खगोलविज्ञान से खगोलभौतिकी तक का रोमांचक सफ़र

विलियम हर्शेल के खगोलीय अवलोकनों से आगे यह सिद्ध हुआ कि जिन पथों को हम देखते हैं वे दरअसल अंडाकार हैं और यह कि केप्लर का ग्रहों की गति संबंधी दूसरा नियम कि समान दूरी समान समय में तय होती है, वैध है. इस तरह न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त सार्वभौमिक सिद्ध हुआ. यह सवाल कि क्या ब्रह्मांड के सभी पदार्थों के लिए एक सार्वभौमिक एवं एकसमान नियम का निर्धारण किया जा सकता है, आखिरकार विज्ञान के सिद्धान्त के रूप में स्थापित हो गया.

Source: News18Hindi Last updated on: August 16, 2020, 3:05 PM IST
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खगोलविज्ञान से खगोलभौतिकी तक का रोमांचक सफ़र
वर्णक्रम से तारों के अनेक भौतिक गुणधर्मों के बारे में जानकारी मिल जाती है.
ब्रह्मांड के रहस्यों की गहराइयों का अंदाजा मानव समाज कई शताब्दियों पूर्व से अब तक लगा रहा है. जिज्ञासा और उत्कट लालसा ही वह कारण है जो ब्रह्मांड के रहस्यों की परतें उभारने में मदद कर रहा है. अलग-अलग सभ्यता के समय पर जब लोगों से पूछा गया कि आपको अपने ब्रह्मांड का कितना सम्यक ज्ञान है तो लोगों का यही जवाब था कि हमें अपने ब्रह्मांड के बारे में अच्छी तरह से मालूम है, जबकि ऐसा नहीं है. हजारों साल पहले से चार सदी पहले तक भी ज़्यादातर लोगों का यही मानना था कि पृथ्वी स्थिर है. दो प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिकों प्लेटो और अरस्तु ने ब्रह्मांड की प्रकृति से सम्बन्धित ऐसे विचार रखें जो 2000 से भी अधिक वर्षों तक कायम रहें. अरस्तु ने यह सिद्धांत दिया था कि पृथ्वी विश्व (ब्रह्मांड) के केंद्र में स्थिर है तथा सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और तारे वृत्ताकार कक्षाओं में पृथ्वी के चारों ओर घूमते हैं. अरस्तु के इसी विचार को आधार बनाकर दूसरी शताब्दी में टॉलेमी द्वारा ब्रह्मांड का भूकेंद्री मॉडल प्रस्तुत किया गया. हालांकि प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक आर्यभट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और खगोल स्थिर है. उनकी यह मान्यता पौराणिक धारणा के विपरीत थी. इसलिए बाद के खगोलशास्त्रियों ने उनकी इस सही मान्यता को स्वीकार नहीं किया. वैसे दिलचस्प बात यह है कि जब दुराग्रही वेदान्तियों द्वारा आर्यभट की इस मान्यता का विरोध किया जा रहा था, तब यूरोप में निकोलस कोपरनिकस सूर्यकेंद्री मॉडल प्रस्तुत कर रहे थे. कोपरनिकस द्वारा एक आसान मॉडल प्रस्तुत किया गया जिसमे यह बताया गया था कि पृथ्वी व अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं. वैसे आर्यभट ने यह जरुर बताया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, परंतु वे यह नहीं बता पाए थे कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है.

जिस समय कोपरनिकस ने सूर्यकेंद्री मॉडल प्रस्तुत किया था, उस समय पूरे विश्व में टॉलेमी के मॉडल का ही बोलबाला था. चूंकि टॉलेमी और अरस्तु के मॉडल को धार्मिक रूप से भी अपना लिया गया था, इसलिए चर्च ने कोपरनिकस के सिद्धांत को प्रचारित तथा प्रसारित करने पर रोक लगा दिया. बाद में किसी तरह एक रोमन प्रचारक ज्योदार्न ब्रूनो को कोपरनिकस के सिद्धांत के बारे में पता चला. उसने कोपरनिकस के मॉडल का अध्ययन किया तथा समर्थन भी. ब्रूनो द्वारा कोपरनिकस के सिद्धांत का समर्थन रोमन धर्म न्यायाधिकरण को धर्म विरुद्ध नज़र आया, इसलिए उन्होंने ब्रूनो को रोम में जिन्दा जला दिया!

कोपरनिकस और ब्रूनों के बाद दुनिया के अलग-अलग कोनों में खगोलिकी के क्षेत्र में अनेक खोजे हुईं. जर्मनी के जोहांस केप्लर ने ग्रहों के गतियों का सही स्पष्टीकरण अपने तीन नियमों के आधार पर प्रस्तुत किया. इटली के वैज्ञानिक गैलिलियो ने दूरबीन का उपयोग खगोलविज्ञान के क्षेत्र में किया तथा कई महत्वपूर्ण खोजें की. इंग्लैण्ड के वैज्ञानिक आइजक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत तथा गति के तीन नियमों की खोज की.

18वीं सदी के दौरान कई खगोलशास्त्रियों ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम की हमारे सौरमंडल के बाहर वैधता को लेकर कई सवाल खड़े किए. हालांकि साल 1781 में सर विलियम हर्शेल ने अपनी बनाई दूरबीन से यूरेनस नामक एक ग्रह को खोज निकाला. और इस तरह पहली बार वैज्ञानिकों के लिए सौरमंडल की सीमा शनि ग्रह के पथ से बाहर पहुंची.
साल 1803 में विलियम हर्शेल जुड़वा तारों के अपने अध्ययन के आधार पर यह घोषणा कर सके थे कि वे भी गुरुत्वाकर्षण के उसी नियम को मानते हैं जिसके आधार पर हम सूर्य के चारों ओर घूमते ग्रहों की गतियों को समझते हैं. जुड़वा तारें वे तारे होते हैं जो एक-दूसरे के चारों ओर चक्कर लगाते हैं.
सर आइजक न्यूटन द्वारा सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज के बाद ग्रहों के पथों की गणना, तारों की दैनिक और वार्षिक गति, नए ग्रहों की खोज, ग्रहों और तारों के प्रकार, ब्रह्मांड में पदार्थों की मात्रा और पदार्थ के अन्य गुणों के अध्ययन और विवेचना का नया सिलसिला शुरू हुआ. 18वी सदी के अंत तक खगोलविज्ञान ने फलित ज्योतिष और धार्मिक पृष्ठभूमि को तिलांजलि दे दी थी. इसके बाद खगोल विज्ञान ब्रह्मांड के गुरुत्वीय, वर्णात्मक और वेधात्मक अध्ययन में बंट गया.

विलियम हर्शेल के खगोलीय अवलोकनों से आगे यह सिद्ध हुआ कि जिन पथों को हम देखते हैं वे दरअसल अंडाकार हैं और यह कि केप्लर का ग्रहों की गति संबंधी दूसरा नियम कि समान दूरी समान समय में तय होती है, वैध है. इस तरह न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त सार्वभौमिक सिद्ध हुआ. यह सवाल कि क्या ब्रह्मांड के सभी पदार्थों के लिए एक सार्वभौमिक एवं एकसमान नियम का निर्धारण किया जा सकता है, आखिरकार विज्ञान के सिद्धान्त के रूप में स्थापित हो गया. विलियम हर्शेल को ही आसमान में तारों से अलग प्रकार के बादल जैसे प्रकाश पुंजों के खोज का श्रेय दिया जाता है. इन्हीं प्रकाश पुंजों को उस समय नाम दिया गया- ‘प्रायद्वीपीय ब्रह्मांड’.

थॉमस राइट और एमानुएल कांट जैसे दार्शनिकों ने हर्शेल की इस खोज से पहले ही इनके बारे में अपने विचार प्रस्तुत किए थे. हालांकि प्रायद्वीपीय ब्रह्मांड बीसवीं सदी में हमारी आकाशगंगा-दुग्धमेखला जैसी मगर इससे बहुत दूर मौजूद विशाल और स्वतंत्र आकाशगंगाओं (मंदाकिनियों) के रूप में जाने जा सके, हर्शेल द्वारा ही पृथ्वी को ब्रह्मांड में उचित स्थान मिला.खगोलभौतिकी का जन्म
उन्नीसवीं सदी के मध्य में एक और क्रांति के जन्म हुआ, जब भौतिकी के क्षेत्र में वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) विश्लेषण, दीप्तिमिति (फोटोमीटरी) और फोटोग्राफी की शुरुवात हुई. इनके सम्मिलन से आधुनिक खगोलभौतिकी (मॉडर्न एस्ट्रोफिजिक्स) का जन्म हुआ. खगोलभौतिकी खगोलविज्ञान का वह अंग है जिसके तहत भौतिकी और रसायनशास्त्रो के नियमों द्वारा खगोलीय पिंडो की संरचना और उनके भौतिक गुणधर्मों का अध्ययन किया जाता है. खगोलभौतिकी मे तारों के अध्ययन का विशेष महत्व है. इसमें तारों की गतियों, उनकी रासायनिक संरचना, तापक्रम, अक्षभ्रमण, चुम्बकत्व, विकासक्रम वगैरह सम्मिलित है. खगोलभौतिकविद् भौतिकी के नियमों का इस्तेमाल सूर्य, तारे और उनके विकास, आकाशगंगा, अंतरतारकीय माध्यम (इंटरस्टेलर स्पेस) तथा कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन का अध्ययन करने के लिए करते हैं.

खगोलभौतिकी का आरंभ सूर्य के वर्णक्रम में सर विलियम वोल्लास्टन और जोसेफ़ फ़्राउनहोफ़र द्वारा गहरी रेखाओं (अवशोषण रेखाओं) के अध्ययन से आरंभ हुआ था. दरअसल सूर्य तथा अन्य तारों के बारे में हमारी तमाम जानकारी पृथ्वी पर पहुंचने वाले उनके प्रकाश या विकिरण के अध्ययन पर आधारित है. जिस तरह से सूर्य के प्रकाश को प्रिज्म से गुजारने पर इंद्रधनुष के विविध रंग प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार दूरस्थ तारों या आकाशगंगाओं के प्रकाश के वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) हासिल किए जा सकते हैं. इस स्पेक्ट्रम में एक सिरे से दूसरे सिरे तक, नीले से लेकर लाल तक, रंग मौजूद होते हैं और कई काली तथा सफ़ेद रेखाएं भी होती हैं.

वर्णक्रम से तारों के अनेक भौतिक गुणधर्मों के बारे में जानकारी मिल जाती है. खगोल भौतिकविद् स्पेक्ट्रोस्कोपी उपकरण के जरिये तारों और ग्रहों की रासायनिक संरचना का पता लगाते है, इस अध्ययन मे उस तारे द्वारा उत्सर्जित विद्युतचुंबकीय विकिरण के तरंगदैधर्य (वेवलेंथ) को देखा जाता है. दरअसल, किसी खगोलशास्त्री  के हाथो मे ब्रह्मांड के रहस्यों को अनावृत्त करने के लिए विद्युतचुंबकीय वर्णक्रम (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम) सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है. वर्णक्रम के अध्ययन से अत्यधिक मात्रा मे सूचना प्राप्त होती है. उदाहरण के लिए वर्णक्रम से हम किसी तारे की रासायनिक संरचना, तापमान, द्रव्यमान, आकार, दूरी और घनत्व को जान सकते हैं.

तारों की स्पेक्ट्रम रेखाओं से उनके तापमान और रासायनिक संरचना के ज्ञान के अलावा उनसे यह भी संकेत मिलता है कि ये तारे कितनी रफ्तार से हमसे दूर जा रहे हैं या निकट आ रहे हैं. यह डॉप्लर प्रभाव की बदौलत होता है. इस प्रभाव की खोज आस्ट्रिया के प्रसिद्ध भौतिकविद् क्रिश्चियन डॉप्लर ने सन 1842  में की थी.
इस प्रभाव के बारे में जानने के लिए हम रेलवे स्टेशन चलते हैं. जब भी हम किसी भी रेलवे-प्लेटफार्म से इस प्रभाव का प्रेक्षण करते हैं. तब हम देखतें हैं कि जब रेलगाड़ी हमारी ओर गतिमान होती हैं. अर्थात् हमारे नजदीक आ रही होती हैं, तब इंजन की सीटी का सुर (तारत्व) ऊंचा होने लगता हैं. मतलब अधिक आवृत्ति की सुनाई पड़ती हैं, परन्तु जैसे ही गाड़ी हमसे यानी प्रेक्षक से दूर जाने लगती हैं, तो इंजन की सीटी का सुर (तारत्व) नीचें होने लगती हैं. अर्थात् कम आवृत्ति की सुनाई पड़ती हैं. ध्वनि की आवृत्ति में परिवर्तन होने की इस घटना को क्रिश्चियन डॉप्लर के सम्मान में डॉप्लर प्रभाव (डॉप्लर इफैक्ट) का नाम दिया गया. हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति जो वाहन चलाता हैं और ट्राफिक-सिग्नल और चाल नियमों की अनदेखी कर देता है तो वाहन की गति को मापने के लिए ट्राफिक-पुलिसकर्मी डॉप्लर प्रभाव का इस्तेमाल करतें हैं. दरअसल, पुलिसकर्मी वाहनों से परावर्तित होने वालें ध्वनि तरंगो के स्पंदों के तरंगदैधर्य का मापन करतें हैं.

प्रकाश के साथ भी यह प्रभाव होता है. बस अंतर यह है कि ध्वनि में डॉप्लर-प्रभाव इस बात पर निर्भर करता हैं कि कोई का ध्वनि का स्रोत श्रोता की तरफ आ रहा हैं या उससे दूर जा रहा हैं. इसके विपरीत प्रकाश में यह प्रभाव सिर्फ प्रेक्षक तथा प्रकाश-स्रोत के बीच सापेक्ष-गति पर निर्भर करता हैं.  उन तारों का जो हमारी ओर बढ़ रहे होंगे उनका प्रकाश नीला (छोटे तरंगदैधर्य का) दिखाई देगा और जो तारे हमसे दूर जा रहे होंगे उनका प्रकाश लाल दिखाई देगा, क्योंकि उस स्थिति में तरंगदैधर्य बढ़ जाएगा. इस प्रभाव को हम आसानी से इसलिए देख सकते हैं क्योंकि तारों के स्पेक्ट्रम की गहरी या अवशोषण रेखाएं लाल या नीले रंग की ओर सरक जाती है. ये अपने मानक स्थान से कितने सरकीं, यह जानने से हम पता लगा सकते हैं कि कोई तारा हमसे कितना रफ्तार से दूर या नजदीक आ रहा है.

रेडियो खगोलविज्ञान
1930 के दशक में ही रेडियो खगोलविज्ञान का जन्म हुआ. गैलीलियो के दूरबीन के बाद यह खगोलीय अवलोकन के क्षेत्र में दूसरा बड़ा कदम था. वर्ष 1932 में अमेरिकी इंजिनीयर कार्ल जेन्सकी ने हमारी आकाशगंगा-दुग्धमेखला से आने वाली रेडियो तरंगों को पहली बार पृथ्वी पर ग्रहण किया. यह एक महान खोज थी, मगर इसका व्यापक उपयोग करके रेडियो खगोलविज्ञान को जन्म देना वर्ष 1934 में ही संभव हुआ, जब ग्रोट रीबर ने पहली बार हंस (सिग्नस) तारामंडल से आती रेडियो तरंगों को अपने रेडियो दूरबीन के जरिये पकड़ी. उसके बाद दुनिया भर के अनेक देशों में बड़ी-बड़ी रेडियो दूरबीने बनी, जिनकी सहायता से ब्रह्मांड के अनेकानेक रहस्यों से पर्दा उठा.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं. यह लेख 'विज्ञान और मानव संस्कृति में ब्रह्मांड' सीरीज का हिस्सा है और यह पांचवां आलेख है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: August 16, 2020, 3:04 PM IST
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