रात अंधेरी क्यों? कैसे हुआ आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञान का जन्म

डॉ. ओल्बर्स ने बरसों पहले निष्कर्ष निकाला कि चूंकि तारे असीमित दूरी तक फैले हैं. इसलिए हम तक पहुंचने वाला उनका प्रकाश भी असीमित होगा. उन्होंने यह सिद्ध भी कर दिया कि रात में आकाश अंधकारमय होने की बजाय तेज रोशनीयुक्त होनी चाहिए. आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान ने ओल्बर्स के विवेचन में क्या त्रुटि निकाली, इसकी चर्चा आगे करेंगे.

Source: News18Hindi Last updated on: August 24, 2020, 3:22 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
रात अंधेरी क्यों? कैसे हुआ आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञान का जन्म
(फोटो: रायटर्स)
सन् 1826 में वियना के एक चिकित्सक और शौकिया खगोलशास्त्री हेनरिक विल्हेम ओल्बर्स ने एक सवाल उठाया कि रात में आकाश अंधकारपूर्ण क्यों रहता है? ओल्बर्स ने यह माना कि ब्रह्मांड अनादि है और अनंत रूप से विस्तृत है तथा तारों से समान रूप से भरा हुआ है. यहां पर यह सवाल उठता है कि इन सभी तारों से हमें कुल कितना प्रकाश प्राप्त होना चाहिए? दूर स्थित तारा अधिक प्रकाश नहीं भेज सकता है क्योंकि भौतिकी का यह नियम है कि कोई भी प्रकाशवान वस्तु प्रेक्षक से जितनी अधिक दूर होती है, उससे आनेवाला प्रकाश उतना ही कम मिलता है. परंतु जितना अधिक दूर हम देखते है, उतने ही अधिक तारे हमें दिखाई देते हैं तथा उनकी संख्या इस दूरी के वर्ग के अनुपात में बढ़ती जाती है. ये दोनों ही प्रभाव एक दूसरे को निष्फल कर देते हैं. अत: एक निश्चित दूरी पर स्थित तारे कुल मिलकर हमे एक जैसा ही प्रकाश देते हैं फिर चाहें वे पास हों या दूर! इससे चिकित्सक ओल्बर्स ने यह निष्कर्ष निकाला कि चूंकि तारे असीमित दूरी तक फैले हुए हैं, इसलिए हम तक पहुंचने वाला उनका सम्मिलित प्रकाश भी असीमित होगा. दूसरे शब्दों में सूर्य चाहे हो या न हो, चाहे रात हो या दिन हो, आकाश असीमित रूप से प्रकाशमान होना चाहिए. वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि यदि आकाश इतना अधिक प्रकाशमान होता तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होता. मगर ओल्बर्स ने भी सामान्य तर्कों तथा गणित की सहायता से यह सिद्ध कर दिया कि रात्रि आकाश अंधकारमय होने की बजाय अत्यधिक मात्रा में प्रकाशवान होना चाहिए. इस गणना को ओल्बर्स विरोधाभास के नाम से जाना जाता है. उस समय के वैज्ञानिकों को स्पष्ट रूप से लगा कि ओल्बर्स के इस तर्क में कोई न कोई गलती अवश्य है. परंतु गणितीय दृष्टि से मजबूत होने के कारण उस समय ओल्बर्स के विवेचन में कोई भी गलती नहीं निकाली जा सकी. आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान ने ओल्बर्स के विवेचन में क्या त्रुटि निकाली, इसकी चर्चा हम आगे करेंगे.

आज हम जानते हैं कि जिस पृथ्वी पर रहते हैं, वह ब्रह्माण्ड तथा सौरमंडल का मात्र एक औसत आकार का ग्रह है. हमारी विराट पृथ्वी सौरमंडल का एक सदस्य है, जिसका मुखिया विशालकाय गर्म गैसयुक्त खगोलीय पिंड सूर्य है. सूर्य पृथ्वी पर जीवों की शक्ति का प्रमुख स्रोत है. सूर्य की प्रत्येक हलचल का प्रभाव पृथ्वी के जीव-जगत पर पड़ता है. सूर्य इतना अधिक विशाल है कि इसमें हमारी पृथ्वी जैसी लगभग 14 लाख खगोलीय पिंड समा सकते हैं. सौरमंडल का स्वामी होने के बावजूद सूर्य भी विशाल आकाशगंगा-दुग्धमेखला (मिल्की-वे) नाम की मंदाकिनी (गैलेक्सी) का एक साधारण और औसत आकार का तारा है. सूर्य 225 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से हमारी आकाशगंगा के केंद्र के चारों तरफ परिक्रमा कर रहा है. आकाशगंगा की एक परिक्रमा को पूर्ण करने में सूर्य को लगभग 25 करोड़ वर्ष लगते हैं. 25 करोड़ वर्ष की इस अत्यंत लम्बी अवधि को ब्रह्माण्ड-वर्ष या कॉस्मिक-ईयर (के नाम से जाना जाता है. गौरतलब है कि पृथ्वी पर मनुष्य के सम्पूर्ण अस्तित्व-काल में सूर्य ने आकाश-गंगा की एक भी परिक्रमा पूर्ण नहीं की है.

हमारी अपनी आकाशगंगा मिल्की-वे में तकरीबन 100 अरब से 400 अरब के बीच तारे हैं और सभी तारे आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा कर रहे हैं. मिल्की-वे आकाशगंगाओं के लोकल ग्रुप की सदस्य है. लोकल ग्रुप आकाशगंगाओं के समूह या पुंज (क्लस्टर) का सदस्य है, और यह समूह भी सुपर क्लस्टर का सदस्य है. यह सिलसिला यहीं समाप्त नहीं होता, लेकिन फिलहाल हमें इससे आगे जाने की जरूरत  है. कुल-मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि स्थूल रूप से ब्रह्मांड आकाशगंगाओं या मंदाकिनियों का समूह है.

जैसा कि हम जानते हैं कि ब्रह्माण्ड मन्दाकिनियो का अत्यंत विराट एवं विशाल समूह है. यहां पर कई प्रश्न उठना मानवीय मस्तिष्क के लिए स्वाभाविक है कि इतना विराट ब्रह्माण्ड कब, कैसे और किससे उत्पन्न हुआ? ब्रह्माण्ड इतना विशाल क्यों है? आखिर यह कितना विशाल है? क्या यह स्थिर है अथवा प्रसारमान? ब्रह्माण्ड का कुल द्रव्यमान कितना है? क्या इसका कुल द्रव्यमान सीमित है अथवा अनंत? ब्रह्माण्ड कब तक प्रसरणशील रहेगा? पुरातन-काल में ब्रह्मांड की स्थिति कैसी रही होगी?  इस विराट ब्रह्माण्ड में पृथ्वी का क्या स्थान है? ब्रह्माण्ड का भावी परिदृश्य (भविष्य) क्या होगा? वगैरह-वगैरह.
ब्रह्माण्ड से सम्बन्धित उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर पाना हमेशा से ही कठिन रहा है. ब्रह्माण्ड की संकल्पना ने मानवीय मस्तिष्क को सदियों से उलझन में डाल रखा है. कोई भी यह नहीं बता सकता कि ब्रह्माण्ड का पहले जन्म हुआ या उसके जन्मदाता का? यदि पहले ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ तो उसके जन्म से पहले उसका जन्मदाता कहां से आया?

वास्तविकता में ब्रह्माण्ड के विषय में वैज्ञानिकों को भी बहुत कम जानकारी है. ब्रह्माण्ड के संबंध में बहुत कुछ अनुमानों एवं कल्पनाओं के आधार पर वैज्ञानिकों ने अपने मत प्रस्तुत किए हैं. रात के समय आसमान की ओर देखे तो आकाश में फैला हुआ तारों का एक शुभ्र पट्टा दिखाई देता हैं. दरअसल, यही आसमान ब्रह्माण्ड का एक छोटा-सा भाग हैं. हम अपनी कोरी आंखों से जितने भी तारे देख सकते हैं उनके साथ-साथ हम, हमारी पृथ्वी, सौरमंडल के समस्त ग्रह, उपग्रह, उल्का-पिण्ड, धूमकेतु और सूर्य भी विशाल आकाशगंगा के अंग हैं. आकाशगंगा के आकार को समझने के लिए चपटी रोटी की कल्पना कीजिए जिसका मध्यभाग थोड़ा-सा फुला हुआ है. अरबों-खरबों तारों की एक विशाल योजना को मंदाकिनी कहते हैं. आकाशगंगा एक मन्दाकिनी ही है.

ब्रह्मांड इतना विशाल हैं कि इसकी हम कल्पना भी नही कर सकते, अरबों-खरबों किलोमीटर लम्बा-चौड़ा मालूम होता है।. ब्रह्माण्ड की दूरियां इतनी अधिक होती हैं कि हम उसे किलोमीटर या अन्य सामान्य इकाईयों में व्यक्त नही कर कर सकते हैं. इसलियें हमे एक विशेष पैमाना निर्धारित करना पड़ा-प्रकाशवर्ष. अल्बर्ट आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की महत्तम गति है प्रकाश की गति. दरअसल प्रकाश की किरणें एक सेकंड में तीन लाख किलोमीटर की दूरी तय करती हैं. इस वेग से प्रकाश-किरणें एक वर्ष में जितनी दूरी तय करती हैं, उसे एक प्रकाश-वर्ष कहते हैं. इसलिए एक प्रकाश-वर्ष 94 खरब, 60 अरब, 52 करोड़, 84 लाख, 05 हजार किलोमीटर के बराबर होता है. सूर्य हमसे 8 मिनट और 18 प्रकाश सेकंड दूर है. पृथ्वी तथा सूर्य के बीच की इस दूरी को खगोलीय इकाई या खगोलीय एकक (एस्ट्रोनोमिकल यूनिट) कहते हैं. सूर्य के पश्चात् हमसे सर्वाधिक नजदीकी तारा प्रौक्सिमा -सेंटौरी है, जिसकी दूरी लगभग 4.3 प्रकाश-वर्ष है.प्रकाश-वर्ष हमें समय और दूरी दोनों की सूचना देता है, हम यह भी कह सकते हैं कि प्रौक्सिमा-सेंटौरी से प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में 4.3 प्रकाश-वर्ष लगेंगे. आकाश का सर्वाधिक चमकीला तारा लुब्धक या व्याध हमसे तकरीबन 9 प्रकाश-वर्ष दूर है. तारों की दूरियां मापने के लिए एक और पैमाने का इस्तेमाल होता है, जिसे पारसेक कहते हैं. एक पारसेक 3.26 प्रकाश-वर्षों के बराबर है. प्रकाश-वर्ष और पारसेक का खगोलीय पैमाना समझ लेने के पश्चात् अब हम ब्रह्माण्ड एवं खगोलशास्त्र से सबंधित बहुत से तथ्यों एवं अवधारणाओं को सुविधानुसार समझ सकते हैं.

स्थिर ब्रह्मांड की अवधारणा
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन द्वारा सन् 1917 में प्रस्तावित ब्रह्माण्डीय प्रतिरूपों के अनुसार ब्रह्माण्ड तीन प्रकार का स्वरूप धारण कर सकता है. पहला-यह एक गोले की सतह की तरह धनात्मक झुका और इसका विस्तार एक सीमा में बंधा हो सकता है. दूसरा-घोड़े की पीठ पर रखी जाने वाली जीन की तरह ऋणात्मक झुका हो सकता है और विस्तार अनंत. तीसरे प्रतिरूप के अनुसार यह चपटा हो सकता है, जिस पर युक्लिड की ज्यामिती लागू होती हैं और इसकी वक्रता शून्य हो सकती हैं. और इसका विस्तार सीमाहीन हो सकता है. सीमितता-युक्त ब्रह्माण्ड में यदि प्रकाश की किरणें भेजी जाए तो वह ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर लौट आएगी. जबकि अनंत अथवा सीमाहीन ब्रह्माण्ड में प्रकाश की किरणें किसी भी दिशा में भेजी जाए, तो वह वापिस नही आएगी.

जब हम आकाश की ओर देखतें हैं तो हमें आकाश में न तो फैलाव दिखाई पड़ता है और न ही सिकुड़न तब हम उस स्थिति में आकाश को स्थिर आकाश कह सकते हैं. इस स्थिति में कोई भी विचारशील व्यक्ति यही मानेगा कि ब्रह्मांड का आकार सीमित है तथा इसका कुल द्रव्यमान निश्चित है, इसलिए ब्रह्मांड समय के साथ अपरिवर्तित (स्थिर) है.

आइंस्टाइन का भी पहले यही मानना था कि ब्रह्मांड स्थिर, शाश्वत एवं सीमित है. मतलब उनका यह मानना था कि ब्रह्मांड हमेशा से ऐसा रहा है और सदैव ही ऐसा रहेगा. यद्यपि आइंस्टाइन के ही सामान्य सापेक्षता सिद्धांत से यह स्पष्ट हो रहा था कि दिक्-काल या तो सिकुड़ेगा या फिर फैलेगा, मगर स्थिर नहीं रहेगा. आइंस्टाइन को अपने ही सिद्धांत में स्थिर ब्रह्मांड के पक्ष में संकेत न मिलने के बावजूद उसके समर्थन में अपने ही समीकरणों को संशोधित करते हुए उसमें उन्होंने एक पद जोड़ा, जिसे ब्रहमांडीय नियतांक कहते हैं. दरअसल आइंस्टाइन ने एक विरोधी गुरुत्वाकर्षण बल की कल्पना की थी. जहां प्रत्येक गुरुत्वाकर्षण बल का कोई न कोई स्रोत होता है वहीं आइंस्टाइन द्वारा कल्पित विरोधी गुरुत्वाकर्षण बल का कोई खास स्रोत नहीं था, बल्कि वह दिक्-काल का एक अंतर्निहित अंग था जिसकी प्रकृति और प्रवृत्ति ब्रह्मांड को संकुचित होने से रोकने एवं स्थिरता प्रदान करने की थी.

आइंस्टाइन के विचारों से रुसी वैज्ञानिक एलेक्जेंडर फ्रीडमैन सहमत नहीं थे. उन्होंने सन् 1922 में अपने सैद्धांतिक खोजों के आधार पर यह पता लगाया कि ब्रह्मांड के बारे में हमें यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह स्थिर है. वस्तुतः उन्होंने ब्रह्मांड के गतिशील होने की बात रखी!

फ्रीडमैन ने दो महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत किए. पहला यह कि ब्रह्मांड हर तरफ, हर दिशा में एक जैसा दिखाई देता है और दूसरा यह कि ब्रह्मांड किसी भी स्थान से देखने पर एक जैसा दिखाई देता है. फ्रीडमैन के ब्रह्माण्डीय मॉडल की दो अवस्थाएं हैं. पहली यह है कि आकाशगंगाएं धीरे-धीरे एक दूसरे से दूर होते जाते हैं परंतु कुछ देर बाद गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें एक-दूसरे से दूर जाने से रोक देता है, तब ये निकट आने लगते हैं, इसके कारण फैलाव के स्थान पर संकुचन होगा. दूसरी अवस्था यह है कि आकाशगंगाएं इतनी तीव्र गति से एक दूसरे से दूर होती जा रही हैं कि गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें दूर जाने से रोक नहीं पाएगा, परिणामस्वरूप ब्रह्मांड हमेशा फैलता ही रहेगा.

जिस समय फ्रीडमैन ने उपरोक्त तर्क रखें, उस समय आइन्स्टाइन तथा अन्य वैज्ञानिकों ने उनके तर्कों की उपेक्षा की. लेकिन एडविन हब्बल ने एक ऐसी खोज की कि वैज्ञानिकों को इस बात का ज्ञान हो गया कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं है, बल्कि गतिशील है. आइए, उस क्रांतिकारी खोज की चर्चा करते हैं.

फैलता हुआ ब्रह्मांड
बीसवी सदी के प्रारम्भ में कोई भी वैज्ञानिक नहीं जानता था कि तारों से परे ब्रह्मांड का विस्तार कहां तक है. वर्ष 1920 में खगोलविदों द्वारा एक अन्तर्राष्ट्रीय विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें ब्रह्मांड के विस्तार एवं आकार पर चर्चा होनी थी. हार्लो शेप्ली तथा बहुसंख्य खगोलविद इस मत के पक्ष में थे कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड का विस्तार हमारी आकाशगंगा तक ही सीमित है. दूसरी तरफ हेबर क्यूर्टिस तथा कुछ थोड़े से लोगों का मानना था कि हमारी आकाशगंगा की ही तरह ब्रह्मांड में दूसरी भी आकाशगंगाएं हैं, जो हमारी आकाशगंगा से अलग अस्तित्व रखती हैं. जैसाकि बड़ी-बड़ी विचार गोष्ठियों में होता है, इस बैठक में भी बहुमत का ही पलड़ा भारी रहा.

1924 में एडविन हब्बल तथा उनके सहयोगियों ने माउंट विल्सन वेधशाला की दूरबीन से यह सिद्ध कर दिया कि इस विराट ब्रह्मांड में हमारी आकाशगंगा की तरह लाखों अन्य आकाशगंगाएं भी हैं. अत: हब्बल के प्रेक्षणों ने क्यूर्टिस के दृष्टिकोण को सही सिद्ध कर दिया. मगर, हब्बल के निरीक्षण के अन्य निष्कर्ष क्यूर्टिस की कल्पना से भी परे के थे. दरअसल 1929 में हब्बल ने यह भी खोज की कि दूर की आकाशगंगाओं से प्राप्त होने वाले प्रकाश की तरंग-लंबाई में एक नियमित वृद्धि है. डॉप्लर प्रभाव के अनुसार जब एक प्रकाश स्रोत हमसे दूर जाता है, तो उससे प्राप्त होने वाले प्रकाश की तरंग-लंबाई में ऐसी ही वृद्धि दिखाई देती है. चूंकि एक सामान्य वर्णक्रम में अधिकतम तरंग-लंबाई लाल रंग और न्यूनतम तरंग-लंबाई नीले-बैंगनी रंग से प्रदर्शित होता है, इसलिए हब्बल द्वारा प्राप्त वर्णक्रम को लाल विचलन कहते हैं. अत: हब्बल ने अपने इस प्रेक्षण से यह निष्कर्ष निकाला कि दूरस्थ आकाशगंगाएं हमसे दूर भाग रही हैं. हब्बल ने यह भी सिद्ध किया कि आकाशगंगाएं जितनी अधिक दूर है, उनकी दूर जाने का वेग भी उतना ही अधिक है. हब्बल ने इसी आधार पर कहा कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड प्रसारमान है, फ़ैल रहा है!

जैसा कि हम जानते हैं कि आइन्स्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष था कि ब्रह्मांड सिकुड़ेगा या फैलेगा, मगर स्थिर नहीं रहेगा. वर्ष 1927 में जब जार्ज लेमाइत्रे ने सामान्य सापेक्षता के इन निष्कर्षों को आइन्स्टाइन को बताया तो उनकी प्रतिक्रिया थी: ‘लेमाइत्रे, तुम्हारी गणित तो ठीक है, परंतु भौतिकी बहुत बुरी।’ आइन्स्टाइन स्थिर ब्रह्मांड के कट्टर पक्षधर थे. परंतु हब्बल की खोज ने सदियों पुरानी उस मान्यता को भी नकार दिया जिसके अनुसार ब्रह्मांड शाश्वत एवं स्थिर है. हब्बल की खोज के बाद आइन्स्टाइन ने कहा कि ब्रह्मांड को स्थिर बनाने के लिए अपने समीकरणों में ब्रह्माण्डीय नियतांक को जोड़ना उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी.

अब वियना के चिकित्सक ओल्बर्स के विरोधाभास पर चर्चा करते हैं, जिसकी चर्चा हमने लेख के शुरुआत में की थी. जैसाकि सदियों के प्रेक्षण और हमारा अस्तित्व यह सिद्ध कर रहे थे कि आकाश इतना अधिक प्रकाशमान नहीं हो सकता. तो प्रश्न यह है कि ओल्बर्स के गणनाओं में क्या गलती थी? इसका संक्षिप्त उत्तर है: उन्हें यह नहीं ज्ञात था कि ब्रह्मांड फ़ैल रहा है. दरअसल डॉप्लर प्रभाव के कारण दूर के तारों से प्राप्त होनेवाला प्रकाश और भी अधिक कम हो जाता है तथा इसका योगदान ओल्बर्स द्वारा गणना किए गए अंश से काफी कम हो जाता है. इसलिए इस प्रश्न ‘रात अंधेरी क्यों?’ का उत्तर है : ब्रह्मांड फ़ैल रहा है! (यह लेखक के निजी विचार हैं. यह लेख 'विज्ञान और मानव संस्कृति में ब्रह्मांड' सीरीज का छठा पार्ट है.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: August 24, 2020, 3:22 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर