चिंता का सबब बना बढ़ता प्रकाश प्रदूषण

"रात में भी प्रकाश के कारण कई पक्षी यह फैसला नहीं ले पाते कि सुबह है या रात. यही नहीं, यह उन प्रवासी पक्षियों को भी दिग्भ्रमित करता है जो साल में मौसम के अनुसार स्थान बदलते हैं. "

Source: News18Hindi Last updated on: March 20, 2020, 7:45 PM IST
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चिंता का सबब बना बढ़ता प्रकाश प्रदूषण
लाइट प्रदूषण को परिभाषित करती एक प्रतीकात्मक तस्वीर.
कृत्रिम प्रकाश (आर्टिफ़िशियल लाइट) के आविष्कार, जिसकी शुरुवात थॉमस अल्वा एडीसन द्वारा विद्युत बल्ब के खोज से शुरू होती है, ने हम इंसानों को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने का अवसर प्रदान किया. आज विकास के जिस मुकाम पर हम खड़े हैं उसमें कृत्रिम प्रकाश की भूमिका और महत्व को नहीं नकारा जा सकता है. मगर आज आवश्यकता से अधिक कृत्रिम प्रकाश का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके कारण प्रकाश प्रदूषण (लाइट पॉल्यूशन) पैदा हो रहा है. प्रकाश प्रदूषण का केवल वातावरण पर ही नहीं बल्कि मनुष्यों, जीव जंतुओं एवं पेड़-पौधों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. यूँ कहें वरदान के रूप में मिले कृत्रिम प्रकाश की अधिकता ने उसे अभिशाप में तब्दील करना शुरू कर दिया है.

हाल ही में यूटा स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका के वैज्ञानिकों ने एक शोधपत्र के जरिये इस खतरे की एक विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की है कि रात को दिन में बदलने की हम इंसानों की जिद ने, इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों और वनस्पतियों को भी निगलने लगी है. नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन हमें चेताता है कि आज हम वायु प्रदूषण से लड़ने की कोशिश कर रहें हैं, वहीं प्रकाश प्रदूषण अपने पाँव पसारता जा रहा है. शोधकर्ताओं का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि दुनिया में प्रकाश प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और अगर इस पर लगाम न लगाया गया तो आने वाले सालों में इंसानों, जानवरों और पेड़-पौधों का जीवन चक्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है. एक आंकड़े के मुताबिक 2012 से 2016 के बीच दुनिया में रात में कृत्रिम प्रकाश वाले क्षेत्र में 2.2 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ोत्तरी हुई है.

हम इंसान विशेष रूप से दिन में सक्रिय रहने वाली प्रजाति हैं. हमारी आंखे दिन में सूर्य की रौशनी में ठीक से कार्य करने के लिए अनुकूलित हैं. हाँ, रात भी कुछ काम कर सकते हैं. मगर हम रात्रिचर प्राणियों की तरह अंधेरे में पूर्णतया सक्रिय नहीं रह सकते हैं, इसलिए हम रात में कृत्रिम प्रकाश का उपयोग करते हैं. कृत्रिम प्रकाश के इस्तेमाल में कोई भी बुराई नहीं है मगर बाहरी भाग में फैला चुभता हुआ अनावश्यक प्रकाश निश्चित रूप से प्रकाश प्रदूषण है. अनेक प्रकृतिविद, पर्यावरणवादी तथा अनुसंधानकारी चिकित्सक अनुभव करते हैं कि प्रकाश प्रदूषण, पर्यावरण प्रदूषण का सर्वाधिक खतरनाक रूप है. शहरी क्षेत्रों में उत्पन्न प्रकाश फोटोन्स जाने अन्जाने सभी को प्रभावित करते हैं.

खुले आकाश के नीचे रहने के बावजूद भी कृत्रिम प्रकाश की अत्यधिक मात्रा की बदौलत रात में आकाश को निहारना मुश्किल हो गया है. शोधकर्ताओं की मानें तो प्रकाश प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) पर खतरनाक असर डाल रहा है जिससे इंसानों और जानवरों की नींद लेने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. प्रकृति के अन्य जीव मसलन कीटों, मछलियों, चमगादड़ों, चिड़ियों एवं अन्य जानवरों की प्रवासन प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है. रॉयल एस्ट्रोनामिकल सोसाइटी के अनुसार विश्व की 70 प्रतिशत आबादी प्रकाश प्रदूषण की पहुँच में हैं. विकसित देशों में स्थिति और भी बुरी है. विकसित देशों के 98 प्रतिशत लोग प्रकाश प्रदूषण के पंजे की पहुँच में हैं. भारत के दिल्ली, मुम्बई जैसे शहर भी प्रकाश प्रदूषण को अपना मेहमान बना चुके हैं.
प्रकाश प्रदूषण का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव मनुष्य पर हो रहा है. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि मनुष्य ही प्रकाश प्रदूषण का जन्मदाता है. मनुष्य पर होने वाला प्रभाव इतना अप्रत्यक्ष होता है कि अधिकांश उसे समझ ही नहीं पाते और अनेकों रोगों का इलाज कराते घूमते रहते हैं. बच्चे भी इसका शिकार होने लगे हैं.

अब यह पूर्ण स्थापित तथ्य है कि हमारी शारीरिक गतिविधियां शरीर के अन्दर स्थित, पृथ्वी के रातदिन के साथ लयबद्ध,  24 घन्टों वाली घड़ी से संचालित होती है. यह घड़ी मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस भाग में स्थित होती है. शरीर का तापमान, हार्मोन स़्त्राव, सतर्कता और नींद इसी घड़ी से चलती है. दिवार पर लगी या हाथ पर बंधी घड़ी के मुताबिक हमारा शरीर नहीं चलता. रात का समय होते ही हमारे शरीर की क्रियाएं धीमी पड़ने लगती है. नींद के हार्मोन का स्वत्रण होने लगता है.

यदि हम समय पर सोते नहीं हैं तो हम अपने ही खिलाफ लड़ाई लड़ने लगते हैं. इससे शरीर की लय गड़बड़ा जाती है. इसका पहला दुष्प्रभाव पाचन क्रिया के गड़बड़ाने के रूप में होता है. पेट में अल्सर होने की संभावना बढ़ जाती है. कैंसर, मधुमेह, मोटापा आदि भी मानव शरीर में घुसने का मौका तलाशने लगते हैं. शरीर थका-थका सा रहने लगता है. चिड़चिड़ापन उत्पन्न होता है. घर व बाहर के रिश्ते बिगड़ने लगते हैं. इससे अवसाद उत्पन्न होता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक इंसानी शरीर में ‘मेलाटोनिन’ नामक एक हार्मोन का निर्माण तभी संभव होता है जब नेत्रों को अंधकार का संकेत मिलता है. इसका काम शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने से लेकर कोलेस्ट्रॉल में कमी लाना होता है जो एक स्वस्थ शरीर के लिए जरूरी है.रात में भी प्रकाश के कारण कई पक्षी यह फैसला नहीं ले पाते कि सुबह है या रात. यही नहीं, यह उन प्रवासी पक्षियों को भी दिग्भ्रमित करता है जो साल में मौसम के अनुसार स्थान बदलते हैं. दरअसल वह चाँद और तारों को देख दिशा का पता लगाते हैं और किसी प्रकाशीय प्रान्त से गुजरते वक़्त उनके स्थिति का सही आभास नहीं हो पात. हम सभी को मालूम है कि पेड़-पौधे ‘फोटोसिंथेसिस’ की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं और रात्रि का अंधेरा उन्हें एक महत्वपूर्ण यौगिक तैयार करने में मदद करता है जिसे हम ‘फाइटोक्रोम’ के नाम से जानते हैं. हर वक़्त मिल रही रौशनी से उनके यह गुण और प्रक्रिया बाधित होती है.

अभी हम अपने गली मोहल्ले को रात में अधिकाधिक प्रकाशित करने में लगे हैं. शहरों में राजमार्गों का विकास हो रहा है जहाँ रात्रि प्रकाश को सर्वाधिक महत्व दिया जार हा है. अब इस नीति को छोड़ कर दक्षता पूर्ण प्रकाश नीति को अपनाना होगा. रात में बिजली जलाते समय, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रकाश, उस क्षेत्र तक ही सीमित रहे जहाँ उसकी जरूरत हो. प्रकाश प्रदूषण अभी नया विषय है. ज़्यादातर लोग इसके घातक प्रभाव से परिचित नहीं हैं. अज्ञानता किसी का रक्षा कवच नहीं बन सकती. सही यही होगा कि हम प्रकाश के साथ तिमिर (अंधकार) के महत्व को भी पहचाने!

(लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: March 20, 2020, 7:45 PM IST
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