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एलन मस्क: दुनिया का सबसे अमीर आदमी जो दूसरे ग्रहों पर दुनिया बसाना चाहता है

मस्क बचपन में बहुत शांत रहते थे जिसकी वजह से स्कूल के सहपाठी उन्हें बहुत तंग किया करते थे, मगर किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते एलन के व्यक्तित्व में खासा बदलाव आया और उन्होंने मात्र 10 साल की उम्र में कम्यूटर प्रोग्रामिंग सीखी.

Source: News18Hindi Last updated on: January 16, 2021, 4:30 PM IST
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एलन मस्क: दुनिया का सबसे अमीर आदमी जो दूसरे ग्रहों पर दुनिया बसाना चाहता है
आज सॉफ्टवेयर इंजीनियर से रॉकेट साइंटिस्ट बने इलॉन मस्क लाखों युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं. (फोटो साभारः AP)
प्राइवेट स्पेस कंपनी ‘स्पेस-एक्स’ के मालिक और हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी ‘टेस्ला’ के सीईओ एलन मस्क दुनिया के सबसे अमीर शख़्स का ताज एमेजॉन के संस्थापक जेफ बेजॉस से हासिल करने में दुबारा कामयाब रहे हैं. अमेरिकी उद्यमी एलन मस्क विज्ञान और तकनीक के ऐसे कई मिशनों से जुड़े हुए हैं जिनकी बदौलत विज्ञान प्रेमियों के बीच उनको ख़ासा पसंद किया जाता है, लोग उनको अपना हीरो मानते हैं, उनकी इंटेलिजेंस के दीवाने हैं और उनके जीवन को भी साइंस-टेक्नोलॉजी के नए कारनामों से जोड़कर देखते हैं. विज्ञान जगत में मस्क की हैसियत एक सेलिब्रेटी से बिलकुल भी कम नहीं है.

28 जून, 1971 में प्रिटोरिया (दक्षिण अफ्रीका) में जन्मे एलन मस्क पिछले एक-दो दशकों से किसी न किसी वजहों से अक्सर सुर्खियों में रहे हैं. फिर चाहे बात भविष्य के इलेक्ट्रिक कारों को डिजाइन करने की हो, सुपर-फ़ास्ट अंडरग्राउंड ट्रांसपोर्ट सिस्टम का ख़ाका तैयार करने की या मंगल ग्रह पर इन्सानों की रिहायशी कालोनियां बसाने की हो. कहा जाता है कि मस्क बचपन में बेहद सीधे-सादे और पढ़ाकू किस्म के लड़के थे और कंप्यूटर पर तो उनकी उंगलियां थिरकती थीं.

मस्क बचपन में बहुत शांत रहते थे जिसकी वजह से स्कूल के सहपाठी उन्हें बहुत तंग किया करते थे, मगर किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते एलन के व्यक्तित्व में खासा बदलाव आया और उन्होंने मात्र 10 साल की उम्र में कम्यूटर प्रोग्रामिंग सीखी. कम्प्यूटर के प्रति मस्क की दिवानगी इस कदर थी कि मात्र 12 साल की उम्र में ‘ब्लास्टर’ नामक एक कम्प्यूटर गेम का सॉफ्टवेयर बना डाला जिसे एक कम्यूटर मैग्ज़ीन ने उनसे 500 अमेरिकी डॉलर में ख़रीदा. इसे मस्क की पहली 'व्यापारिक उपलब्धि' कहा जा सकता है. 17 साल की उम्र में मस्क दक्षिण अफ्रीकी सेना में अनिवार्य सेवा से बचने के लिए कनाडा चले गए और वहां उन्होने क्वीन्स यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया. मस्क ने फिजिक्स और इकॉनमिक्स में बैचलर डिग्री हासिल की, जिसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सलवेनिया चले गए. आगे चलकर मस्क ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से अप्लाइड एनर्जी फिजिक्स में पी-एचडी करने के लिए दाखिला लिया लेकिन दो ही दिन बाद उसे छोड़ कर आ गए!
मस्क के यूनिवर्सिटी छोड़ने का सबसे बड़ा कारण था उस दौरान आया ‘इंटरनेट बूम’ यानि इंटरनेट के ज़माने की शुरुवात. मस्क ने अपने छोटे भाई किम्बल के साथ मिलकर कैलिफोर्निया में ‘जिप2’ नामक एक सॉफ्टवेयर कंपनी की नींव डाली. यह स्टार्टअप इतना सफल रहा कि मस्क ने 1999 में अपनी कंपनी जिप2 को कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी कॉम्पैक को 30 करोड़ अमेरिकी डॉलर में बेच दी और इस सौदे के साथ ही मस्क बड़े कारोबारियों में शुमार हो गए. मस्क ने इस पैसे का इस्तेमाल साइंस-टेक्नोलॉजी के नए कारनामों को अंजाम देने के लिए किया. और यहीं से शुरू हुआ उनकी अपूर्व कामयाबी और सुर्खियों में रहने का सिलसिला.

फौलादी इरादों के मालिक
जिप2 को बेचने के बाद एलन मस्क ने 1999 में ‘एक्स.कॉम’ नाम की ऑनलाइन फाइनैंस कंपनी खोली. इस कंपनी का दावा था कि वो ऑनलाइन पेमेंट करने की व्यवस्था में क्रांति लाने वाली है. मस्क की इस कंपनी को आज दुनिया ‘पेपॉल’ के नाम से जानती है. अक्टूबर 2002 में ईबे ने 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर के शेयर के बदले पेपॉल को मस्क से खरीद लिया. एक्स.कॉम (पेपॉल) को बेचने के बाद मस्क अरबपति हो गए.स्पेसएक्स के जरिए करना चाहते हैं अपने सपने को साकार
14 वर्ष की उम्र में मस्क को डगलस एडम्स की किताब ‘द हिचहाइकर्स गाइड टू द गैलेक्सी’ हाथ लगी. इस साइन्स फीक्सन नॉवेल में लेखक ने यह कल्पना की है कि यह ब्रह्मांड असल में एक सुपर-कंप्यूटर है. ऐसा सुपर-कंप्यूटर, जिसे किसी दूसरे ग्रह पर बैठे एलियंस अपने सुपर-कंप्यूटर से मैनेज और कंट्रोल कर रहे हैं. इस किताब को पृष्ठ-दर-पृष्ठ पढ़ते हुए मस्क को ऐसा एहसास हुआ कि ब्रह्मांड में हमारी पृथ्वी जैसे अनेक ग्रह हो सकते हैं जहां पर किसी न किसी रूप में जीवन का वजूद हो. इस किताब ने मस्क को जीवन के विविध स्वरूपों को खोजने के लिए और मानवता की रक्षा के लिए प्रेरित किया और इसके लिए सबसे जरूरी है तकनीकी विकास और इंजीनियरिंग में महारत हासिल करना. मस्क के मन में बचपन से यह ख़्वाब रहा है कि रॉकेट प्रौद्योगिकी के बल पर मंगल या किसी दूसरे ग्रह पर इंसानी बस्तियां बसाना. 30 साल की उम्र में जब मस्क अरबपति बन चुके थे, ने अपने इस सपने को सच करने के लिए एक नया रॉकेट खरीदने के लिए रूस पहुँच गए मगर रूस ने रॉकेट की कीमत ज्यादा बताई तो उन्होने खुद की एक रॉकेट कंपनी बनाने का मन बनाया. लेकिन इसके लिए उन्हें एक ऐसे वैज्ञानिक की जरूरत थी जो उनको रॉकेट के पुर्जों और जरूरी सामानों की जानकारी दे सके. इसी क्रम में उनकी मुलाक़ात अमेरिकी रॉकेट इंजीनियर व रॉकेट इंजन डिजाइनर टॉम म्यूलर से हुई और स्पेसएक्स पर काम शुरू हुआ.

हमारी आज की दुनिया राजनैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से उथल-पुथल के दौर में है. ऐसी परिस्थिति में महज़ 200-300 वर्षों के भीतर मानव जाति का अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो सकता है और इस संकट का एक ही समाधान है कि हम अंतरिक्ष में कॉलोनियां बसाएं. पिछले कुछेक वर्षों में हुए शोधों और अंतरिक्ष अन्वेषणों से पता चलता है कि भविष्य में धरतीवासियों द्वारा मानव बस्तियाँ बसाने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान हमारा पड़ोसी ग्रह मंगल है क्योंकि मंगल और पृथ्वी में अनेक समानताएं हैं. मस्क का मानना है कि इंसान अगर एक ही ग्रह (पृथ्वी) तक सीमित रहेंगे तो अपना वजूद बचा नहीं सकेंगे. चांद और सौरमंडल के ग्रहों खासकर मंगल पर बस्तियां बसाने और दुनिया भर के अमीर पर्यटकों को अंतरिक्ष की सैर कराने के उद्देश्य से इलॉन मस्क ने साल 2002 में स्पेस एक्सप्लोरेशन टेक्नोलॉजीज कॉर्पोरेशन यानी स्पेसएक्स नामक कंपनी की स्थापना की. स्पेसएक्स ने जब शुरुवाती नाकामयाबियों के बाद चौथी बार में फॉल्कन रॉकेट को लॉंच करने में कामयाबी हासिल की तो पूरी दुनिया की अंतरिक्ष एजेंसियों में खलबली मच गई. स्पेसएक्स के शक्तिशाली रॉकेट फॉल्कन-9 से दो बार एस्ट्रोनॉट्स को सफलतापूर्वक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में भी पहुंचाया जा चुका है. स्पेसएक्स का फॉल्कन-9 रॉकेट इस मायने में दुनियाभर के अन्य रॉकेटों से अलग है कि इस रॉकेट को पूरी तरह से दुबारा लॉचिंग के इस्तेमाल में लाया जा सकता है. गौरतलब है कि यह तकनीकी क्षमता मस्क की कंपनी के अलावा दुनिया की किसी भी स्पेस एजेंसी को नहीं हासिल है. इलॉन मस्क का कहना है कि अगर सबकुछ ठीकठाक रहा तो 2025 तक स्पेसएक्स इस स्थिति में आ जाएगा कि वह एक ही साल में हजारों अमीर पर्यटकों को अंतरिक्ष की सैर करा सके और इसके बदले भारी-भरकम कमाई कर सके.

आधी सदी पहले अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अपोलो चंद्र अभियान की सफलता ने मंगल ग्रह को इंसानी पहुंच के काफी करीब ला दिया था. असल में, नासा ने 1980 के दशक की शुरुआत में ही लाल ग्रह पर कदम रखने की योजना बनाई थी, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक रूखों के बदलाव ने उस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया. चाँद के बाद मंगल तक इंसान के पहुंचने की बात तो दूर 1972 के बाद चांद पर अब तक दुबारा किसी के कदम तक नहीं पड़े हैं. इसका बड़ा कारण राजनीतिक है क्योंकि बीते 50 सालों में अंतरिक्ष से जुड़ी तमाम गतिविधियां अमेरिका, रूस, चीन, भारत, जापान वगैरह देशों की सरकारी एजेंसियों के भरोसे ही संचालित होती रही हैं. अंतरिक्ष से जुड़े मामलों के जानकारों की माने तो स्पेसएक्स की कामयाबी से अब अंतरिक्ष की यात्रा सरकारों के कब्जे से धीरे-धीरे बाहर हो रही है और स्पेसएक्स की बदौलत मंगल हमारे सपनों की नई मंजिल बन गया है.

अगले साल स्पेसएक्स पहली बार एक मानव रहित स्पेसक्रॉफ्ट को मंगल की और भेजेगा. ये मिशन मंगल के ऊपर मौजूद पानी के स्रोतों की खोजबीन करेगा और इसके अलावा ये मिशन मंगल पर छुपे खतरों को ढूंढने के साथ-साथ अन्य कई महत्वपूर्ण कामों को अंजाम देगा. वैसे स्पेसएक्स के मुताबिक इस मिशन के जरिए मंगल पर इंसानों के रहने लायक एक स्टेशन बनाए जाने का भी लक्ष्य है. एलन मस्क का कहना है कि वे 2024 में मंगल पर एक मानव युक्त मिशन को भी अंजाम देंगे. इस मिशन के तहत मंगल पर एक डिपो बनाए जाने की योजना है जोकि भविष्य में मंगल पर उतरने वाली अंतरिक्ष यानों के लिए एक लैंडिंग पैड की तरह काम करेगा! बहरहाल, मस्क के इस मंगल अभियान को अंतरिक्ष विज्ञान के जानकार और वैज्ञानिक मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा बता रहे हैं.

इंसानी वजूद को बचाने की कवायद
बतौर उद्यमी इलॉन मस्क को बहुत दूरदर्शी व्यक्तित्व का मालिक कहा जाता है. कई युवा उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं. वे काफी पहले ही जान चुके थे कि भविष्य में इंसान इलैक्ट्रिक कार का ही इस्तेमाल करेंगे, क्योंकि पर्यावरण संकट एक वैश्विक समस्या में तब्दील हो चुका है. फलस्वरूप उन्होने 2003 में टेस्ला मोटर्स की स्थापना की. टेस्ला इलेक्ट्रिक कारों में लगने वाले पुर्ज़े और बैट्रियां भी बनाती है जिन्हें दूसरे कार निर्माता कंपनियों को बेचा जाता है. डॉयचे वेले के मुताबिक मस्क की मौजूदा सभी कंपनियों का उद्देश्य है इंसानी अस्तित्व पर मंडरा रहे तीन खतरों का हल खोजना : जलवायु परिवर्तन, एक ही ग्रह पर इंसानी निर्भरता और इंसानों की प्रजाति का किसी काम का ना रह जाने का खतरा. मशीनें जितनी सक्षम हो रही हैं, ये खतरा उतना ही बढ़ता जा रहा है. टेस्ला मोटर्स, सोलर सिटी और द बोरिंग कंपनी ऊर्जा के स्वच्छ विकल्पों के उपयोग से जलवायु परिवर्तन से सामना करने में प्रयासरत हैं. मस्क और उनके जैसी सोच रखने वाले मानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंसानों के लिए खतरा बन जाएगी. इसी सोच के साथ दिसंबर 2015 में उन्होंने गैर लाभकारी कंपनी ‘ओपन एआई’ की स्थापना की. इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इंसानों के लिए फायदेमंद बनाने का और उससे उठने वाले जोखिम को खत्म करने का.

एलन मस्क दुनिया को आवागमन के बिलकुल नए और सुरक्षित साधन भी देना चाहते हैं. भविष्य में ऐसा ही एक साधन होगा : ‘हाइपरलूप’. मस्क अमेरिका की पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन प्रोजेक्ट हाइपरलूप ट्रेन पर भी काम कर रहे हैं. यह यातायात का एक ऐसा साधन बन सकता है जिससे बेहद तेज गति से यात्रा संभव है. इसमें सील्ड ट्यूब्स होती हैं जिसके जरिए पॉड बिना किसी घर्षण और वायु प्रतिरोध के घुमा सकते हैं. इस पॉड में लोगों को बैठाया जा सकता है. अगर मस्क का हाइपरलूप ट्रेन प्रोजेक्ट सफल हो जाता है तो यह दुनिया का सबसे तेज पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम साबित होगा.

साल 2017 में मस्क ने न्यूरोलिंक नाम से एक स्टार्टअप कंपनी की भी स्थापना की. इस कंपनी का मकसद ऐसी तकनीक का अविष्कार करना है, जिससे इंसान अपने दिमाग को सीधे कंप्यूटर से जोड़ सके. मस्क के मुताबिक न्यूरोलिंक तकनीक भविष्य में हम इन्सानों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खिलाफ जंग में खासा कारगर साबित हो सकता है.

तुनकमिज़ाजी स्वभाव

भले ही आज सॉफ्टवेयर इंजीनियर से रॉकेट साइंटिस्ट बने इलॉन मस्क लाखों युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं, उनकी शख्सियत के लोग दीवाने हों मगर उनको करीब से जानने वाले उनके आचरण और काम करने के तौर-तरीके पर सवाल उठाते हैं. कई लोग तो उन्हें एक उजड्ड आदमी मानते हैं, जिसके पास दिमाग तो है, लेकिन तमीज नहीं.  कई बार मस्क ने विवादित बयान देकर उन्होंने इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपनी टेस्ला को अरबों डॉलर का नुकसान भी पहुंचाया है. बहरहाल, आज इलॉन मस्क अपने कैरियर के उस मुकाम पर हैं, जहां पर उनके लाखों प्रशंसक हैं और आलोचक भी, लेकिन उनकी अनदेखी कोई नहीं कर सकता न प्रशंसक और न ही आलोचक!
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: January 16, 2021, 4:25 PM IST
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