ग्रहों के बनने की गुत्थी सुलझी या और उलझी?

क्या वाकई सौरमंडल का इतिहास चट्टानों और पिंडों के जोरदार टकराने से नहीं बल्कि धीरे-धीरे आपस में जुड़ने की घटनाओं से भरा है?

Source: News18Hindi Last updated on: February 17, 2020, 12:14 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
ग्रहों के बनने की गुत्थी सुलझी या और उलझी?
प्राचीन खलोगीय पिंड एरोकोथ’ (Arrokoth) की एक तस्वीर.
सदियों से ब्रह्माण्ड मानव को आकर्षित करता रहा है. इसी आकर्षण ने खगोल वैज्ञानिकों को ब्रह्माण्डीय प्रेक्षण और ब्रह्माण्ड अन्वेषण (Cosmic exploration) के लिए प्रेरित किया. ब्रह्मांड और सौरमंडल के रहस्यों की कुछ परतों को खोलने के क्रम में हाल ही में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने हमारे सौरमंडल के बाहरी छोर पर स्थित एक मध्यम आकार के चट्टान पता लगाया है. नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक इस चट्टान के कारण हमें ग्रहों के बनने की बुनियादी प्रक्रिया को फिर से समझने की ज़रूरत है. दरअसल, ‘एरोकोथ’ (Arrokoth) नामक इस प्राचीन खगोलीय पिंड (Ancient celestial body) के जरिए नासा के वैज्ञानिक ग्रहों के बनने की हमारी मौजूदा समझ को बदलने का दावा कर रहे हैं.

हमारे सौरमंडल (Solar system) का निर्माण कैसे हुआ इसको जानने का वैज्ञानिकों के पास कोई प्रत्यक्ष आधार नहीं हैं क्योंकि तारों और ग्रहों के बनने की प्रक्रिया में लाखों-करोड़ों वर्षों का समय लगता है. इसको लेकर हमारी मौजूदा सैद्धांतिक समझ यह है कि 13.7 अरब वर्ष पहले ब्रह्मांड की उत्पत्ति यानी बिग बैंग के तकरीबन 9 अरब वर्षों के बाद सूर्य और उसके परिवार के अन्य सदस्यों का जन्म हुआ. वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशनों के जरिए यह बताया था कि हमारा सूर्य और अन्य ग्रह एक विस्फोटक घटना के उत्पाद हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक एक अत्यंत सघन धूल और गैसों का बादल जिसे ‘नेब्यूला’ (Nebula) या नीहारिका कहते हैं, अपने ही गुरुत्वाकर्षण बल के कारण जब नेब्यूला सिकुड़ने लगता है तब तारों और ग्रहों का निर्माण होता है. केंद में स्थित तारे के आसपास छोटे-छोटे पत्थर और चट्टानें आपस में टकराकर बड़े चट्टानों का निर्माण करते हैं और हमारी वर्तमान समझ के मुताबिक आखिरकार यही विशाल चट्टानें एक जोरदार धमाके के साथ आपस में टकराकर ग्रहों और अन्य खगोलीय पिंडों का रूप अख़्तियार कर लेती हैं.

अब एरोकोथ की खोज के बाद ऐसा लग रहा है कि शायद अब तक हम गलत थे!

अब नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे सौरमंडल का इतिहास चट्टानों और पिंडों के जोरदार टकराने से नहीं बल्कि धीरे-धीरे आपस में जुड़ने की घटनाओं से भरा है. एरोकोथ दो अलग-अलग चट्टानी पिंडों के धीरे-धीरे विलय के परिणामस्वरूप बना है. इसपर जोरदार टक्कर का न तो कोई निशान है और न ही दरार! अब नासा के वैज्ञानिक यह दावा कर रहें हैं कि हमारे ग्रह भी इसी तरह से बने हैं. बर्फ और चट्टानें धीरे-धीरे जुड़ती चली गईं और आकार बढ़ता गया और आखिरकार ग्रह उस शक्ल में आए, जैसे वे आज दिखाई देते हैं.
दरअसल एरोकोथ नामक यह चट्टान किसी भी स्पेसक्राफ्ट द्वारा देखा गया अबतक का सबसे दूरवर्ती और सबसे प्राचीन पिंड है. वैज्ञानिकों ने नए शोध पत्रों में इस पिंड के रहस्यों को उजागर किया है. नई खोज से दशकों पुरानी इस गुत्थी को सुलझाने में मदद मिलेगी कि शुरुवाती सौरमंडल की धुंधली धूल से पहली बार ग्रह किस तरह बने. मूंगफली जैसे आकार का यह लाल चट्टान ‘काइपर बेल्ट’ (Kuiper Belt) में बौने ग्रह (Dwarf planet) प्लूटो से एक अरब साठ करोड़ किलोमीटर दूर स्थित है. 36 किलोमीटर लंबे पिंड में जमी हुई अवस्था में मीथेन मौजूद है.

एरोकोथ’ (Arrokoth) नामक इस प्राचीन खगोलीय पिंड (Ancient celestial body) के जरिए नासा के वैज्ञानिक ग्रहों के बनने की हमारी मौजूदा समझ को बदलने का दावा कर रहे हैं.


काइपर बेल्ट हमारे सौरमंडल के बाहरी छोर पर एक ऐसा क्षेत्र है, जहां हजारों बौने ग्रहों और बर्फीले चट्टानों की भरमार है. इस पट्टी में मौजूद पिंड दरअसल अरबों वर्ष पहले सूरज के ग्रहों के निर्माण के बाद बचे अवशेष हैं. दरअसल ग्रहों के निर्माण के बाद जो पिंड और चट्टानें बचे रह गए वे हमारे सौरमंडल के बाहरी हिस्से में इस बेल्ट मे मौजूद हैं. एरोकोथ भी इन्हीं मे से एक है.
नासा का न्यू होराइजंस (New Horizons) स्पेसक्राफ्ट पिछले साल एरोकोथ के पास से होकर गुजरा था. एरोकोथ पृथ्वी से इतना ज्यादा दूर है कि स्पेसक्राफ्ट द्वारा एकत्रित डेटा अभी भी पृथ्वी पर पहुंच रहे हैं. एरोकोथ की अनोखी बनावट को देखते हुए कुछ वैज्ञानिकों ने उसे अंतरिक्ष का ‘स्नो मैन’ भी कहा है. पहले इस पिंड का नाम ‘अल्टिमा थुले’ (Ultima Thule) रखा गया था, लेकिन नाजियों से जुड़ा होने के कारण इस नाम पर विवाद हो गया जिसके बाद इसका नाम एरोकोथ रखा गया जो एक अमेरिकी आदिवासी भाषा का शब्द है.


वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के ग्रह वैज्ञानिक और अध्ययन के प्रमुख लेखक प्रो. बिल मैककिनन (Prof Bill McKinnon) का कहना है कि एरोकोथ के बारे में एकत्रित जानकारी इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके सामने न्यू होराइजंस द्वारा 2015 में प्लूटो के बारे इकट्ठी की गई जानकारियां भी फीकी हैं. उन्होंने बताया कि हमने एरोकोथ के बारे में जो जानकारी हासिल की है उसे देखते हुए यह चट्टानी पिंड बहुत ही अनोखा है. यह महज आलू जैसी चट्टान नहीं है. यह पिंड हमारे सौरमंडल के बारे में बहुत कुछ कहता है. काइपर बेल्ट में एरोकोथ जिस स्थान पर स्थित है वहां कभी धूल और गैस के बादल का बाहरी छोर था.

गैस और धूल के इस बादल को सोलर नेब्यूला भी कहा जाता था. हमारा सूर्य जब पहली बार बना तब उसके चारों तरफ यह बादल मौजूद था. इस क्षेत्र में ग्रहों का विकास शुरुवाती चरण में ही रुक गया था, क्योंकि उस समय उपलब्ध द्रव्य सामग्री (Material content) का घनत्व कम था. इस बर्फीली जगह के जांच-पड़ताल से वैज्ञानिक उस समय में झांक सकते हैं जब मौजूदा ग्रहों के बीज बोए जा रहे थे.

(लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: February 17, 2020, 12:14 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर