ब्रह्मांड के रहस्यों से दो-चार होने की नई तैयारी

ब्रह्मांड और अंतरिक्ष के बहुत से रहस्य आज भी अनसुलझे हैं, बहुत से सवालों के जवाब अभी खोजे जाने बाकी हैं. हब्बल टेलीस्कोप की कक्षा या ऑर्बिट लगातार छोटी हो रही है और ऐसी संभावना है कि यह दूरबीन 2024 में पृथ्वी के वायुमंडल में वापस आ कर जल जाए. लेकिन इसकी जगह लेने के लिए इसका उत्तराधिकारी पहले से ही तैयार है. जिसका नाम है- जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप और इसे इसी महीने 22 तारीख को अंतरिक्ष में लॉन्च किया जाना है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि इसकी मदद से उन आकाशगंगाओं को भी देखने में मदद मिल पाएगी जोकि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ ही बनी थीं.

Source: News18Hindi Last updated on: December 9, 2021, 1:59 PM IST
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ब्रह्मांड के रहस्यों से दो-चार होने की नई तैयारी

मूमन डच मूल के ऐनकसाज हैंस लिपर्शे को दूरबीन के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है. लिपर्शे ने दूरबीन का आविष्कार किसी विशेष वैज्ञानिक उद्देश्य या प्रयास से नहीं किया था, बल्कि यह एक इत्तेफाक से हुई खोज का नतीजा था. वाकया इस तरह है कि सन् 1608 में एक दिन हैंस कांच के दो लैंसों की मदद से सामने सड़क पर जा रही एक लड़की के खूबसूरत चेहरे को निहारने की कोशिश कर रहा था. उसने इत्तेफाक से दोनों लैंसों को एक-दूसरे के समानांतर सही दूरी पर रखने पर यह देखा कि लड़की का खूबसूरत चेहरा और भी ज्यादा सुंदर दिखाई देता है और इससे दूर की चीजें भी बेहद साफ दिखाई देती हैं. इसी वाकये से प्रभावित होकर हैंस ने दो लैंसों को जोड़कर एक खिलौना बनाया, जिसे आजकल दूरबीन या टेलीस्कोप कहते हैं.


1609 में इटली के महान वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली ने हैंस लिपर्शे की बनाई दूरबीन की तर्ज पर एक बार फिर से दूरबीन बनाई और उसकी मदद से वे अंतरिक्ष में विचरते ग्रहों-उपग्रहों आदि खगोलीय पिंडों का हाल-चाल लिया करते थे. गैलीलियो ने अपनी दूरबीन की मदद से चन्द्रमा पर मौजूद दाग (क्रेटर), बृहस्पति ग्रह के चार चंद्रमाओं सहित सूर्य के साथ परिक्रमा करने वाले सौर धब्बों का पता लगाया. गैलीलियो ही वे पहले खगोल विज्ञानी थे, जिन्होंने अपनी दूरबीन से यह पता लगाया कि सूर्य के बाद पृथ्वी का नजदीकी तारा प्रॉक्सिमा सेन्टॉरी है. इसके अलावा, अपनी दूरबीन की मदद से गैलीलियो ने ही हमे शुक्र की कलाओं से जुड़ा ज्ञान और कोपरनिकस के उस सूर्यकेंद्री मॉडल को सही साबित किया, जिसके मुताबिक ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी नहीं, बल्कि सूर्य है. पृथ्वी समेत सभी खगोलीय पिंड सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं. इसलिए पृथ्वी ब्रह्मांड की केंद्र नहीं है, बल्कि वह महज चन्द्रमा की कक्षा का केंद्र है.


गैलीलियो ने 1610 में अपनी खोजों के आधार पर ‘स्टेरी मैसेंजर’ नामक एक किताब लिखी. कुछ समुदायों में किताब का भरपूर स्वागत हुआ जबकि कुछ लोगों, विश्वविद्यालयों और चर्च को दूरबीन से हासिल नए ज्ञान से आपत्ति थी. इस किताब ने नए ज्ञान को पुराने ज्ञान से टकराने का कारण बना दिया और अंततः इतालवी विश्वविद्यालयों और चर्चों ने गैलीलियो के दूरबीन को काली कला के रूप में खारिज कर दिया. किसी ने ठीक ही कहा है कि धार्मिक और नस्लीय घृणा मति भ्रष्ट कर देती है. अगर गैलीलियो की वैज्ञानिक खोजों को उस वक्त इटली में अहमियत दी जाती तो वहां के वैज्ञानिक विकास की स्थिति आज कुछ और ही होती!


बहरहाल, न लिपर्शे की दूरबीन पहली थी और न ही गैलीलियो की दूरबीन आखिरी थी. तब से करीब चार सदियां बीत चुकी हैं और अब तक दूरबीनों ने खगोल विज्ञान में कई दिलचस्प और पेचीदा खोजों को अंजाम दिया है, इनमें हमारे सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा कर रहे ग्रहों की खोज, ब्रह्मांड के विस्तार की गति में तेजी के सबूत, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी का अस्तित्व, मिल्की-वे से इतर दूसरी आकाशगंगाओ की खोज, ढेरों तारों, सुपरनोवा, ब्लैक हॉलों, क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं आदि की खोज शामिल है.


आज पृथ्वी पर कई सारी विशालकाय दूरबीने लगी हुई हैं तो कुछ दूरबीने अंतरिक्ष में भी स्थापित किए गए हैं. दरअसल, आकाशीय पिंड प्रकाश के अलावा इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन भी बाहर निकलते हैं. जो खगोलीय पिंड बहुत दूर हैं, उनमें से बाहर आने वाली इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन का ज़्यादातर हिस्सा पृथ्वी का वायुमंडल सोख लेता है और इसी वजह से पृथ्वी पर मौजूद ऑप्टिकल टेलीस्कोपों के जरिए वैज्ञानिक उन पिंडों को ठीक से नहीं देख पाते. पृथ्वी के वायुमंडल से होने वाली बाधाएं खगोलीय पिंडों की छवियों को धुंधला बना देती हैं. पृथ्वी की वायुमंडलीय बाधाओं को दूर करने और दूर के आकाशीय पिंडों के सटीक ऑब्जर्वेशन के लिए स्पेस टेलीस्कोप बनाए गए. नासा ने चार ऐसे ही टेलीस्कोप या आब्जर्वेटरिज अंतरिक्ष में उतारे हैं- चंद्रा एक्स-रे टेलीस्कोप, स्पिट्जर टेलीस्कोप, हब्बल स्पेस टेलीस्कोप और कॉप्टन गामा रे आब्जर्वेटरी. हालांकि इन चारों दूरबीनों का अपना महत्व है लेकिन हब्बल स्पेस टेलीस्कोप खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी के इतिहास में सबसे क्रांतिकारी दूरबीन साबित हुआ है. हबल स्पेस टेलीस्कोप की महान उपलब्धियों ने इसे खगोल भौतिकी और खगोल विज्ञान के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण दूरबीनों में से एक बना दिया है.


अमेरिकी खगोलशास्त्री एडविन पावेल हब्बल के नाम से मशहूर नासा के इस स्पेस टेलीस्कोप ने ब्रह्मांड और अंतरिक्ष के बारे में हमें बहुत सी नई जानकारियां दी हैं. ब्रह्मांड का तेजी से फैलाव हो रहा है, एडविन हब्बल यह पता लगाने वाले पहले सख्श थे. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ के पारस्परिक सहयोगी स्पेस मिशन के तहत हब्बल स्पेस टेलीस्कोप को 1990 में अंतरिक्ष में लॉन्च किया गया था और तब से लेकर अब तक इसने तमाम तकनीकी अड़चनों के बावजूद इन 31 सालों में ब्रह्मांड के कई रहस्यों से पर्दा उठाया है. अब तक अपने 31 साल के कार्यकाल में हब्बल दूरबीन ने ब्रह्मांड की कुछ सबसे बेहतरीन तस्वीरों को अपने कैमरे में कैद किया है और पृथ्वी पर भेजा है. इन तस्वीरों के जरिए वैज्ञानिक ब्रह्मांड, अंतरिक्ष और खगोलीय पिंडों (ग्रहों, तारों, निहारिकाओं, आकाशगंगाओं आदि) के बारे में एक बेहतर समझ अख़्तियार कर पा रहे हैं.


ब्रह्मांड और अंतरिक्ष के बहुत से रहस्य आज भी अनसुलझे हैं, बहुत से सवालों के जवाब अभी खोजे जाने बाकी हैं. हब्बल दूरबीन की कक्षा या ऑर्बिट लगातार छोटी हो रही है और ऐसी संभावना है कि यह दूरबीन 2024 में पृथ्वी के वायुमंडल में वापस आ कर जल जाए. लेकिन इसकी जगह लेने के लिए इसका उत्तराधिकारी पहले से ही तैयार है. जिसका नाम है- जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप और इसे इसी महीने 22 तारीख को अंतरिक्ष में लॉन्च किया जाना है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि इसकी मदद से उन आकाशगंगाओं को भी देखने में मदद मिल सकती है जो कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ ही बनी थीं. वैज्ञानिकों का कहना है कि जेम्स वेब को इसी मकसद के लिए तैयार किया गया है कि यह ब्रह्मांड की शुरुआती आकाशगंगाओं की खोजबीन करे. नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर की वैज्ञानिक एंबर स्ट्रान के मुताबिक हब्बल से भी ज्यादा प्रकाश वर्ष दूर तक इस दूरबीन की रेंज होगी और हम बहुत दूर मौजूद खगोलीय पिंडों को उनकी अरबों साल पहले की स्थिति में देख पाएंगे.


जेम्स वेब में ब्रह्मांड की गहराइयों में झाँकने के लिए बहुत बड़ा मिरर लगाया गया है. जहां हब्बल टेलीस्कोप के प्राइमरी मिरर की चौड़ाई 2.5 मीटर है, वहीं जेम्स वेब टेलीस्कोप की चौड़ाई 6.5 मीटर है. जेम्स वेब टेलीस्कोप की क्षमता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस पर एक सनशील्ड लगा हुआ है जिसका आकार एक टेनिस कोर्ट (तकरीबन 22 मीटर) के बराबर है. यह सनशील्ड सूर्य के इन्फ्रारेड किरणों को कैमरे के लेंस में दाखिल होने से रोकने के लिए लगाया गया है. यह सनशील्ड तापमान को स्थिर रखने में मददगार होगा. यह 298 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर भी टेलीस्कोप को सुरक्षित रख सकता है इसके साथ-साथ इस टेलीस्कोप में चार कैमरे और सेंसर मॉनिटर (मिड आईआर इंस्ट्रूमेंट, फिल्टर इमेजर, आईआर मल्टी-ऑब्जेक्ट स्पेक्ट्रोग्राफ और नियर इंफ्रारेड कैमरा) इंस्टाल किए गए हैं. जैसे ही किसी खगोलीय पिंड का प्रकाश टेलीस्कोप में दाखिल होगी तो वह प्राइमरी मिरर से टकराकर चार सेंसरों तक जाएगी. लब्बोलुआब यह है कि अंतरिक्ष में यह टेलीस्कोप एक सैटलाइट डिश के जैसे काम करेगा.


जेम्स वेब टेलीस्कोप को ब्रह्माण्ड के कुछ बड़े रहस्यों को सुलझाने के मकसद से लांच किया जाएगा. मोटे तौर पर इस जेम्स वेब मिशन के चार मुख्य लक्ष्य हैं. पहला, ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बाद बनने वाले शुरुआती तारों और आकाशगंगाओं की खोज. दूसरा, तारों और आकाशगंगाओं की उत्पत्ति को समझते हुए ब्रह्मांड की उत्पत्ति को सुलझाना. तीसरा, तारों की परिक्रमा कर रहे ग्रहों का अध्ययन. चौथा, जीवन की उत्पत्ति के रहस्य को सुलझाना.


जेम्स वेब टेलिस्कोप आधुनिक इंजीनियरिंग का एक बड़ा चमत्कार है. इसका विकास नासा, ईएसए और सीएसए ने मिल कर किया है. इस मिशन पर काम 1996 में शुरू हुआ था. इसे पहले 2005 में अंतरिक्ष में भेजा जाना था, लेकिन बजटीय और तकनीकी समस्याओं की वजह से लांचिंग की तारीख आगे खिसकती रही.  पिछले बहुत से अनुसंधान, अन्वेषण और शोध इस खास दूरबीन की प्रतीक्षा में हैं. तकनीकी बदलाव के साथ नई-नई चुनौतियां सामने आने से 2016, 2018 और 2020 (कोविड-19 महामारी) में भी इसकी लांचिंग स्थगित की जा चुकी हैं. हालांकि अब भले ही नासा ने इसकी सभी बजटीय और तकनीकी समस्याओं से निजात पा लिया हो लेकिन कोरोना वायरस के अब तक के सबसे खतरनाक और संक्रामक वैरिएंट ‘ओमिक्रान’ ने अमेरिका सहित पूरी दुनिया में दस्तक दे दी है, जिससे जेम्स वेब की लांचिंग निश्चित रूप से प्रभावित हो सकती है. अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो जेम्स वेब आगामी 22 दिसंबर को अंतरिक्ष में भेजा जाने वाला अब तक का सबसे बड़ा टेलीस्कोप बन जाएगा. तो ये तारीख नोट कर लीजिये और आस लगाए रखिए कि सब कुछ अच्छे से हो जाए. अस्तु!


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: December 9, 2021, 1:59 PM IST
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