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प्रकृति ने नए आविष्कारों और नवाचारों के लिए कैसे किया प्रेरित

बायोमिमिक्री तकनीकी नवचार व आविष्कार के क्षेत्र में प्रयोग होने वाला एक नया पारिभाषिक शब्द है. प्रकृति में पाई जाने वाली प्रणालियों और जैव विविधता का वैज्ञानिक विधियों द्वारा अध्ययन एवं उपयोग करके इंजीनियरी तंत्रों को विकसित और डिज़ाइन करना ‘बायोमिमिक्री’ कहलाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 21, 2020, 5:39 PM IST
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प्रकृति ने नए आविष्कारों और नवाचारों के लिए कैसे किया प्रेरित
बायोमिमिक्री तकनीकी नवचार व आविष्कार के क्षेत्र में प्रयोग होने वाला एक नया पारिभाषिक शब्द है. प्रकृति में पाई जाने वाली प्रणालियों और जैव विविधता का वैज्ञानिक विधियों द्वारा अध्ययन एवं उपयोग करके इंजीनियरी तंत्रों को विकसित और डिज़ाइन करना ‘बायोमिमिक्री’ कहलाता है.
पृथ्वी एकमात्र ग्रह है जो जीवन का समर्थन करने के लिए जाना जाता है, और इसकी प्राकृतिक विशेषताएं वैज्ञानिक अनुसंधान के कई क्षेत्रों का विषय हैं. यह पृथ्वी, जिसकी कोख में करोड़ों पेड़-पौधे, जीव-जातियाँ पनप रही हैं, जो इन सभी जीव जातियों को पाल पोस रही है. हम यह कह सकते हैं कि सबसे बड़ी वैज्ञानिक व रचयिता तो प्रकृति स्वयं है. हज़ारों-लाखों वर्षों में उसने जो कुछ विकसित किया है, आजकल के वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में उसी से सीखने-समझने की कोशिश कर रहे हैं.

बायोमिमिक्री तकनीकी नवचार व आविष्कार के क्षेत्र में प्रयोग होने वाला एक नया पारिभाषिक शब्द है. प्रकृति में पाई जाने वाली प्रणालियों और जैव विविधता का वैज्ञानिक विधियों द्वारा अध्ययन एवं उपयोग करके इंजीनियरी तंत्रों को विकसित और डिज़ाइन करना ‘बायोमिमिक्री’ कहलाता है. बायोमिमिक्री का शाब्दिक अर्थ है- प्राकृतिक जीव-जंतुओं से प्रेरित होकर या नकल करके किया जाने वाला आविष्कार. और इस तरह बायोमिमिक्री पारिस्थितिक तंत्र और उसके निवासियों के लिए संरक्षण को भी  प्रोत्साहित करती है. बायोमिमिक्री के वैज्ञानिक अध्ययन की शाखा का नाम है- बायोमिमेटिक्स.

प्रसिद्ध महिला जीवविज्ञानी और बायोमिमिक्री इंस्टीट्यूट की संस्थापक जेनीन बेनायस ने बायोमिमिक्री को लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया. उन्होंने 1997 में ‘बायोमिमिक्री : इनोवेशन इन्सपायर्ड बाय नेचर’ नामक एक किताब भी लिखी तथा इसे परिभाषित तथा व्याख्यायित किया. उनके अनुसार कोई सजीव जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है. यानी कोई भी जैविक निर्माण लाखों-करोड़ों वर्षों के निरंतर जैविक विकास और प्राकृतिक अनुकूलन का नतीजा होता है. इसलिए इन जीवों से प्रेरणा लेकर मानव जीवन के लिए उपयोगी और टिकाऊ आविष्कार किए जा सकते हैं. जेनीन बेनायस कहती हैं कि ‘जब हम देखते हैं कि इस पृथ्वी पर वास्तव में टिकाऊ क्या है, तो एकमात्र वास्तविक मॉडल जिसने लंबे समय तक काम किया है वह है- हमारी यह प्राकृतिक दुनिया. इस तरह यह स्पष्ट है कि बायोमिमिक्री प्रकृति की तकनीक को आम इंसानी ज़िंदगी में अमल में लाने की विधा है. इसके इस्तेमाल से मानव जिंदगी को और भी बेहतर तथा सुविधाजनक बनाया जा सकता है. आइए, बायोमिमिक्री को कुछ उदाहरणों तथा अनुप्रयोगों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं.

पक्षियों की तरह आसमान में उड़ना
इटली के महान वैज्ञानिक और चित्रकार लिओनार्दो दा विंची ने वर्ष 1445 में सर्वप्रथम उड़ने वाले यंत्र की कल्पना की थी तथा पेंटिग्स बनाई थी. उन्होंने पक्षियों की शारीरिक संरचना और इनके उड़ने की तौर-तरीकों का बारीकी से अध्ययन किया और इसके आधार पर पैराशूट और हवाई जहाज के अनेकों चित्र बनाए. ये चित्र विमान के आविष्कार में बहुत ही सहायक सिद्ध हुए. विलियम और ओरिबिल राइट यानी राइट ब्रदर्स ने भी ‘फ्लायर’ नामक अपने विमान को डिज़ाइन करने में पक्षियों की उड़ान से प्रेरणा ली थी. गौरतलब है कि वर्ष 1903 में राइट ब्रदर्स ने पहली बार हवा में विमान उड़ाने में सफलता पाई थी। यह बीसवी सदी का एक महानतम आविष्कार माना जाता है.

किंगफिशर पक्षी की चोंच और बुलेट ट्रेन में सुधार

बुलेट ट्रेन बहुत ही तेज गति से चलने वाली रेल गाड़ियों को कहते हैं और जापान का शिनकांसेन रेल नेटवर्क इनके लिए विश्व प्रसिद्ध है. जापान में 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाले बुलेट ट्रेन के शुरुवाती दौर में एक बड़ी दिक्कत थी उसकी वजह से होने वाला ध्वनि प्रदूषण. दिक्कत दरअसल रेलगाड़ी के सुरंग से निकलते समय बदलते वायुदाब के कारण थी. जब बुलेट ट्रेन सुरंग में घुसती है तो उसके आगे हवा का एक तकिया-सा बन जाता है, जो ट्रेन के सुरंग से गुजरते-गुजरते दबता जाता है – इसके चलते ट्रेन के आगे हवा का दबाव बढ़ता जाता है. जब ट्रेन सुरंग से निकलती है, तो यह हवा एकदम से फैलती है और एक धमाका होता है. इसे ‘टनल बूम’ कहते हैं और इसकी आवाज आधा किलोमीटर दूर तक सुनाई देती थी.टनल बूम को सुलझाने के लिए जापानी इंजीनियरों ने किंगफिशर की चोंच का ख्याल आया. अगर आपने किंगफिशर को पानी में मछ्ली का शिकार करते देखा है तो आप यह जानते होंगे कि वह पानी की सतह को रॉकेट की रफ्तार से चीरता है और अक्सर सफल होकर चोंच में मछ्ली लिए बाहर उड़ जाता है. हवा से पानी में जाते समय वह भी बुलेट ट्रेन की तरह दबाव में बदलाव महसूस करता है, लेकिन उसकी यह क्रिया बगैर किसी आवाज के होती है. यह किंगफिशर के सिर और चोंच के बड़े और खास आकार की बदौलत होता है. तो बस क्या था! इंजीनियरों ने जांच शुरू की और बुलेट ट्रेन की नाक बिलकुल किंगफिशर की चोंच जैसी बनाई. प्रकृति से प्रेरणा लेकर बहुत सारा समय और पैसा बच गया.

लोटस इफैक्ट

जर्मनी के वनस्पतिशास्त्री विल्हेल्म बर्थलोट ने जलीय वनस्पति कमल के पत्ते के ऊपर पानी की बूंदों के गोल होकर इधर-उधर डोलने और इसी प्रक्रम में गंदगी को समेट कर पत्ते को साफ-सुथरा रखने के गुण को ‘लोटस इफैक्ट’ का नाम दिया. इस तरह कमल भी बायोमिमिक्री का एक अच्छा उदाहरण बनकर आया. वैज्ञानिकों ने देखा कि कमल की पत्तियों पर पानी नहीं ठहरता तथा सतह पर चिपकता भी नहीं. यह देखकर कुछ वैज्ञानिकों को प्रेरणा मिली खुद को साफ रखने वाली (सेल्फ क्लीनिंग) कृत्रिम सतहों का आविष्कार करने की. लोटस इफैक्ट के सिद्धान्त का व्यवहारिक प्रयोग आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा है. सौर ऊर्जा के संग्रहण के लिए बनाए गए सोलर पैनलों पर धूल कणों का जम जाना एक बड़ी समस्या है. वैज्ञानिकों ने लोटस इफैक्ट सिद्धान्त का उपयोग करते हुए एक खास रंग बनाया है, जिसका सोलर पैनल पर लेपन करके सोलर पैनल को साफ-सुथरा रखा जा सकता है और ऊर्जा रूपांतरण में तकरीबन 40 प्रतिशत हानि को रोका जा सकता है.

लोटस इफैक्ट के करामाती गुणों का लाभ उठाते हुए शीशे, कपड़े, पेंट वगैरह बनाए गए हैं, खासकर उन चीजों के लिए जहां बार-बार साफ करना कठिन और महंगा होता है, जैसे ट्रेफिक लाइट के शीशे, नाव के पाल वगैरह-वगैरह. लोटस इफैक्ट पर आधारित सतहों का उपयोग उन जगहों पर भी किया जा सकता है, जहां पानी की कमी है. ओस और पानी की बूंदों को टंकी में लुढ़काकर एकत्रित किया जा सकता है. लोटस इफैक्ट पर अनुसंधान प्रगति पर है तथा उम्मीद है कि आने वाले दिनों में नए आविष्कार व नवाचार सामने आएंगे.

पक्षियों के वीआकार से ईंधन संरक्षण का तरीका सीखना

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं ने देखा कि पक्षी समूह प्रायः रोमन लिपि के ‘वी’ अक्षर के आकार में उड़ान भरते हैं। उसमें सबसे आगे रहने वाले पक्षी का क्रम हमेशा बदलता रहता है. आगे वाला पक्षी अपने ठीक पीछे वाले पक्षी को आगे आने का मौका देता है. यह क्रम निरन्तर चलता रहता है और वे अपनी उड़ान को ऊर्जा के सामूहिक योगदान द्वारा एकसमान बनाए रखते हैं. इस प्रकार पक्षी वी- आकार का उपयोग करके अपने उड़ान की दूरी को 70 प्रतिशत से अधिक बढ़ाने में सक्षम हो जाते हैं. प्रो. ऐलन क्रू के नेतृत्व वाले शोधकर्ताओं ने पक्षियों की इसी तकनीक का उपयोग विमानों के एक समूह पर करके देखा और पाया कि यदि विमानों को एक साथ वी-आकार में उड़ाया जाये तो विमान को एक-एक कर उड़ाने की अपेक्षा 15 प्रतिशत तक ईंधन बचाया जा सकता है. यह भविष्य में ईंधनों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. हालांकि इस दिशा में बहुत सारा अनुसंधान किया जाना बाकी है. लेकिन कहा जा सकता है कि यह भी बायोमिमिक्री का एक अच्छा उदाहरण है.

पक्षियों की इस तकनीक से और भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है कि इतने पक्षी एक साथ बगैर एक दूसरे से टकराये और दूरी बनाकर कैसे उड़ते हैं? यह नि:संदेह एक शोध का विषय है. इस पर भविष्य में और भी शोध कार्य किये जा सकते हैं जो कि विमान प्रौद्योगिकी की दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है. यह भी ताज्जुब की बात है कि मछलियों के झुंड में तैरते समय कभी भी कोई दो मछली परस्पर नहीं टकराती. इस सामान्य-सी परिघटना में भी तकनीकी आविष्कार तथा विकास के बीज अंतर्निहित हैं.

वेल्क्रो

वेल्क्रो के भी आविष्कार की प्रेरणा जीव जगत से मिली थी. कहानी कुछ इस तरह है कि एक स्विस इंजीनियर जॉर्ज डि मेस्ट्रल अपने कुत्ते के साथ आल्प्स में टहल रहे थे और दोनों पर कई काँटेदार फल, जिन्हें गोखरू कहते हैं, चिपके जा रहे थे. दरअसल, ये काँटेदार फल कहीं भी चिपक जाते हैं. जॉर्ज डि मेस्ट्रल ने इन काँटेदार पौधों से प्रेरित होकर वेल्क्रो का आविष्कार किया. वेल्क्रो का इस्तेमाल वर्तमान समय में व्यापक पैमाने पर हो रहा है. इसका इस्तेमाल बैग, सेंडिल, जूतों, कपड़ों इत्यादि में किया जाता है. वेल्क्रो शुरू में सूत से बनाए जाते थे जिसकी अपनी सीमाएं थीं. इसलिए बाद में नायलॉन तथा पॉलीस्टर के वेल्क्रो बनाए जाने लगे जो कहीं ज्यादा बेहतर और टिकाऊ हैं. कुल मिलकर वेल्क्रो बायोमिमिक्री का एक अनुपम उदाहरण है.

वेल्क्रो से बेहतर चिपकू

अपोलो अंतरिक्ष अभियान के समय से अंतरिक्ष यान में चीजों को व्यवस्थित करने के लिए वेल्क्रो का इस्तेमाल होता था. वेल्क्रो में एक बड़ी खामी यह होती है कि उसमें दो परतें लगती हैं और उसके रेशे टूट-टूटकर कचरा बन जाते हैं. इसलिए कुछ वैज्ञानिक एक ऐसे चिपकू के तलाश में लगे जो वेल्क्रो से बढ़िया काम करे. और छिपकलियों से प्रेरित होकर एक नए किस्म के चिपकू का आविष्कार किया. छिपकली के अध्ययन से यह पता चला कि उसके पैरों की उँगलियों के नीचे कुछ गद्देदार रचनाएँ हैं, जिन्हें फुट पैड कहते हैं. ये काफी कमाल के हैं. इन पर हजारों सूक्ष्म रोम उभरे होते हैं जो दीवार की सतह के संपर्क में रहते हैं. इन्हीं फुट पैड की बदौलत छिपकलियाँ बेहद मजबूती के साथ सतह से चिपके रहते हैं. नासा ने इन्हीं गुणों से सीखकर एक ऐसे पदार्थ का आविष्कार किया जो किसी भी सतह पर आसानी से चिपक सकता है.

हमारे पास वर्तमान में मौजूद ज़्यादातर गोंद सूखी चीजों पर ही चिपकती हैं, जबकि हमें अक्सर गीली सतहों पर चिपकने वाले गोदों की जरूरत पड़ती है. जैसे ऊतकों की मरम्मत, शरीर के भीतर बने घावों की मरहम-पट्टी में और शरीर के अंदर लगाए जाने वाले यंत्रों को चिपकाने में. एक स्लग (घोंघे जैसा जीव) के गुणों से प्रेरित होकर हावर्ड विश्वविद्यालय के डेविड मूनी ने एक खास गोंद का आविष्कार किया है, जो गीली सतहों पर भी चिपकता है.

इसी तरह से अभी हाल ही में एक विशेष तरह के चिपकाने वाले टेप की खोज की गई है. इस टेप में किसी भी तरह के गोंद का प्रयोग नहीं होता है. वैज्ञानिकों को इसे बनाने की प्रेरणा एक तरह के सरीसृप गेको से मिली. इस सरीसृप के तलवों में सूक्ष्म ब्रश जैसी संरचनाएं होती हैं जिनकी वजह से यह दीवारों से नहीं फिसलता है और आराम से चल लेता है.

पेड़ों से घरों के डिज़ाइन बनाने की प्रेरणा

उत्तरीगोलार्द्ध में घरों की डिजाइन शंक्वाकार होती है. यह चीड़ तथा देवदार जैसे पेड़ों से प्रेरित है. ऊंचे स्थानों पर हिमपात होता है, साल भर मौसम ठंडा रहता है, काफी समय तक बर्फबारी होती है. इसलिए घर की छतें शंकु के आकार की बनाई जाती हैं जिससे हिमपात में बर्फ फिसल जाए तथा छत पर इकट्ठा न हो. अगर बर्फ जमती जाएगी तो भार से छत टूट सकती है. यह एक तरह की बायोमिमिक्री ही है जो कि उत्तरी गोलार्द्ध तथा बहुत ऊंचे पर्वतीय स्थानों के लिए बहुत फायदेमंद होती है. यह पर्वतीय क्षेत्रों में भवन निर्माण की अहम तकनीक प्रदान करती है.

इंसानी आँखों प्रेरित ब्रॉड विजन एरिया युक्त कैमरा

इंसानी आँखों का वक्रित पृष्ठ आधुनिकतम डिजिटल कैमरों की तुलना में अधिक विस्तृत क्षेत्र ब्रॉड विजन एरिया देख पाने की सुविधा उपलब्ध कराता है. हमारी कैमरा इंजीनियरिंग के सामने चुनौती यह थी कि माइक्रोइलैक्ट्रॉनिक कम्पोनेंट्स को वक्रित सतह (कर्वड सरफेस) पर बिना उन्हें कोई नुकसान पहुँचाए कैसे एडजस्ट किया जाए. अब नार्थवेस्ट यूनिवर्सिटी के योंगांग हुआंग तथा इलिनायस विश्वविद्यालय के जॉहन रोजर्स ने मानव आँख के ही आकार, आकृति और संरचना का जाली जैसे पदार्थ का बना एक डिजिटली कैमरा विकसित किया है, जिसके वक्रित सतह में इलैक्ट्रॉनिक कम्पोनेंट्स लगाए गए हैं. इस तकनीक से बेहद साफ-सुथरा और फोकसित चित्र मुमकिन हो जाएंगे और अंत में यह एक कृत्रिम रेटिना अथवा बायोनिक नेत्र के विकास में सहायक सिद्ध हो सकेगी.

हाथी की सूंड़ जैसी रोबोटी भुजा

अगर बात की जाए हाथी के सूंड़ की, तो यह भी बायोमिमिक्री के लिए एक अच्छा उदाहरण है. जर्मन इंजीनियरिंग फर्म ‘फेस्टो’ द्वारा निर्मित बायोमेकाट्रोनिक हैंडलिंग प्रणाली हाथी के सूंड़ पर आधारित है. जिसके हाथ हाथी की सूंड़ की तरह खंड-खंड नैनो ट्यूब थैलियों से मिल कर बने हैं, जिनमें हवा भर कर इन्हें फुलाया और निकाल कर पिचकाया जा सकता है. ये हाथ हाथी की सूंड़ की दक्षता से ही भार को ऊपर उठाकर रख सकते हैं और चाहे तो इनके जरिए सामान उठा कर दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है. ये एक ओर स्वयं बहुत हल्के हैं किंतु स्टील की तरह मजबूत हैं. इस तरह के नैनो ट्यूबों के बने कपड़े पहनकर एक दिन बूढ़े लोग अपनी कमजोर मांसपेशियों के बावजूद दक्षता से काम कर सकेंगे.

ऊपर हमने बायोमिमिक्री के कुछ उदाहरण दिये हैं. इसके अलावा हमारे आसपास बहुत-सी चीजें हैं जो बायोमिमिक्री से प्रेरित हैं और वे मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हो रही हैं. जैसे- मधुमक्खियों से प्रेरित प्लास्टिक, कछुए से प्रेरित मानव का विशेष सुरक्षा कवच, बिल्ली के पंजों से सुरक्षित पिन, चमगादड़ से बेहतर सोनार तकनीक और दृष्टिहीनों की मदद, शार्क जैसी त्वचा, कीटों से प्रेरित टीकों की सुरक्षा का तरीका, व्हेल के पंख से प्रेरित पवनचक्की के ब्लेड, गुबरैले से प्रेरित पानी इकट्ठा करने का नायाब तरीका वगैरह-वगैरह. इसलिए इंजीनियरिंग और आधुनिक टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में बायोमिमिक्री के इस्तेमाल की असीम संभावनाएं हैं. इस नई उभरती विधा ने वैज्ञानिकों और तकनीकीविदों का ध्यान अपनी ओर खींचा है.

(लेखक विज्ञान विषय के जानकार हैं)
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ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: May 21, 2020, 5:39 PM IST
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