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    जीन क्रांति के मुहाने पर खड़ी दुनिया

    यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी हम इंसानों के उज्ज्वल और सुंदर भविष्य के...

    Source: News18Hindi Last updated on: May 4, 2020, 12:18 PM IST
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    जीन क्रांति के मुहाने पर खड़ी दुनिया
    यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी हम इंसानों के उज्ज्वल और सुंदर भविष्य के...
    यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी हम इंसानों के उज्ज्वल और सुंदर भविष्य के प्रबंधन का दूसरा नाम है। मानव प्रजाति की आज तक की यात्रा बहुत ही कठिन और लंबे रास्तों से होकर गुज़री है। वह इस यात्रा की कई पड़ावों को पार करते हुए अब इक्कीसवी सदी में दाखिल हो चुका है। इस महान यात्रा के दौरान उसने अपनी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति के लिए जरूरी आविष्कार किए और टेक्नोलॉजी को विकिसित किया। विज्ञान और टेक्नोलॉजी की बदौलत ही आज सारी दुनिया होमो सेपियंस (आधुनिक मानव) की मुट्ठी में है।

    हम जीव विज्ञान की सदी में रह रहें हैं। यह काफी पहले ही घोषित किया जा चुका है कि अगर 20वी सदी भौतिक विज्ञान की सदी थी तो निश्चित रूप से 21वी सदी जैव-प्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) की सदी होगी। ऐसा स्वास्थ्य, कृषि, पशु विज्ञान, पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा, उद्योग आदि क्षेत्रों में, जिनके केंद्रबिंदु में जीव जगत है, के सतत मांग के कारण संभव हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में जीव विज्ञान में चमत्कृत कर देने वाले नए अनुसंधान तेजी से बढ़े हैं। आज वैज्ञानिक विकास, खास तौर से जीन इंजीनियरिंग और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में, की रफ्तार इतनी तेज है कि जीव विज्ञानियों के लिए यह सोचना भी कठिन है कि आनेवाले वर्षों में मानव सभ्यता का क्या स्वरूप होगा? मानव चिंतन और नैतिकता का मानदंड क्या होगा? क्या इनका भी निर्णय जीन इंजीनियरिंग और बायोटेक्नोलॉजी के जरिए ही होगा?

    आज पूरी दुनिया जिस बायोटेक्नोलॉजी के मुहाने पर खड़ी है, वह परंपरागत बायोटेक्नोलॉजी से बिलकुल अलग है। यह आण्विक जीवविज्ञान (मोलिक्युलर बायोलॉजी) की देन है। वस्तुत: जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी या जीन इंजीनियरिंग (जीनियागरी) है। जीन सजीवों में सूचना की बुनियादी इकाई और डीएनए का एक हिस्सा होता है। जीन इस लिहाज से स्वार्थी होते हैं कि उनका एकमात्र उद्देश्य होता है स्वयं की ज्यादा से ज्यादा प्रतिलिपियों को अगली पीढ़ी में पहुंचाना। इसलिए जीन माता-पिता और पूर्वजों के गुण और रूप-रंग संतान में पहुंचाता है। कह सकते हैं कि काफी हद तक हम वैसा ही दिखते हैं या वही करते हैं, जो हमारे शरीर में छिपे सूक्ष्म जीन तय करते हैं। डीएनए के उलट-पुलट जाने से जींस में विकार पैदा होता है और इससे आनुवांशिक बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बच्चों को अपने पुरखों से विरासत में मिलती है। मानव में लगभग 20-25 हजार तरह के जीन होते हैं।

    कोशिका से जीन तक
    तककिसी भी जीवित पदार्थ का सबसे छोटा घटक होता है, कोशिका (सेल)। ज़्यादातर कोशिकाओं के भीतर एक लगभग गोलाकार थैली होती है, जिसे न्यूक्लियस कहते हैं। इस न्यूक्लियस के भीतर डोरी या धागे के आकार के अनेक अणु पाये जाते हैं, इसे डीएनए (डीऑक्सीराइबोज न्यूक्लिक एसिड) कहते हैं। इसमें अनुवांशिक कूट निहित होता है। यूं कहें डीएनए जीवन का ब्लूप्रिंट होता है। डीएनए-अणु की संरचना घुमावदार सीढ़ी (डबल-हेलिक्स) की तरह होती है। और अंत में, जीन, इस डीएनए-अणु के टुकड़े हैं, इनके हिस्से हैं। असल में डीएनए-अणु अपना काम जीनों के जरिए ही करवाते हैं। किसी भी जीव में होनेवाली समस्त रसायनिक क्रियाओं में प्रोटीन की मुख्य भूमिका होती है। गौरतलब है कि जीवन की सभी गतिविधियों (जैसे चलना-फिरना, विकास, प्रजनन, वगैरह-वगैरह) के लिए वास्तव में रसायनिक क्रियाएँ ही जिम्मेदार होती हैं और इन क्रियाओं का सुचारु रूप से संचालन अनेकानेक प्रोटीन अणुओं द्वारा किया जाता है, जिन्हें ‘एनज़ाइम’ कहते हैं। जीन स्वयं प्रोटीन नहीं बनाते, जीन पहले आरएनए बनाते हैं और फिर आरएनए से प्रोटीनों का निर्माण होता है। मानव के समस्त डीएनए व आरएनए को सामूहिक रूप से कहा जाता है जीनोम और सभी प्रोटीनों को सामूहिक नामा दिया गया है प्रोटियोम। आइए, जीन इंजीनियरीग को एक वैज्ञानिक घटना से समझने की कोशिश करते हैं।

    नवंबर, 2018 में चीन में हुई एक घटना से पूरा वैज्ञानिक समुदाय बुरी तरह से हिल गया था। यह दुनिया के विभिन्न कोनों में गर्मागर्म बहस का कारण बना। इसने नैतिकता बनाम वैज्ञानिक प्रगति की बहस को पुनर्जीवित कर दिया था। यह हैरान कर देने वाली खबर थी- एक चीनी वैज्ञानिक द्वारा जुड़वां बच्चियों के पैदा होने से पहले ही उनके जींस में बदलाव करने का दावा।

    नियति को चुनौतीचूंकि शरीर में क्रियाशील जीन की स्थिति ही बीमारी विशेष को आमंत्रित करती है, इसलिए वैज्ञानिक लंबे समय से मनुष्य की जीन कुंडली को पढ़ने में जुटे हैं। वैज्ञानिकों का उद्देश्य जन्म से पहले या जन्म के साथ शिशु को जीन एडिटिंग तकनीक के जरिये आनुवांशिक बीमारियों को नियंत्रित करने वाले जीन को पहचान कर उसे सुधारना रहा है। इस दिशा में इतनी प्रगति हुई है कि अब जेनेटिक इंजीनियर आसानी से आण्विक कैंची का इस्तेमाल करके दोषपूर्ण जीन की काट-छाँट कर सकते हैं, और जीन एडिटिंग की इस टेक्नोलॉजी को व्यावहारिक रूप से पौधों या जानवरों की किसी भी प्रजाति पर लागू किया जा सकता है। हालांकि मनुष्य के जीनोम में बदलाव करने की टेक्नोलॉजी बेहद विवादास्पद होने के कारण अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे लोकतांत्रिक देशों में प्रतिबंधित है। मगर चीन ही एक ऐसा देश ऐसा है जहां मानव जीनोम में फेरबदल करने पर प्रतिबंध नहीं है और इस दिशा में वहाँ पर पिछले कुछेक वर्षों में काफी तेजी से काम हुआ है।

    इसी कड़ी में एक हलचल पैदा कर देने वाली खबर थी-  चीनी शोधकर्ता हे जियानकुई द्वारा जुड़वां बच्चियों (लुलू और नाना) के पैदा होने से पहले ही उनके जींस में फेरबदल करने का दावा। हे जियानकुई के अनुसार उन्होंने सात दंपतियों के प्रजनन उपचार के दौरान भ्रूणों को बदला जिसमें एक मामले में संतान के जन्म लेने में यह परिणाम सामने आया था। इन जुड़वा बच्चियों में सीसीआर-5 नामक एक जीन को जो संभावित भावी एचआईवी संक्रमण के लिए उत्तरदायी है, को सीआरआईएसपीआर-कैस 9 नामक जीन एडिटिंग टूल की मदद से बदला गया। सीआरआईएसपीआर-कैस 9 को  मानव, पशु और पौधों में लक्षित जीन को हटाने, सक्रिय करने और दबाने के लिए किया जा सकता है। जियानकुई ने यह दावा एक यू ट्यूब  विडियो के माध्यम से किया था,  मगर इस दावे की स्वतंत्र रूप से कोई पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है और इसका प्रकाशन भी अब तक (अप्रैल, 2020) किसी मानक साइंस जर्नल में नहीं हुआ है।

    दुधारी तलवार

    जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी आनुवांशिक बीमारियों का इलाज करने की दिशा में निश्चित रूप से एक मील का पत्थर है। इसकी संभावनाएं चमत्कृत कर देने वाली हैं। यह निकट भविष्य में आण्विक स्तर पर रोगों को समझने और उनसे लड़ने के लिए एक अचूक हथियार साबित हो सकता है। लेकिन यह भी सच है कि ज्ञान दुधारी तलवार की तरह होता है। हम इसका उपयोग विकास के लिए कर सकते हैं और विनाश के लिए भी! इसलिए जियानकुई के प्रयोग पर तमाम सामाजिक संस्थाओं और बुद्धिजीवियों ने आपत्ति जतानी शुरू कर दी तथा मानव जीन एडिटिंग पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने की मांग अब तक कर रहे हैं। जेनेटिक्स जर्नल के संपादक डॉ किरण मुसुनुरू के मुताबिक ‘इस तरह से तकनीक का परीक्षण करना गलत है, मनुष्यों पर ऐसे प्रयोग नैतिक रूप से रक्षात्मक नही हो सकते है।’ एमआईटी टेक्नॉलजी रिव्यू ने चेतावनी दी है कि यह तकनीक नैतिक रूप से सही नहीं है क्योंकि भ्रूण में परिवर्तन भविष्य की पीढ़ियों को विरासत में मिलेगा और अंततः समूचे जीन कुंडली को प्रभावित कर सकता है। इसलिए नैतिकता से जुड़े सवाल व विवाद खड़े होने के बाद फिलहाल जियानकुई ने अपने प्रयोग को रोक दिया है तथा चीनी सरकार ने भी इसके जांच के आदेश दिये हैं। हालांकि चीन मानव क्लोनिंग को गैरकानूनी ठहराता है लेकिन जीन एडिटिंग को खासतौर पर गलत नहीं ठहराता। बहरहाल, चीन की जांच अभी जारी है और हे जियानकुई सलाखों के भीतर!

    नैतिक और सामाजिक प्रश्न

    इस तरह के प्रयोग पर विरोधियों ने सवालिया निशान खड़े करने शुरू कर दिये हैं, उनका कहना है कि इससे समाज में बड़ी जटिलताएँ और विषमताएं उत्पन्न होंगी। सर्वप्रथम मनुष्य इससे कमाई के लिए डिज़ाइनर बेबी बनाने का कारोबार शुरू कर सकता है। प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चे को गोरा-चिट्ठा, गठीला शरीर, ऊंची कद-काठी और बेजोड़ बुद्धि वाला चाहते है। इससे भविष्य में जो आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग होंगे उनके ही बच्चों को बुद्धि-चातुर्य और व्यक्तित्व को जीन एडिटिंग के जरिये सँवारने-सुधारने का मौका मिलेगा। तो क्या डिजाइनर शिशु अमीरों तक ही सीमित रहेंगे? इससे सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा नहीं मिलेगा? हालांकि वैज्ञानिकों का एक तबका इस तरह के प्रयोगों को गलत नही मानता। उन्हें लगता है की ऐसे प्रयोग लाइलाज बीमारियों के उपचार के लिए नए संभावनाओं के दरवाजे खोल सकते हैं। इससे किसी बीमार व्यक्ति के दोषपूर्ण जीनों का पता लगाकर जीन एडिटिंग द्वारा स्वस्थ्य जीन आरोपित करना संभव होगा। मगर विरोधी इस तर्क से भी सहमति नहीं जताते उनका कहना है कि अगर जीन विश्लेषण से किसी व्यक्ति को यह पता चल जाए कि भविष्य में उसे फलां बीमारी की संभावना है और वह जीन एडिटिंग थेरेपी करवाने में आर्थिक रूप सक्षम नहीं है। तो क्या उस व्यक्ति का सामाजिक मान-सम्मान प्रभावित नहीं होगा? क्या बीमा कंपनियाँ भावी रोगी का बीमा करेंगी? क्या नौकरी में इस जानकारी के आधार पर उससे भेदभाव नहीं होगा?

    जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी अगर गलत हाथों में पहुँच जाए तो इसका उपयोग विनाश के लिए भी किया जा सकता है। इसके संभावित खतरों से चिंतित भविष्यवादियों का मानना है कि यह टेक्नोलॉजी आनुवांशिक बीमारियों को ठीक करने तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कुछ अतिवादी आतंकवादी अनुसंधानकर्ता अमानवीय मनुष्य के निर्माण करने की कोशिश करेंगे। तब इन अमानवीय लोगों से आम आदमी कैसे निपट सकेगा?

    ज़ाहिर है कि संभावनाएं अपार हैं और चुनौतियाँ भी। मगर जीन इंजीनियरिंग या जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी पर नैतिक और सामाजिक बहस और वैज्ञानिक शोधकार्य दोनों जारी रहनी चाहिए। इस तकनीक का इस्तेमाल मानव विकास के लिए होगा या विनाश, यह आने वाला भविष्य ही बताएगा।

    (लेखक विज्ञान विषय के जानकार हैं)
    ब्लॉगर के बारे में
    प्रदीप

    प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

    उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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    First published: May 4, 2020, 12:18 PM IST
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