एवं प्रभावित हुआ है, वही दूसरी तरफ यह प्रकृति के लिए किसी वरदान से कम नही है. हम सिर्फ सिक्के के एक पहलू के आधार पर कोरोना वायरस को महामारी मान रहे हैं, परंतु अगर दूसरे पहलू को देखा जाए तो यह पारिस्थितिकी तंत्र, प्रकृति एवं पर्यावरण के लिए तो वरदान सिद्ध हो रहा है. पूरी दुनिया जिस पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा और चिंता की खातिर बड़ी-बड़ी संगोष्ठियाँ और कार्य योजनाएं बनाती रही, वैश्विक चिन्तन होता रहा, अरबों रुपये भी खर्च हो चुके हैं पर फिर भी कुछ खास नतीजा नहीं निकला, वहीं यह काम एक अदने-से वायरस की बदौलत हुए विश्वव्यापी लॉकडाउन ने कर दिखाया. इंसानियत पर भारी कोरोना ने बड़ी सीख और ज्ञान भी दिया. अब भी समय है चेतने और जाग उठने का वरना देर हुई और प्रकृति ने कहीं और भी तेवर दिखाए तो क्या गत होगी, यह नन्हें विषाणु कोरोना ने जता दिया है.

    प्रकृति ने हम इंसानों को जीवन-यापन के लिए एक से बढ़कर एक संसाधन दिए, मगर अपने लालच एवं स्वार्थ के चलते इंसान सबकुछ से निर्वासित हो गया और हालात ऐसे बन गए है कि उसे अपने-अपने घरों में बंद होकर जीना पड़ रहा है. कोरोना धीरे-धीरे भयानक रूप लेता जा रहा है. और इसके चलते मानवीय क्रियाएं ठप्प पड़ चुकी है और इसका प्रत्यक्ष लाभ प्रकृति को मिल रहा है. वातावरण स्वच्छ और निर्मल हो गया है, पानी, नदियाँ, हवा, जंगल, भूमि एवं पूरा पर्यावरण खिलखिला रहा है. हवा शुद्ध होने से आसमान भी साफ हो गया है. पक्षियों का कलरव दुबारा गूंजने लगा है। सड़कें प्रदूषण रहित हैं. न वाहनों से निकलनेवाले धुएं हैं और नहीं उनके हॉर्न. कोरोना वायरस के चलते अमेरिका और यूरोप सहित विश्व के ज़्यादातर देशों में लॉकडाउन है. सड़कों पर गाड़ियों के नहीं चलने से सुखद व सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहा है. पर्यावरण को दमघोंटू प्रदूषण से राहत मिली है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से यह पहला मौका है जब पृथ्वी से जहरीली गैसों का उत्पादन बेहद कम हो रहा है. जालंधर से हिमालय पर्वत की श्र्ंखला दिखाई पड़ने लगी है. मुंबई के समुद्री तट पर लाखों की संख्या में कछुओं सहित कई अन्य जलचर मजे करते हुए दिखे हैं. अब बिना दूरबीन के ही कोरी आँखों से ही दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों से सप्तऋषि मण्डल, ध्रुव तारे, बुध और अन्य ग्रहों-तारों, आकाशीय पिंडों को निहारा जा सकता है.

    आजकल आकाश भी नीला दिखने लगा है, क्योंकि प्रदूषण की वजह से ओज़ोन परत का संतुलन बिगड़ गया था, उसमें अब सुधार हो रहा है.  यह जगजाहिर है कि किस प्रकार से चीन पर्यावरण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन करते हुए अपने उद्योग-धंधों में ओज़ोन परत के लिए घातक गैसों का व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल करता रहा है. पृथ्वी पर जीवन के लिए ओज़ोन परत का बहुत महत्व है. पृथ्वी के धरातल से लगभग 25-30 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमण्डल के समताप मंडल क्षेत्र में ओज़ोन गैस का एक पतला-सा आवरण है. यह आवरण पृथ्वी के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है. ओज़ोन परत सूरज से आने वाली जीव जगत के लिए बेहद घातक पराबैंगनी किरणों (अल्ट्रा वॉयलेट वेव्स) को पृथ्वी पर आने से रोकती है. अगर पृथ्वी के चारों ओर ओज़ोन रूपी यह सुरक्षा छतरी नहीं होती तो शायद अन्य ग्रहों की तरह पृथ्वी भी जीव-विहीन होती! साल 1974 में कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के मारियो मोलिना और शेरवुड रोलैण्ड ने पहली बार यह पता लगाया कि सीएफसी ओज़ोन परत को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है क्योंकि इसमें मौजूद क्लोरीन के अणु ओज़ोन के लाखों अणुओं को नष्ट कर देने में सक्षम हैं. बाद में ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली अन्य रासायनिक पदार्थों के बारे में पता चला जिनमें हेलान, कार्बन टेट्राक्लोराइड, मिथाइल क्लोरोफॉर्म, फ्रीयान प्रमुख हैं. हालांकि प्रारंभ में इस बात को न तो वैज्ञानिकों ने गंभीरता से लिया और न ही राजनेताओं और औद्योगिक घरानों ने!  साल 1985 में जब वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव (अंटार्कटिका) के ऊपर ओज़ोन की परत में एक विशालकाय सुराख (ओज़ोन होल) देखा जो साल-दर-साल बड़ा होता जा रहा था, तब कहीं जाकर हमें अपने ऊपर मँडराते इस बड़े खतरे का एहसास हुआ. अभी औद्योगिक गतिविधियों के बंद होने की वजह से ओज़ोन परत में थोड़ा-थोड़ा सुधार हो रहा है.

    लॉकडाउन की बदौलत हमारी पृथ्वी में पहले से बहुत कम कंपन हो रहा हैं इन दिनों हमारी पृथ्वी पहले से कहीं अधिक स्थिर हो गई हैं. भूवै‍ज्ञानिकों के मुताबिक अब पृथ्वी उतनी नहीं कांप रही जितनी लॉकडाउन से पहले कांपती थी. ये भूवैज्ञानिक दृष्टि से एक बड़ा अवसर है. ऐसा परिवर्तन इसलिए हुआ है क्योंकि विश्वव्यापी लॉकडान के दौरान पृथ्वी पर 24 घंटे होने वाली गतिविधियां बंद पड़ी हैं. पूरी दुनिया इस समय ठहरी हुई है. भूकंप वैज्ञानिकों की कहना है कि इस समय दुनिया भर में कम हुए ध्वनि प्रदूषण के चलते वे बहुत छोटे-छोटे भूकंप को भी मापने में सफल सिद्ध हो रहे हैं, जबकि इससे पहले ये भी बड़ी कठिनाई से संभव हो पाता था. पृथ्वी का कंपन कम होने के कारण वैज्ञानिकों को पृथ्वी की सतह पर होने वाली प्राकृतिक गतिविधियों का बेहतर अध्ययन करने का ये सुनहरा अवसर है इसके दौरान भूवैज्ञानिक ज्वालामुखी के व्यवहार की भविष्यवाणी करने और भूकंप के उपकेंद्र के स्थान को त्रिभुजित करने के लिए जिम्मेदार समुद्र की लहरों के प्रभाव का उपयोग करने वालों सहित अन्‍य शोध-अनुसंधान सरलता से कर सकेंगे.
    विश्वव्यापी लॉकडाउन के कारण कार्बन उत्सर्जन रुक गया है. अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर की ही बात करें तो पिछले साल की तुलना में इस साल वहां प्रदूषण 50 प्रतिशत कम हो गया है. इसी तरह चीन में भी कार्बन उत्सर्जन में 25 प्रतिशत की कमी आई है. चीन के 6 बड़े पावर हाउस में 2019 के अंतिम महीनों से ही कोयले के उपयोग में 40 प्रतिशत की कमी आई है. पिछले साल इन्हीं दिनों की तुलना में चीन के 337 शहरों की हवा की गुणवत्ता में 11.4 फ़ीसद का सुधार हुआ. दुनिया भर में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से पहली बार कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में 5 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की जा सकती है. टाइम्स ऑफ इंडिया में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अर्थ सिस्टम साइंस के प्रोफेसर जैक्सन के हवाले से कहा गया है कि कोरोना संकट के बीच यह एक सुखद खबर है. ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के चेयरपर्सन रॉब जैक्सन के अनुसार वर्ष 2008 में आर्थिक मंदी के समय कार्बन उत्सर्जन में 1.4 प्रतिशत की कमी आई थी. विशेषज्ञों के अनुसार एक फरवरी से 19 मार्च 2020 के बीच पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में उद्योगों से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन में 10 मिलियन टन यानी एक करोड़ टन की कमी दर्ज की गई है.

    इस महामारी ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि संकट की घड़ी में सारी दुनिया एक साथ खड़ी होकर एक-दूसरे का साथ देने के लिए तैयार है. तो फिर क्या यही जज़्बा, जोश और इच्छा शक्ति हम पर्यावरण बचाने के लिए ज़ाहिर नहीं कर सकते? हमें विश्वास है इस समय का अंधकार हम स्वच्छ और हरे-भरे वातारण से मिटा देंगे. आज जब हम घरों में बैठे हैं तो हमारे पास सलीके से सोच-विचार, चिंतन करने का पर्याप्त समय है. हमें भावी पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्रीय खतरों से निपटने के लिए, आज यह उपयुक्त समय है जब हमें प्रकृति के लिए कुछ करने की जरूरत है, नही तो हमें इसके खतरनाक परिणाम जरूर देखने को मिलेंगे.

    (लेखक साइंस ब्लॉगर एवं विज्ञान संचारक हैं)
    ब्लॉगर के बारे में
    प्रदीप

    प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

    उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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    First published: April 18, 2020, 3:23 PM IST
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