डेटा फैक्ट्री में तब्दील होता इंसान!

फेसबुक, गूगल, ट्वीटर, व्हाट्सऐप आदि कंपनियां अपनी सेवाओं के लिए यूजर से एक भी रुपये नहीं लेतीं, मुफ्त हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इन कंपनियों को चलाने के लिए पैसा कहां से मिलता है. हमें यह समझना होगा कि दुनिया के किसी भी कोने में मुफ्त नाम की कोई भी चीज नहीं होती

Source: News18Hindi Last updated on: January 20, 2020, 2:37 PM IST
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डेटा फैक्ट्री में तब्दील होता इंसान!
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म खुद को मुफ्त बताते हों, मगर इनकी ज्यादातर कमाई का स्रोत यूजर्स की निजी जानकरियां या डेटा है
तकरीबन एक साल से सोशल नेटवर्किंग की दुनिया का बेताज बादशाह फेसबुक अपने नए सिक्युरिटी फीचर टू फैक्टर ऑथेन्टिकेशन के दौरान यूजर्स से उनके एकाउंट को ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए उनके मोबाइल नंबर की मांग कर रहा है. लेकिन बहुत से तकनीकी विशेषज्ञ और गोपनीयता के हिमायती फेसबुक यूजर्स को चेता रहे हैं कि मोबाइल नंबर को एकाउंट में जोड़ने से प्राइवेसी के खत्म होने का खतरा है. मोबाइल नंबर किसी को पहचानने का सबसे बड़ा तरीका है, इसके जरिए कोई भी यूजर की गतिविधियों पर निगरानी रख सकता है. इस पर फेसबुक का कहना है कि उसके इस फीचर का मकसद यूजर्स के एकाउंट को ज्यादा सुरक्षित बनाना है. ऑथेन्टिकेशन की इस प्रक्रिया के तहत सबसे पहले यूजर अपने एकाउंट में पासवर्ड डालकर लॉग-इन करता है.

इसके बाद ऑथेन्टिकेशन के दूसरे चरण में फेसबुक यूजर के मोबाइल फोन पर एक कोड भेजता है, इस कोड को पासवर्ड एंटर करने के बाद डालना होता है. इस प्रक्रिया को पूरा करने के बाद ही यूजर अपना फेसबुक एकाउंट नए डिवाइस पर एक्सेस कर पाता है. अगर फेसबुक पर आपका कोई लोकप्रिय पेज है, तो टू फैक्टर ऑथेन्टिकेशन फीचर के जरिए लॉग-इन किए बगैर अपने पेज पर कुछ भी पोस्ट नहीं कर सकते हैं. पिछले तकरीबन दो-तीन महीनों से फेसबुक इस मामले में जबर्दस्ती से काम ले रहा है.

पहली नजर में लगता है कि फेसबुक ऐसा यूजर की पहचान को पुख्ता करने और उसके एकाउंट को हैकर्स से बचाने के लिए कर रहा है. मगर क्या फेसबुक जैसी कंपनी पर भरोसा किया जा सकता है? फेसबुक के पुराने रिकार्ड्स को देखें तो वह कई बार अपने यूजर्स की बेहद निजी जानकारियों को अवांछित लोगों के हाथों में पहुंचने से नहीं रोक पाया है. वैसे भी फेसबुक के मौजूदा बिजनेस मॉडल को देखें तो यही लगता है कि डेटा सिक्युरिटी जैसे मुद्दों पर फेसबुक जैसी बड़ी कंपनी ज्यादा गंभीर नहीं है.

यूजर्स को नहीं मिलता ओनली मी का ऑप्शन
दरअसल, फेसबुक जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मोबाइल नंबर डालने के कई खतरे हैं. जिसमें सबसे अहम है कि आपके नंबर की मदद से कोई भी फेसबुक पर आपकी प्रोफाइल को आसानी से ढूढ़ सकता है और यहां 'ओनली मी' का ऑप्शन यूजर्स को नहीं मिलता. इस मामले में इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी प्राइवेसी सेटिंग्स क्या हैं. कोई भी इंटरनेट यूजर फेसबुक पर अपना नंबर डालने वाले किसी भी यूजर की निजी जानकारी निकाल कर उसका जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकता है!

गोपनीयता के ख्याल पर सवाल...
इसके अलावा, एक अमेरिकी अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जब यूजर्स अपने मोबाइल नंबर को फेसबुक प्रोफाइल से जोड़ते हैं तो वे मार्केटिंग से जुड़ी चीजों के लिए भी अनुमति दे देते हैं. यानी फेसबुक फोन नंबर का इस्तेमाल विज्ञापन टारगेट करने के लिए यूजर्स से पहले ही हामी भरवा लेता है. हम इंटरनेट और मल्टीमीडिया के युग में सांस लेने वाले आधुनिक प्राणी हैं. आज गूगल, फेसबुक, ब्लॉग, ट्वीटर, व्हाट्सऐप और दूसरे तमाम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. जहां इन सभी प्लेटफॉर्मों ने हमें अभिव्यक्ति के मजबूत मंच प्रदान किए हैं, वहीं यहां कुछ खास कंपनियों का ही वर्चस्व चल रहा है. और ये कंपनियां हमारी गोपनीयता का उतना ख्याल नहीं कर रहीं हैं, जितनी इन्हें करनी चाहिए. 

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अर्थशास्त्र की फ्री-मार्केट कैपिटलिज्म थ्योरी
फेसबुक, गूगल, ट्वीटर, व्हाट्सऐप आदि कंपनियां अपनी सेवाओं के लिए यूजर से एक भी रुपये नहीं लेतीं, मुफ्त हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इन कंपनियों को चलाने के लिए पैसा कहां से मिलता है. हमें यह समझना होगा कि दुनिया के किसी भी कोने में मुफ्त नाम की कोई भी चीज नहीं होती, पीछे से जेब में हाथ डाला ही जाता है. इसको समझने के लिए अर्थशास्त्र की फ्री-मार्केट कैपिटलिज्म थ्योरी को समझना होगा. भले ही ये ऑनलाइन प्लेटफॉर्म खुद को मुफ्त बताते हों, मगर इनकी ज्यादातर कमाई का स्रोत यूजर्स की निजी जानकरियां या डेटा हैं जिसे वे अपनी सहायक कंपनियों को बेच देते हैं और फिर वे इस डेटाबेस का इस्तेमाल विज्ञापन टारगेट करने के लिए करते हैं.

इन्हें दिया जाता है यूजर्स का पर्सनल डाटा
ये कंपनियां यूजर्स की डेमोग्राफिक डेटा के साथ-साथ उनके काम-काज, उम्र, लिंग, स्थान, पसंद-नापसंद, वैवाहिक स्थिति, आर्थिक स्थिति, राजनीतिक झुकाव, रहन-सहन और फ्रेंड सर्कल आदि बेहद निजी जानकारियों को सहेज कर रखती हैं. यूजर्स के बारे में जितना डेटा जिस कंपनी को मालूम होगा उसकी विज्ञापन प्रणाली उतनी ही ज्यादा प्रभावी होगी. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों द्वारा इकट्ठी की जाने वाली ये जानकारियां जूते, कॉस्मेटिक्स, ब्रांडेड कपड़े, गैजेट्स आदि हजारों ऐसे चीजें बनाने वाली कंपनियों के लिए बेहद मूल्यवान साबित होती हैं. इन्हीं डेटाबेस के जरिये उन्हें अपने वास्तविक ग्राहक वर्ग का पता चलता है. इन कंपनियों के लिए यूजर्स डेटा उगाही का कारख़ाना (फैक्टरी) भर हैं, जिनको बहला-फुसलाकर ज्यादा से ज्यादा डेटा उगलवाना इनका मकसद है!

कमजोर होती सामाजिकता
डिजिटल टेक्नोलॉजी में हुई प्रगति ने हमें कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल आदि यंत्रों के माध्यम से तीव्र गति से संपर्क स्थापित करने के अद्वितीय अवसर प्रदान किए हैं. आज आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक आदि समस्त मानवीय गतिविधियों में टेक्नोलॉजी का भरपूर प्रयोग हो रहा है. टेक्नोलॉजी ने जहां हमारे जीवन को आसान और बेहतर बनाया है, वहीं इसके नकारात्मक पक्ष भी हैं. टेक्नोलॉजी ने हमारे जीवन में इतनी गहरी पैठ बना ली है कि आज फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्वीटर आदि सोशल माध्यमों में हम इतने रमें रहते हैं कि वास्तविक दुनिया से पूरी तरह से बेखबर आभासी दुनिया में ही मदमस्त रहते हैं. इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के बहाने हमारी सामाजिकता को कमजोर किया है.

ये गुलामी चिंता का विषय
टेक्नोलॉजी हमारी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का फायदा उठाकर हमें गुलाम बनाने का प्रयास कर रही है. आज टेक्नोलॉजी इंसान को पीछे छोड़ती जा रही हैं, जिससे यह संभव है कि आज दिखाई पड़ने वाली ज्यादातर नौकरियां चंद दशकों में न रहें. किसी भी टेक्नोलॉजी के कारण, खासकर जब वह बेहद तेजी से आए तो उससे समाज की आंतरिक व्यवस्था और उसका संतुलन बिगड़ सकता है. इसने बुद्धिवादियों, वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को चिंता में डाल दिया है

आधुनिक टेक्नोलॉजी के माध्यम से कॉर्पोरेट कंपनियां हमारी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का फायदा उठाते हुए हमें नियंत्रित करने लगती हैं. हमें पता भी नहीं चलता और हमारा दिमाग उनके कब्जे में होता चला जाता है. गूगल के भूतपूर्व डिज़ाइन नीतिकार ट्रिस्टन हैरिस का कहना है कि जैसे जादूगर लोगों की अनुभव-क्षमता की सीमाओं और कमजोरियों को तलाशते हैं, ताकि वे लोगों के जाने बगैर उनसे अपनी मर्जी से काम करवा सके. अगर एक बार आप जान जाएं कि लोगों को कैसे नियंत्रित करना है, फिर आप उन्हें एक वाद्य यंत्र की तरह मनमर्जी से बजा सकते हैं. उत्पादों के डिज़ाइनर (कॉर्पोरेट कंपनियां) भी आपके दिमाग के साथ बिलकुल यही करते हैं. वे (जाने-अनजाने में) आपकी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों को आपके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं ताकि आपका ध्यान आकर्षित किया जा सके.

यह आधुनिक युग भी बड़ा विरोधाभासी है, जो दिखता है, होता उससे अलग है. आधुनिक तकनीक दिखावे पर जोर देता है यानी इसके लिए गुणात्मक पहलुओं से ज्यादा महत्वपूर्ण मात्रात्मक पहलू है. पारम्परिक तकनीक दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होती थी और आधुनिक तकनीक हवस (इच्छा) को पूरा करने के लिए है. प्रसिद्ध समाजकर्मी पवन कुमार गुप्त के अनुसार, 'आधुनिक और पारम्परिक तकनीक के बीच एक बड़ा फर्क यह है कि जहां पारम्परिक तकनीक को समाज व्यवस्थित करता था, वहीं आधुनिक तकनीक समाज को व्यवस्थित करती है.' आधुनिक तकनीक इच्छा (हवस) और आवश्यकता के बड़े अंतर को धूमिल कर देती है. इसलिए आधुनिक तकनीक समाज के लिए नहीं बल्कि मोटी रकम कमाने वाली कॉर्पोरेट कंपनियों (बाजार) के लिए बनी है. बहरहाल, टेक्नोलॉजी जिस तरह से हमारे दिमाग पर कब्जा कर रही है, क्या यह भविष्य में मनुष्य को बेकाम और अप्रासंगिक बना सकती है, क्या भविष्य में मनुष्य टेक्नोलॉजी के अधीन हो जाएगा? ये कुछ ऐसे सवाल है जिस पर हमें गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है.

(लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: January 20, 2020, 2:32 PM IST
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