ब्रह्मांड को बांधे रखने वाली शक्तियां

‘ब्रह्माण्ड’ (यूनिवर्स) का एक ऐसा शब्द है, जिसके अंदर सबकुछ समाहित है. सुप्रसिद्ध ब्रह्मांडविज्ञानी (कोस्मोलोजिस्ट) सर फ्रेड होयल के मुताबिक,...

Source: News18Hindi Last updated on: April 23, 2020, 10:40 AM IST
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ब्रह्मांड को बांधे रखने वाली शक्तियां
ब्रह्मांड के स्वरूप को दर्शाती एक तस्वीर.
‘ब्रह्माण्ड’ (यूनिवर्स) का एक ऐसा शब्द है, जिसके अंदर सबकुछ समाहित है. सुप्रसिद्ध ब्रह्मांडविज्ञानी (कोस्मोलोजिस्ट) सर फ्रेड होयल के मुताबिक, “ब्रह्मांड सबकुछ है: जीवंत और निर्जीव वस्तुएं, अणु-परमाणु और आकाशगंगाएँ, आध्यात्मिक और भौतिक तंत्र, स्वर्ग और नर्क (यदि कोई है), सबकुछ समेट लेना ब्रह्मांड का विशिष्ट गुणधर्म है.” ब्रह्मांड के रहस्यों की गहराइयों का अंदाजा मानव समाज कई शताब्दियों पूर्व से अब तक लगा रहा है. और जिज्ञासा और उत्कट लालसा ही वह कारण है जो मानव समाज को ब्रह्माण्ड के रहस्यों की परतें उभारने में मदद कर रहा है. अलग-अलग सभ्यता के समय पर जब लोगों से पूछा गया कि आपको अपने ब्रह्मांड का कितना सम्यक ज्ञान है तो लोगों का यही जवाब था कि हमें अपने ब्रह्मांड के बारे में अच्छी तरह से मालूम है, जबकि ऐसा नहीं है. बीसवीं शताब्दी के खोजों ने हमें ब्रह्मांड के संबंध में बहुत कुछ जानने की ग़लतफ़हमियों से उबारा क्योंकि वास्तविकता तो यह है कि हमे ब्राह्मांड के संबंध में केवल 4 प्रतिशत जानकारियां ही प्राप्त हैं, शेष 96 प्रतिशत जिसके बारे में हम कुछ खास नहीं जानते! और ऐसा इसलिए क्योंकि 4 प्रतिशत से अणुओं और परमाणुओं से हमारा दिखाई पड़ने वाला ‘दृश्य ब्रह्मांड’ बना है. बाकी 96 प्रतिशत ब्रह्मांड डार्क मैटर और डार्क एनर्जी के ऐसे रूप से बना है जिनके बारे में हम अभी तक कुछ खास नहीं जान पाए हैं.

अब सवाल यह उठता है कि हमने इस 4 प्रतिशत में ब्रह्मांड के बारे में अब तक क्या जाना? तो संक्षेप में शायद हमारा उत्तर प्रश्नात्मक हो कि ब्रह्मांड कैसे उत्पन्न हुआ? ब्रह्मांड की क्रियाएं कैसे उत्पन्न हुई? और हमारा उदय किस प्रकार हुआ? जैसे कई प्रश्नों के अलावा हमने ब्रह्मांड की संरचना और उसके गणितीय स्वरूप को महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के आपेक्षिकता सिद्धांत (थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी) के जरिए समझा, जिसने हमारी प्रकाश की गति प्राप्त करने की उम्मीद ही खत्म कर दी. बर्न के पेटेंट ऑफिस में एक क्लर्क की हैसियत से काम कर रहे 26 वर्षीय अल्बर्ट आइंस्टाइन ने सैद्धांतिक भौतिकी की स्थापित मान्यताओं को चुनौती देते हुए दिक्काल (यानी स्पेस-टाइम) और पदार्थ की नई धारणाओं के साथ चार शोध पत्र प्रकाशित किए जिन्होंने ब्रह्मांड विज्ञान को झकझोरकर उसका कायाकल्प ही कर दिया. आइंस्टाइन ने हमें बताया कि हमारा या हमारे यान का अस्तित्व शून्य लंबाई और अनंत द्रव्यमान में बना नहीं रह सकता.

लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि ऐसी कौन-सी शक्ति है जो हमें और हमारे इस ब्रह्मांड को समस्त क्रियाओं से बांधे रखता है? और शायद इस प्रश्न का उत्तर भी हमारी ब्राह्मांड से संबंधित उसी 4 प्रतिशत के ज्ञान में शामिल है. भौतिक विज्ञानियों ने अब तक चार ऐसे बलों की खोज की है जो इस व्यवस्था के लिए जिम्मेदार हैं. और यह हैं- गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युतचुंबकीय बल (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स), प्रबल बल (स्ट्रॉंग फोर्स) और कमजोर या क्षीण बल (वीक फोर्स).


गुरुत्वाकर्षण से हम सब भली भांति परिचित हैं. इस बल के कारण ही ऊपर फेंका गया पत्थर धरती पर वापस आ जाता है. उपग्रह ग्रहों के और ग्रह, सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं और इसके कारण ही आकाशगंगा के 150 अरब से भी ज्यादा तारे एक व्यवस्था में बंधे हुए हैं. महान वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली ने मुक्त रूप से गिरते पिंड का अध्ययन करके जड़त्व का नियम दिया था. जड़त्व सभी कणो और पिंडों का अभिन्न गुण है. इसके बाद सर आइजक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के लिए एक गणितीय नियम को प्रस्तुत करके बताया कि विशाल पिंडों के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव अनंत दूरियों तक रहता है. लेकिन न्यूटन गुरुत्वाकर्षण का केवल मापन ही कर पाए थे. दो आकाशीय पिंडों के बीच यह बल किस साधन से, किस माध्यम से और किस वेग से काम करता है न्यूटन ने इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी. उन्होने द्रव्यमान और वजन यानी भार में भी अंतर बताया था.
सन् 1915 में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने गुरुत्वाकर्षण को एक नए ढांचे में प्रस्तुत किया था, जो उनके आपेक्षिकता के सामान्य सिद्धान्त (थ्योरी ऑफ जनरल रिलेटिविटी) के रूप में विख्यात है. वस्तुतः हम पृथ्वी पर आवास करतें हैं, जिसके कारण हम ‘यूक्लिड की ज्यामिती’ को सत्य मानतें हैं, परन्तु दिक्-काल में यह सर्वथा असत्य है. और हम पृथ्वी पर अपनें अनुभवों के कारण ही यूक्लिड की ज्यामिती को सत्य मानतें हैं, और सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत यूक्लिड के ज्यामिती से भिन्न ज्यामिती को अपनाती है. इसलिए सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत को समझना आशा से अधिक चुनौतीपूर्ण माना जाता रहा है.

सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत ‘समतुल्यता के नियम’ (इक्वीलेंस प्रिंसिपल) पर आधारित है, और इसके अनुसार गुरुत्वाकर्षण बल प्रकाश के ही वेग से गतिमान रहता है. समतुल्यता के नियम को समझने के लिए कल्पना कीजिये कि भौतिकी से संबंधित प्रयोग के लिए पृथ्वी पर एक बंद कमरा है तथा अन्तरिक्ष में त्वरित करता हुआ (9.8 मीटर/सेकेंड) एक अन्य  कमरा है, दोनों ही कमरे प्रयोग करने के लिए एकसमान होंगें. दरअसल, आइंस्टाइन ने समतुल्यता के नियम के ही द्वारा यह सिद्ध किया कि त्वरण (एस्स्लरेशन) एवं गुरुत्वाकर्षण एक ही प्रभाव उत्पन्न करते हैं. इसके लिए उन्होनें प्रसिद्ध ‘लिफ्ट एक्सपेरिमेंट’ नामक वैचारिक प्रयोग का सहारा लिया.

सर्वप्रथम आप यह कल्पना कीजिये कि एक लिफ्ट है, जो किसी इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल पर है. लिफ्ट के तार को काट दिया जाता है और लिफ्ट स्वतंत्रतापूर्वक  नीचें गिरने लगता है. जब लिफ्ट गिरने लगेगा तो उसमे सवार लोगों पर भारहीनता का प्रभाव पड़ेगा, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से अन्तरिक्ष यात्री अन्तरिक्ष यान में सवार हो करके करते हैं. उस समय पृथ्वी की ओर बेरोकटोक तीव्र गति से गिरने का अनुभव होगा. यदि कोई व्यक्ति जो लिफ्ट के अंदर उपस्थित हों और लिफ्ट के बाहर का कोई दृश्य न देख सके तो उसका अनुभव ठीक उसी प्रकार से होगा, जिस प्रकार से अन्तरिक्ष यात्रियों को होता है. कोई भी व्यक्ति यह नही बता सकता हैं कि लिफ्ट में जो घटनाएँ घटी, वह गुरुत्वाकर्षण के कारण घटी हैं अथवा त्वरण के कारण. अत: सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत के अनुसार त्वरण तथा गुरुत्वाकर्षण मूलतः एक ही प्रभाव उत्पन्न करतें हैं तथा इनकें बीच अंतर स्पष्ट करना असम्भव हैं.
वास्तविकता में, आइन्स्टाइन के सिद्धांत के अनुसार गुरुत्वाकर्षण एक बल नही हैं, बल्कि त्वरण तथा मंदन का कारक है एवं सूर्य के नजदीक ग्रहीय-पथ एवं ग्रहों के निकट उपग्रहीय-पथ को वक्रिल बनाता है. किसी अत्यंत सहंत पिंड के इर्दगिर्द दिक्-काल वक्र हो जाता है. वस्तुतः अब यह पुरानी मान्यता हो चुकी है कि सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसके इर्दगिर्द ग्रह दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं में परिक्रमा करतें रहतें हैं, बल्क़ि यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि सूर्य का द्रव्यमान अपने इर्दगिर्द के दिक्-काल (स्पेस-टाइम) को वक्र (कर्व) कर देता है. और दिक्-काल की वक्रता के ही कारण चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी सूर्य का!


आइंस्टाइन के मुताबिक गुरुत्वाकर्षण बल के माध्यम के लिए गुरुत्वीय तरंगों और इसके प्रसारण के लिए एक विशेष किस्म के सूक्ष्म कण ‘ग्रेविटॉन’ का अस्तित्व होना चाहिए. हालांकि इसके बाद भी गुरुत्वाकर्षण की गुत्थी सुलझी नहीं और अभी भी ग्रेविटॉन की खोज जारी है, वहीं गुरुत्वीय तरंगों की खोज हो चुकी है. आइंस्टाइन ने भी द्रव्यमान और भार का विस्तृत रूप प्रस्तुत किया और बताया कि जब किसी वस्तु पर बल लगाया जाता है तो उसकी गति बल के अनुपात में बढ़ जाती है, इस अनुपात का स्थिरांक ही द्रव्यमान है. दूसरी ओर वजन का अर्थ है द्रव्यमान पर गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव. हालांकि, गुरुत्वाकर्षण बल सभी तारों, ग्रहों, आदि विशाल पंडो को आपस में बांधे रखता है लेकिन यह ब्रह्मांड का सबसे कमजोर बल है.

विद्युतचुंबकीय बल की तरफ बढ़ने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि इसकी खोज उन्नीसवीं सदी में हुई थी. मनुष्य को चुंबक की आकर्षण शक्ति पहले से ही मालूम थी लेकिन वस्तुओं में यह चुंबक शक्ति बिजली की धारा प्रवाहित करके भी पैदा की जा सकती थी या जानकारी लगभग 150 साल पहले ही मिली है. इससे चुंबक और विद्युत की शक्तियों को एक विद्युत चुंबकीय बल में संयुक्त करना संभव हुआ. बाद में जेम्स क्लार्क मैक्सवेल ने इस बल के प्रभाव क्षेत्र के लिए गणितीय समीकरण भी प्रस्तुत कर दिए. यह बल अणुओं-परमाणुओं को एक दूसरे से बांधता है. हमारे दैनिक जीवन (डेली रूटीन) की अनगिनत चीजें यहां तक कि हमारी शारीरिक संरचना भी इसी बल के कारण टिकी हुई है. यह बल आवेशी कणों के बीच फोटोन्स की मदद से काम करता है यह गुरुत्वाकर्षण से करीब 10^40 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है. इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि गुरुत्वीय बल में केवल आकर्षण काम करता है जबकि इस बल में आकर्षण और प्रतिकर्षण दोनों काम करते हैं. इसलिए विद्युतचुंबकीय बल को परस्पर क्रिया कहना ज्यादा सही होगा.

इन दोनों बलों के अलावा बीसवीं सदी में दो और बलों की खोज की गई. इन नए बलों को समझने के लिए पहले परमाणु की आंतरिक रचना के बारे में कुछ छोटी-मोटी बातें जानना जरूरी है. हम सभी जानते हैं कि परमाणु अविभाज्य नहीं. और उसमे एक नाभिक होता है। परमाणु नाभिक में मुख्यत: दो तरह के कण होते हैं- प्रोटान जिन पर धन आवेश (पॉज़िटिव चार्ज) होता है और न्यूट्रान जो आवेश रहित होते हैं. नाभिक के चारों ओर ऋण आवेश (नेगेटिव चार्ज) वाले इलेक्ट्रान नामक कण चक्कर लगाते रहते हैं. परमाणु में जितने प्रोटान होते हैं उतने ही इलेक्ट्रॉन भी होते हैं. इन विपरीत आवेशों के कणों के बीच विद्युतचुंबकीय बल काम करता है. जिसके कारण परमाणु नाभिक और उस का चक्कर लगाने वाले इलेक्ट्रान एक-दूसरे के साथ बंधे रहते हैं (यदि प्रकृति में चुंबकीय बल ना होता तो न तो परमाणु होते और न ही किसी सजीव या निर्जीव का अस्तित्व होता)। नाभिक के न्यूट्रान कण आवेश रहित होते हैं इसलिए उनके इनको बांधे रखने के लिए किसी बल की जरूरत नहीं है. लेकिन अब यहां एक समस्या है हम जानते हैं कि समान आवेश वाले कण एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और विपरीत आवेश वाले एक दूसरे को आकर्षित करते हैं. इस हिसाब से देखें तो प्रोटान को स्वयं एक-दूसरे को दूर धकेलना चाहिए. क्योंकि सभी प्रोटानों पर धन आवेश होता है लेकिन नाभिक में ऐसा नहीं होता, उलटे सभी प्रोटान एक-दूसरे के साथ दृढ़ता से बंधे रहते हैं. इस कारण की खोज के लिए काफी गहराई से सोचने पर वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि गुरुत्वाकर्षण और विद्युतचुंबकीय बल के अलावा कोई तीसरा बल भी मौजूद है जो प्रोटानो को आपस में बांधे रखता है और यह बल पहले दोनों बलों से ज्यादा शक्तिशाली है. वैज्ञानिकों ने इसे ‘प्रबल बल’ का नाम दिया, जो विद्युतचुंबकीय बल से 10^2 गुना ज्यादा शक्तिशाली है. यह बल नाभिक के भीतर केवल कुछ ही दूरी तक 10^-15 मीटर तक का करता है. बाद में जब परमाणु नाभिक में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के अलावा अन्य अतिसूक्ष्म कणो की खोज हुई तो वैज्ञानिकों ने नाभिक में एक चौथे बल की भी खोज की. ये नए कण नाभिक के भीतर एकाएक जन्म लेते हैं, क्षणभर के लिए नाभिक के भीतर ही यात्रा करते हैं और फिर दूसरे कणों में रुपांतरित हो जाते हैं. वैज्ञानिकों ने खोज की कि इन कणों की उत्पत्ति एक विशिष्ट बल के कारण होती है. इसी बल के कारण प्रकृति के कुछ तत्वों के नाभिक की बड़ी तेजी से क्षय होता रहता है (इसको हम रेडियोधर्मिता के नाम से जानते हैं). इस बल को वैज्ञानिकों ने ‘क्षीण बल’ का नाम दिया. यह विद्युतचुंबकीय बल से करीब 10^10 गुना कमजोर होता है. यही चार बल पूरे ब्रह्मांड को एक व्यवस्थित ढंग से बांधे रखते हैं. ब्रह्मांड के विकासक्रम में इन चार बलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

जब महाविस्फोट (बिग बैंग) के साथ ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई तो द्रव्य और ऊर्जा का फैलाव शुरू हुआ. द्रव्य और ऊर्जा के साथ-साथ स्पेस और टाइम का भी विस्तार आरंभ हुआ. महाविस्फोट के बाद शुरुआती क्षणों में ब्राह्मांड का तापमान बहुत ऊँचा था. उस समय ये चारों बल एकीकृत (यूनिफाइड) थे. ब्रह्मांड की उत्पत्ति के 3 मिनट बाद ही तापमान इतना घट गया कि प्रबल बल सक्रिय हो गया. इस बल ने प्रोटान और न्यूट्रानो को बांधकर नाभिकों का निर्माण कर दिया. इसके लगभग 5 लाख साल बाद विद्युतचुंबकीय बल सक्रिय हुआ और इसने नाभिकों और इलेक्ट्रानों को आपस में बांधकर परमाणुओं का निर्माण कर दिया. बाद में जब तारे, ग्रह, उपग्रह व दूसरे खगोलीय पिंड अस्तित्व में आए तो गुरुत्वाकर्षण बल सक्रिय हो गया. वैज्ञानिक मानते हैं कि ब्राह्मांड के शुरूआती क्षणों में सभी बल संयुक्त रहे थे. इसलिए पिछले कई दशकों से वैज्ञानिक इन बलों को संयुक्त करने के प्रयास चल रहे हैं. विद्युतचुंबकीय बल व आंशिक यानी क्षीण बल को एक करने में वैज्ञानिकों को सफलता मिल गई है और इसके साथ प्रबल बल को भी संयुक्त करने में उन्होंने आंशिक सफलता हासिल कर ली है. लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल को अन्य बलों के साथ जोड़ने में कठिनाई आ रही है. गौरतलब है कि इन बलों को संयुक्त करने से हमें ‘थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ मिल जाएगा!

आइंस्टाइन ने भी इस दिशा में कई साल प्रयास किए, लेकिन वह सफल नहीं हुए. इसके प्रयास आज भी जारी हैं यदि यह चारों बल एक साथ जुड़ जाते हैं तो कई सदियों से चले आ रहे ब्रह्मांड विज्ञान के सारे नियमों में भूचाल आना लाजिमी है.

(लेखक विज्ञान विषय के जानकार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: April 23, 2020, 10:38 AM IST
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