फिजूलखर्ची नहीं है अंतरिक्ष में जाने की होड़

यह बेहद अजीब बात है कि हमारे पास युद्ध लड़ने और उच्च मारक क्षमता की रक्षा तकनीकें विकसित करने के लिए पैसे हैं, लेकिन पूरी मानव जाति की रक्षा हेतु अंतरिक्ष कार्यक्रम पर खर्च करने के लिए नहीं. निश्चित रूप से अंतरिक्ष में जाना सस्ता नहीं होगा, लेकिन फिर भी इसमें दुनिया के संसाधनों का बहुत छोटा सा हिस्सा ही खर्च होगा.

Source: News18Hindi Last updated on: July 26, 2021, 12:01 pm IST
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फिजूलखर्ची नहीं है अंतरिक्ष में जाने की होड़

हाल ही में अमेजॉन के संस्थापक जेफ बेजोस और उनसे पहले वर्जिन ग्रुप के चेयरमैन रिचर्ड ब्रैंसन ने अंतरिक्ष की सैर की. जहां एक ओर अंतरिक्ष पर्यटन (स्पेस टूरिज़्म) के लिहाज से दोनों की अंतरिक्ष यात्राओं को मील का पत्थर और मानव सभ्यता की प्रगति और विकास का सूचक माना गया. वहीं, दूसरी तरफ कई बुद्धिजीवियों और पर्यावरणविदों ने इसे गैरजरूरी और फिजूलखर्ची बताकर उनके इस कृत्य की जमकर आलोचना की.


एक अनुमान के मुताबिक विश्व की तकरीबन 22 प्रतिशत आबादी रोटी, कपड़ा, मकान जैसी मूलभूत समस्याओं से जूझ रही है. हम इंसानों ने अपनी करतूतों से धरती को जलवायु परिवर्तन और भारी प्रदूषण की गिरफ्त में झोंक दिया है. वैसे भी आज पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी के दुष्चक्र में फंसी हुई है, लाखों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, करोड़ों लोग बेरोजगार हो चुके हैं. ऐसे में निश्चित रूप से हमें अपने ज़्यादातर संसाधनों का इस्तेमाल आमजन की खुशहाली, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और जलवायु परिवर्तन व प्रदूषण की समस्या का समाधान ढूंढने के लिए करना चाहिए.


क्‍या अंतरिक्ष जाना असल समस्‍याओं से मुंह मोड़ना है?

सवाल उठता है कि क्या अंतरिक्ष में जाना गरीबी, जलवायु परिवर्तन जैसी असल समस्याओं से मुंह मोड़ना नहीं है? महज कुछ मिनटों या घंटों की अंतरिक्ष यात्रा के लिए इतनी कोशिश और इतना पैसा खर्च करना कहां की समझदारी है? आखिर, हमें अंतरिक्ष में जाना ही क्यों चाहिए, क्या पृथ्वी पर रहने के बेहतर कारण नहीं है? आखिर क्यों निर्धनता, बेरोजगारी और भुखमरी जैसी मूलभूत समस्याओं को भूलकर हम चांद-तारों-ग्रहों की बात कर रहें हैं? आइए, इन सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं.


यह सभी जानते हैं कि अंतरिक्ष की अकल्पनीय दूरियों और अनगिनत खगोलीय पिंडों के संदर्भ में हमारी पृथ्वी की हैसियत बेहद कमजोर और खतरों भरी है. वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के गर्भ में सुरक्षित जीवाश्मों के अध्ययन से यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला है कि हमारी पृथ्वी कभी खतरों से खाली नहीं रही और इसने अनेक संकटों को झेला है. बीसवीं शताब्दी तक हम सोचते थे कि हम बहुत सुरक्षित जगह पर रह रहे हैं, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है. मानव जाति के लुप्त होने के खतरे चिंताजनक रूप से बहुत अधिक और बहुत तरह से बढ़ गए हैं.


कई साल पहले ब्रिटिश खगोलशास्त्री ब्रोण्डन कोर्टर ने ‘डूम्स डे’ (प्रलय का दिन) का सिद्धांत दिया था. इसमें उन्होने सांख्यिकीय विश्लेषण से यह अनुमान लगाने की कोशिश की थी कि विलुप्त हो चुकी प्रजातियों की सूची में हम (इंसान) कब शामिल होंगे. विलुप्त होने के उन्होने कई कारण बताए थे- परमाणु दुर्घटना, महामारी, ग्लोबल वार्मिंग, जनसंख्या में बेतहाशा बढ़ोत्तरी….और अनेक आसमानी खतरे, मसलन किसी घातक उल्का पिंड, क्षुद्रग्रह या धूमकेतु से पृथ्वी की टक्कर वगैरह-वगैरह.

महान वैज्ञानिक स्टीफेन हॉकिंग ने आज से दस साल पहले ही कह दिया था कि महज दो सौ वर्षों के भीतर पृथ्वी पर ऐसी घटना घट सकती है जिससे पूरी मानव जाति का नामोनिशान ही मिट जाए! उन्होने यह भी कहा था कि इस संकट का एक ही समाधान है कि हम अंतरिक्ष में कॉलोनियां बसाएं.


अस्तित्व बचाने को उठाना होगा अंतरिक्ष में जाने का जोखिम

हॉकिंग अपनी आखिरी किताब ‘ब्रीफ आन्स्वेर्स टू द बिग क्वेस्चंस’ में लिखते हैं: ‘हम इंसान अज्ञानी और विचारशून्य हो सकते हैं. हमने जब भी इतिहास में अस्तित्व के संकट का सामना किया, तब हमारे पास अमूमन कोई न कोई जगह होती थी, जहां हम उपनिवेश बसा सकते थे. कोलंबस ने 1492 में ऐसा किया, जब उसने नई दुनिया की खोज की, परंतु अब कोई नया विश्व नहीं है. कोई कल्पनालोक नहीं है. हमारे लिए जगह कम पड़ रही है और जो जाने के लिए अन्य स्थान बचे हैं, वे दूसरे विश्व हैं….


लिहाजा हमें अपना अस्तित्व बचाने के लिए यहाँ टिके रहने की बजाय बाहर निकल कर अंतरिक्ष में जाने का जोखिम उठाना चाहिए…अंतरिक्ष में फैल जाने से हम स्वयं को अपने आप से ही बचा सकेंगे. मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास है कि इंसान को पृथ्वी छोड़कर जाने की जरूरत है. अगर हम रुके तो पूरी तरह से विलुप्त होने का खतरा है.’ लब्बोलुबाब यह है कि हर कहानी का एक अंत जरूर होता है-हमारी कहानी का भी होगा!


हॉकिंग सहित अधिकांश खगोलशास्त्रियों का यही मानना है कि अगर हम अंतरिक्ष की ओर नहीं गए तो मानव जाति का शायद ही कोई भविष्य भी होगा. काफी समय से वैज्ञानिक यह कहते आ रहे हैं कि हमें अपने मौजूदा घर (पृथ्वी) से अलग एक और घर अंतरिक्ष में, दूसरे ग्रहों-उपग्रहों पर बसाना होगा. ऐसा किसी शौक के लिए नहीं बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए करना होगा.

क्योंकि, पृथ्वी तरह-तरह के खतरों से सुरक्षित नहीं है. इसलिए अब अंतरिक्ष अन्वेषण और अंतरिक्ष यात्रा महज रोमांच और जिज्ञासा का विषय न होकर, वास्तव में यह आने वाली पीढ़ी और मानव जाति के वजूद को बचाए रखने के लिए हमारा कर्तव्य भी है.


निर्जन द्वीप में पड़े परित्यक्त जैसा हो सकता है हमारा हाल

जरा सोचिए, क्या मौजूदा परिदृश्य में अंतरिक्ष में जाने को संसाधनों की बर्बादी या फिजूलखर्चीं कहना कितना सही है? अगर हम अंतरिक्ष में नहीं जाते हैं, तो हमारा हाल कुछ-कुछ उस निर्जन द्वीप में पड़े परित्यक्त जैसा होगा, जो बचने का कोई प्रयास ही नहीं कर रहा है. लिहाजा, हमें अंतरिक्ष में और भी संभावनाएं खोजनी चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि मनुष्य और कहाँ रह सकते हैं.


मेरा मानना है हमें छोटी-से-छोटी अंतरिक्ष यात्रा को प्रोत्साहित करना चाहिए, भले ही वह रोमांच और आनंद के उद्देश्य से की जा रही हो. क्योंकि, अंतरिक्ष में जाने की होड़ से विज्ञान के प्रति जनसमान्य की रुचि में बढ़ोत्तरी तो होती है, साथ-ही-साथ तकनीकी प्रगति की रफ्तार भी तेज होती है. आज के अनेक वैज्ञानिक अंतरिक्ष में मनुष्य के पहुंचने के बाद विज्ञान के प्रति प्रेरित हुए, जिससे वे हमारे और ब्रह्मांड में मनुष्य के स्थान को लेकर एक बेहतर समझ अख़्तियार कर सके. इसने दुनिया के बारे में सोचने का नया नज़रिया दिया और पृथ्वी ग्रह के भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में समग्रता से सोचने के लिए प्रेरित किया.


रिचर्ड ब्रैंसन और जेफ बेजोस की अंतरिक्ष उड़ानें अंतरिक्ष और विज्ञान के प्रति लोगों के उत्साह को बहाल करने में अहम भूमिका निभाएंगी. उद्योगपतियों के बीच अगर अंतरिक्ष में जाने को लेकर प्रतिस्पर्धा होती है, तो इससे तकनीकी विकास में ही तेजी आएगी और अंततोगत्वा दूसरे ग्रहों पर मानव बस्तियां बसाने का सपना साकार हो पाएगा. यही हमारी दीर्घावधि रणनीति होनी चाहिए, इसके अलावा हमारे पास कोई भी विकल्प नहीं है.

यह बेहद अजीब बात है कि हमारे पास युद्ध लड़ने और उच्च मारक क्षमता की रक्षा तकनीकें विकसित करने के लिए पैसे हैं, लेकिन पूरी मानव जाति की रक्षा हेतु अंतरिक्ष कार्यक्रम पर खर्च करने के लिए नहीं. निश्चित रूप से अंतरिक्ष में जाना सस्ता नहीं होगा, लेकिन फिर भी इसमें दुनिया के संसाधनों का बहुत छोटा सा हिस्सा ही खर्च होगा.


यूएस अंतरिक्ष कार्यक्रमों में खर्च कर रहा है अपनी जीडीपी का 0.3 प्रतिशत

अमेरिका अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए अपने जीडीपी का महज 0.3 प्रतिशत हिस्सा खर्च करता है वहीं हमारा देश मुश्किल से अपनी जीडीपी का 0.1 प्रतिशत इसरो को अन्तरिक्ष अनुसंधान के लिए देता होगा. अगर हम अंतराष्ट्रीय बजट को बीस गुना बढ़ा देते हैं, ताकि अंतरिक्ष में जाने के गंभीर प्रयास हो सके तो भी यह दुनिया के जीडीपी का बहुत ही मामूली अंश होगा. हमें अंतरिक्ष को अपने सपनों की नई मंजिल बनाना होगा और निजी कंपनियों के कारण मंजिल तक दौड़ में हुई तेजी को प्रोत्साहित करना होगा.


कुछ लोग कह सकते हैं कि अंतरिक्ष में खोजबीन करने की बजाय हमें अपना पैसा आमजन की खुशहाली, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और जलवायु परिवर्तन व प्रदूषण की समस्या का समाधान ढूंढने के लिए करना चाहिए. बिलकुल यह जरूरी है और हमें करना भी चाहिए. लेकिन, इसके बावजूद हम अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए अंतराष्ट्रीय जीडीपी के एक प्रतिशत का चौथाई हिस्सा तो बचा ही सकते हैं. क्या हम भविष्य के लिए एक प्रतिशत का चौथाई हिस्सा भी खर्च नहीं कर सकते? प्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक कोंस्तांतिन त्सिओल्कोव्स्की ने पृथ्वी को मानव जाति का पालना कहा था. क्या, हम हमेशा के लिए पालने में ही रहना पसंद करेंगे?


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: July 26, 2021, 12:01 pm IST

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