मंगल ग्रह पर बसने की बेताबी

हम इंसानों के लिए सबसे डरावना भविष्य वह है जिसमें मानव सभ्यता के ही खत्म हो जाने की कल्पना की जाती है. लेकिन क्या मंगल ग्रह पर जीव होना, इस डर को कुछ हद तक कम कर सकता है?

Source: News18Hindi Last updated on: January 16, 2020, 1:04 PM IST
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मंगल ग्रह पर बसने की बेताबी
अमेरिका मंगल ग्रह पर अगले साल रोवर भेजने की तैयारी कर रहा है.
अब तक ज्ञात ब्रह्मांड में केवल हमारी धरती पर ही जीवन है. और मानव जाति ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में इतनी प्रगति की है कि आज हम एक सुविधाजनक, स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जीने में भी सक्षम हैं. मगर हमारी वर्तमान दुनिया राजनैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से उथल-पुथल के दौर में है. ऐसी परिस्थिति में सवाल है कि क्या मानव जाति अपना वजूद अगले दो सौ वर्षों तक कायम रख पाएगी?

हम इंसानों के लिए सबसे डरावना भविष्य वह है जिसमें मानव सभ्यता के ही खत्म हो जाने की कल्पना की जाती है. ये कल्पनाएं निराधार नहीं हैं. इस समय मानवजाति जलवायु परिवर्तन, परमाणु युद्ध, जैव विविधता का विनाश, ओज़ोन परत में सुराख, जनसंख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी आदि समस्याओं के अलावा आसमानी खतरों, जैसे किसी उल्का या धूमकेतु के टकरा जाने के जानलेवा खतरे, का भी सामना कर रही है. बीसवीं शताब्दी तक हम सोचते थे कि हम बहुत सुरक्षित जगह पर रह रहे हैं लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है. मानव जाति के लुप्त होने के खतरे चिंताजनक रूप से बहुत अधिक और बहुत तरह से बढ़ गए हैं. महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग यह कहकर धरती से रुखसत हो चुके हैं कि महज़ 200 वर्षों के भीतर मानव जाति का अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो सकता है और इस संकट का एक ही समाधान है कि हम अंतरिक्ष में कॉलोनियां बसाएं.

वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल ग्रह पर जीवन के लिए वहां के वायुमंडल में बदलाव करने होंगे.


इधर हाल के वर्षों में हुए अनुसंधानों से यह पता चलता है कि भविष्य में हम पृथ्वीवासियों द्वारा रिहायशी कॉलोनी बनाने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान हमारा पड़ोसी ग्रह मंगल है. मंगल ग्रह और पृथ्वी में अनेक समानताएं हैं. हालांकि मंगल एक शुष्क और ठंडा ग्रह है, लेकिन इसमें वे तमाम तत्व मौजूद हैं जो इसे जीवन के अनुकूल बनाते हैं. जैसे पानी, कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन वगैरह. हालांकि पृथ्वी का जुड़वा समझे जाने वाले शुक्र ग्रह की आंतरिक संरचना पृथ्वी से काफी मिलती-जुलती है, लेकिन जब बात जीवन योग्य परिस्थितियों की हो तो मंगल अनोखे रूप से सर्वाधिक उपयोगी और उपयुक्त ग्रह है. मंगल अपनी धुरी एक चक्कर लगाने में लगभग पृथ्वी के बराबर समय लेता है (24 घंटे, 39 मिनट और 35 सेकंड). मंगल पर पृथ्वी के समान ऋतुचक्र होता है. पृथ्वी की तरह मंगल पर भी वायुमंडल मौजूद है, हालांकि यह बहुत विरल है.
लेकिन इन समानताओं के साथ कुछ भिन्नताएं भी हैं, जो मंगल को मानव के लिए रिहायशी कॉलोनियों में तबदील करने में बड़ी चुनौती पेश करती हैं. मंगल पर न तो वायु पर्याप्त है और न ही सूरज की रोशनी. वहां का अधिकतम तापमान अंटार्कटिका के न्यूनतम तापमान के लगभग बराबर है. हानिकारक सौर किरणें मंगल की सतह पर सीधे धावा बोलती हैं. 95 प्रतिशत कार्बन डाईऑॅक्साइड से बना इसका वायुमंडल हमारे लिए दमघोंटू है.

अलबत्ता, वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल के परिवेश को पृथ्वी जैसा बनाना संभव है. मंगल को रूपांतरित करके पृथ्वी जैसा बनाने को वैज्ञानिक ‘टेराफॉर्मेशन’ का नाम देते हैं. भले ही यह कल्पना रोमांचक लगती हो मगर टेराफॉर्मिंग आसान नहीं है. इसके साथ अनेक तकनीकी और पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं हैं.


इससे जुड़ा हालिया सुझाव यह है कि अगर मंगल ग्रह पर परमाणु विस्फोट किए जाएं, तो उसके वातावरण को रहने लायक बनाया जा सकता है. इसे न्यूक मार्स की संज्ञा दी गई है. सैद्धांतिक रूप से यह दावा है कि परमाणु हथियारों के विस्फोट से कार्बन डाईऑॅक्साइड मुक्त होगी, जिससे एक ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा होगा जो मंगल की ठंडी जलवायु को गर्म कर देगा.निजी स्वामित्व वाली स्पेसएक्स एक ऐसी कंपनी है जो मंगल ग्रह पर पहुंचने और वहां कॉलोनी बसाने के मामले में विभिन्न देशों के सरकारी संगठनों (मसलन नासा, ईसा, जैकसा और इसरो) से काफी आगे है. यह कंपनी केवल 17 साल पुरानी है लेकिन दुनिया भर में उपग्रह प्रक्षेपण के मामले में अपना दबदबा बनाए हुए है. स्पेसएक्स के अरबपति मुखिया एलन मस्क का यह मानना है कि नाभिकीय विस्फोट मंगल के बर्फीले ग्लेशियरों को पिघला देगा. यह कुछ-कुछ कृत्रिम सूरज (आर्टिफिशियल सन) के जैसा होगा और स्पेसएक्स के पास ऐसी तकनीकी क्षमता है जो मंगल के वातावरण को रेडियोधर्मी (रेडियोएक्टिव) किए बगैर उसे इंसानी जीवन के अनुकूल बना सकती है.

पर इस तकनीक में काफी पैसा खर्च होगा और साथ ही इस तकनीक में कई खतरे भी हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि भले ही सुनने में यह आसान और रोमांचक लगता हो, मगर वैसा है नहीं. कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार मंगल पर परमाणु विस्फोट से वहां का वातावरण बहुत ठंडा हो सकता है जिसकी वजह से वहां का तापमान गर्म होने की बजाय और ठंडा हो सकता है. परमाणु विस्फोट से राख और धूल की चादर मंगल ग्रह को ढंक लेगी जिससे मंगल के औसत तापमान में भारी गिरावट आ जाएगी और वहां नाभिकीय जाड़ा (न्यूक्लियर विंटर) शुरू हो सकता है.


और तो और, इस तकनीक में मंगल ग्रह के वातावरण और उसकी सतह पर विकिरण फैलने का खतरा भी है जो हमारे भविष्य की इकलौती उम्मीद यानी मंगल ग्रह को तबाह कर सकता है. इस लिहाज़ से देखें तो मस्क के विचार बेहद भयानक हैं. बेहतर होगा कि हम मंगल पर कदम सावधानी से रखें. और वहां ज़मीन के नीचे पनप रहे किसी सूक्ष्मजीवी जीवन (माइक्रोबियल लाइफ) को तबाह न कर दें.

(लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: January 16, 2020, 1:04 PM IST
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