ब्रह्मांड संबंधी प्राचीन धारणाएं: अरस्तू और टॅालेमी का पृथ्वी केन्द्रित ब्रह्मांड

अरस्तू और टॉलेमी के भूकेंद्रिक मॉडल को उस समय सर्वाधिक परिशुद्ध तथा धर्मसम्मत ब्रह्मांड व्यवस्था माना जाने लगा, इसका परिणाम यह हुआ कि किसी भी विद्वान ने लगभग दो हजार वर्षों तक उनके विचारों को चुनौती देने का साहस नहीं किया.

Source: News18Hindi Last updated on: June 18, 2020, 2:52 PM IST
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ब्रह्मांड संबंधी प्राचीन धारणाएं: अरस्तू और टॅालेमी का पृथ्वी केन्द्रित ब्रह्मांड
ब्रह्मांड के स्वरूप को दर्शाती एक तस्वीर.
सिकंदर के गुरु अरस्तू ने राजनीतिक और दार्शनिक विचारधारा के प्रतिपादन के साथ-साथ ब्रह्मांड के नियमों की विस्तृत चर्चा की तथा वैज्ञानिक शोध की विधा पर भी अपने विचार प्रकट किए. अरस्तू को आधुनिक भौतिकी के आरंभिक सिद्धांतों का जनक  माना जाता है. वास्तव में, अरस्तू के सिद्धांतों को किसी भी पश्चिमी मानव के द्वारा प्रकृति के वस्तुपरक यथार्थ को समझने का प्रथम प्रयास माना जाता है. हालाँकि आज अरस्तू के कई विचार गलत सिद्ध हो चुके हैं, जैसे उनकी यह मान्यता कि ब्रह्मांड का समस्त पदार्थ चार तत्वों- पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि से निर्मित है, जिनमें पृथ्वी का घनत्व सबसे अधिक तथा अग्नि का सबसे कम है. बहरहाल, अरस्तू के सिद्धांतों को समस्त यूनान सहित भारत, चीन और अरब और बाद में यूरोप में व्यापक प्रसिद्धि मिली.

अरस्तू ने मानव जाति की वैचारिक धरोहर की लगभग समस्त शाखाओं में अपने योगदान दिए. अरस्तू के अनुसार ब्रह्मांड की सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तु पृथ्वी है. अरस्तू ने बेहद सावधानी और सटीक ढंग से ब्रह्मांड का शुरुवाती भूकेंद्रिक या पृथ्वी केंद्रित मॉडल प्रस्तुत किया था. उनके मॉडल के अनुसार पृथ्वी विश्व (ब्रह्मांड) के केंद्र में स्थिर है तथा सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और तारे वृत्ताकार (गोलाकार) कक्षाओं में पृथ्वी के चारों ओर घूमते हैं. उनके अनुसार पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे सभी खगोलीय पिंड परिपूर्ण, पारदर्शी, शुद्ध और ईश्वरीय हैं और वृत्ताकार गति ही सर्वाधिक शुद्ध गति है. अरस्तू के अनुसार पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र है, तथा ब्रह्मांड का निर्माण पृथ्वी और मनुष्य के लिए ही हुआ है. यानी मनुष्य ही इस सृष्टि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण जीव है. संक्षेप में, अरस्तू के भूकेंद्रिक मॉडल में निम्न मान्यताएं थीं :

- पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित है.
- सभी खगोलीय पिंड वृत्ताकार कक्षाओं में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहें हैं. पृथ्वी के सबसे नजदीक चंद्रमा का खगोल, फिर सूर्य का, उसके बाद मंगल का... तथा दसवां खगोल स्वर्ग का है.
- सभी आकाशीय पिंड ऐसे अपरिवर्तनशील, शुद्ध एवं पारदर्शी पदार्थों से निर्मित हैं, जो पृथ्वी पर नहीं पाए जाते हैं.

अरस्तू के भूकेंद्रिक मॉडल की प्रमुख समस्या यह थी कि यह मॉडल खगोलीय पिंडों की प्रेक्षित गति की व्याख्या करने में असफल सिद्ध हुआ. ग्रहों के अवलोकन से यह पाया गया कि उनकी गति अनियमित हैं, वे कभी आगे तो कभी पीछे चलते हैं. यूनानियों ने इन ग्रहीय पिण्डों को ‘प्लेनेट’ यानी ‘घुम्मकड़’ कहकर संबोधित किया. अरस्तू की उक्त मान्यता के आधार पर ग्रहों के भ्रमण-पथ को निर्धारित नहीं किया जा सकता था. तारों का पैटर्न ऋतुओं के साथ कैसे बदलता रहता है या फिर, चंद्रमा एक महीने की अवधि में घटता-बढ़ता क्यों रहता है- इसे भी अरस्तू के मॉडल से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता था.

ग्रहों की अनियमिता या घुमक्कड़ी प्रवृत्ति को समझने के लिए ग्रीक विद्वानों द्वारा दो धारणाएं विकसित की गईं- (1) फलित ज्योतिष आधारित (2) अरस्तू के खगोलशास्त्र पर आधारित. पहली धारणा यह बनी कि ग्रहों की गति प्राकृतिक नियमों के अधीन नहीं है, स्वतंत्र है. ग्रह अपनी इच्छाशक्ति के मुताबिक विचरण करते हैं. इसी धारणा से आगे चलकर यह समझ बनी कि ग्रहों की इच्छाशक्ति पृथ्वी के नश्वर प्राणियों को प्रभावित करती है और यह शक्ति मनुष्य का भविष्य निर्धारित करती है. यही धारणा बाद में फलफूलकर फलित ज्योतिष के रूप में तब्दील हो गई.ग्रहों के अनियमित चाल की व्याख्या करने के लिए वैज्ञानिक प्रवृत्ति के खगोल वैज्ञानिकों ने दूसरी धारणा यानी अरस्तू के भूकेंद्रिक ब्रह्मांडीय व्यवस्था मॉडल का अनुसरण किया. ग्रहों की गति को समझाते हुए तथा अरस्तू के सिद्धांत में संशोधन करते हुए एक बेहतरीन ज्यामितीय मॉडल तकरीबन 140 ई. में टॉलेमी ने दिया, जो खगोलविज्ञान पर अबतक लिखी गई सबसे महान पुस्तक ‘अल्माजेस्ट’ के लेखक हैं. टॉलेमी भी अरस्तू की भांति पृथ्वी को ब्रह्मांड के केंद्र में स्थिर मानते थे तथा यह भी मानते थे कि सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और तारे वृत्ताकार (गोलाकार) कक्षाओं में पृथ्वी के चारों ओर घूमते हैं. टॉलेमी ने खगोलीय पिंडों की अनियमित गति को समझाने के लिए एक बेहद जटिल प्रणाली प्रस्तुत की. उन्होंने यह कल्पना की कि प्रत्येक ग्रह अपने एक वृत्त में घूमता है, जिसे अधिचक्र कहते हैं. इन अधिचक्रों के केंद्र एक बड़े वृत्त में गतिशील होते हैं, जिन्हें ‘डेफरेंट’ कहते हैं. टॉलेमी के अनुसार हमारी पृथ्वी सभी डेफरेंट का केंद्र है. सरल शब्दों में कहें तो टॉलेमी के भूकेंद्रिक मॉडल के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा और सभी ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करने के साथ-साथ अधिचक्रों की भी परिक्रमा करते हैं, तथा अधिचक्रों का केंद्र यानी डेफरेंट पृथ्वी की परिक्रमा करता है.

अरस्तू और टॉलेमी के भूकेंद्रिक मॉडल को उस समय सर्वाधिक परिशुद्ध तथा धर्मसम्मत ब्रह्मांड व्यवस्था माना जाने लगा, इसका परिणाम यह हुआ कि किसी भी विद्वान ने लगभग दो हजार वर्षों तक उनके विचारों को चुनौती देने का साहस नहीं किया. वास्तव में यूनानी तौर-तरीके से ही प्रभावित होकर भारतीय खगोलविज्ञान का उदय हुआ. हालाँकि भारतीय खगोलविज्ञान ग्रीक से प्रभावित जरुर था, मगर यह स्वतंत्र और मौलिक रूप से विकसित हुआ. प्राचीन भारत में अरस्तू-टॉलेमी के स्थिर पृथ्वी केंद्रित सिद्धांत का कितना प्रभाव था, यह महान खगोलविद-गणितज्ञ आर्यभट के एक उदाहरण स्पष्ट हो जाता है. आर्यभट ने इस विचार का खंडन कर दिया था कि हमारी पृथ्वी ब्रह्माण्ड के मध्यभाग में स्थिर है. आर्यभट ने भूभ्रमण का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है. इसका विवरण आर्यभट अपनी पुस्तक आर्यभटीय में इस प्रकार देते हैं-

 ‘लंका में स्थित मनुष्य नक्षत्रों को उल्टी ओर (पूर्व से पश्चिम) जाते हुए देखता है उसी भांति से चलती नाव में बैठे मनुष्य को किनारें स्थित वस्तुओं की गति उल्टी दिशा में प्रतीत होती है.’

पृथूदकस्वामी आर्यभटीय की एक आर्या के बारे में लिखते हैं-

‘तारामंडल स्थिर है और पृथ्वी अपनी दैनिक घूर्णन गति से नक्षत्रों तथा ग्रहों को उदय एवं अस्त करती है.’

आर्यभट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और खगोल स्थिर है. उनकी यह मान्यता अरस्तू-टॉलेमी के पृथ्वी केंद्रित ब्रह्मांड व्यवस्था और भारत की पौराणिक धारणाओं के विपरीत थी. आर्यभट के सौ वर्षों बाद एक महान गणितज्ञ-ज्योतिषी हुए – ब्रह्मगुप्त. ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट की आपत्तिजनक शब्दों में कड़वी आलोचना की. ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट के भूभ्रमण सिद्धांत की आलोचना एवं उपेक्षा की.  वास्तव में उस समय अरस्तू-टॉलेमी के सिद्धांत का इतना अधिक प्रभाव था कि आर्यभट के समकालीन और बाद के खगोलशास्त्रियों ने उनकी इस सही मान्यता को स्वीकार नहीं किया.

विद्वान अल्बरूनी ने लगभग 13 वर्षों तक भारत में रहकर भारतीय संस्कृति, गणित एवं खगोलशास्त्र का व्यापक अध्ययन किया. उन्होनें ब्रह्मगुप्त के आलोचनाओं को गलत एवं आपतिजनक माना साथ ही आर्यभट की बुद्धि का भी लोहा माना. इसलिए ही सम्भवतः अल्बरूनी अपनी पुस्तक ‘क़िताब-उल-हिंद’ में एक जगह भारतीय खगोलशास्त्र को मोतियों और गोबर का मिश्रण बताते हैं.

सिद्धान्तिक काल जोकि भारतीय विज्ञान की दृष्टि से वैभव का काल है. आज वैज्ञानिक एवं इतिहासकार 5वी शताब्दी में आर्यभट प्रथम से लेकर 12वी शताब्दी में भास्कर द्वितीय तक के काल को सिद्धांतिक काल के नाम से जानते हैं. इस काल में हमारे देश में आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, महावीर, नागार्जुन जैसे महान वैज्ञानिक हुए. इसी समय-अवधि के दौरान पृथ्वी की आकृति, घूर्णन और ग्रहण आदि के बारे में भारतीय खगोलशास्त्रियों को ज्ञान हो चुका था, उस दौरान शेष विश्व अरस्तू-टॉलेमी के पृथ्वी केंद्रित ब्रह्मांड पर ही अटका हुआ था और उसमें इतनी जटिलता आ चुकी थी कि द्वितीयक अधिचक्र की भी धारणा करनी पड़ी जो पहले अधिचक्र की परिक्रमा करता था. इस तरह भूकेंद्री मॉडल जो शुरुवात में एक सरल प्रणाली थी, उसमे बहुत सारी जटिलताएं आ गईं थीं. अरस्तू और टॉलेमी के सिद्धांत भौतिक विश्व का सही चित्रण करने में असमर्थ सिद्ध हो रहें थे, जिससे खगोलविज्ञानियों में निराशा फैलने लगी मगर धार्मिक रूप से ईसाई चर्च ने भूकेंद्री मॉडल को धर्मसम्मत माना क्योंकि ब्रह्मांड का यह मॉडल बाइबिल की धारणा के अनुरूप थी.

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(यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं. यह लेख 'विज्ञान और मानव संस्कृति में ब्रह्मांड' सीरीज का हिस्सा है और यह दूसरा  लेख है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: June 18, 2020, 2:52 PM IST
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