क्या भारत में बढ़ रही है अवैज्ञानिकता?

"आधुनिक युग में जिस प्रकार से कोई खुद को अंधविश्वासी, नस्लवादी या स्त्री शिक्षा विरोधी कहलाना पसंद नहीं करता, उसी प्रकार से खुद को 'अवैज्ञानिक' कहलाना भी पसंद नहीं करता"

Source: News18Hindi Last updated on: April 5, 2020, 11:09 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
क्या भारत में बढ़ रही है अवैज्ञानिकता?
(News18 क्रिएटिव)
महामारी का कहर कैसे बरपा होता है और एक झटके में हजारों जिंदगियां तथा देश-समाज कैसे तबाह हो जाते हैं, 21वीं सदी में दुनिया के ज्यादातर लोगों ने इसका जिक्र कहानियों में ही सुना होगा. लेकिन कोरोना वायरस ने उन कहानियों और उसके खौफ को फिर से लोगों में बसा दिया है. कोरोना वायरस के संक्रमण का उपचार ढूंढने के लिए वैज्ञानिकों और डॉक्टरो टीम ने पूरी ताकत लगा रखी है. सभी इस जानलेवा बीमारी का समाधान खोज रहे हैं. वहीं संकट के इस कठिन दौर हमारे तौर-तरीकों और आचरण ने दिखा दिया है कि भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय अंधविश्वास और धार्मिक रीति रिवाज़ हावी हैं. इसलिए कहीं मौलनाओं को धार्मिक जमावड़े करने से परहेज़ नहीं और कहीं हिन्दू समुदाय के संत-महंत गौमूत्र पीने की सलाह दे रहे हैं. सत्तारूढ़ पार्टी के नेतागण वायरस को भगाने के लिए मंत्रोच्चार, आहुति, यज्ञ वगैरह-वगैरह कर्मकांडों की बात करते अक्सर नज़र आए.

जब प्रधानमंत्री ने 22 मार्च को अपने-अपने घरों में से ही ताली बजाकर, थाली बजाकर, घंटी बजाकर एक-दूसरे का आभार जताने और इस कोरोना से लड़ने के लिए एकजुटता दिखाने की बात कही तो बहुसंख्य लोगों ने उनकी बात का गलत, अवैज्ञानिक और अंधविश्वासपरक मतलब निकाला कि थाली-ताली और घंटी बजाने से कोरोना वायरस नष्ट हो जाएगा. छद्मवैज्ञानिकों की फौज ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए यह दावा किया कि उनका मत विज्ञानसम्मत है. उन्हीं में से एक छद्मविज्ञानी ने यह तर्क दिया कि ‘जब घंटा-घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है। इस कंपन का फायदा होता है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं, जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है.’

आधुनिक युग में जिस प्रकार से कोई खुद को अंधविश्वासी, नस्लवादी या स्त्री शिक्षा विरोधी कहलाना पसंद नहीं करता, उसी प्रकार से खुद को ‘अवैज्ञानिक’ कहलाना भी पसंद नहीं करता है. वह अपनी अतार्किक बात को वैज्ञानिक सिद्ध करने के लिए मूलभूत सच्चाई की नकल उतारनेवाले छल-कपट युक्त छद्म विज्ञान का सहारा लेता है. घंटी बजाने या दिया जलाने से वायरस नष्ट हो जाता है जैसी मनगढ़ंत और हवा-हवाई दावे किये जा रहें हैं वे छद्मविज्ञान के ही उदाहरण हैं.  आज भी दुनिया भर में भारत को सांप-सपेरों का देश इसलिए ही कहा जाता है क्योंकि हमारे ऊपर अंधविश्वास और रूढ़िया हावी हैं.

विवेकहीनता के समक्ष समर्पण क्यों?
पिछले साल झारखंड में लातेहार जिले के सेमरहाट गांव में दो बच्चों की नरबलि देने का मामला सामने आया था. इससे पहले असम के उदालगुड़ी जिले के कलाईगांव में एक विज्ञान शिक्षक द्वारा पड़ोस के बच्चे की बलि देने की कोशिश की चौंकाने वाली खबर आई थी. चिंता की बात यह है कि नरबलि की बात ने भले थोड़ा चौंकाया हो, इसके पीछे का अंधविश्वास हमारे लिए कोई नई चीज नहीं है. आज के वैज्ञानिक युग में भी बिल्ली के रास्ता काटने को अपशगुन मानने और दरवाजे पर नींबू-मिर्ची लटकाने से लेकर किसी को डायन कहकर मार डालने तक अंधविश्वास के अनेकानेक रूप देखने-सुनने को मिलते रहते हैं.

आखिर क्या कारण है कि शिक्षा और उच्च शिक्षा भी हमारे मन से अंधविश्वास का प्रभाव दूर नहीं कर पाती? कहते हैं इसका एक कारण है बिना किसी प्रमाण या तर्क के किसी भी बात पर यकीन करने की हमारी प्रवृत्ति. दूसरे शब्दों में इसे कहा जाता है वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव. सवाल उठता है यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या बला है? किताबों में इसका स्पष्ट जवाब मिल जाता है- वैज्ञानिक दृष्टिकोण मूलतः एक ऐसी मनोवृत्ति या सोच है जिसका मूल आधार है किसी भी घटना की पृष्ठभूमि में उपस्थित कार्य-कारण को जानने की प्रवृत्ति. मगर किताबों में इस बात का जवाब नहीं मिलता कि स्कूलों के पाठ्यक्रमों से गुजरने और कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में रहते हुए तमाम बड़े विद्वानों के विचारों को आत्मसात करने के बाद भी हमारा मन अंधविश्वास के अंधेरों से पीछा क्यों नहीं छुड़ा पाता.

भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जिसके संविधान द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए प्रतिबद्धता को प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताया गया है. अत: यह हमारा दायित्व है कि हम अपने समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दें. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्त्व को पंडित जवाहरलाल नेहरु ने 1946 में अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में विचारार्थ प्रस्तुत किया था. उन्होनें इसे लोकहितकारी और सत्य को खोजने का मार्ग बताया था. मगर, हमारे देश में ये क्या हो रहा है, यहाँ तो हम, हमारे वैज्ञानिक और हमारे नेता वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर कोरी बात करके ही अपना फर्ज पूरा हुआ मानते हैं.  शिक्षित लोगों से लेकर अशिक्षित लोगों तक अंधविश्वासों और पाखंडों के समर्थक हैं, यहाँ तक हमारे देश के कई वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी भी इसके अपवाद नहीं हैं ; जो चकित करता है.विज्ञान का मिथकीकरण

पिछले सत्तर वर्षों में हमारे देश में दर्जनों उच्च कोटि के वैज्ञानिक संस्थान अस्तित्व में आए हैं और उन्होंने हमारे देश के समग्र विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया है. हमारे मन में अत्याधुनिकी तकनीकी ज्ञान तो रच-बस गया है, मगर हमने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को खिड़की से बाहर फेंक दिया. वैश्वीकरण के प्रबल समर्थक और उससे सर्वाधिक लाभ अर्जित करने वाले लोग ही भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर आज आक्रमक तरीके से यह विचार सामने लाने की खूब कोशिश कर रहे हैं कि प्राचीन भारत आधुनिक काल से अधिक वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी सम्पन्न था. आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कशीलता, धर्मनिरपेक्षता, मानवता और समाजवाद की बजाय अवैज्ञानिकता, अंधविश्वास और असहिष्णुता को बढ़ावा दिया जा रहा है.

आजादी के बाद शायद ही कभी एक साथ किसी सरकार में इतने प्रतिगामी विचारों के लोग रहे हों जितने मौजूदा मोदी सरकार में हैं. आम नेता-मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री, यहाँ तक प्रधानमंत्री भी मिथक, अंधविश्वास और विज्ञान का घालमेल कर चुके हैं. इनका दावा रहा है कि यदि प्राचीन भारतीय ग्रन्थों की भलीभांति व्याख्या की जाए, तो आधुनिक विज्ञान के सभी आविष्कार उसमें पाए जा सकते हैं. जैसे- राडार प्रणाली, मिसाइल तकनीक, ब्लैक होल, सापेक्षता सिद्धांत एवं क्वांटम सिद्धांत, टेस्ट ट्यूब बेबी, अंग प्रत्यारोपण, विमानों की भरमार, संजय द्वारा दूरस्थ स्थान पर घटित घटनाओं को देखने की तकनीक, समय विस्तारण सिद्धांत, अनिश्चितता का सिद्धांत, संजीवनी औषधि, कई सिर वाले लोग, इंटरनेट, भांति-भांति प्रकार के यंत्रोंपकरण आदि-इत्यादि. वेदों, पुराणों में विज्ञान के जिस अक्षय भंडार को स्वयं आदि-शंकराचार्य, यास्क से सायण तक के वेदज्ञ, आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे गणितज्ञ-ज्योतिषी नहीं खोज पाएं, उसको हमारे नेताओं ने ढूढ़ निकाला! एक आम हिन्दुस्तानी अपने पूर्वजों के ऐसे कथित उच्च कोटि के प्रौद्योगिकी पर बेहद गर्व करता है, और उसे ये उपलब्धियां अपने गौरवपूर्ण स्वर्णिम इतिहास की झलक दिखाती प्रतीत होती है और वह यह मानता है कि जरुर हमारे पूर्वज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की दृष्टि से उन्नत रहे होंगे.

विज्ञान और छद्मविज्ञान

भारत में अवैज्ञानिकता और रूढ़िवादिता को सत्ता का भरपूर समर्थन प्राप्त हो रहा है. सामाजिक जीवन में निरंतर तार्किकता, चेतना संपन्न बहस का अभाव, धार्मिक कट्टरता का बढ़ता दायरा, अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर आधारित कार्यक्रमों का बोलबाला, स्कूलों में विज्ञान विषयों की पढ़ाई का कमजोर स्तर, विज्ञान विषयों मे रोचकता का अभाव, बच्चों को विज्ञान और जीवन में तादात्म्य स्थापित करने की प्रेरणा में कमीं, खराब आर्थिक स्थितियां आदि कुछ ऐसे कारण हैं जिससे आज अवैज्ञानिकता तेजी से बढ़ रही है और लोग विज्ञान से दूर होते जा रहे हैं. मगर ऐसा नहीं है कि पूरी दुनिया अकेले भारत में ही अवैज्ञानिकता बढ़ रही है, बल्कि वैज्ञानिक सोच के विरोधी समूह अमेरिका, रूस, चीन, जापान जैसे विकसित देशों में भी सक्रिय हो चुके हैं. देखने वाली तो बात यह है कि क्या वैज्ञानिक समुदाय इन सारी उपलब्धियों पर पानी फेरने के प्रयासों का विरोध कर पाएगा? क्या हमारी आने वाली पीढ़ियां तार्किक ढंग से सोच सकेंगी और वैज्ञानिक शोध को आगे ले जा पाएंगी?

(लेखक विज्ञान संचारक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: April 5, 2020, 11:09 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर