World Mental Health Day 2020: मन चंगा तो सब चंगा!

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) के मुताबिक दुनिया भर में हर चार व्यक्तियों में से एक व्यक्ति जीवन के किसी न किसी मोड़ पर मानसिक विकार से पीड़ित होता है. भारत की लगभग छह-सात फीसदी मौजूदा आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 10, 2020, 12:59 PM IST
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World Mental Health Day 2020: मन चंगा तो सब चंगा!
भारत की लगभग छह-सात फीसदी मौजूदा आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित है. (प्रतीकात्मक)
इक्कीसवीं सदी में जीवन बेहद भाग-दौड़ वाला हो गया है. खास करके शहरों में जीवन की आपाधापी के साथ कदम मिलाना कठिन होता जा रहा है. यह सच है कि शहरों की व्यस्त सड़कें और भीड़ भरे बाजार हमारे दिलो-दिमाग को लगातार बीमार बना रहे हैं. जीवन में सरलता, सहजता और प्रकृति के साथ तालमेल कम होते जा रहे हैं. चारों तरफ तनाव-ही-तनाव और उससे पैदा हुई शारीरिक और मानसिक बीमारियां. आधुनिक जीवन में तनाव एक महामारी का रूप ले चुका है. शहर में फैले कंक्रीट के जंगल के किसी एक कोने में, कहीं किन्हीं ऊंची इमारतों के बीच किसी फ्लैट या अपार्टमेंट में एक टुकड़ा हरियाली, धूप और आसमान के लिए तरसती ज़िंदगी हमें हरदम तनाव से भरती रहती है. तनावपूर्ण जीवनशैली के कारण अधिकांश लोग मानसिक बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) के मुताबिक दुनिया भर में हर चार व्यक्तियों में से एक व्यक्ति जीवन के किसी न किसी मोड़ पर मानसिक विकार से पीड़ित होता है. भारत की लगभग छह-सात फीसदी मौजूदा आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित है.


मानसिक स्वास्थ्य मौजूदा समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में जनसामान्य की जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 10 अक्टूबर को ‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस’(World Mental Health Day) के रूप में मनाया जाता है. विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ (World Federation for Mental Health) की स्थापना सन् 1948 में की गई थी. इस संस्था का मकसद वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना है. पहली बार विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 10 अक्टूबर, 1992 में विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल रिचर्ड हंटर के पहल पर मनाया गया था.

मन की निराली दुनिया
मन की दुनिया बेहद निराली और रहस्यमय है. इसका न तो कोई ओर है और न छोर! डॉ. यतीश अग्रवाल और डॉ. रेखा अग्रवाल मन की इस निराली दुनिया का वर्णन अपनी किताब ‘मन की दुनिया’ में कुछ इस तरह से करते हैं : मन की चंचलता और चपलता का कोई सानी नहीं है. इस पल यहाँ, तो दूसरे ही पल ब्रह्मांड के किसी भी कोने में विचरण करता पाया जा सकता है! गति में समीर भी उसका मुक़ाबला नहीं कर सकती. ऐसे में उसका समय-असमय रूठ जाना, अस्वस्थ होकर तरह-तरह की लीलाएं रचना, अपने राग-रंग दिखाना कतई आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए. कुछ सर्वेक्षणों में यह देखा गया है कि 30-40 प्रतिशत लोग जीवन के किसी न किसी चरण में मन की रुग्णता के शिकार जरूर बनते हैं. पर मनोविज्ञान ने अब इतनी प्रगति कर ली है कि मन की लीलाओं को समझना और उसका संतुलन लौटाने के लिए सार्थक प्रयास करना सरल हो गया है.

मन कब, किस पल, कहाँ सैर-सपाटे पर निकल जाए, कब किस रंग में डूब जाए, कब किस से उलझ जाए, नहीं मालूम! ऐसे में उसके व्यवहार को समझ पाना, उसकी गहराइयों को छू पाना, उसकी परतों को बेपर्द कर उसकी आंतरिक पीड़ा की थाह ले पाना किसी के लिए भी दुष्कर है. मगर दुनिया भर के मनोवैज्ञानिकों के निरंतर प्रयास की बदौलत आज हमने मन की बारीकियों को टटोलने और समझने में काफी-कुछ महारत हासिल कर ली है.

तनाव का सदुपयोग जरूरीतनाव मनुष्य का एक आवश्यक गुण है. भले ही आपको यह बात चौंकाने वाली लगे मगर वास्तव में तनाव मनुष्य का एक बेहद जरूरी गुण है. बगैर तनाव के मानव प्रजाति कब की विलुप्त हो जाती! मानव की विकास यात्रा में तनाव ने हम मनुष्यों को विकास और परिवर्तन करना सिखाया है. तनाव और डर ने ही उसे गुफा में रहना सिखाया, भोजन की चिंता ने उसे शिकार करना, खेती करना और मवेशियों को पालना सिखाया. बीमारियों से डर और उससे उपजे तनाव ने उसे आयुर्वेद से लेकर सर्जरी तक करना सिखाया. यह तनाव ही है जो हमसे हमारा बेहतर करवाता है... तनाव के बगैर हमारा जीवन एक ही ढर्रे पर चलता रहता और हम इंसान चार्ल्स डार्विन के ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ (Survival of the fittest) सिद्धान्त के अनुसार नष्ट या विलुप्त हो गए होते.

जब आपको अपनी जान बचाने के लिए तेज दौड़ने की ज़रूरत होती है तो आप तेज दौड़ते हैं, जब आपको हिम्मत की ज़रूरत होती है तो आपमें हिम्मत आती है और जब आपको अंधेरे में देखना होता है तब आपकी आँखों की पुतलियों बड़ी हो जाती हैं. आसान भाषा में कहें तो जब मस्तिष्क के सामने एक तनावभरी स्थिति पैदा होती है तो वह शरीर की ऊर्जा को दूसरी जगहों से हटाकर तनावभरी स्थिति से निपटने में लगाता है.


तनाव तब अवगुण या घातक हो जाता है जब आपको इससे निपटना न आए या आप इससे हार मानने लगे. तनाव जब हमारे मन-मस्तिष्क पर हावी होने लगता है तब यह समस्या उत्पन्न करता है, जानलेवा समस्याएँ. इस धरती पर ऐसा कोई विरला ही इंसान होगा जिसे कभी निराशा ने न घेरा हो. हाँ, इंसान निराशाओं के भँवर में फँसता ही है. निराशा से मुक्ति पाना हर इंसान का धर्म है, कर्तव्य है. क्षणिक निराशा हमारा गुण है और घोर निराशा एक मनोरोग.

सर्वव्यापी है मनोरोग का दायरा
मनोरोग किसी भी आर्थिक हैसियत के व्यक्ति को अपने चपेट में ले सकते हैं और सफल व प्रसिद्ध व्यक्ति भी इससे अछूते नहीं रहते. प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. विनय कुमार के मुताबिक मन के रोग किसी को भी हो सकते हैं. मनोरोग आम हैं. ये ख़ास लोगों को भी होते हैं. दरअसल दुख की दुनिया में कोई ख़ास नहीं, यहाँ पर सभी आम होते हैं. मनोरोग किसी को भी हो सकता है- आपको, मुझे और उनको भी जो पवित्र आसान पर बैठकर शरीर, मन, आत्मा और ईश्वर पर प्रवचन देते रहते हैं. मनोरोग से ग्रस्त वे भी होते हैं जिनकी उपलब्धियां असाधारण होती हैं. 40 प्रतिशत अमेरिकी राष्ट्रपतियों में डिप्रेशन की पहचान की गई है. द्वितीय विश्वयुद्ध का महानायक चर्चिल बायोपलर मूड डिसार्डर का शिकार था. अपने यहाँ भी महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ सहित कई बड़े लेखक मनोरोग से ग्रस्त पाए गए हैं. प्रख्यात मनोचिकित्सक नैन्सी एंडरीयासन के शोध हमें बताते हैं कि रचनात्मक प्रतिभा और मनोरोग में बेहद क़रीबी संबंध है. इस संबंध का आधार गुणसूत्र (Chromosomes) हैं.

महान डच चित्रकार विंसेंट वैन गो की पेंटिंग्स में ब्रश की रेखाओं के कोणीय झुकाव का अध्ययन करके मनोवैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि वे संभावत: बायोपलर मूड डिसार्डर से ग्रसित थे. लंबे अर्से से मनोवैज्ञानिक ऐसा मानते रहे हैं कि बहुत सृजनशील एवं रचनाधर्मी व्यक्तियों के मनोरोगी होने की संभावना दूसरों के बनिस्पत ज्यादा होती है. मनोरोग हर उम्र और हर समुदाय के लोगों को हो सकता है. कारोबारी हो या बेरोजगार, नौकरीपेशा हो या फिर विद्यार्थी हर किसी को मनोरोग हो सकता है.

दिमाग का केमिकल लोचा!
हमारे मानसिक स्वास्थ्य को कई रसायन प्रभावित करते हैं. उन्हें न्यूरोट्रांसमीटर (Neurotransmitter) कहा जाता है. उनमें सबसे प्रमुख है सिरोटोनिन (Serotonin). इसे अच्छे मूड का न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है. शरीर में इनका अच्छा स्राव हमें खुशमिजाज रखता है. रसायनशास्त्र की भाषा में इसे 5-हाइड्रॉक्सी ट्रिप्टामीन कहा जाता है. सिरोटोनिन रसायन, भूख, नींद, सीखने की प्रवृत्ति और याददाश्त संबंधी कार्यों को नियंत्रित करता है. जिन खाद्य पदार्थो में ऐमीनो अम्ल ट्रिप्टोफेन होता है, वे दिमाग में सिरोटोनिन के स्तर को बढ़ाते हैं.

दिमाग ही शरीर का असली रसायनशास्त्री है, शरीर का केमिस्ट है. हमारे भाव और पर्यावरण के बोध के आधार पर मस्तिष्क नसों में रसायन छोड़ता है. ये ही रसायन खून में घुल कर पूरे शरीर में घूमते हैं और कोशिकाओं और अंगों को संचालित करते हैं. उदाहरण के लिए अगर हम आंख खोलते ही किसी प्रियजन को देखते हैं तो मस्तिष्क खून में कुछ खास तरह के रस, कुछ हॉर्मोन छोड़ता है. इनके नाम हैं डोपामाइन और ऑक्सिटोसिन. कुछ ऐसे हॉर्मोन भी होते हैं जो शरीर के विकास को बढ़ाते हैं. इन रसायनों से कोशिकाओं का स्वास्थ्य अच्छा होता है. इसीलिए किसी प्रिय व्यक्ति से मिलने पर चेहरा चमकने, दमकने लगता है. हमें लगता है कि हमें उनका आशीर्वाद मिल गया है. इससे ठीक उलटा होता है जब हम किसी अप्रिय व्यक्ति या वस्तु को देखते हैं तब मस्तिष्क तनाव पैदा करने वाले, शरीर में सूजन पैदा करने वाले रसायन छोड़ने लगता है. यह दिमाग का प्रतिरक्षा तंत्र है क्योंकि तनाव में शरीर वह सब कर सकता है जो प्रसन्न रूप में नहीं करता.

शारीरिक रोगों की तरह मन के रोग भी कई तरह के हो सकते हैं. कुछ प्रमुख मानसिक रोग हैं : डिप्रेशन, स्किजोफ्रीनिया, बायोपलर मूड डिसॉर्डर, ईटिंग डिसॉर्डर, ओब्सेसिव-कंपल्सिव डिसॉर्डर, फोबिया, डिमेन्शिया, एंजायटी डिसॉर्डर, हिस्टीरिया, सीजनल अफेक्टिव डिसॉर्डर वगैरह-वगैरह.


आखिर में यही कहूंगा कि आज यह जरूरी हो गया है कि हम अपने जीवन की सामाजिक और पारिवारिक परिपेक्ष्य में समीक्षा करें और देखें कहीं हम अकेले तो नहीं होते जा रहे हैं और क्या हम अपने परिवार के लोगों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी भली-भांति निभा रहे हैं. जीवन में हम छोटी-छोटी खुशियों को सँजोकर एक स्वस्थ और सुरक्षित मानसिक जीवन की मजबूत बुनियाद रख सकते हैं. मानसिक समस्या उत्पन्न होने पर हमें अंधविश्वास के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए बल्कि किसी अच्छे मनोचिकित्सक से सलाह लेकर समुचित इलाज कराना चाहिए.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. वह विज्ञान से जुड़े मामलों के जानकार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रदीप

प्रदीपतकनीक विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव खलीलपट्टी, जिला-बस्ती में 19 फरवरी 1997 में जन्मे प्रदीप एक साइन्स ब्लॉगर और विज्ञान लेखक हैं. वे विगत लगभग 7 वर्षों से विज्ञान के विविध विषयों पर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं. इनके लगभग 100 लेख प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है.

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First published: October 10, 2020, 12:53 PM IST
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