ब्रह्मांड की अंधेरी गुफाएंं और भौतिकी का नोबेल

आकाशगंगा में ऐसे बहुत से तारे होते हैं जिनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से तीन-चार गुना से भी अधिक होता है. ऐसे तारों पर गुरुत्वीय खिचांव अत्यधिक होने के कारण तारा संकुचित होने लगता हैं, और दिक्-काल (स्पेस-टाइम) विकृत (कर्व) होने लगती है, परिणामत: जब तारा किसी निश्चित क्रांतिक सीमा (क्रिटिकल लिमिट)) तक संकुचित हो जाता है, और अपनें ओर के दिक्-काल को इतना अधिक झुका लेता है कि अदृश्य हो जाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 22, 2020, 10:53 PM IST
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ब्रह्मांड की अंधेरी गुफाएंं और भौतिकी का नोबेल
आप जल्दबाजी में अदृश्य तारे को ब्लैक होल मान लेते हैं तो आप गलत भी हो सकतें हैं क्योंकि यह एक ऐसा तारा भी हो सकता हैं जो हमसे बहुत दूर हैं. सांकेतिक फोटो: पीटीआई
स्वीडन की रॉयल साइन्स एकेडमी ने इस साल के लिए भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कारों की घोषणा कर दी है. यह पुरस्कार रोजर पेनरोज, रेनहार्ड गेंजेल और एंड्रिया गेज को इस साल 10 दिसंबर (अल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि) को दिया जाएगा. पुरस्कार राशि में से आधा हिस्सा पेनरोज को दिया जाएगा और बाकी आधे में से आधी-आधी राशि रेनहार्ड और एंड्रिया को मिलेगी. तीनों वैज्ञानिकों की खोज ब्लैक होल से जुड़ी हुई है. रोजर पेनरोज को 1965 में यह सिद्ध करने के लिए कि अल्बर्ट आइंस्टाइन का ‘सामान्य आपेक्षिकता सिद्धान्त’ (थ्योरी ऑफ जनरल रिलेटिविटी) अनिवार्य रूप से ब्लैक होल के सृजन की ओर ले जाती है. आइंस्टाइन के लिए किसी बिंदु पर हर तरफ से सिर्फ एक ही बल (गुरुत्व) कार्य करे और उसे संतुलित करने वाले सभी बल समाप्त हो जाएं, यह बात तर्क और बुद्धि से परे की थी. यानी आइंस्टाइन के ब्लैक होल के कान्सैप्ट में ही झोल लगता था. वहीं गेंजेल और गेज ने आधुनिक दूरबीनों और अन्य खगोलीय तकनीकों की सहायता से उन्होंने इस बात के सुबूत दिए कि हमारी आकाशगंगा-मिल्कीवे के केंद्र में हमारे सूर्य से तकरीबन 40 गुना द्रव्यमान वाला एक बेहद विशालकाय ब्लैक होल मौजूद है. बाद में खगोलविज्ञानियों द्वारा इस ब्लैक होल का नामकरण ‘सैजिटेरियस-ए’ नाम से किया गया.

दरअसल, ब्लैक होल अत्यधिक घनत्व तथा द्रव्यमान वाले ऐसें पिंड होते हैं, जो आकार में तो बहुत छोटे होते हैं. मगर इसके प्रबल गुरुत्वाकर्षण के चंगुल से प्रकाश की किरणों का भी निकलना नामुमकिन होता है. चूँकि इससे प्रकाश की किरणें भी बाहर नहीं निकल पाती हैं, अत: यह हमारें लिए हमेशा अदृश्य बना रहता है. आपके समक्ष प्रस्तुत इस लेख में हम इन्हीं ब्लैक होलों के बारे में चर्चा करने जा रहें हैं, जिसकें गुणधर्म बहुत ही विचित्र होते हैं.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ब्लैक होल का सबसे पुराना वर्णन विज्ञान की किताबों में नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की किताबों में मिलता है. साल 1757 की गर्मियों में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच प्लासी में चार दिनों तक एक भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें नवाब की जीत हुई थी. नवाब ने युद्ध में बंदी बनाए गए लोगों को फोर्ट विलियम के एक जेल में रखने का आदेश दिया, जिसे बाद में ब्लैक होल के नाम से जाना गया. जेल के एक कमरे में, जिसकी लंबाई 18 फुट तथा चौड़ाई 14 फुट थी, कुल 146 लोगों को कैद करके रखा गया. उस कमरे में सिर्फ दो छोटी-छोटी खिड़कियाँ थीं. जून के गर्म महीने में 146 में से 123 बंदी काल के ग्रास बन गए. इसी लोमहर्षक पहलू की वजह से जेल के कमरे को ब्लैक होल का नाम दिया गया क्योंकि इसमें एक छोटी-सी जगह के भीतर कैदियों को ठूंस दिया गया था और इससे निकलने का कोई भी रास्ता नहीं था. वैसे प्लासी के आखिरी युद्ध में छल-बल की बदौलत अंग्रेजों की जीत हुई थी.
(स्रोत : डॉ. जयंत नार्लीकर की नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित पुस्तक ‘ब्लैक होल’)

बहरहाल, यह हुई इतिहास की बात! वैज्ञानिक दृष्टि से ब्लैक होलों की मौजूदगी के बारे में सबसे पहले सुझाव साल 1783 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन मिशेल ने, उस समय के ज्ञात सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत (यूनिवर्सल थ्योरी ऑफ ग्रेविटेशन) के आधार पर प्रस्तुत किया था. मिशेल के अनुसार एक अत्यंत सघन एवं अतिसहंत तारा, जिसका गुरुत्वाकर्षण इतना प्रबल होगा कि उससें प्रकाश की किरणों का भी निकलना असम्भव हो जाएगा. तारे से उत्सर्जित होने वाली प्रकाश की किरणें अधिक दूर जाने से पहले ही तारे का गुरुत्वाकर्षण उसे अपनीं सतह पर वापस खींच लेगा. खगोलविज्ञानी ऐसे सघन पिंडो को अब ‘कृष्ण विवर’ या ‘ब्लैक होल’ कहते हैं. मिशेल के अनुसार हम इन्हें देख तो नहीं सकेंगे, परन्तु इसके गुरुत्वीय प्रभाव को अवश्य अनुभव कर सकेंगे. उनके अनुसार ब्रह्माण्ड में बहुत बड़ी संख्या में ऐसें तारे (ब्लैक होल) मौजूद हो सकतें हैं.

मिशेल के सुझाव के बाद साल 1796 में, फ़्रांसीसी वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ पियरे साइमन लाप्लास ने अपनीं पुस्तक ‘द सिस्टम ऑफ़ द वर्ल्ड’ में मिशेल से अलग एवं स्वतंत्र रूप से कहा था कि अत्यंत कम क्षेत्र में अधिक द्रव्यमान वाले पिंड के गुरुत्वाकर्षण के कारण प्रकाश की किरणों का भी निकलना असम्भव होगा. लाप्लास के तर्क को समझने लिए सर्वप्रथम हमें यह समझना होगा कि पलायन वेग (एस्केप वेलोसिटी) किसी ग्रह या तारे के लिए क्यों महत्वपूर्ण होता है. हम किसी वस्तु को ऊपर की ओर जितने अधिक वेग से फेंकते हैं, वह उतनी ही अधिक ऊंचाई तक ऊपर जाती है. यदि पृथ्वी पर हम एक गेंद को ऊपर फेंकते हैं, तो यह पृथ्वी पर वापस गिर जाता है. यदि एक निश्चित वेग सीमा को लांघकर हम एक रॉकेट को प्रक्षेपित करें, तो वह पृथ्वी के गुरुत्व-क्षेत्र को पार करके अन्तरिक्ष में पलायन कर जाएगा तथा पृथ्वी पर वापस नही आएगा. इस न्यूनतम वेग-सीमा को ‘निर्गम वेग’ कहतें हैं.पृथ्वी की सतह से पलायन वेग लगभग 11.2 कि.मी./सेकेण्ड हैं. ध्यान देने की बात है कि किसी पिंड का गुरुत्वाकर्षण जितना अधिक होता है, उतना ही उसका पलायन वेग भी अधिक होता है. चूँकि ब्लैक होलों का गुरुत्वाकर्षण अत्यधिक प्रबल होता हैं, इसलिए इसका पलायन वेग प्रकाश के वेग से भी अधिक होता है. पलायन वेग अत्यधिक होने के कारण प्रकाश सहित अन्य रेडियो तरंगे, एक्स-रे इत्यादि इसके प्रबल गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से निकलने में असमर्थ होती हैं.

लाप्लास ने अपने तर्क में कहा था कि यदि किसी तारे का द्रव्यमान और उसके त्रिज्या का अनुपात अत्यधिक हो, तो पलायन वेग प्रकाश की गति से भी अधिक होगा और इस स्थिति में तारे से प्रकाश की किरणें उत्सर्जित नही हो पाएंगी क्योंकि उसका गुरुत्व-क्षेत्र अत्यंत प्रबल होगा. लाप्लास ने अपनी पुस्तक के तीसरे संस्करण में इस मत को त्याग दिया क्योंकि उन्नीसवीं सदी में न्यूटन के कणिका-सिद्धांत (कारपसकुलर-थ्योरी) को समर्थन नही प्राप्त हो रहा था, उस समय यह माना जाता था कि प्रकाश द्रव्यमान रहित तरंग है, इसलिए यह गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से मुक्त रहता है. दरअसल तरंग सिद्धांत से यह स्पष्टीकरण नही दिया जा पा रहा था, कि प्रकाश गुरुत्वाकर्षण बल से कैसे प्रभावित होगा. गुरुत्वाकर्षण बल किस प्रकार से प्रकाश को प्रभावित करता है इस बारे में तब तक कोई उपयुक्त सिद्धांत सामने नही आया जब तक बीसवीं सदी के आरम्भिक काल में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने अत्यंत प्रभावशाली सैद्धांतिक विचार ‘सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत’ (थ्योरी ऑफ जनरल रिलेटिविटी) का प्रतिपादन नहीं कर दिया.

ब्लैक होल कैसे बनते हैं?
ब्लैक होल का निर्माण किस प्रकार से होता है, यह जानने के लिये तारों के विकास-क्रम को समझना ज़रूरी है. दरअसल तारे का विकास आकाशगंगा (गैलेक्सी) में उपस्थित धूल एवं गैसों के एक अत्यंत विशाल मेघ से आरंभ होता है, जिसे नीहारिका (नेब्यूला) कहते हैं. नीहारिकाओं के अंदर हाइड्रोजन की मात्रा सर्वाधिक होती है और 23 से 28 प्रतिशत हीलियम तथा अल्प मात्रा में कुछ भारी तत्वों की मौजूदगी होती है.

जब गैस और धूल से भरे हुए मेघ के घनत्व में वृद्धि होती है. उस समय मेघ अपने ही गुरुत्व के कारण संकुचित होने लगता है. मेघ में संकुचन के साथ-साथ उसके केन्द्रभाग के ताप एवं दाब में भी वृद्धि हो जाती है. अंततः ताप और दाब इतना अधिक हो जाता है कि हाइड्रोजन के नाभिक आपस में टकराने लगते हैं और हीलियम के नाभिक का निर्माण करनें लगतें हैं. ऐसे में तारों के अंदर तापनाभिकीय संलयन (थर्मो-न्यूक्लियर फ्यूजन) आरंभ हो जाता है. तारों के अंदर यह अभिक्रिया एक नियंत्रित हाइड्रोजन बम विस्फोट के समान होती है. इस प्रक्रम में प्रकाश तथा ऊष्मा के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है. इस प्रकार वह मेघ ऊष्मा व प्रकाश से चमकता हुआ एक तारा बन जाता है. तापनाभिकीय संलयन से निकलीं प्रचंड ऊष्मा से ही तारों का गुरुत्वाकर्षण संतुलन में रहता है, जिससें तारा अधिक समय तक स्थायी बना रहता है. अंतत: जब तारे के भीतर मौजूद हाइड्रोजन तथा अन्य नाभिकीय ईंधन खत्म हो जाता है, तो वह अपने गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करने के लिए पर्याप्त ऊष्मा नहीं प्राप्त कर पाता है. ऐसे में तारा ठंडा होने लगता है.

साल 1935 में भारतीय खगोलभौतिकविद् सुब्रमण्यन चन्द्रशेखर ने यह स्पष्ट कर दिया कि अपने ईंधन को खत्म कर चुके सौर द्रव्यमान से 1.4 गुना द्रव्यमान वाले तारे, जो अपने ही गुरुत्व के विरुद्ध स्वयं को नही संभाल पाते हैं. उस तारे के अंदर एक विस्फोट होता है, जिसे अधिनवतारा (सुपरनोवा) विस्फोट कहा जाता है. विस्फोट के बाद यदि उसका अवशेष बचता है, तो वह अत्यधिक घनत्वयुक्त ‘न्यूट्रान तारा’ बन जाता है.

आकाशगंगा में ऐसे बहुत से तारे होते हैं जिनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से तीन-चार गुना से भी अधिक होता है. ऐसे तारों पर गुरुत्वीय खिचांव अत्यधिक होने के कारण तारा संकुचित होने लगता हैं, और दिक्-काल (स्पेस-टाइम) विकृत (कर्व) होने लगती है, परिणामत: जब तारा किसी निश्चित क्रांतिक सीमा (क्रिटिकल लिमिट)) तक संकुचित हो जाता है, और अपनें ओर के दिक्-काल को इतना अधिक झुका लेता है कि अदृश्य हो जाता है. यही वे अदृश्य पिंड होते हैं जिसे अब हम ‘कृष्ण विवर’ या ‘ब्लैक होल’ कहते हैं. अमेरिकी भौतिकविद् जॉन व्हीलर ने साल 1967 में पहली बार इन पिंडो के लिए ‘ब्लैक होल’ शब्द का उपयोग किया.

यदि पृथ्वी के पदार्थों का घनत्व लाखों-करोंड़ों गुना अधिक हो जाए तथा इसके आकार को संकुचित करके 1.5 सेंटीमीटर छोटी कर दिया जाए तो ऐसी अवस्था में प्रबल गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी भी प्रकाश- किरणों को उत्सर्जित नही कर सकेगी और यह एक ब्लैक होल बन जाएगी. किसी भी ब्लैक होल में द्रव्यमान की तुलना में घनत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है. यदि सूर्य को संकुचित करकें इसकी 700,000 किलोमीटर की त्रिज्या को 3 किलोमीटर में परिवर्तित कर दिया जाए, तो इसकी परिणति ब्लैक होल के रूप में होगी. हम जानते हैं कि पृथ्वी एवं सूर्य का इस प्रकार से संकुचित होना असम्भव हैं, क्योंकि न तो पृथ्वी का द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक हैं और न ही सूर्य का.

ब्लैक होल की विशेषताएं
किसी ब्लैक होल का सम्पूर्ण द्रव्यमान एक बिंदु में केन्द्रित रहता है जिसे केन्द्रीय विलक्षणता बिंदु (सेंट्रल पॉइंट ऑफ सिंगुलैरिटी) कहते हैं. विलक्षणता बिंदु के आसपास वैज्ञानिको ने एक गोलाकार सीमा की कल्पना की है जिसे प्रायः घटना क्षितिज (इवैंट होराइजन) कहा जाता है. घटना क्षितिज से परे प्रकाश सहित समस्त पदार्थ विलक्षणता बिंदु की दिशा में आकर्षित होकर खींचे चले जाते हैं. परन्तु घटना क्षितिज से होकर कोई भी वस्तु बाहर नही आ सकती है. घटना क्षितिज की त्रिज्या को स्क्वार्जस्चिल्ड त्रिज्या के नाम से जाना जाता है, जिसका नामकरण जर्मन वैज्ञानिक और गणितज्ञ कार्ल स्क्वार्जस्चिल्ड के सम्मान में किया गया है.

दिलचस्प बात यह हैं कि कार्ल स्क्वार्जस्चिल्ड ने ब्लैक होल की विद्यमानता को सैद्धांतिक रूप में सिद्ध करने के पश्चात् इसके भौतिक विद्यमानता को स्वयं अस्वीकृत कर दिया था. बहरहाल, कार्ल स्क्वार्जस्चिल्ड और जॉन व्हीलर को संयुक्त रूप से ब्लैक होल के खोज का श्रेय दिया जाता हैं. अल्बर्ट आइंस्टाइन के विशेष आपेक्षिकता सिद्धांत (थ्योरी ऑफ स्पेशल रिलेटीविटी) के अनुसार एक निश्चित दूरी पर स्थित एक प्रेक्षक के लिए ब्लैक होल के निकट स्थित घड़ियाँ अत्यंत धीमी गति से चलेंगी. विशेष सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार समय सापेक्ष है. समय व्यक्तिनिष्ठ है, सापेक्ष है, जिस समय प्रेक्षक ‘अब’ कहता हैं, वह केवल स्थानीय निर्देश-प्रणाली पर ही लागू होती है, नाकि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर! इस प्रभाव को समय विस्तारण (टाइम डाइलेशन) कहते हैं.

ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण के कारण, उससे दूर स्थित कोई भी प्रेक्षक यह देखेगा कि ब्लैक होल के अंदर गिरने वाली कोई भी वस्तु उसके घटना क्षितिज के निकट बहुत कम गति से नीचें गिर रही है, उस तक पहुँचनें में अनंत काल-अवधि लगती हुई प्रतीत होती है. उस समय उस वस्तु की समस्त गतिविधियाँ अत्यंत धीमी होने लगेगी, इसलिए वस्तु का प्रकाश अत्यधिक लाल और धुंधला (अस्पष्ट) प्रतीत होगा.

इस प्रभाव को गुरुत्वीय अभिरक्त विस्थापन (ग्रेवीटेशनल रेड-शिफ्ट) कहते हैं. अंततः ब्लैक होल के अंदर गिरनेवाली वस्तु इतनी अधिक धुंधली हो जाएगी कि दिखाई देना बंद हो जाएगी. अधिकांशत: लोगो का यह मत होता है कि ब्लैक होल वैक्यूम क्लीनर की तरह व्यवहार करता है, परन्तु ऐसा नहीं है. जो भी वस्तु ब्लैक होल के निकट जायेगा उसे ही वह निगलेगा. इसका अभिप्राय यह है कि यदि हमारा सूर्य एक ब्लैक होल बन जाए, तब इसकी त्रिज्या 3 किलोमीटर होगी, तो भी सभी ग्रहों की कक्षाएँ पूर्णतया अपरिवर्तित होंगी. ब्लैक होल किसी भी ग्रह को निगल नही सकेगा, बशर्ते यदि वह ग्रह ब्लैक होल के निकट न आएं.

एक नहीं, अनेक प्रकार के हैं ब्लैक होल
ब्रह्माण्ड में कई प्रकार के ब्लैक होल हैं जो अपने विशिष्ट भौतिक गुणों द्वारा पहचाने जाते हैं. ऐसे तारे जिनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से कुछ गुना अधिक होता है और गुरुत्वीय संकुचन के कारण वे अंततः एक ब्लैक होल में बदल जाते हैं. ऐसे कृष्ण विवरों को तारकीय द्रव्यमान (स्टेलर मास) ब्लैक होल कहते हैं. ऐसे ब्लैक होल जिनका निर्माण आकाशगंगाओं के केंद्र में होता है, अतिसहंत (सुपरमैसिव) ब्लैक होल कहलाते हैं. इनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान की तुलना में लाखों-करोड़ों गुना अधिक होता है. वैज्ञानिकों के अनुसार हमारी आकाशगंगा-दुग्धमेखला के केंद्र में ‘सैजिटेरियस-ए’ नामक एक विशाल ब्लैक होल है.

ऐसे ब्लैक होल जिनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से भी कम होता है, उनका निर्माण गुरुत्वीय संकुचन के कारण न होकरके, बल्क़ि अपने केंद्र भाग के पदार्थ का दाब एवं ताप के कारण संपीडित होने से होता है. ऐसे कृष्ण विवरों को प्राचीन (प्राईमोर्डियल) ब्लैक होल या लघु ब्लैक होल के नाम से जाना जाता है. इन लघु ब्लैक होलों के बारे में वैज्ञानिकों की मान्यता है कि इनका निर्माण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय हुआ होगा. दिवंगत भौतिकविद् स्टीफन हाकिंग के अनुसार हम ऐसे ब्लैक होलों के अध्ययन से ब्रह्माण्ड की आरंभिक अवस्थाओं के बारे में बहुत कुछ पता लगा सकते हैं.

कुछ ब्लैक होल अपने अक्ष पर एक नियत गति से घूर्णन भी करते हैं. सर्वप्रथम साल 1963 में न्यूजीलैंड के एक गणितज्ञ व वैज्ञानिक रॉय केर ने इन घूर्णनशील (रोटेटिंग) ब्लैक होलों के अस्तित्व को गणितीय आधार प्रदान किया. इन ब्लैक होलों का आकार इनके घूर्णन दर और द्रव्यमान पर निर्भर करता है. ऐसे ब्लैक होलों को अब वैज्ञानिक केर का ब्लैक होल कहकर संबोधित करते हैं. इनकी संरचना बहुत जटिलतायुक्त होती हैं, एवं घटना क्षितिज भी गोलाभ (स्फेरोइड) होती हैं. ऐसे ब्लैक होल जो घूर्णन नही करतें हैं स्क्वार्जस्चिल्ड ब्लैक होल कहलाते हैं.

मुश्किल है, ब्लैक होल को खोजना
जैसा कि हम जानते हैं कि ब्लैक होल प्रकाश की किरणों को उत्सर्जित नहीं करते हैं, तो हम इन्हें खोजने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? यह खगोलविदों के लिए पहले एक गम्भीर समस्या थी. परन्तु खगोलविदों ने इस समस्या का भी समाधान ढूढ़ निकाला. मिशेल के अनुसार ब्लैक होल अदृश्य होने पर भी अपने निकट स्थित पिंडों पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव डालता है. खगोलविदों ने इस परियोजना के अंतर्गत आकाश में स्थित उन युग्म तारों (बायनरी स्टार्स) का प्रेक्षण किया, जो एक-दूसरे के गुरुत्वाकर्षण से बंधकर एक-दूसरे की परिक्रमा करते हैं. कल्पना करें की आकाश में दो तारें एक दूसरे की परिक्रमा कर रहे हैं, उनमें से एक तारा अदृश्य है तथा दूसरा तारा दृष्टिगोचर है. ऐसी स्थिति में दृश्य तारा अदृश्य तारे की परिक्रमा करेगा.

यदि आप जल्दबाजी में अदृश्य तारे को ब्लैक होल मान लेते हैं तो आप गलत भी हो सकतें हैं क्योंकि यह एक ऐसा तारा भी हो सकता हैं जो हमसे बहुत दूर हैं और उसका प्रकाश इतना धीमा हैं कि हमे दिखाई न दे रहा हो. यदि खगोलविद दृश्य तारे के कक्षा से सबंधित खगोलीय गणनाओं के आधार पर उसके द्रव्यमान से सबंधित जानकारी एकत्र कर लेगा तो वह खगोलीय विधियों द्वारा सरलता से उस अदृश्य तारे के द्रव्यमान के बारे में पता लगया जा सकता है. यदि उसका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से तीन-चार गुना अधिक होता है, तो अत्यधिक सम्भावना है कि वह अदृश्य तारा एक ब्लैक होल है.

ब्लैक होल के अस्तित्व को सिद्ध करने का एक अन्य उपाय भी है. कल्पना करें ब्लैक होल के निकट एक दृश्य तारा है, तब ब्लैक होल इस दृश्य तारे की गैसीय द्रव्यराशि को उसके पृष्ठभाग से अपनें में खींचता रहेगा. ब्लैक होल में दृश्य तारे की द्रव्यराशि के गिरने के कारण उसमें से काफी तेजी से एक्स-किरणें उत्सर्जित होने लगेंगी (घर्षण, ताप एवं दाब के कारण). तब एक्स-किरणों के उद्गम के निरीक्षण एवं अध्ययन से ब्लैक होल के भौतिक विद्यमानता को सिद्ध किया जा सकता हैं. खगोलविदों को साल 1965 में हंस (सिग्नस) तारामंडल में एक अत्यंत प्रचंड एक्स-रे स्रोत मिला. उस स्रोत को सिग्नस एक्स-1 नाम दिया गया. साल 1970 में अमेरिका द्वारा प्रक्षेपित एक उपग्रह द्वारा यह पता चला कि सिग्नस एक्स-1 कोई श्वेत वामन या न्यूट्रान तारा नही है, बल्कि एक ब्लैक होल हैं. दरअसल सिग्नस एक्स-1 एक युग्म तारक-योजना है. इस युग्म तारे का दृश्य तारा अत्यंत विशाल है, जो अदृश्य तारे की परिक्रमा कर रहा है. खगोलविदों ने सिग्नस एक्स-1 के द्रव्यमान का निर्धारण खगोलीय विधियों द्वारा छह सूर्यों के द्रव्यमान के बराबर की है. इससे यह स्पष्ट होता हैं कि सिग्नस एक्स-1 एक ब्लैक होल है.

स्टीफेन हॉकिंग और ब्लैक होल
ब्लैक होल के बारे में हमारी वर्तमान समझ भौतिकविद् स्टीफन हॉकिंग के कार्यों पर आधारित है. हाकिंग ने साल 1974 में ‘ब्लैक होल इतने काले नहीं’ शीर्षक से एक शोध पत्र प्रकाशित करवाया. इस शोध पत्र में हॉकिंग ने सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत एवं क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों के आधार पर यह दर्शाया कि ब्लैक होल पूरे काले नही होते, बल्कि ये अल्प मात्रा में विकिरणों को उत्सर्जित करतें हैं. हाकिंग ने यह भी प्रदर्शित किया कि ब्लैक होल से उत्सर्जित होने वाली विकीरणें क्वांटम प्रभावों के कारण धीरे-धीरे बाहर निकलती हैं. इस प्रभाव को हॉकिंग विकीरण (हॉकिंग रेडिएशन) के नाम से जाना जाता है.
हॉकिंग विकिरण प्रभाव के कारण ब्लैक होल अपने द्रव्यमान को धीरे-धीरे खोने लगते हैं, तथा ऊर्जा का भी क्षय होता है (E=mc²). यह प्रक्रिया लम्बें अंतराल तक चलने के बाद आखिरकार ब्लैक होल वाष्पन को प्राप्त होता है. दिलचस्प बात यह है कि विशालकाय ब्लैक हालों से कम मात्रा में विकिरणों का उत्सर्जन होता है, जबकि लघु ब्लैक होल बहुत तेजी से विकिरणों का उत्सर्जन करके वाष्प बन जाते हैं.
(लेखक विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: October 22, 2020, 10:53 PM IST
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