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    गैलीलियो-न्यूटन के रोचक किस्सों से समझिए खगोल विज्ञान के नए युग की शुरुआत

    कॉपरनिकस के सूर्यकेंद्री मॉडल के कारण खगोल विज्ञान में क्रांति आ गई. इसने विज्ञान की अन्य शाखाओं पर भी व्यापक प्रभाव डाला. कॉपरनिकस के मॉडल को संशोधित व विकसित करके आगे बढ़ाने का काम टाइको ब्राहे, जोहांस केप्लर, गैलीलियो गैलीली जैसे खगोलविदों ने किया.  

    Source: News18Hindi Last updated on: August 7, 2020, 10:52 PM IST
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    गैलीलियो-न्यूटन के रोचक किस्सों से समझिए खगोल विज्ञान के नए युग की शुरुआत
    सूर्य ग्रहण का दृश्य. (फाइल फोटो)
    कॉपरनिकस के सूर्यकेंद्री मॉडल के कारण खगोल विज्ञान में तो क्रांति हुई ही, साथ में विज्ञान की अन्य शाखाओं पर भी इसने व्यापक प्रभाव डाला. विशेषकर भौतिक विज्ञान में तो इस क्रांति का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा. हालांकि  कॉपरनिकस के मॉडल में अब भी कई कमियां थीं, जैसे उन्होने पृथ्वी के स्थिर होने और सूर्य व अन्य ग्रहों द्वारा उसकी परिक्रमा करने की धारणा का तो खंडन किया था, लेकिन प्राचीन यूनानियों की तरह ग्रहों के लिए वृत्ताकार कक्षा होने की बात को इनकार नहीं कर सके. और अधिचक्र की आडंबरयुक्त धारणा अब भी कॉपरनिकस के सिद्धांत में मौजूद थी. हालांकि इससे इसकी ज्यामितीय रचना जरूर आसान हो गई थी, मगर ज्यादा आकर्षक नहीं रही. इससे खगोलविज्ञानियों के एक वर्ग में निराशा और हताशा बढ़ने लगी थी. मगर अब कॉपरनिकस को नकारा नहीं जा सकता था क्योंकि यह पुराने भूकेंद्री या पृथ्वीकेंद्री सिद्धांत की अपेक्षा चंद्रमा और ग्रहों की गतियों की सटीक व्याख्या करने में सक्षम था. बहरहाल, कॉपरनिकस के सूर्यकेंद्री मॉडल को संशोधित व विकसित करके आगे बढ़ाने का काम टाइको ब्राहे, जोहांस केप्लर, गैलीलियो गैलीली जैसे खगोलविदों ने किया.

    टाइको ब्राहे दूरबीन-पूर्व-युग के एक महान खगोलविद थे. दूरबीन के आविष्कार से पहले आकाशीय पिंडों का अध्ययन-अवलोकन करने के लिए हमारे पास एक ही साधन था- हमारी आंखे. आज से सदियों पूर्व जब आज की तरह आधुनिक दूरबीनें नहीं थी, फिर भी हमारे पूर्वजों ने ग्रहों एवं नक्षत्रों से संबंधित अत्यंत उच्चस्तरीय वैज्ञानिक खोजें अपनी आंखों एवं अन्य सीमित साधनों से की. इस तथ्य का एक श्रेष्ठ उदाहरण महान खगोलविद टाइको ब्राहे थे, जिन्होंने डेनमार्क स्थित अपनी वेधशाला में अपनी आंखों और विशाल खगोलीय यंत्रों से कोण मापते हुए महत्वपूर्ण आंकड़े प्राप्त किए थे। उन्होने ग्रहों और तारों की गति और स्थिति का बेहद सावधानी के साथ निरीक्षण किया और दर्ज किया.

    वर्ष 1572 में ब्राहे ने शर्मिष्ठा तारामंडल (कैसोपीया) में एक अधिनव-तारा विस्फोट (सुपरनोवा) देखा था और वर्ष 1577 में और उसके बाद उन्होने पांच अन्य अवसरों पर धूमकेतुओं का अवलोकन किया. टाइको ब्राहे अपने आंकड़ों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि अधिनव तारा विस्फोट और धूमकेतुओं की कक्षा चांद से बहुत दूर स्थित हैं. और ये तारे पारदर्शी गोले को चीरकर हमारे सौरमंडल के बाहर से आए हैं. उनका यह निष्कर्ष अरस्तू-टॉलेमी के समय से अब तक चली आ रही उस प्राचीन मान्यता के विपरीत था, जिसमें यह माना जाता था कि तारे हमारे सौरमंडल के ही बाशिंदे हैं और वे स्थिर हैं. ब्राहे की विलक्षणता इस बात में है कि उन्हें हम एक ऐसे मोड़ पर पाते हैं जहां विज्ञान अपने सैद्धांतिक चोगे को उतार फेंकता है और जैसा कि हम आगे देखेंगे कि कालांतर में ब्राहे द्वारा जुटाए गए महत्वपूर्ण खगोलीय आकड़ों का ही प्रयोग करके ब्राहे के सहायक जोहांस केप्लर ने ग्रहों की गति के प्रसिद्ध तीन नियमों की खोज की थी.

    टाइको ब्राहे को कॉपरनिकस का सूर्यकेंद्री मॉडल गलत लगता था. साथ ही उन्होने अरस्तू-टॉलेमी के भी भूकेंद्री मॉडल को खारिज कर दिया था; क्योंकि उनके खगोलीय अवलोकन इन दोनों ही सिद्धांतों से मेल नहीं खाते थे. इसलिए उन्होने सौरमंडल का अपना अलग टाइकोनिक मॉडल प्रस्तुत किया. उनके मॉडल की यह विशेषता थी कि उसमें बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते थे, यानी सूर्यकेंद्री थे, और फिर सूर्य और चंद्रमा सहित अन्य ग्रह मिलकर पृथ्वी की परिक्रमा करते थे, यानी पृथ्वीकेंद्री भी था. लब्बोलुबाब यह है कि ब्राहे का मॉडल टॉलेमी और कॉपरनिकस के मॉडल का मिलाजुला रूप था. ब्राहे जीवनभर शुद्ध और अनवरत अवलोकनों के जरिए अपने मॉडल को सही सिद्ध करने को प्रयासरत रहे. इसी क्रम में ब्राहे को गणितीय गणनाओं में पारंगत एक मेधावी गणितज्ञ की जरूरत थी, जिसकी पूर्ति 1600 में जोहांस केप्लर के मुलाक़ात से हुई. टाइको और केप्लर के बीच के संबंध मधुर नहीं थे. लेकिन महत्व की बात यह है कि टाइको ब्राहे द्वारा जुटाए गए खगोलीय आकड़ें केप्लर के लिए बेहद मूल्यवान साबित हुए.
    टाइको ब्राहे की मौत के बाद केप्लर ने उसकी अनुपस्थिति अथवा उत्तराधिकारियों के अभाव का फायदा उठाते हुए चुपचाप उनके आंकड़ों को अपने कब्जे में ले लिया. रोचक बात यह है कि जहां टाइको ब्राहे को कॉपरनिकस का सूर्यकेंद्री सिद्धांत गलत लगता था, वहीं केप्लर का पूर्ण विश्वास था कि सूर्य को विश्व के केंद्र में ही होना चाहिए. केप्लर पर अपने खगोलविज्ञान के अध्यापक मिखाइल मेस्टलिन के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा था. गौरतलब है कि मेस्टलिन उन शुरुवाती बुद्धिजीवियों में से थे जिन्होंने कॉपरनिकस के सिद्धांत को ढंग से समझा और स्वीकार किया था.

    टाइको ब्राहे द्वारा जुटाए गए सर्वोत्तम आंकड़ों का तकरीबन 20 वर्षों तक केप्लर ने सूक्ष्मता से अध्ययन-विश्लेषण किया. केप्लर के ज़्यादातर प्रयास मंगल ग्रह की कक्षा से संबंधित थे. वास्तव में केप्लर का ऐसा मानना था कि मंगल की कक्षा के बारे में अधिकाधिक अध्ययन करने से ही ग्रहों की गति के रहस्य को समझा जा सकता है, क्योंकि इसकी कक्षा वृत्त से काफी अलग होती है. और यहीं पर केप्लर अपने पूर्ववर्तियों से आगे निकल गए.

    गौरतलब है कि पाइथागोरस और अरस्तु समेत सभी प्राचीन यूनानियों, यहां तक कि कॉपरनिकस को भी वृत्ताकार कक्षा में गहरी आस्था थी. केप्लर, टाइको ब्राहे के आंकड़ों का गंभीरतापूर्वक विश्लेषण करके इस सामान्य एवं सरल निष्कर्ष पर पहुंचे कि ‘ग्रह जिस पथ पर चलते हैं वह वृत्ताकार नहीं होता. वह दोनों तरफ अंदर की ओर और विपरीत किनारों पर बाहर की तरफ झुका होता है. इस तरह की आकृति को दीर्घवृत्ताकार या अंडाकार आकृति कहते हैं. अत: ग्रह दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं में घूमते हैं, ना कि वृत्ताकार कक्षाओं में.’ और केप्लर के इसी अध्ययन-विश्लेषण की अंतिम परिणति 1609 में ‘एस्ट्रोनोमिया नोवा’ नामक ग्रंथ के रूप में हुई, जिसमें उन्होंने ग्रहों की गति के तीन विख्यात नियमों में से दो का प्रतिपादन किया, जिन्हें अब उन्हीं के नाम से जाता है. केप्लर ने अपने तीसरे नियम की खोज करने में दस और वर्ष लगाए, जिसका विस्तृत वर्णन उन्होंने वर्ष 1619 में ‘वार्मोंनिसेस मुंडी’ में किया.संक्षेप में केप्लर के तीन नियम इस प्रकार हैं- प्रथम नियम के अनुसार ग्रहों का पथ पूर्ण-वृत्ताकार नही हैं. ग्रहों का पथ वस्तुतः दीर्घवृत्ताकार अथवा अंडाकार है और सूर्य एक नाभि पर स्थित है. द्वितीय नियम अपने पथ पर गतिशील ग्रहों के वेग में होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या करता है. तृतीय नियम यह बताता है कि किन्ही दो ग्रहों के आवर्ती कालों के वर्ग सूर्य से उनकी औसत दूरी के घन के अनुपात में रहते हैं.

    केप्लर के नियमों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इनसे अधिचक्रों की बोझिल अवधारणा की कोई भी जरूरत नहीं रह गई. सही अर्थों में प्रकृति को संचालित करने वाली सार्वभौमिक नियमों की ये प्रथम प्रयोगसिद्ध व्याख्या थी. जब भी हम विज्ञान की खोजों और इसकी अभिप्रेरणाओं की चर्चा करते हैं तो जोहांस केप्लर से बढ़कर कोई भी उदाहरण नहीं मिलता!

    गैलीलियो और न्यूटन का आगमन
    कॉपरनिकस के सूर्यकेंद्री सिद्धांत ने जहां एक तरफ बाइबिल में उल्लिखित और चर्च द्वारा प्रसारित ज्ञान, दूसरी ओर महान ज्ञानसाधक अरस्तु और टॉलेमी के मत को चुनौती दी थी, वहीं ब्रूनो ने अपने विचार बेबाकी से प्रकट करके चर्च से लोहा लिया और आगे जाकर टाइको ब्राहे के महत्वपूर्ण खगोलीय आंकड़ों की सहायता से जोहांस केप्लर ने ग्रहीय गति के रहस्य को उजागर करते हुए कॉपरनिकस के सिद्धांत में जरूरी सुधार किए. ‘कोपरनिकसीय क्रांति’, ‘ब्रूनो की शहादत’ और केप्लर द्वारा ‘ग्रहों की गति के नियमों के प्रतिपादन’ के बाद अभी खगोल विज्ञान में असली क्रांति होनी बाकी थी.

    इसकी शुरुआत हुई सत्रहवीं सदी में इटली के महान खगोलविद गैलीलियो गैलिली से. गैलीलियो ने अपने समकालीन वैज्ञानिकों से अलग राह अपनाते हुए वैज्ञानिकों के नजरिए में क्रांतिकारी बदलाव ला दिए. वह अपने विचारों की सत्यता सिद्ध करने के लिए उस समय आमतौर पर प्रचलित तर्क-वितर्क का ही सहारा नहीं लेते थे, बल्कि अपने सिद्धांत को सही साबित करने के लिए उपयुक्त प्रयोगों को भी जरूरी मानते थे. इसलिए गैलीलियो को प्रयोगात्मक विज्ञान का जनक माना जाता है.

    गैलीलियो के विशिष्ट योगदान से खगोल विज्ञान में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ आया. सन 1609 में गैलीलियो ने हालैंड के ऐनकसाज हैन्स लिपरशे के द्वारा दूरबीन के आविष्कार के बाद स्वयं उसका पुनर्निर्माण किया और सर्वप्रथम खगोल विज्ञान के क्षेत्र में इसका उपयोग भी किया. गैलीलियो ने अपनी दूरबीन की सहायता से चन्द्रमा पर उपस्थित क्रेटर, बृहस्पति ग्रह के चार प्राकृतिक उपग्रहों सहित सूर्य के साथ परिक्रमा करने वाले सौर कलंकों या सौर धब्बों का भी पता लगाया. गैलीलियो ही वे वैज्ञानिक थे जिन्होंने यह पता लगाया कि सूर्य के पश्चात पृथ्वी का निकटवर्ती तारा प्रौक्सिमा-सेंटौरी है. इसके अतिरिक्त गैलीलियो ने हमें शुक्र की कलाओं से संबंधित ज्ञान तथा कॉपरनिकस के सूर्यकेंद्री सिद्धांत को सत्य प्रमाणित किया. इसलिए गैलीलियो को आधुनिक खगोलशास्त्र के पितामह का भी सम्मान दिया जाता है. गैलीलियो के अमूल्य योगदान को अल्बर्ट आइंस्टाइन तथा स्टीफन हाकिंग जैसे महान वैज्ञानिकों ने नम्रतापूर्वक स्वीकार किया है. स्टीफन हाकिंग ने अपनी किताब ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ टाइम में लिखा है: “गैलीलियो, शायद किसी अन्य व्यक्ति की तुलना में, आधुनिक विज्ञान के जन्म के लिए अधिक उत्तरदायी थे.’

    गैलीलियो को शुरू से ही कॉपरनिकस के सूर्यकेंद्री सिद्धांत में विश्वास था. वर्ष 1597 में उन्होने केप्लर को लिखा था, “मैं कॉपरनिकस के मॉडल में विश्वास करता हूं. इससे खगोल विज्ञान की बहुत सारी गुत्थियां सुलझ जाती हैं.” हालांकि गैलीलियो ने जब अपने दूरबीन के जरिए कॉपरनिकस के सिद्धांत के समर्थन में जरूरी प्रमाण इकट्ठे किए, तभी उन्होने इसे सार्वजनिक रूप से समर्थन देना शुरू किया. गैलीलियो ने जब अपनी दूरबीन से देखा तो उन्हें बृहस्पति ग्रह के पास चार छोटे-छोटे ‘तारे’ जैसे दिखाई दिए. गैलीलियो समझ गए कि बृहस्पति ग्रह का अपना एक अलग संसार है. उसके इर्द-गिर्द घूम रहे ये पिंड अन्य ग्रहों की तरह पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए बाध्य नहीं हैं. यहीं से टोलेमी और अरस्तु की परिकल्पनाओं की नींव हिल गई. जिनमें ग्रह और सूर्य सहित सभी पिंडों की गतियों का केन्द्र पृथ्वी को बताया गया था. गैलीलियो की इस खोज से सौरमडंल के सूर्यकेंद्री सिद्धांत को बहुत बल मिला.

    जब गैलीलियो ने सूर्यकेन्द्री सिद्धांत का समर्थन करना शुरू किया, उन्हें धर्मगुरुओ और कट्टरपंथियों के विरोध का सामना करना पडा़ और जैसा कि हम जानते हैं कि धार्मिक रूप से ईसाई चर्च ने भूकेंद्री मॉडल को स्वीकृति दे दी थी क्योंकि ब्रह्मांड का यह मॉडल बाइबिल के उत्पत्ति अध्याय के अनुरूप था. 1615 में कैथोलिक चर्च ने  गैलीलियो को धर्मविरोधी करार दे दिया. फरवरी 1616 मे वे आरोप मुक्त हो गए, लेकिन चर्च ने सूर्यकेंद्री सिद्धांत को गलत और धर्म के विरुद्ध कहा. गैलीलियो को इस सिद्धांत का प्रचार न करने की चेतावनी दी गई जिसे उसने मान लिया. लेकिन 1632 मे अपनी नई किताब ‘डायलाग कन्सर्निंग द टू चिफ वर्ल्ड सिस्टमस’ मे उनके द्वारा सूर्यकेन्द्री सिद्धांत के दुबारा समर्थन के बाद उन्हे चर्च ने फिर से धर्मविरोधी घोषित कर दिया और इस महान वैज्ञानिक को अपना शेष जीवन अपने घर में ही नजरबंद होकर गुजारना पड़ा.

    गैलीलियो ने पृथ्वी पर पिंडों की गति को प्रभावित करने वाले यांत्रिकी के तात्विक नियमों की खोज की थे. जो नियम उन्होंने बनाए थे, वे गिरते हुए पिंडों और लोलकों की गति के उनके व्यापक अध्ययन पर आधारित थे. और जैसा कि हम जानते हैं कि गैलीलियो ने अपनी दूरबीन से बृहस्पति के उपग्रहों की गतियों का विश्लेषण करते हुए कॉपरनिकस के सिद्धांत की पुष्टि की थी, मगर यह सवाल कि क्या कुछ ऐसे नियम बनाए जा सकते हैं, जो सभी पिंडों की गतियों को समान रूप से प्रभावित करते हैं, फिर चाहे वह पृथ्वी पर फेंका गया पत्थर हो या फिर सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने वाले ग्रहों की बात हो? वास्तव में गैलीलियो और उनके समकालीनों के लिए यह बात समझ से परे रही होगी कि खगोलीय पिंडों की गति भी उन्हीं नियमों से बंधी हुई है जिनसे कि दैनिक जीवन की सामान्य प्रक्षेपित वस्तुएं. इस बात की घोषणा के लिए सर आइजक न्यूटन का आगमन हुआ.

    यहां सत्रहवीं शताब्दी के दो महान विचारकों का उल्लेख प्रासंगिक होगा. पहले रेने देकार्ते जिन्होंने तर्क और विवेक की राह अपनाई और दूसरे फ्रांसिस बेकन जिन्होंने प्रयोग या आविष्कार को अधिक महत्व दिया. न्यूटन के लिए देकार्ते और बेकन दोनों के ही उदाहरण आवश्यक एवं महत्वपूर्ण थे. न्यूटन को देकार्ते से यह प्रेरणा मिली कि प्रकृति सदैव और हर जगह एकसमान है और उसमें एकरूपता छिपी रहती है. सामन्य लोगों के लिए जीवन के तथ्य और सच्चाइयां विस्मयकारी होती हैं, पर उनके पीछे छिपे सिद्धांतों की गूढ़ता के प्रति वे उदासीन रहते हैं. न्यूटन और सेब की कहानी तो सभी जानते हैं मगर उनके द्वारा प्रस्तावित गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के पीछे गहन तार्किक विचारशीलता एवं गैलीलियो द्वारा किए गए प्रयोगों को आत्मसात कर एक सार्वभौमिक सच्चाई को अति अनुशासित व विलक्षण रूप से प्रकाशित कर पाने की उनकी क्षमता अद्भुत थी.

    सन 1666 में प्लेग की महामारी फैलने के दौरान न्यूटन अपनी जागीर में रह रहे थे, गुरुत्वाकर्षण के बारे में उनके मन में पहली बार विचार आया. पेड़ से सेब गिरते देखकर गुरुत्वाकर्षण का विचार सूझने का किस्सा उसी दौरान का है. न्यूटन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जो बल सेब को धरती की ओर खींचता है, वही बल चंद्रमा को पृथ्वी की ओर और पृथ्वी को सूर्य की ओर खींचता है. केप्लर के ग्रहीय गति के नियमों के आधार पर अंततोगत्वा न्यूटन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि केवल पृथ्वी ही नहीं, अपितु प्रत्येक ग्रह और विश्व का प्रत्येक कण प्रत्येक दूसरे कण को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है. दो कणों के बीच कार्य करनेवाला आकर्षण बल उन कणों के द्रव्यमानों के गुणनफल का (प्रत्यक्ष) समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है. कणों के बीच कार्य करनेवाले पारस्परिक आकर्षण को गुरुत्वाकर्षण तथा उससे उत्पन्न बल को गुरुत्वाकर्षण बल कहा जाता है। न्यूटन द्वारा प्रतिपादित उपर्युक्त नियम को न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम कहते हैं. कभी-कभी इस नियम को ‘गुरुत्वाकर्षण का प्रतिलोम वर्ग नियम’ (इनवर्स स्क्वायर लॉ) भी कहा जाता है. यह एक क्रांतिकारी खोज है.

    न्यूटन एक सशक्त गणितज्ञ थे और उनका एक मूलभूत निष्कर्ष था कि एक ठोस गोलक का व्यवहार अपने केंद्र पर अवस्थित एक वज़नी बिंदु की तरह होता है. न्यूटन ने इस बात को आगे बढ़ाते हुए यह दिखा दिया कि ग्रहों के मार्गों का निश्चित निर्धारण किया जा सकता है और साथ ही यह भी कि ग्रह अपने निश्चित मार्ग पर घूमते हुए एक ब्रह्मांडीय घड़ी का काम करते हैं. उन्होंने गणितीय कुशाग्रता एवं परम धैर्य का परिचय देते हुए ज्वार–भाटों की, धूमकेतुओं की कक्षाओं की एवं अन्य ब्रह्मांडीय पिंडों के गतिचक्र की गणना की.

    न्यूटन द्वारा प्रेरित वैचारिक क्रांति के आधार में थी उनकी यह मान्यता कि जो नियम सामान्य आकार की वस्तुओं पर लागू होते हैं, वे वस्तुत: सार्वभौमिक हैं और हर छोटे–बड़े किसी भी आकार या शक्ल के पदार्थ या पिंडों पर लागू होते हैं. अठाहरवी सदी के दौरान ग्रहीय गतियों की समझ के लिए न्यूटन के नियमों की व्यापक छानबीन की गई. मगर क्या न्यूटन के नियम हमारे सौरमंडल के बाहर भी प्रासंगिक है, इसको लेकर कई लोगों ने संदेह प्रकट किया. हालांकि, 1803 में सर विलियम हर्शेल जुड़वा तारों के अध्ययन के आधार पर यह घोषणा कर सके कि कुछ मामलों में ये जोड़े वास्तविक भौतिक युग्मों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो एक दूसरे के चारों ओर चक्कर लगते हैं. हर्शेल के खगोलीय अवलोकनों के आधार पर आगे यह भी स्थापित हुआ कि जिन कक्षाओं को हम देखते हैं वे दरअसल अंडाकार हैं. इस प्रकार दूरस्थ तारों के बारे में न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों की प्रयोज्यता सिद्ध हुई. यह सवाल कि क्या ब्रह्मांड के समस्त पदार्थों के लिए एक सार्वभौम एवं एकसमान नियम को निर्धारण किया जा सकता है, आखिरकार एक वैज्ञानिक सिद्धान्त के रूप में स्थापित हुआ. इस प्रकार वैज्ञानिक चिंतन के क्षेत्र पहली महान क्रांति हुई.  (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
    ब्लॉगर के बारे में
    प्रदीप

    प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

    उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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    First published: August 7, 2020, 10:23 PM IST
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