Vedic Maths: क्या कठिन गणनाएं जल्दी कर लेना ही 'वैदिक गणित' है?

Vedic Mathematics: वैदिक गणित, दर्शन और प्राचीन भारतीय परंपरा से जुड़े विषयों को अहमियत देने के बारे में नई शिक्षा नीति - 2020 में भी कहा गया है कि ‘इनको तार्किक और वैज्ञानिक आधार पर जांचने के बाद जहां प्रासंगिक होगा, वहां पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा.

Source: News18Hindi Last updated on: May 8, 2022, 9:41 PM IST
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Vedic Maths: क्या कठिन गणनाएं जल्दी कर लेना ही 'वैदिक गणित' है?
हिमाचल प्रदेश ने अगले शैक्षणिक सत्र से छात्रों को वैदिक गणित पढ़ाने का फैसला लिया है.

हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड ने अगले शैक्षणिक सत्र से छठी से दसवीं कक्षा तक के छात्रों को वैदिक गणित पढ़ाने का फैसला लिया है. हिमाचल शिक्षा बोर्ड के इस फैसले को कुछ लोग हमारी संस्कृति और हमारे समृद्ध अतीत से नई पीढ़ी को जोड़ने के पहल के तौर पर देख रहे हैं. इससे ठीक पहले विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय भी वैदिक गणित को देश भर के स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल करने का सुझाव दे चुका है. वैदिक गणित, दर्शन और प्राचीन भारतीय परंपरा से जुड़े विषयों को महत्व देने के संबंध में नई शिक्षा नीति – 2020 में भी कहा गया है कि ‘इनको तार्किक और वैज्ञानिक आधार पर जाँचने के बाद जहाँ प्रासंगिक होगा, वहाँ पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा.’


यहां पर ये सवाल उठने लाज़िमी हैं कि आखिर ये ‘वैदिक गणित’ क्या है? इसकी विषय वस्तु क्या है? क्या यह वेदों से लिया गया है? क्या यह स्कूली छात्रों के लिए उपयोगी है? क्या यह आधुनिक गणित के मानकों पर खरा उतरता है? आइए, इन सवालों के संभावित जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं.


वैदिक गणित क्या है?

‘वैदिक गणित’ शब्द का सामान्य अर्थ निकलता है – ‘वेदों से प्राप्त गणित’. यानी ऐसा गणित या गणितीय विधि जिनके बारे में वैदिक काल के ऋषियों को पता था. लेकिन वर्तमान में इस वैदिक गणित का मूल आधार जगद्गुरु स्वामी श्री भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज द्वारा लिखित ‘वैदिक मैथेमेटिक्स’ नामक किताब है, जो पहली बार 1965 में लेखक की मृत्यु के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुई थी. स्वामीजी ने अपनी इस किताब की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से लिखा है कि उन्होंने चौथे वेद यानि ‘अथर्ववेद’ के परिशिष्ट से 16 सरल गणितीय सूत्र प्राप्त किए हैं. इसलिए स्वामीजी को लुप्त हो चुके वैदिक गणित को पुनर्जीवित करने का श्रेय दिया जाता है.


स्वामीजी की किताब के आधार पर सैकड़ों पुस्तकें और लेख लिखे जा चुके हैं. वैदिक गणित के समर्थकों के मुताबिक, ‘इसमें वेदों से प्राप्त 16 सरल और अद्वितीय सूत्र व 13 उपसूत्र हैं. ये दूसरे वैज्ञानिक कार्यों की तरह नहीं विकसित किए गए हैं, बल्कि यह गणित के मौलिक सत्यों और सिद्धांतों का स्वत: प्रदर्शन है. इन सूत्रों को जो सीख लेगा वह गणित का इतना बड़ा विद्वान बन जाएगा कि कैलकुलेटर से ज्यादा तेज कैलकुलेशन (गणना) कर पाएगा.’


वैदिक गणित: आखिर कितना वैदिक?

इस गणित के साथ ‘वैदिक’ विशेषण जुड़ा हुआ है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह सचमुच वैदिक है? चूंकि स्वामीजी के निधन के बाद उनकी किताब प्रकाशित हुई थी, इसलिए अभी तक यह नहीं पता चल पाया है कि उन्होंने इन 16 सूत्रों और 13 उपसूत्रों को वेदों से कहाँ और कैसे प्राप्त किया. हालांकि किताब की प्रस्तावना में स्वामीजी ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि इन सूत्रों को उन्होंने ‘अथर्ववेद’ के परिशिष्ट से प्राप्त किए हैं. लेकिन ये सूत्र अथर्ववेद के उपलब्ध परिशिष्टों में कहीं नहीं मिलते! ऐसे में दो बातें हो सकती हैं या तो स्वामीजी ने ‘अथर्ववेद’ के परिशिष्टों का अनूठा, अद्भुत संस्करण ढूंढ़ निकाला होगा, या फिर यह किताब उन्होंने स्वयं ही लिखी हो और अपने कार्यों को बेहतर स्वीकार्यता तथा सम्मान दिलाने के लिए ‘वैदिक’ शब्द (Vedic term) को जोड़ दिया हो.


स्वामीजी की किताब ‘वैदिक मैथेमेटिक्स’ की भूमिका पुरातत्व और संस्कृत साहित्य के प्रकांड विद्वान डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखी है. वासुदेव शरण ने किताब की भूमिका में वेदों को लेकर अपना कोई भी विचार प्रकट नहीं किया है. बल्कि वे लेखक की प्रस्तावना के एक अंश का हवाला देते हैं, जिसमें दावा किया गया है कि मानव समाज के लिए आवश्यक समस्त ज्ञान वेदों में जरूर मौजूद होना चाहिए. ‘जरूर मौजूद होना चाहिए’ को वे विशेष रूप से रेखांकित करते हैं – यह स्पष्ट करने के लिए कि यह उनकी नहीं, बल्कि लेखक की निजी राय है.


वासुदेव शरण आगे लिखते हैं, ‘उनके (लेखक) वैदिक परंपराओं के मूल्यांकन का सार यही है कि उसे तथ्यों की दृष्टि से न देखकर, उसे आदर्श नजरिए से देखना चाहिए, नाम्ना, भारत में वेदों को, परंपरागत अर्थ में, संपूर्ण ज्ञान के संग्रह के रूप में लेना चाहिए और जो हमारे पास बचे हैं उनके सीमित अर्थ में नहीं लेना चाहिए. इस अभिगम से आलोचकों के तर्क अर्थहीन हो जाते हैं तथा प्राचीन काल से संरक्षित सामग्री में वैदिक गणित के सूत्रों की खोज करने की कोई जरूरत नहीं रह जाती…. लेखक का यह कथन कि सोलह सूत्र अथर्ववेद के परिशिष्ट में आते हैं, उपरोक्त परिभाषा तथा अधिगम में ही समझना चाहिए.’


यह कहना कि ‘मानव समाज के लिए आवश्यक समस्त ज्ञान वेदों में जरूर मौजूद होना चाहिए’ अपने आप में तर्क विरोधी बात है. गणित या विज्ञान के सिद्धांत आसमान से नहीं टपकते. ये गहन तार्किक चिंतन द्वारा धीरे-धीरे विकसित होते हैं. स्वामीजी की उपरोक्त परिभाषा को मानें तो वेद ज्ञान-विज्ञान के अक्षय भंडार हैं और वैदिक ऋषियों को वह सारा गणित और विज्ञान ज्ञात था जो अभी तक खोजा गया है या जो भविष्य में खोजा जाएगा!


खैर, स्वामीजी के प्रति पूज्यभाव रखने वाले वासुदेव शरण भूमिका में यह भी लिखते हैं कि ‘स्वामीजी की यह कृति अपने आप में एक नया परिशिष्ट माने जाने का अधिकार रखती है और इसलिए आश्चर्य नहीं कि यहां दिए गए सूत्र वेदों के किसी भी ज्ञात परिशिष्ट में उपलब्ध नहीं होते.’ वासुदेव शरण अग्रवाल की इस बात और स्वामीजी के उस कथन कि ‘उन्होंने ये सोलह सूत्र अथर्ववेद के परिशिष्ट से प्राप्त किए हैं’, में कोई भी सामंजस्य नहीं है. इसका मतलब यह है कि वासुदेव शरण ने भले ही स्वामीजी के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की हो, लेकिन उनके मतों को अपना स्पष्ट बौद्धिक समर्थन नहीं दिया.

वैदिक गणित में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे ‘वैदिक’ कहा जाए


‘वैदिक मैथमैटिक्स’ की उत्पत्ति के बारे में स्वामीजी की एक शिष्या मंजुला त्रिवेदी लिखती हैं: ‘ये सूत्र अथर्ववेद के किसी परिशिष्ट में नहीं हैं, वास्तव में ये सूत्र अथर्ववेद में यत्र-तत्र बिखरी हुई सामग्री से स्वामीजी के द्वारा सहजबोध से पुनर्सृजित किए गए हैं.’


वासुदेव शरण अग्रवाल के आग्रह पर वैदिक मैथमैटिक्स की पाण्डुलिपि की गणनाओं की सत्यता की जांच बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध गणितज्ञ डॉ. बृजमोहन ने की थी. लेकिन वासुदेव शरण ने किताब की भूमिका में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है कि वैदिक गणित के बारे में डॉ. बृजमोहन की क्या राय है. और शायद इसीलिए डॉ. बृजमोहन उसी साल (1965) प्रकाशित अपनी किताब ‘गणित का इतिहास’ में स्वामीजी की वैदिक मैथमैटिक्स के बारे में अपने विचार प्रकट करने के लिए विवश हुए थे.


अपनी किताब की भूमिका में डॉ. बृजमोहन लिखते हैं: “स्वामीजी ने इन सूत्रों का यह अभिदेश दिया था -अथर्ववेद, परिशिष्ट – 1. मुझे अथर्ववेद के जितने भी संस्करण काशी के पुस्तकालयों में मिल सके, मैंने सब छान मारे. मुझे उपरिलिखित सूत्र कहीं नहीं मिले. मैंने स्वामीजी को इस विषय में तीन पत्र लिखे. मुझे कोई उत्तर नहीं मिला. तत्पश्चात मैं वेदों के उद्भट विद्वानों से मिला जैसे- पं. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी, और पंचगंगा घाट काशी के पं. रामचंद्र भट्ट. उन्होंने बताया कि उपरिलिखित सूत्रों की भाषा ही वैदिक संस्कृत से मेल नहीं खाती अतः ये वैदिक सूत्र नहीं हो सकते. इसके अतिरिक्त वेदों में कहीं गणितीय विषयों का उल्लेख है ही नहीं ……हम उक्त सूत्रों का वास्तविक अभिदेश जानने के लिए उत्सुक हैं. किंतु जब तक यथार्थ अभिदेश न मिल जाए तब तक हम इतनी अप्रमाणित बात अपनी पुस्तक में नहीं दे सकते.”


इस संदर्भ में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के गणितज्ञ डॉ. एस. जी. दानी ने भी 1993 में ‘वैदिक मैथमैटिक्स: मिथ एंड रियालिटी’ शीर्षक से इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में एक शोधपरक आलेख लिखा. अपने आलेख में एक जगह पर वे लिखते हैं – ‘स्वामीजी की पुस्तक में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वैदिक गणित कहा जाए. यहां तक कि इसमें उत्तरवर्ती काल की भारतीय गणितीय सिद्धांतों और प्रक्रियाओं की समृद्ध परंपरा का भी उल्लेख नहीं है.’


डॉ. दानी ने अपने आलेख में एक प्रसंग का भी वर्णन किया है. यह प्रसंग प्राचीन भारतीय गणित के विद्वान डॉ. केएस. शुक्ला ने बताया था, जो स्वामीजी से मिले थे. केएस. शुक्ला ने अथर्ववेद की एक प्रामाणिक माने जानेवाली प्रति स्वामीजी को दिखलाई और कहा कि ये सूत्र तो इसमें हैं ही नहीं. लेकिन स्वामीजी ने दुबारा दावा किया कि उन्हें मालूम है कि ये अथर्ववेद के ही अंग हैं. किंतु उनके पास प्रमाण देने के लिए कुछ भी नहीं था.


प्रख्यात खगोलविज्ञानी डॉ. जयंत नार्लीकर अपनी किताब ‘साइंटिफिक एज: फ्रॉम वैदिक टू मॉडर्न साइंटिस्ट’ में इस संदर्भ में लिखते हैं कि, ‘दुर्भाग्यवश किसी ने भी इस बात पर आपत्ति व्यक्त नहीं की कि इन प्राचीन पवित्र वेदों में अपनी तरफ से जोड़ने या किसी विषय को वेदों पर आधारित बताने का अधिकार किसी को नहीं है. इससे वेदों की मौलिकता नष्ट हो जाएगी.’


ज़्यादातर गणितज्ञों, इतिहासकारों और वैज्ञानिकों का मानना है कि स्वामीजी का वैदिक गणित ‘प्रक्षिप्त’ का एक उदाहरण है. संस्कृत शब्द प्रक्षिप्त का अर्थ है अपनी बातों को अधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए अपनी रचना को किसी प्रसिद्ध विद्वान या साहित्यिक रचना से जोड़ देना. स्वामीजी ने ऐसा ही किया और अपने सरल गणितीय खोजों को अथर्ववेद से जोड़ दिया ताकि उनके कार्यों को बेहतर स्वीकार्यता और सम्मान मिल सके.


सोचने वाली बात है कि जिस वैदिक गणित को स्वयं आदि-शंकराचार्य, यास्क से सायण तक के वेदज्ञ, आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे गणितज्ञ-ज्योतिषी नहीं खोज पाएं, उसको स्वामीजी ने खोज निकाला! अगर ऐसा तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि स्वामीजी से पहले वेदों के जो टीकाकार, भाष्यकार हुए वे सभी मूर्ख थे क्योंकि उनको गणित के इस भंडार के बारे में पता ही नहीं चला?


गणित की कसौटी पर वैदिक गणित





आइए, अब वैदिक-अवैदिक के सवाल को छोड़कर हम इस पर चर्चा करें कि वैदिक मैथमैटिक्स की विषय वस्तु क्या है. अगर यह आधुनिक गणित की कसौटियों पर खरी उतरती है तो यह बेहद खुशी की बात होगी कि कोई मौलिक योगदान, जो भारतीय मूल की है (फिर चाहें इसकी उत्पत्ति वैदिक काल में हुई हो या बाद में), वह असाधारण तो है.


इस प्रकार के असाधारण कार्य का एक उदाहरण दूसरे संदर्भ में जयंत नार्लीकर अपनी किताब ‘साइंटिफिक एज’ में देते हैं. नार्लीकर के मुताबिक यदि हम अलग से विचार करें तो पाएंगे की ट्रिनिटी कॉलेज के रेन लाइब्रेरी से भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की खोई हुई नोटबुक मिली, जिसमें संख्या सिद्धान्त से संबंधित अनेक अज्ञात परिणाम मिले. ये परिणाम नए और महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ उच्च गणितीय जांच में भी खरे उतरे.


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामानुजन के काम को खूब सराहा गया. स्वामीजी के सोलह सूत्रों पर भी यही मानदंड लागू किया जा सकता है. क्या वे किसी भी तरह से गणित की हमारी समझ को आगे बढ़ाते हैं? नहीं. जोड़, घटा, गुणा, भाग, वर्गमूल आदि से संबंधित सवालों को शॉर्टकटों (ट्रिक्स) के माध्यम से तेजी से हल करने को गणित में मौलिक योगदान नहीं माना जा सकता है.

बहुत से ऐसे प्रतिभाशाली लोग होते हैं जो बड़ी से बड़ी संख्याओं की बेहद तेज रफ्तार से गणना कर लेते हैं. यहां तक कई-कई लोग कैलकुलेटर से भी ज्यादा तेज कैलकुलेशन (गणना) करने में सक्षम होते हैं. क्या त्वरित गणना करने वाले किसी व्यक्ति को हम रामानुजन के समान वर्ग में रख सकते हैं? या एक मामूली गणितज्ञ का भी दर्जा दे सकते हैं? बिल्कुल नहीं, वास्तविक गणित केवल संख्याओं का परिकलन या हिसाब-किताब नहीं है बल्कि तर्क और विचारों का परस्पर ऐसा संबंध है जो सरल सिद्धांतों से शुरू होकर एक गहन निष्कर्ष तक पहुंचता है.


उदाहरण के लिए अगर हम यूक्लिड की प्रमेय पर विचार करें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि अभाज्य संख्याओं की संख्या अनंत है. इसको लेकर यूक्लिड का तर्क मोटे तौर पर इस तरह है: यदि अभाज्यों की एक परिमित सूची दी हुई हो, तो हम एक अन्य अभाज्य संख्या ज्ञात कर सकते हैं, जो इस सूची में नहीं हैं. यह तर्क तार्किकता की शक्ति व सौंदर्य को दर्शाता है और बगैर अनावश्यक गणना के निष्कर्ष तक पहुंचा देता है.


नार्लीकर द एशियन एज में ‘अरिथमेटिक ऑफ नोस्टलेजिया’ शीर्षक से प्रकाशित अपने एक लेख में लिखते हैं: ‘वास्तव में, जैसे ही कोई स्कूली गणित की बाधा को पार करता है और अपने दायरे और क्षितिज को बढ़ाता है, वह इस कारण को नोटिस करता है कि क्यों गणित को अक्सर विज्ञान के बजाय “कला” कहा जाता है. इसके लिए, तब व्यक्ति को विषय की विभिन्न किस्में मिलती हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी सौंदर्यपरक प्रेरणा शक्ति होती है, जिसे चित्र या मूर्तिकला के टुकड़े के रूप में देखा जा सकता है या संगीत रचना के रूप में आनंद लिया जा सकता है. इस योजना में तार्किक रूप से जुड़े तर्क एक को अंतिम गंतव्य तक ले जाते हैं. संख्याएं इस योजना का हिस्सा बन सकती हैं या नहीं भी हो सकती हैं: यदि वे ऐसा करती हैं, तो वे नाटक में मुख्य अभिनेता नहीं हैं. इसलिए, जिसे वैदिक गणित कहा जाता है, वह वैदिक न होने के साथ-साथ गणित भी नहीं है.’


मुख्यत: वैदिक गणित की तकनीकों को मानसिक अंकगणित के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसे पारंपरिक रूप से निचले दर्जे के कारीगरों जैसे बढ़ई या शकुंतला देवी जैसे लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है. आज मानसिक अंकगणित की ऐसी कई अन्य प्रणालियां भी मौजूद हैं. यदि हम इसको बढ़ावा देना चाहते हैं, तो हमें पहले एक व्यवस्थित तुलना करनी चाहिए. अमूमन एक व्यवस्थित तुलना करने पर आधुनिक व्यावहारिक या सैद्धांतिक गणित के सामने स्वामीजी का वैदिक गणित रत्ती भर भी नहीं ठहरता.


यह सच है कि वैदिक मैथमैटिक्स में वर्णित शॉर्टकट वास्तव में पारंपरिक तकनीक की तुलना में बहुत कम समय में उत्तर देते हैं, लेकिन मौजूदा या परंपरागत विधि के उपयोग करने के पीछे जो तार्किक कारण हैं उसका उल्लेख वैदिक गणित में नहीं किया गया है. वैदिक गणित से यह गलत धारणा पैदा होती है कि ‘गणित का अर्थ है चयनित पाठ्यपुस्तक की समस्याओं का तेजी से समाधान’. और यह उन तकनीकों के प्रति अंधश्रद्धा पैदा करती है जिसमें साबित करने के बजाय गणना करने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जाता है. यही वजह है कि आज गणित में बोधायन द्वारा बताई गई समकोण त्रिभुज संबंधी विशेषता को ‘गणित’ नहीं माना जाता क्योंकि उन्होंने इसकी उपपत्ति नहीं दी थी और पाइथागोरस को इसका श्रेय इसलिए दिया जाता है क्योंकि उन्होने उसकी उपपत्ति भी दी थी. प्रमेय का अर्थ ही है, ‘जिसे सिद्ध या प्रमाणित किया जा सके’.


विद्वानों के मुताबिक स्कूली बच्चों को वैदिक गणित पढ़ाना उनको गणित के उस वास्तविक और सार्थक स्वरूप से ध्यान भटकाना होगा जिसे वास्तव में पढ़ाए जाने की जरूरत है. तीव्र गणना तो कैलकुलेटर से भी की जा सकती है. क्या आप सिर्फ कैलकुलेटर की मदद से आधुनिक गणित के सभी प्रश्नों को हल कर सकते हैं? मेरे ख्याल से तो कथित वैदिक गणित के शॉर्टकटों (ट्रिक्स) को बच्चों पर लादने का अर्थ होगा उनकी सोचने की क्षमता को कुंद करना, उन्हें भ्रामक लेबल ‘वैदिक’ की आड़ में मूल और उपयोगी गणित से दूर करना. बाकी सुधि पाठक स्वयं इसका मूल्यांकन कर सकते हैं. अस्तु!


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: May 8, 2022, 9:41 PM IST
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