जन्मदिन विशेष: आधुनिक गणित के वास्तुकार डेविड हिल्बर्ट

David Hilbert Birthday Special: हम ‘आर्किटेक्ट ऑफ मॉडर्न मैथमेटिक्स’ के नाम से मशहूर जर्मन गणितज्ञ डेविड हिल्बर्ट को उनके जन्मदिन पर याद कर रहे हैं. हिल्बर्ट गणितीय अनुसंधानों के साथ-साथ अपने भुलक्कड़पन के लिए भी प्रसिद्ध थे. यहां तक कि एक बार उन्‍होंंने एक थ्‍योरी को सुन कर उसकी तारीफ की और उसके प्रणेता का नाम जानना चाहा तो उत्‍तर सुनकर खुद अचरज में पड़ गए. इस दिलचस्‍प किस्‍से के साथ जर्मन गणितज्ञ डेविड हिल्बर्ट के योगदान को जानते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: January 23, 2023, 12:23 pm IST
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जन्मदिन विशेष: आधुनिक गणित के वास्तुकार डेविड हिल्बर्ट
‘गोर्डान प्रॉब्लम’ के जन्मदाता पॉल गोर्डान ने हिल्बर्ट से प्रभावित हो कर कहा था कि, ‘यह गणित नहीं है, यह तो धर्मशास्त्र है!’

आज 23 जनवरी ‘आर्किटेक्ट ऑफ मॉडर्न मैथमेटिक्स’ के नाम से मशहूर जर्मन गणितज्ञ डेविड हिल्बर्ट का जन्मदिन है. हिल्बर्ट को आमतौर पर 19 वीं और 20 वीं सदी का सबसे प्रभावशाली गणितज्ञ माना जाता है. आज भी, आधुनिक गणित और भौतिकी पर उनके काम और उनकी अंतर्दृष्टि के व्यापक प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. हिल्बर्ट एक बेहतरीन अध्यापक थे और उन्होंने गोटिंगटन यूनिवर्सिटी में रहते हुए 19 वीं सदी की सकारात्मक रीतियों को बरक़रार रखा तथा यूनिवर्सिटी को गणितीय शोध के प्रमुख केंद्र के रूप में तब्दील कर दिया.


उनके नाम से कई गणितीय शब्द (मैथमेटिकल टर्म्स) अभिन्न रूप से जुड़े हैं, जिनमें हिल्बर्ट स्पेस (एक अनंत आयामी यूक्लिडियन स्पेस), हिल्बर्ट प्रोग्राम, हिल्बर्ट एक्सिओम्स, हिल्बर्ट कर्व्स, हिल्बर्ट क्लासिफिकेशन और हिल्बर्ट इनइक्वालिटी, साथ ही कई प्रमेय (थ्योरम्स) भी शामिल हैं. इसके अलावा भौतिक विज्ञानियों और गणितज्ञों द्वारा आम तौर पर स्वीकृत एक दिलचस्प तथ्य यह है कि थ्योरी ऑफ जनरल रिलेटिविटी के फील्ड इक्वेशंस को हिल्बर्ट ने आइंस्टाइन से पहले ही हल कर लिया था, जिसे आज ‘आइंस्टाइन-हिल्बर्ट एक्शन’ के नाम से जाना जाता है. इन सबके साथ-साथ हिल्बर्ट गहरी नींद से जगा देने वाले अपने दर्शन, महिलाओं को शोध कार्य के लिए प्रोत्साहित करने, कदम-कदम पर दुनिया को चौंका देने वाली अपनी अलहदा शख्सियत और अपने भुलक्कड़पन के लिए भी जाने जाते हैं.


डेविड हिल्बर्ट का जन्म 23 जनवरी, 1862 को तत्कालीन पूर्वी प्रशिया की राजधानी (मौजूदा केलिनिग्राद, रूस) कोनिग्सबर्ग के नजदीक बेहलाऊ नामक स्थान पर हुआ था. उनके पिता ऑटो हिल्बर्ट कोनिग्सबर्ग कोर्ट में एक प्रतिष्ठित न्यायाधीश और प्रिवी काउंसलर थे. उनकी मां मेरिया थेरेस एक व्यवसायी की पुत्री थीं लेकिन उनकी दिलचस्पी दर्शनशास्त्र, खगोलशास्त्र और गणित (विशेषकर अभाज्य संख्याओं) में थी. कहा जाता है कि हिल्बर्ट की मां ने गणित में उनकी दिलचस्पी बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी या यूं कहें उन्होंने अपनी मां से गणित में रुचि विरासत में पाई थी.


हिल्बर्ट की पढ़ाई-लिखाई घर पर ही मां की छत्रछाया में शुरू हुई. जब वे आठ साल के हुए तब पहली बार उनका दाखिला कोनिग्सबर्ग के एक स्थानीय स्कूल में कराया गया. दस साल की उम्र में हिल्बर्ट ने रॉयल फ्रेडरिकस्कोलेग नामक विद्यालय में प्रवेश लिया, जहां पर विज्ञान और गणित की बजाय शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन को ज्यादा तवज्जो दिया जाता था. हिल्बर्ट बचपन में कोई प्रतिभाशाली छात्र नहीं थे बल्कि वे भी दूसरे औसत व कमजोर छात्रों जैसे ही थे. यह बेहद ताज्जुब की बात है कि एक ऐसा व्यक्ति जो कालांतर में आधुनिक गणित पर अपना गहरा प्रभाव डालने वाला था, वह स्कूली दिनों में एक कमजोर छात्र था. बाद में कई जगहों पर स्वयं हिल्बर्ट ने ही खुद को फ्रेडरिकस्कोलेग में पढ़ने वाले एक सुस्त और नासमझ लड़के के रूप में वर्णित किया है.


अपनी स्कूली शिक्षा के अंतिम वर्ष (1879) में हिल्बर्ट को विल्हेम जिम्‍नेजियम में स्थानांतरित कर दिया गया. विल्हेम जिमनेशियम ने उनके जीवन की दिशा निर्धारित करने में बेहद अहम भूमिका निभाई क्योंकि यहां गणित और विज्ञान को पर्याप्त तवज्जो दिया जाता था. पहली बार यहीं उनकी गणितीय प्रतिभा को लक्ष्य किया गया था. सन् 1880 में विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद हिल्बर्ट ने कोनिग्सबर्ग यूनिवर्सिटी में अपना दाखिला करवाया. यहीं उनकी मुलाक़ात गणित के क्षेत्र में अपनी धाक जमा चुके प्रतिभाशाली छात्र हरमन मिंकोव्स्की से हुई, जो बाद में गहरी दोस्ती में बदल गई. कोनिग्सबर्ग यूनिवर्सिटी का उन्मुक्त शैक्षणिक वातावरण हिल्बर्ट को बेहद पसंद आया, जिसकी वजह से उन्हें गणित के क्षेत्र में पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करने का मौका मिला. गौरतलब है कि महान दार्शनिक इमान्यूअल काण्ट का सारा जीवन कोनिग्सबर्ग यूनिवर्सिटी में ही पढ़ते-पढ़ाते गुजरा था. काण्ट का मानना था कि गणित ज्ञान का वह रूप है जिसे सिर्फ और सिर्फ विशुद्ध चिंतन-मनन के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है. काण्ट के इस विचार से हिल्बर्ट ताउम्र प्रभावित रहे.


उन दिनों जर्मनी में छात्रों को एक यूनिवर्सिटी से दूसरे यूनिवर्सिटी में जाकर पढ़ाई करने की सुविधा हासिल थी. कोनिग्सबर्ग से पहले सेमेस्टर की गणित की पढ़ाई इंटेग्रल कैलकुलस, थ्योरी ऑफ डेटरमिनेण्ट्स और कर्वेचर ऑफ सरफेस जैसे विषयों के साथ पूरी की. उसके बाद जर्मन परंपरा का पालन करते हुए वे दूसरे सेमेस्टर में हाईडेलबर्ग यूनिवर्सिटी गए जहां उन्होंने गणितज्ञ लाजर फुच्स के डिफरेंशियल इक्वेशंस पर लेक्चर सुने. 1882 में कोनिग्सबर्ग लौटने पर, हिल्बर्ट ने संख्या सिद्धांत (नंबर थ्योरी), इनवेरिएंट्स (निश्चरों) और थ्योरी ऑफ फंक्शंस पर फर्डिनेंड वॉन लिंडमैन, हेनरिक वेबर और एडॉल्फ हर्विट्ज़ जैसे दिग्गज गणितज्ञों के व्याख्यान सुने. 1882 के वसंत में, हरमन मिंकोव्स्की भी बर्लिन में अध्ययन करने के बाद कोनिग्सबर्ग लौट आए. आगे चलकर हिल्बर्ट और मिंकोव्स्की एक-दूसरे की गणितीय प्रगति को दृढ़ता से प्रभावित करने वाले थे. हिल्बर्ट, मिंकोव्स्की और हर्विट्ज़ अक्सर लंबी दूरी की सैर पर निकलते और गणितीय समस्याओं पर विस्तार से चर्चा करते थे.


यूनिवर्सिटी में आठ सेमेस्टर की पढ़ाई पूरी करने के बाद हिल्बर्ट ने लिंडमैन के मार्गदर्शन में अपने पीएचडी थीसिस पर काम शुरू किया और 1885 में ‘थ्योरी ऑफ अल्जेब्राइक इनवेरिएंट्स’ पर किए अपने अनुसंधान कार्य पर डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की. पीएचडी करने के बाद हर्विट्ज़ की सलाह पर हिल्बर्ट ने लाइपज़िग की यात्रा की और यूनीफिकेशन ऑफ ज्योमेट्री (ज्यामितियों के एकीकरण) विषय पर केंद्रित फेलिक्स क्लाइन के सेमीनार में भाग लिया. क्लाइन हिल्बर्ट की गणितीय प्रतिभा से बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने हिल्बर्ट को पेरिस जाकर वहाँ हो रहे गणितीय शोधों का अध्ययन करने की सलाह दी.


हिल्बर्ट मार्च 1886 में पेरिस पहुंचे. वहाँ उन्होंने चार्ल्स हर्मिट, हेनरी पोनकारे, केमिल जोर्डीन जैसे दिग्गज गणितज्ञों से गणित के कई विषयों पर चर्चा की. हर्मिट ने हिल्बर्ट को निश्चरों (इनवेरिएंट्स) से जुड़ी ‘गोर्डान प्रॉब्लम’ को हल करने की सलाह दी. 1886 में वापस कोनिग्सबर्ग लौटने पर हिल्बर्ट ने अपने ही यूनिवर्सिटी से बतौर प्रिवात्डोज़ेंट (निजी तौर पर शिक्षा देने वाला अध्यापक) अपने टीचिंग कॅरियर की शुरुआत की.


शैक्षिक दायित्यों को निभाते हुए उन्होंने अपना शोध कार्य भी जारी रखा. वे गंभीरतापूर्वक ‘गोर्डान प्रॉब्लम’ और अन्य गणितीय समस्याओं को हल करने में जुटे हुए थे. आखिरकार 1888 में अपने अथक परिश्रम की बदौलत हिल्बर्ट को ‘गोर्डान प्रॉब्लम’ को सुलझाने में सफलता हासिल हुई. उन्होंने द्विघातीय स्तरों (क्वाड्रेटिक लेवल्स) के ऊपर गणना किए बगैर निश्चरों की मौजूदगी को साबित कर दिया. इसे ‘हिल्बर्ट के बेसिस थ्योरम’ के नाम से जाना जाता है. हिल्बर्ट ने ‘गोर्डान प्रॉब्लम’ का जो हल प्रस्तुत किया था वह बेहद सरल बोधगम्य और तार्किक रूप से सम्मोहक थी. ‘गोर्डान प्रॉब्लम’ के जन्मदाता पॉल गोर्डान स्वयं भी हिल्बर्ट के हल से बेहद प्रभावित हुए और कहा कि, ‘यह गणित नहीं है, यह तो धर्मशास्त्र है!’


‘गोर्डान प्रॉब्लम’ पर अपने काम की बदौलत हिल्बर्ट की गणितीय मेधा की चर्चा यूरोप में चहुंओर फैल गई. परिणामस्वरूप आगे चलकर हिल्बर्ट कोनिग्सबर्ग यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर और पूर्णकालिक प्रोफेसर के रूप में पदोन्नत हुए. 1892 में तीस साल की उम्र में कैथे येरोश नामक युवती से वैवाहिक बंधन में बंध गए. इस दौरान उन्होंने ने अपने अनन्य मित्र मिंकोव्स्की के साथ मिलकर बीजगणितीय संख्या सिद्धांत पर अपना शोध कार्य जारी रखा.


1895 में क्लाइन के प्रयासों से हिल्बर्ट को गोटिंगटन यूनिवर्सिटी में गणित की प्रतिष्ठित चेयर हासिल हुई, जिस पद पर वे 1930 में अपने रिटायरमेंट तक बने रहे. हिल्बर्ट ने संख्या सिद्धांत के साथ-साथ ज्यामिति के क्षेत्र में बेहद मौलिक अनुसंधान किए. उन्होंने ज्यामिति के क्षेत्र में जो काम किए, वे युक्लिड की ज्यामिति की नए सिरे से व्याख्या करती है. सही मायनों में युक्लिड के बाद हिल्बर्ट ही वह शख्स थे, जिसने युक्लिडीय ज्यामिति के विकास में सबसे ज्यादा योगदान दिया. युक्लिड के ‘एलिमेंट्स’ का नए सिरे से समालोचनात्मक अध्ययन करने के बाद उन्होंने 21 नई परिकल्पनाओं का सृजन किया और 1899 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द फाउन्डेशंस ऑफ़ ज्योमेट्री’ में इनकी विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की. ज्यामिति के बाद हिल्बर्ट ने ड्रिख्ले नियम की तार्किक उपपत्ति (प्रूफ) प्रस्तुत की.


अगस्त 1900 में हिल्बर्ट ने अंतर्राष्ट्रीय गणित कांग्रेस, पेरिस में अपने प्रसिद्ध व्याख्यान ‘द प्रॉब्लम्स ऑफ मैथमैटिक्स’ में गणित की 23 अनसुलझी समस्याओं की सूची प्रस्तुत की, जिसने बीसवीं सदी के गणितीय अनुसंधान की निर्धारित की. अपने व्याख्यान की भूमिका में हिल्बर्ट ने कहा कि “हममें से कौन उस पर्दे को हटा कर प्रसन्नता का अनुभव नहीं करेगा जिसके पीछे भविष्य छिपा है ताकि आने वाले विज्ञान के विकास को देखा जा सके, और आने वाली सदियों के विकास के रहस्यों को भेदा जा सके? वे कौन-सी दिशाएं हैं जिनमें हमारे भावी गणितज्ञों की उमंग पूर्ण यात्राओं का अंत होगा? गणितीय चिंतन के विस्तृत और समृद्ध क्षेत्र में किन नई विधियों और नए तथ्यों का नई सदी में पर्दाफाश होगा?”


हिल्बर्ट गणितीय अनुसंधानों के साथ-साथ अपने भुलक्कड़पन के लिए भी प्रसिद्ध थे. एक बार वे एक गणितज्ञ हैल्मुट हेस्स से गणित पर चर्चा कर रहे थे. हेस्स ने बीजगणितीय संख्या सिद्धांत की एक महत्त्वपूर्ण शाखा क्लास-फील्ड थ्योरी से संबंधित अपनी नई खोजों के बारे में बताना शुरू किया. जब हेस्स अपनी पूरी बात कह चुके तो हिल्बर्ट ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, “सुंदर, बहुत सुंदर!” फिर उन्होंने जिज्ञासावश हेस्स से जानना चाहा कि इस थ्योरी का जन्मदाता कौन है? इस सवाल को सुनकर हेस्स भौंचक्के रह गए. खैर, जब उन्होंने इस सवाल का जवाब दिया तो खुद हिल्बर्ट भी चौंके बिना न रह सके भुलक्कड़ हिल्बर्ट को हेस्स ने बताया कि इस थ्योरी के प्रणेता कोई और नहीं बल्कि वे खुद यानि डेविड हिल्बर्ट हैं.


हिल्बर्ट ने अपने जीवन में गणित और भौतिक विज्ञान से संबंधित इतने महत्वपूर्ण काम किए कि उनका उल्लेख एक लेख में करना बिलकुल भी संभव नहीं है. उन्होंने गणित से जुड़ी अनेक किताबें लिखी. उनकी ‘ज्योमेट्री एंड द इमेजिनेशन’, ‘मेथड्स ऑफ़ मैथमेटिकल फिजिक्स’, ‘प्रिंसिपल्स ऑफ मैथमेटिकल लॉजिक’ आदि किताबों को गणित जगत में काफी सराहा गया और उनका कई यूरोपीय भाषाओँ में अनुवाद हुआ. हिल्बर्ट ने अनेक पुरस्कार प्राप्त किए, जिनमें हंगेरियन एकेडमी ऑफ साइंसेज का बोलयाई पुरस्कार प्रमुख है. 14 फरवरी, 1943 को इस दिग्गज गणितज्ञ का 81 साल की उम्र में निधन हो गया. हिल्बर्ट के इस आधार वाक्य से, जो उनकी समाधि पर भी अंकित है, हम सदैव आशावादिता की प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं :


“हमें जरूर जानना चाहिए, हम जरूर जान लेंगे.”

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: January 23, 2023, 12:23 pm IST
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