अंतरिक्ष में स्वच्छता अभियान चलाए जाने की जरूरत

अंतरिक्ष में इंसानी दखल का इतिहास महज़ 6 दशक पुराना है. अक्टूबर 1957 में सोवियत संघ द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए पहले मानव निर्मित सैटेलाइट स्पूतनिक-1 के बाद से हजारों रॉकेट, सैटेलाइट, स्पेस प्रोब और टेलीस्कोप अंतरिक्ष में भेजे गए हैं. लिहाजा वक्त के साथ अंतरिक्ष में कचरा बढ़ने की रफ्तार भी बढ़ती गई.

Source: News18Hindi Last updated on: May 1, 2021, 3:50 PM IST
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अंतरिक्ष में स्वच्छता अभियान चलाए जाने की जरूरत
(प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: Science Photo Library/Corbis)
तकरीबन हफ्ता भर पुराना वाक़या है- धरती से करीब 320 किलोमीटर ऊपर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की ओर जा रही अंतरिक्ष यात्रियों की एक टीम सोने के लिए तैयार हो रही थी तभी स्पेसएक्स हेडक्वार्टर, कैलिफोर्निया से अचानक उनकी ओर बढ़ते एक खतरे को लेकर चेतावनी दी गई. अंतरिक्ष यात्रियों से कहा गया कि वे अपने स्पेससूट्स पहन लें और अपने-अपने सीट पर वापस चले जाएं. खतरा यह था कि स्पेसएक्स के जिस यान (क्रू ड्रैगन) में अंतरिक्ष यात्री सवार थे उसकी तरफ अंतरिक्षीय कचरे का एक टुकड़ा बेहद तेजी से बढ़ रहा था. सौभाग्यवश खतरा आया और टल गया! यह टुकड़ा स्पेसक्राफ्ट को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकता था.

उक्त घटना इसी 23 अप्रैल की है, यह दुर्घटना में भी तब्दील हो सकती थी! स्पष्ट है कि मंगल ग्रह तक मानव बस्तियां बसाने के मंसूबे पाले हमारी इस आधुनिक सभ्यता के लिए अंतरिक्ष में मौजूद मलबे या कचरे कितनी बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं. कई वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर अंतरिक्ष में तैरते कचरे से निजात पाने का तरीका नहीं निकाला गया और अंतरिक्ष में इंसान का दखल ऐसे ही बढ़ता गया तो आने वाले सौ सालों में पृथ्वी की निचली कक्षा में इतने सैटेलाइट्स और रॉकेट्स के मलबे तैरते दिखाई देंगे कि हमें कोई नया सैटेलाइट स्थापित करने की जगह ही नहीं मिलेगी!

हम इंसानों ने अपनी करतूतों से जल, जमीन, हवा, आकाश, नदियों, समुद्रों, पहाड़ों आदि सभी जगहों पर भयंकर प्रदूषण करके न सिर्फ अपने ऊपर बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवधारियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है. अब तक सोचा जा रहा था कि पृथ्वी और इसके पर्यावरण को ही इंसान प्रदूषित कर रहा है, मगर अब पृथ्वी और इसके वातावरण को छोड़कर अंतरिक्ष में भी मानव निर्मित स्पेसक्राफ्ट्स, रॉकेट्स और सैटेलाइट्स से उत्पन्न मलबे/कचरे खतरनाक अंतरिक्ष प्रदूषण का रूप अख़्तियार कर रहे हैं. लिहाजा अब अंतरिक्ष सैटेलाइट्स, अंतरिक्ष यात्रियों, स्पेस टेलिस्कोप्स और अंतरिक्ष स्टेशनों के लिए ज्यादा सुरक्षित नहीं रह गया है. एक अनुमान के मुताबिक छोटे-बड़े मिलाकर तकरीबन 17 करोड़ पुराने रॉकेट और बेकार हो चुके सैटेलाइट्स के टुकड़े आठ किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं. आपसी टक्कर से इन टुकड़ों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा ही हो रहा है.

अंतरिक्ष में इंसानी दखल का इतिहास महज़ 6 दशक पुराना है. अक्टूबर 1957 में सोवियत संघ द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए पहले मानव निर्मित सैटेलाइट स्पूतनिक-1 के बाद से हजारों रॉकेट, सैटेलाइट, स्पेस प्रोब और टेलीस्कोप अंतरिक्ष में भेजे गए हैं. लिहाजा वक्त के साथ अंतरिक्ष में कचरा बढ़ने की रफ्तार भी बढ़ती गई.
यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे पृथ्वी के कई पहाड़ों पर अत्यधिक पर्वतारोहण की वजह से तरह-तरह के कूड़े-करकट के अंबार लगे हैं, उसी तरह से अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में कबाड़ की एक चादर फैल गई है. एक अनुमान के मुताबिक पिछले 25 वर्षों में अंतरिक्ष में कचरे की मात्रा दुगनी से भी ज्यादा हो गई है.
अंतरिक्ष में बढ़ता कबाड़ वैज्ञानिकों के लिए सिरदर्द बन गया है. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि आने वाले वक्त में पृथ्वी की कक्षा कम्यूनिकेशन सैटेलाइट्स से इस कदर भर जाएगी कि इसमें नए सैटेलाइट्स के लिए जगह ही नहीं बचेगी.

सन् 1993 में पृथ्वी पर स्थित राडार से अंदाजा लगाया था तो अन्तरिक्ष में मानव निर्मित 10 सेन्टीमीटर से बड़े कचरे की संख्या लगभग 8000 आई थी. आज 5000 से ज्यादा तो एक मीटर से बड़े कचरे हैं. 10 सेंटीमीटर आकार के कचरों की संख्या 20,000 और एक सेन्टीमीटर आकार के कचरे की संख्या 7.5 लाख मानी जा रही है. इससे छोटे आकार के कचरों और कबाड़ों का अनुमान लगाना भी मुश्किल है.

अंतरिक्ष युग की शुरुवात से लेकर अबतक तकरीबन 23000 सैटेलाइट्स विभिन्न देशों द्वारा अंतरिक्ष में भेजे जा चुके हैं. भेजे गए इन सैटेलाइट्स में से फिलहाल 5 प्रतिशत ही सक्रिय हैं, बाकी 95 प्रतिशत सैटेलाइट्स पृथ्वी की कक्षा में कचरे के रूप में बगैर किसी नियंत्रण के बेलगाम 36000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार (0.22 कैलीबर की राइफल से निकली गोली 22 गुना से भी ज्यादा रफ्तार) से घूम रहे हैं, जो लगातार आपस में टकरा-टकराकर, टूटकर अपनी संख्या में इजाफा कर रहें हैं. इनके लगातार टकराने की गति संख्यावृद्धि के साथ-साथ और तेज होती जा रही है.
अंतरिक्ष में कचरे के टकराने की शृंखला अभिक्रिया को वैज्ञानिकों ने ‘केस्लर सिंड्रोम’ नाम दिया है. यह नाम नासा के पूर्व वैज्ञानिक डॉनाल्ड केस्लर के सम्मान में दिया गया है, जिन्होने अंतरिक्ष कचरे को लेकर सन् 1978 में सबसे पहले गंभीरतापूर्वक अनुसंधान शुरू किया था. केस्लर ने सत्तर के दशक में यह भविष्यवाणी की थी कि एक दिन पृथ्वी की कक्षा में कचरा इतना ज्यादा बढ़ जाएगा कि वे आपस में टकरा-टकराकर अपनी संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी इजाफा करते जाएंगे. लिहाजा अब अंतरिक्ष कार्यकर्मों के नियंता और वैज्ञानिक केस्लर सिंड्रोम को गंभीरतापूर्वक ले रहे हैं.

एक ब्रिटिश वैज्ञानिक रिचर्ड क्राउटडर के मुताबिक सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि पृथ्वी से 22,300 मील ऊपर की भू-स्थैतिक कक्षा (जियो-स्टेशनरी ऑर्बिट) में अंतरिक्षीय कचरे के जमघट और आपसी टक्कर के परिणामस्वरूप दुनिया की संचार व्यवस्था भी चौपट हो सकती है. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंतरिक्ष में आठ किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से चक्कर काट रहे एक सिक्के से किसी दूसरे सिक्के की टकराहट से वैसा ही प्रभाव होगा जैसा धरती पर सौ किलोमीटर की रफ्तार से चल रही दो बसों की टक्कर से होता है. अंतरिक्ष में मंडराते कचरे से टकराने पर स्पेसक्राफ्ट्स और एक्टिव सैटेलाइट्स नष्ट हो सकते हैं और इसके साथ ही इंटरनेट, जीपीएस, टेलीविज़न जैसी जरूरी सेवाएँ भी बाधित हो सकती हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक फिलहाल अंतरिक्ष में मौजूद कबाड़ का जो घनत्व है, उससे हर पाँच साल में एक बार किसी सैटेलाइट से टकराने की आशंका है.

अंतरिक्ष का कचरा मानव जाति और इस पृथ्वी के समस्त जीव जगत के लिए भी घातक है. अगर ये अनियंत्रित लाखों डिग्री सेल्सियस ताप पर दहकते टुकड़े घनी बस्तियों पर गिरते है तो जान-माल दोनों की बड़ी हानि हो सकती है. 1969 में जापानी जहाज पर गिरे एक टुकड़े से एक नौसैनिक घायल हो गया था. एक बार कबाड़ का एक टुकड़ा उड़ते हवाई जहाज से कुछ ही दूरी से निकल गया था, अगर जहाज से टकरा जाता तो भीषण दुर्घटना हो जाता. 2017 में एक मिलीमीटर के एक नन्हे से टुकड़े ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की बेहद मजबूत काँच की खिड़की को तोड़ दिया था! 2001 में कोलंबिया स्पेस शटल की दुर्घटना में भारतीय मूल की कल्पना चावला समेत सात अन्य अंतरिक्ष यात्रियों की जान चली गई थी. इस दुर्घटना के अलग-अलग कारण बताएं जाते हैं लेकिन कुछ रिपोर्टों में यह आशंका जताई गई थी कि अंतरिक्ष में भटकते एक टुकड़े/कचरे से टकराने की वजह से यह भीषण त्रासदी हुई थी!

जिस तरह से सभी देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों को अंजाम दे रहें हैं, उस तरह तो अंतरिक्ष में भीड़ और भी बढ़ेगी और इससे दुर्घटना की संभावनाएं भी बढ़ेंगी. तो इस समस्या का समाधान क्या है, इसके जवाब में वैज्ञानिक कहते हैं कि अंतरिक्ष से कचरे को इकट्ठा करके वापस धरती पर लाना ही इस समस्या का इकलौता समाधान है लब्बोलुबाब यह है कि अंतरिक्ष में भी स्वच्छता अभियान चलाए जाने की जरूरत है.

अंतरिक्ष के कचरे को खत्म करना या वापस पृथ्वी पर लाना एक बेहद चुनौतीपूर्ण और खर्चीला काम है. इस कचरे के निस्तारण को लेकर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुछ उपाय सुझाएं हैं. संयुक्त राष्ट्र ने एक ऐसे सैटेलाइट को विकसित करने का सुझाव दिया था जो ऐसे कचरे को अंतरिक्ष में एक जगह पर इकट्ठा करके उसे पृथ्वी की ओर धकेल दे. यह कचरा या तो पृथ्वी के वातावरण में दाखिल होते वक्त जलकर खाक हो जाए या फिर इसे ऐसी दिशा दी जाए कि बगैर कोई नुकसान पहुंचाए समुद्र में गिर जाए.


वहीं नासा की योजना यह है कि पृथ्वी से लेजर किरणे भेजकर अंतरिक्ष में मौजूद कचरे को या तो बाहरी कक्षाओं में धकेल दिया जाए या फिर समाप्त कर दिया जाए. फिलहाल जापान की स्काई परफेक्ट जेसैट कॉर्प नामक एक कंपनी इसी दिशा में काम कर रही है. कंपनी के मुताबिक लेजर से निकलने वाली ऊर्जा, कचरे की कक्षा को बाधित कर उसे धरती के वायुमंडल में धकेल देगी जहां वो जलकर खाक हो जाएगा. नासा भी एक इलेक्ट्रो नेट पर काम कर रही है. यह जाल अंतरिक्ष में मौजूद कचरे को बांधेगा और वापस धरती के वायुमंडल में लाएगा, लेकिन इस कान्सैप्ट पर ठोस काम होना अभी बाकी है.

स्काई परफेक्ट जेसैट कॉर्प समेत कम से कम चार जापानी कंपनियाँ अंतरिक्षीय कचरे की सफाई को लेकर बेहतर व्यवसायिक अवसर देख रही हैं. वर्तमान में विभिन्न देशों की सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियां और निजी कंपनियाँ अंतरिक्ष की सफाई को लेकर काम कर रहीं हैं. फिलहाल हमारे पास कोई सस्ती और कारगर तकनीक नहीं है जिससे अंतरिक्ष का मलबा साफ किया जा सकें, हालांकि आशावादियों का मानना है कि समस्या की गंभीरता को उद्घाटित करने पर वैज्ञानिक और अंतरिक्ष कार्यक्रमों के नियंता (सरकारें) जरूर इस बारे में कोई चिंतन शुरू करेंगी और कोई न कोई समाधान जरूर निकाल लेंगे. अस्तु!

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: May 1, 2021, 3:35 PM IST
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