जीनोम अनुसंधान से जगी उम्मीदें, लेकिन दुरुपयोग की आशंकाएं भी निराधार नहीं!

वर्तमान में वैज्ञानिकों को मानव जीनोम के रूप में एक बहुत ही उपयोगी साधन हासिल हो गया है. गौरतलब है कि हमारे डीएनए में मौजूद सभी जीनों के समूह को ‘जीनोम’ नाम दिया गया है. जीनोम अनुसंधान को हम सम्पूर्ण मानव जाति के बेहतर स्वास्थ्य व कल्याण से भी जोड़कर देख सकते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 19, 2021, 12:10 pm IST
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जीनोम अनुसंधान से जगी उम्मीदें, लेकिन दुरुपयोग की आशंकाएं भी निराधार नहीं!
म जीव विज्ञान की सदी में रह रहें हैं. यह काफी पहले ही घोषित किया जा चुका है कि अगर 20वी सदी भौतिक विज्ञान की सदी थी तो निश्चित रूप से 21वी सदी जीव विज्ञान की सदी होगी. पिछले कुछ वर्षों में जीव विज्ञान में हुई असाधारण प्रगति की बदौलत अब हम आनुवंशिकता की प्रक्रिया को लेकर एक बेहतर समझ बना पा रहे है. जीव विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति और तकनीकी विकास की रफ्तार इतनी तेज हो चुकी है, जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की गई थी.



वर्तमान में वैज्ञानिकों को मानव जीनोम के रूप में एक बहुत ही उपयोगी साधन हासिल हो गया है. गौरतलब है कि हमारे डीएनए में मौजूद सभी जीनों के समूह को ‘जीनोम’ नाम दिया गया है. जीनोम अनुसंधान को हम सम्पूर्ण मानव जाति के बेहतर स्वास्थ्य व कल्याण से भी जोड़कर देख सकते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह लाइलाज बीमारियों के उपचार के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोल सकता है.



दुनिया भर में लाखों लोग ऐसी दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित हैं, जिनका इलाज या तो बहुत महंगा है या फिर अभी तक उनका इलाज खोजा ही नहीं जा सका है. 80 प्रतिशत दुर्लभ बीमारियाँ आनुवंशिक होती हैं. आनुवांशिक का मतलब ऐसी बीमारियाँ जो पीढ़ी दर पीढ़ी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में जाती हैं. जीनोमिक्स में हुई प्रगति की बदौलत कई आनुवांशिक बीमारियों से जुड़े कारकों की पहचान करना अब संभव हो सकेगा.




अब यह भी संभव हो सकेगा कि उस बीमारी के लिए ज्यादा असरदार दवाइयाँ बनाई जा सके, बीमार व्यक्ति का बेहतर इलाज हो सके और व्यक्ति को दुर्लभ व जटिल आनुवांशिक बीमारियाँ होने से पहले ही बचाया जा सके.



जीन थेरेपी से आनुवांशिक बीमारियों के इलाज की उम्मीद

साल दर साल जीनोम अनुसंधान कई दुर्लभ आनुवांशिक बीमारियों के उपचार की दिशा में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है. लिहाजा, यह रोगियों के बीच आशा की एक नई किरण के तौर पर उभरा है. इस दिशा में हालिया बड़ी कामयाबी है: बच्चों में होने वाली तंत्रिका (न्यूरोजेनेटिक) संबंधी एक दुर्लभ बीमारी एरोमेटिक एल-एमिनो एसिड डिकारबॉक्साइलेज (एएडीसी) के इलाज के लिए एक खास तरह की जीन थेरेपी तकनीक का विकास.



ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस नवीनतम जीन थेरेपी तकनीक को विकसित किया है. इस तकनीक से एएडीसी से पीड़ित बच्चों का इलाज किया गया, जिसके नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे. एएडीसी एक ऐसी बीमारी है जिससे रोगी के मस्तिष्क में सिरोटोनिन और डोपामाइन नामक रसायन नहीं बनते हैं. ये दोनों रसायन भावनाओं को पैदा करने के लिए जिम्मेदार होते हैं. सेंट्रल नर्वस सिस्टम में इन रसायनों को पैदा करने वाले एंजाइम होते हैं.



सेंट्रल नर्वस सिस्टम में रसायनों को पैदा करने वाला एंजाइम एएडीसी से पीड़ित बच्चों में नहीं पाया जाता है. इसकी गैरमौजूदगी से बच्चों का उनकी मांसपेशियों पर से नियंत्रण कम हो जाता है, जिससे उन्हें बोलने, खाने, चलने और किसी वस्तु को पकड़ने में बहुत कठिनाई होती है. इसके अतिरिक्त उन्हें ओक्युलोग्रीक क्राइसिस नामक दौरे भी पड़ते हैं.




हालिया विकसित जीन थेरपी तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों ने कई बच्चों में इस दौरे को बंद करने में कामयाबी हासिल की. न सिर्फ बच्चों ने हँसना शुरू कर दिया बल्कि उनके स्वभाव में भी काफी सुधार हुआ. इस शोध के निष्कर्ष नेचर कम्यूनिकेशंस जर्नल के हालिया अंक में प्रकाशित किए गए हैं. शोध टीम के सदस्य और न्यूरोलॉजिकल सर्जरी के विशेषज्ञ डॉ. क्रिस्टोफ बैंकीविज के मुताबिक, हमें जो नतीजे देखने को मिले हैं उससे ऐसी ही अन्य बीमारियों के इलाज खोजने की राह भी खुली है.



संभावनाओं के साथ चुनौतियाँ भी!

आज पूरी दुनिया जिस बायोटेक्नोलॉजी युग के द्वार पर खड़ी है, वह परंपरागत बायोटेक्नोलॉजी से पूरी तरह अलग है. यह आण्विक जीवविज्ञान (मोलिक्युलर बायोलॉजी) की देन है, जिसे जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी या जेनेटिक इंजीनियरिंग कहा जा रहा है. जीन सजीवों में सूचना की बुनियादी इकाई और डीएनए का एक हिस्सा होता है. जीन इस लिहाज से स्वार्थी होते हैं कि उनका एकमात्र उद्देश्य होता है स्वयं की ज्यादा से ज्यादा प्रतिलिपियों को अगली पीढ़ी में पहुंचाना.



इसलिए जीन माता-पिता और पूर्वजों के गुण और रूप-रंग संतान में पहुंचाता है. कह सकते हैं कि काफी हद तक हम वैसा ही दिखते हैं या वही करते हैं, जो हमारे शरीर में छिपे सूक्ष्म जीन तय करते हैं. डीएनए के उलट-पुलट जाने से जींस में विकार पैदा होता है और इससे आनुवांशिक बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बच्चों को अपने पुरखों से विरासत में मिलती है. चूंकि शरीर में क्रियाशील जीन की स्थिति ही बीमारी विशेष को आमंत्रित करती है, इसलिए वैज्ञानिक लंबे अरसे से इंसान की जीन कुंडली को पढ़ने में जुटे हैं.



वैज्ञानिकों का उद्देश्य जन्म से पहले या जन्म के साथ शिशु को जीन एडिटिंग तकनीक के जरिये आनुवांशिक बीमारियों को नियंत्रित करने वाले जीन को पहचान कर उसे सुधारना रहा है. इस दिशा में इतनी प्रगति हुई है कि अब जेनेटिक इंजीनियर आसानी से आण्विक कैंची का इस्तेमाल करके दोषपूर्ण जीन की काट-छांंट कर सकते हैं, और जीन एडिटिंग की इस तकनीक को व्यावहारिक रूप से पौधों या जानवरों की किसी भी प्रजाति पर लागू किया जा सकता है.




दुधारी तलवार की तरह है जीनोम अनुसंधान

जीन एडिटिंग तकनीक आनुवांशिक बीमारियों का इलाज करने की दिशा में निश्चित रूप से एक मील का पत्थर है. इसकी संभावनाएं चमत्कृत कर देने वाली हैं. यह निकट भविष्य में आण्विक स्तर पर रोगों को समझने और उनसे लड़ने के लिए एक अचूक हथियार साबित हो सकता है. लेकिन यह भी सच है कि ज्ञान दुधारी तलवार की तरह होता है. हम इसका इस्तेमाल विकास के लिए कर सकते हैं और विनाश के लिए भी!



जीन एडिटिंग के विरोधियों का मानना है कि इससे डिजाइनर बेबी बनाने का कारोबार भी शुरू हो सकता है. जो आर्थिक रूप से संपन्न लोग होंगे उन्हें अपने बच्चे के बुद्धि-चातुर्य और व्यक्तित्व को जीन एडिटिंग के जरिये संवारने-सुधारने का मौका मिलेगा. स्वाभाविक ही इससे सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा. हालांकि, वैज्ञानिकों का एक तबका जीन एडिटिंग तकनीक को मनुष्यों पर आजमाने को गलत नहीं मानता. उसे लगता है कि ऐसे प्रयोग लाइलाज बीमारियों के उपचार की नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं.



 
इससे किसी बीमार व्यक्ति के दोषपूर्ण जीनों का पता लगाकर जीन एडिटिंग द्वारा स्वस्थ जीन आरोपित करना संभव होगा. मगर विरोधी इस तर्क से भी सहमति नहीं जताते. उनका कहना है कि अगर जीन विश्लेषण से किसी व्यक्ति को पता चल जाए कि भविष्य में उसे फलां बीमारी होने वाली है और वह जीन एडिटिंग/ जीन थेरेपी करवाने में आर्थिक रूप सक्षम नहीं है, तो उसकी क्या स्थिति होगी? क्या बीमा कंपनियां ऐसे भावी रोगी का बीमा करेंगी? क्या नौकरी में इस जानकारी के आधार पर उससे भेदभाव नहीं होगा?




इसके अलावा जीन एडिटिंग तकनीक अगर गलत हाथों में पहुंच जाए तो इसका उपयोग विनाश के लिए भी किया जा सकता है. आतंकवादी अनुसंधानकर्ता अमानवीय मनुष्य के निर्माण की कोशिश भी कर सकते हैं. तब इन अमानवीय लोगों से आम आदमी कैसे निपट सकेगा?



जाहिर है, संभावनाएं अपार हैं और चुनौतियां भी. ऐसी चुनौतियों से जूझते हुए ही मनुष्य विकास की संभावनाएं खंगालते यहां तक पहुंचा है. आगे भी उसे विकास की इसी प्रक्रिया के साथ चलना है. अस्तु!
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: July 19, 2021, 12:10 pm IST
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