मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने में अहम पड़ाव होंगे उसके चांद

इंसान उस चीज़ को खोजने में जुटा हुआ है, जिसकी कोई हद नहीं. जिसका कोई ओर-छोर नहीं. अब इंसान सिर्फ पृथ्वी के एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप पर ही नहीं जाना चाहता है, बल्कि वह ग्रहों, उपग्रहों यहां तक सौरमंडल को पार करके सितारों के बीच से गुजरते हुए पूरे ब्रह्मांड को ही नाप लेना चाहता है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 6, 2020, 11:57 AM IST
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मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने में अहम पड़ाव होंगे उसके चांद
अंदाजा है कि मंगल की सतह पर 2030 या 2040 के दशक में पहला इंसान दस्तक देगा. (प्रतीकात्मक)
खोज करना हम इंसानों की फितरत है. हम हमेशा से ही अपने चारों ओर की दुनिया को जानने-समझने के लिए लालायित रहे हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक शुरुआत में होमो सेपियंस यानी आधुनिक मानव एफ्रो-एशियाई भू-भाग में ही रहते थे. तो सवाल यह उठता है कि तो फिर कालांतर में हम इंसान अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और हवाई जैसे सुदूर द्वीपो तक कैसे पहुंचे? आज से तकरीबन 45,000 साल पहले शुरुआती मनुष्य ऑस्ट्रेलिया पहुंचे. ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचने के लिए इंसानों ने बगैर किसी रक्षा तकनीक के सैकड़ों किलोमीटर के कई समुद्री चैनलों को पार किया.

इंसान ने आखिर क्यों जान हथेली पर रखकर समुद्र की विकराल लहरों से अठखेलियां करने की जुर्रत की? इसका संक्षिप्त और सटीक जवाब है- मानव की जिज्ञासा या उत्सुकता और अपने चारों ओर की प्रकृति को जानने-समझने की ललक या स्थानांतरण और नई दुनिया बसाने की चाहत. ऑस्ट्रेलिया की इस यात्रा के बाद मानवता की दूसरी सबसे बड़ी घटना थी, अपोलो-11 द्वारा इंसानों का चांद पर कदम रखना. और अब भी इंसान अपनी जिज्ञासा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. तभी तो, इंसान उस चीज़ को खोजने में जुटा हुआ है, जिसकी कोई हद नहीं. जिसका कोई ओर-छोर नहीं. अब इंसान सिर्फ पृथ्वी के एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप पर ही नहीं जाना चाहता है, बल्कि वह ग्रहों, उपग्रहों यहां तक सौरमंडल को पार करके सितारों के बीच से गुजरते हुए पूरे ब्रह्मांड को ही नाप लेना चाहता है.

वर्तमान परस्थितियों के मद्देनजर महज 200 सालों के भीतर ही पृथ्वी से मानव जाति का वजूद हमेशा के लिए मिट सकता है और इस संकट से बचने का एक ही उपयुक्त समाधान है कि हम अंतरिक्ष में कॉलोनियां बसाएँ. इसलिए अब अंतरिक्ष अन्वेषण महज रोमांच और जिज्ञासा का विषय न होकर, असलियत में यह आने वाली पीढ़ी और मानव जाति के वजूद को बचाए रखने के लिए हमारा कर्तव्य है.


नि:संदेह भविष्य में हम पृथ्वीवासियों द्वारा रिहायशी कॉलोनी बनाने के लिए सबसे उपयुक्त पात्र हमारा पड़ोसी ग्रह मंगल है. मनुष्य को मंगल की सतह पर भेजना वैज्ञानिकों के सबसे जटिल और महत्वाकांक्षी लक्ष्यों में से एक है. हालांकि यह किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं है. सबसे पहले हमें पृथ्वी के निम्न कक्षा (Low Earth orbit) में पहुंचना होगा, उसके बाद चंद्रमा पर सफल लैंडिंग करानी होगी और फिर चाँद से मंगल की ओर जाने के लिए लाखों किलोमीटर का सफर कम से कम 2 साल में पूरा होगा, यह घोर आशावादी व्यक्ति को भी निराश कर सकता है. लेकिन ऐसी दो जगहें हैं जो हमें पृथ्वी से मंगल की ओर पहुंचाने में अहम पड़ाव साबित हो सकते हैं. ये दोनों ही पृथ्वी और मंगल के बीच के एक कदम (Stepping stone) हैं. ये बेस कैंप्स हमें और हमारे संशाधानों को मंगल की कक्षा में अचानक प्रवेश से उसके गुरुत्वाकर्षण बल से बचा सकते हैं. पृथ्वी से मंगल पर पहुंचने के ये दो पड़ाव हो सकते हैं- मंगल ग्रह के इर्द गिर्द परिक्रमा कर रहे इसके दो चांद, डेमोस और फोबोस.
काफी पहले से वैज्ञानिक यह मानते आए थे कि मंगल ग्रह का कोई भी प्राकृतिक उपग्रह या चाँद नहीं है. ग्रहों के गति के तीन प्रसिद्ध नियमों (Laws of Planetary Motion‎) को देने वाले खगोलशास्त्री जोहांस केप्लर ने सबसे पहले इस लाल ग्रह के चारों तरफ परिक्रमा करते दो चंद्रमाओं के होने का सुझाव दिया था. अमेरिकी खगोलशास्त्री आसफ हॉल ने साल 1877 में मंगल ग्रह का अध्ययन करके डेमोस और फोबोस की खोज की. इन दो छोटे पिंडों को लाल ग्रह की चकाचौंध से छिपा दिया था. डिमोस का व्यास (Diameter) 13 किलोमीटर है, जबकि फोबोस का व्यास 22 किलोमीटर है. गौरतलब है कि हाल तक डिमोस सौरमंडल का सबसे छोटा चाँद माना जाता था, इसी महीने खगोलशास्त्रियों ने शनि के 2 चंद्रमाओं की खोज की है, जिनके व्यास महज 5 किलोमीटर है.

मंगल ग्रह और पृथ्वी में कई समानताएं हैं. हालांकि मंगल एक शुष्क और ठंडा ग्रह है, लेकिन इसमें वे तमाम तत्व मौजूद हैं जो इसे जीवन के अनुकूल बनाने में सक्षम हैं, जैसे कि पानी, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन वैगरह. हालांकि पृथ्वी का जुड़वा समझे जाने वाले शुक्र ग्रह की आंतरिक संरचना पृथ्वी से काफी मिलती-जुलती है, लेकिन जब बात जीवन योग्य परिस्थितियों की हो तो मंगल अनोखे रूप से सर्वाधिक उपयोगी और उपयुक्त ग्रह है. मंगल अपनी धुरी पर लगभग पृथ्वी जितने ही समय में 24 घंटे 39 मिनट और 35 सैकिण्ड में घूमता है. मंगल पर पृथ्वी के समान ऋतुचक्र होता है. पृथ्वी की तरह मंगल पर भी वायुमंडल मौजूद है, हालांकि यह बहुत पतला है. अब तक मंगल पर कुल 18 अंतरिक्ष अभियान (Space missions) भेजे गए हैं, जिनमे से सिर्फ 9 ही सुरक्षित रूप से इसकी सतह पर उतरे हैं. असलियत में हम अपने सभी अभियानों को अंजाम देने में सक्षम थे. क्योंकि मंगल के दोनो चंद्रमा, फोबोस और डिमोस एक अनोखा विकल्प मुहैया कराते हैं. मंगल ग्रह की सतह से पृथ्वी पर सीधे जाने के बजाय, हम इंसान इन चट्टानी चंद्रमाओं पर एक स्टेशन स्थापित कर सकते हैं : एक आधार शिविर (Base camp). ताकि मंगल की सतह पर मनुष्य को उतारने के गंभीर और सुरक्षित प्रयास के लिए जा सके.

फोबोस डिमोस से बड़ा है, और यह अपने सबसे लंबे आयाम (Longest dimension) पर तकरीबन 27 किलोमीटर का है. इसकी संरचना सी-टाइप या कार्बोनेसस चोंड्रेइटस क्षुद्रग्रह (Carbonaceous chondrites asteroid) की संरचना से मिलती-जुलती है. मंगल के ऊपर फोबोस 5,989 किलोमीटर की ऊँचाई पर परिक्रमा कर रहा है और यह इसकी परिक्रमा पूरी करने में महज 7 घंटे 39 मिनट का समय लेता है. वहीं डिमोस अपने सबसे लंबे आयाम में सिर्फ 15 किलोमीटर की दूरी पर है, और 23,460 किलोमीटर की ऊंचाई पर हर 30 घंटे में मंगल की परिक्रमा करता है.
साल 2015 में नासा के तीन इंजीनियरों ने ‘मंगल पर मानव मिशन भेजने के लिए एक न्यूनतम वास्तुकला (Minimal Architecture)’ को प्रस्तावित किया. उन्होने यह सुझाव दिया कि मंगल पर इंसान को भेजने के लिए चार चरणों (Steps) की एक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए. सबसे पहले आधारभूत ढांचा (Infrastructure) तैयार करने के लिए फोबोस पर एक मानव मिशन भेजा जाएगा. उसके बाद एक महीने के लिए अंतरिक्षयात्री सतह के नीचे जाएंगे. फिर एक साल का लंबा अभियान चलाया जाएगा. और आखिर में, इंसान मंगल पर एक स्थायी उपस्थिति (Permanent presence) लिए कदम रखेगा.


फोबोस पर जाने के लिए स्पेस लॉन्च सिस्टम के चार रॉकेटो की जरूरत होगी. पहले तीन रॉकेट जिनमें एक आपूर्ति (Supplies), दूसरा फोबोस को निवास योग्य (Habitable) बनाने के लिए, और तीसरा अंतरिक्ष यात्रियों के घर वापसी के लिए एक वाहन (Vehicle) लेकर जाएगा. चौथा रॉकेट मंगल पर 4 अंतरिक्ष यात्रियों को एक ओरियन कैप्सूल के जरिए ले जाएगा. अंतरिक्ष यात्री लगभग 500 दिनों के लिए फोबोस स्टेशन पर रहेंगे, फोबोस पर विज्ञान के प्रयोग (Experiments) करेंगे.

फोबोस मिशन से सीखे गए सबक के आधार पर, मंगल पर वास्तविक लैंडिंग के लिए नासा और छह स्पेस लॉन्च सिस्टम को लॉन्च करेगी. आखिर में, चार यात्रियों के एक चालक दल (Crew) को लॉन्च करेगा, वह फोबोस स्टेशन की यात्रा करेगा और फिर मंगल पर उतरने की तैयारी करेगा. दो अंतरिक्ष यात्री मंगल पर लैंडिंग करेंगे जबकि अन्य दो अंतरिक्ष यात्री फोबोस पर बने रहेंगे. अंदाजा है कि मंगल की सतह पर 2030 या 2040 के दशक में पहला इंसान दस्तक देगा.


2024 में, जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जैक्सा) ने फोबोस और डिमोस की यात्रा करने के लिए मार्स मूंस एक्सप्लेरेशन (एमएमएक्स) मिशन शुरू करने की योजना बनाई है. एमएमएक्स फोबोस की सतह पर उतरेगा और वहाँ नमूने (samples) इकट्ठे करेगा और 2029 तक धरती पर वापस लौटेगा. कुछ मानवयुक्त अंतरिक्ष यान के प्रस्तावकों (Human spaceflight proponents) ने यह भी सुझाव दिया है कि मंगल से पहले नासा को फोबोस पर अंतरिक्ष यात्रियों को उतारना चाहिए. नासा 2030 तक एक मानव मिशन भेजने की तैयारी में है. हालांकि यह बहुत ही अधिक चुनौतीपूर्ण काम है. बहरहाल, मनुष्य मंगल पर कब और कैसे पहुंचेगा इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है.

(लेखक विज्ञान मामलों के जानकार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: September 6, 2020, 11:55 AM IST
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