World Tourism Day: यात्रा का मतलब सिर्फ दूरी तय करना ही नहीं

मणिपुर. भारत का यह खूबसूरत हिस्सा अपनी संस्कृति, भाषा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत केंद्र है. इसकी एक बड़ी पहचान सांस्कृतिक विविधता और सामुदायिक चेतना है. इसको समझे और महसूस किए बिना आप भारत के इस हिस्से को नहीं समझ सकते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 27, 2020, 9:14 AM IST
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World Tourism Day: यात्रा का मतलब सिर्फ दूरी तय करना ही नहीं
पूर्वोत्तर का यह छोटा सा राज्य अपने भीतर असीम संभावनाएँ समेटे हुए है. (प्रतीकात्मक)
यात्राएं जीवनानुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं. जब आप किसी यात्रा पर होते हैं तो सिर्फ एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी भर तय नहीं कर रहे होते बल्कि जीवनानुभवों में बहुत कुछ जोड़ रहे होते हैं. इसी क्रम में यात्राएं आपको समृद्ध करती जाती हैं. दुनिया के कई रहस्य यात्राओं से ही सुलझे और बहुत कुछ अनजाना यात्राओं से ही जाना गया. उन यात्राओं का अनुभव ही अलहदा होता है जहाँ आप बिना किसी योजना के चल पड़ते हैं. ऐसी यात्राएं आपको वह अनुभव देती हैं जो और कहीं से नहीं मिल सकता है. ऐसी ही एक यात्रा पर आपको ले चलता हूँ.

यह यात्रा भारत के उस हिस्से की है जिसको लेकर शेष भारत के लोगों की समझ अखबारों और अफवाहों से बनी है. अखबारों और अफवाहों में जो वहां का चित्रण है उसमें हिंसा, अलगाव है जबकि यह वहां की असल तस्वीर नहीं है. भारत का यह खूबसूरत हिस्सा अपनी संस्कृति, भाषा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत केंद्र है. इसकी एक बड़ी पहचान सांस्कृतिक विविधता और सामुदायिक चेतना है. इसको समझे और महसूस किए बिना आप भारत के इस हिस्से को नहीं समझ सकते हैं.

हिंदी पट्टी के पास इस हिस्से की जो भी समझ है वह राजनैतिक पाठ के रूप में है. वह पाठ भी आधा-अधूरा ही है. यहाँ की संस्कृति, भाषा, रहन-सहन, खान-पान, जीवनचर्या, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार आदि को लेकर कोई ठीक-ठीक समझ भी देखने को नहीं मिलती है. लोग इस सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के अद्भुत केंद्र से अनभिज्ञ हैं. पर्यटन के लिए इधर का रुख कम ही लोग करते हैं. उसका कारण अज्ञानता, अफवाह और अखबारी समझ ही है. इससे बाहर निकलने के लिए यात्रा जरूरी है तभी आप भारत के इस रमणीय हिस्से पूर्वोत्तर को जान व समझ सकते हैं.


इस यात्रा से पहले आपके यात्री की समझ भी नॉर्थ ईस्ट को लेकर अखबारों की कतरन और दिल्ली में पढ़ाई करने आने वाले नॉर्थ ईस्ट के बच्चों के मार्फत ही बनी थी. उसमें सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक धारणा ही प्रबल थी लेकिन नॉर्थ ईस्ट हमेशा मेरी रुचि का क्षेत्र रहा. उसे और गहरे से जानने व समझने की इच्छा रही. लिखने-पढने के साथ यात्राओं का चस्का जब से लगा तब से ही नॉर्थ ईस्ट की यात्रा करना जहन में था लेकिन अब वह दिन आ चुका था.
यह यात्रा दिल्ली से तब आरंभ हुई जब नॉर्थ-ईस्ट का एक राज्य मणिपुर आदिवासी बिल को लेकर चल रहे आंदोलन के कारण सुर्खियों में बना हुआ था. इसी समय वहाँ ILP (Inner Line Permit) को लेकर भी आंदोलन चल रहा था. इन सारी स्थितियों के बावजूद मुझे नॉर्थ ईस्ट के इस राज्य को लेकर ख़ासी दिलचस्पी थी. यह यात्रा मात्र एक पर्यटक की यात्रा भर नहीं थी बल्कि बहुत सारे सवालों और वहां के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों को जानने की जिज्ञासा से भरी हुई थी.

दिल्ली में विजय नगर से रात के तकरीबन 9.30 बजे निकलने के साथ ही यह यात्रा आरम्भ हो गई थी. ‘ब्रह्मपुत्र मेल’ की एस-5 में सीट नंबर 34 पर रात के 11.40 बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से निकलते ही दिमाग में बहुत कहा-अनकहा, सुना-अनसुना चलने लगा. इस ट्रेन से दीमापुर तक जाना था और फिर वहाँ से आगे की यात्रा तय करनी थी. दिल्ली से ट्रेन खुलने के साथ ही दिमाग भी खुलने लगा. दिल्ली से दीमापुर तक 44 घंटे और 2282 किलोमीटर के सफर में 50 से भी ज्यादा घंटे लग गए. इस ट्रेन की यह ख़ासियत थी की वह हर स्टेशनुमा जगह पर रुकती जरूर थी. दिल्ली से त्रेपनवां स्टेशन दीमापुर का है लेकिन यह ट्रेन करीब 80 स्टेशन पर तो रुकी ही होगी. खैर, 50 घंटे की इस थकावट वाली यात्रा के बाद रात के 2 बजे दीमापुर स्टेशन पर पहुँच ही गया. इस ट्रेन के ज्यादातर यात्री मणिपुर और नागालैंड के ही थे तो ट्रेन में सफर में ही मुझे कुछ-कुछ जानने- समझने को मिल गया था.

अब दीमापुर पहुँचने के बाद इम्फ़ाल जाने के साधन के बारे में पता किया तो एक नाम सुनाई दिया ‘विंगर’. सोचने लगा कि भला ये विंगर क्या बला है! खैर जब तक मैं इस बारे में सोचता तभी एक आदमी ने कहा “भैया चलीं, रेलवे स्टेशन के बाहर से मिलेगा, मुझे भी इम्फ़ाल जाना है और मैं वहीं रहता हूँ”. साथ चलने का प्रस्ताव देने वाला यह व्यक्ति बिहार से था और इम्फाल में उसकी दुकान थी. इसके बाद विंगर में बैठ गया जिसमें 10 लोगों के अतिरिक्त 12 बत्तखें भी थी. इन 10 लोगों में 6 लोग मणिपुर के अलग-अलग जिलों से, 3 व्यक्ति बिहार से जो इम्फ़ाल में काम करते थे और एक मैं.
रात के 3 बजे के आस-पास विंगर दीमापुर से चला तो सीधे नागालैंड पुलिस के एक चैक-पोस्ट पर रुका. घने जंगलों से पटा यह क्षेत्र अंधकारमय था लेकिन तभी एक वर्दीधारी आदमी ने विंगर के अंदर टॉर्च से देखा और आगे की सीट पर बैठे दोनों लोगों को आई कार्ड दिखाने को कहा. उन दोनों ने पहले से ही आई-कार्ड हाथ में रखा था और कहने से पहले ही दिखा दिया. इसके बाद टॉर्च का उजाला मेरी तरफ आया और मुझे देखते ही पुलिस के उस जवान ने कहा ‘मयांग’(जो नॉर्थ ईस्ट से बाहर का आदमी हो) अपना परमिट दिखाओ. इस कहने में जोर थोडा ज्यादा था लेकिन मैंने उसी त्वरा के साथ कहा परमिट नहीं है. मुझे गाड़ी से बाहर निकलने को कहा गया और ऐसा कहते ही विंगर का चालक कहने लगा “अभी तो कितना टेंशन चल रहा है तुमको बिना परमिट के नहीं आना चाहिए. मैं आपके लिए नहीं वेट करूँगा’’.

मैंने ड्राइवर से कहा मुझे 5 मिनट दो अगर देर हुई तो चले जाना. यहाँ तक का किराया मैं आपको दे दूंगा. इस बात पर ड्राइवर थोड़ा शांत हुआ और मैं नीचे उतर कर उनके ऑफिसर से मिला. ऑफिसर ने मेरा पता, फोन नम्बर नोट करने और आई-कार्ड देखने के बाद कुछ हिदायतों के साथ जाने को कहा.


यात्रा का अनुभव और रोमांच यहीं से आरम्भ हो गया था. इसके बाद तो घने जंगलों के बीच से विंगर सांय-सांय करते हुए निकल रहा था और मैं अगले किसी अनुभव के लिए खुद को तैयार कर रहा था. नागालैंड की सीमा खत्म हुई तो मणिपुर का पहला गाँव माओ आया. यहाँ सब यात्रियों ने चाय पी. मैंने चाय के साथ ही इस जगह के बारे में जानने में उत्सुकता दिखाई. चाय बना रही तक़रीबन 50 वर्ष की महिला ने हिंदी के स्पष्ट लहजे में कहा यह मणिपुर का गेट और मेरा गाँव है. मैंने भी जहाँ तक नजर जा सकती थी नजर दौड़ाई तो सेना के जवान और गाड़ियाँ ही नजर आ रही थी. मेरे लिए यह आश्चर्यजनक था लेकिन उनके लिए सामान्य बात थी.

माओ से तकरीबन 2 किलोमीटर ही निकले कि विंगर खराब हो गया. बहुत कोशिश करने के बाद भी ठीक न होने पर सब लोग अपनी-अपनी व्यवस्था से निकलने लगे. मैंने भी एक ट्रक को हाथ दिया और फिर आगे की यात्रा ट्रक से हुई. मुझे जाना इम्फाल था लेकिन ट्रक को सेनापति तक ही जाना था. सेनापति से बस के जरिए इम्फाल पहुँच गया. रात को इम्फाल पहुँचने के बाद अगले दिन तडके सुबह यहाँ के प्रसिद्ध इमा कैथेल बाजार जाना हुआ. सड़क से लेकर बाजार और लोगों के व्यवहार तक में कहीं से वो बातें नहीं थी जो अक्सर नॉर्थ ईस्ट को लेकर गढ़ी जाती हैं. यह बाजार महिलाओं के प्रतिनिधित्व का बेहतरीन उदाहरण है.

मणिपुर की महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण का ही प्रतीक इमा कैथेल या नुपी कैथेल मणिपुर की राजधानी इंफाल के बीचों-बीच स्थित है. मणिपुरी भाषा में ‘इमा’ का मतलब ‘माँ’ और ‘कैथेल’ का मतलब ‘बाज़ार’ होता है. एक तरह से यह माताओं का बाज़ार है. इस नाम के पीछे का एक सीधा कारण जो मुझे नज़र आया वह यह कि इस बाजार में सभी महिलाएँ लगभग 35 से 60 वर्ष के बीच की थीं. इस बाज़ार में 10 हज़ार से ज्यादा महिलाएँ काम करती हैं.

महिलाओं के द्वारा संचालित यह बाज़ार अपनी एक अलग पहचान रखता है. दुनिया का शायद यह इकलौता बाज़ार होगा जहाँ सिर्फ और सिर्फ महिला दुकानदार ही हैं. इंफाल शहर के ख्वाईरंबन्द (Khwairamband) नामक इलाके में स्थित यह बाज़ार, पुराना बाज़ार, लक्ष्मी बाज़ार और नया बाज़ार नाम से बड़े-बड़े तीन कॉम्प्लेक्स में विभाजित है. इन तीनों में अलग-अलग वस्तुएँ मिलती हैं. जैसे नया बाज़ार में सब्जी, मछली और फल मिलते हैं तो वहीं लक्ष्मी बाज़ार में परंपरागत कपड़े और अन्य घरेलू सामान. इसके अंदर छोटी-छोटी पंक्ति में 15-16 दुकानें हैं.

इस बाज़ार का अपना एक सिस्टम है. अंदर दुकानें लगाने के लिए लाइसेंस (license) का होना जरूरी है जोकि IMC (ImphalMunicipal Council) जारी करती है. इसके लिए कुछ पैसे साल के किराए के तौर पर IMC को देने होते हैं. जिन महिलाओं के पास लाइसेंस नहीं होता वह बाज़ार के बाहर पटरी पर बैठकर सामान बेचती हैं. इनकी तादाद भी बहुत अधिक है. पटरी पर सामान बेचने वाली अधिकांश महिलाएँ इंफाल से दूर पहाड़ी जिलों जैसे- बिशनुपुर, उखरुल, सेनापति, चंदेल, तामेंगलोंग, चुराचांदपुर आदि से आती हैं. इनमें से कुछ महिलाएँ तो पटरी पर बैठकर अपना सामान खुद बेचती हैं तो कुछ महिलाएँ सारा सामान वहाँ दुकान वाली महिलाओं को बेचकर अपने घर चली जाती हैं. इसी संरचना के साथ यह बाजार चलता है.

अपने तरह के इस अनूठे बाज़ार के इतिहास के बारे में ठीक-ठीक जानकारी तो नहीं है कि ये कब और किन परिस्थितियों में अस्तित्व में आया परंतु इस बाज़ार पर अध्ययन करने वाले व कुछ इतिहास की किताबें बताती हैं कि यह मणिपुर के राजा के शासन काल से ही है. तब यह बाज़ार मणिपुर के व्यापार का मुख्य केंद्र था लेकिन समय के साथ कई परिवर्तन इस बाज़ार में भी आए हैं.


मणिपुर के मानवाधिकार कार्यकर्ता धनावीर लाइशरम (Dr. DhanabirLaishram) बताते हैं कि “यह बाज़ार आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनैतिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र है. मणिपुर के महिला आंदोलन का केंद्र भी इमा कैथेल है. यहाँ ‘लंच’ के समय महिलाएँ विभिन्न राजनैतिक, सामाजिक मुद्दों पर बात करती हैं. एक तरह से मणिपुरी महिलाओं की राजनैतिक चेतना की प्रयोगशाला के तौर पर इस बाज़ार को देखा जा सकता है. यहाँ एक आवाज़ पर कई हज़ार महिलाएँ जमा हो जाती हैं लेकिन समय और राजनैतिक पार्टियों के ‘इनवॉल्वमेंट’ और ‘इन्ट्रेस्ट’ के कारण बाज़ार की एकता भी खंडित हुई है. अब मीटिंग से लेकर आंदोलनों में बाज़ार की एक तिहाई महिलाओं की भागीदारी ही होती है. आप देखिए इसी बाज़ार की उपज, मणिपुर का सबसे सशक्त महिला संगठन,‘मइरापाईबी’ (meirapaibi) निकला है”.

यह बाजार अपने आप में मणिपुर की महिलाओं की संघर्षगाथा का प्रतीक है. इस यात्री ने हिंदी पट्टी की नजर से जब इस बाजार को देखा तो कुछ अजूबा सा लगा लेकिन जब वहां सामान बेच रही महिलाओं से बात की तो समझ आया कि आत्मनिर्भर होने के मायने क्या हैं! हम जैसे पुरुषवादी बाजार संरचना के अभ्यस्त लोगों के लिए यह आश्चर्य और कौतूहल दोनों पैदा करने वाला था. इस बाज़ार के कुछ अलिखित नियम हैं जो इसकी खूबसूरती भी है. यहाँ यदि कोई कपड़ा बेच रहा है तो वह कपड़ा ही बेचेगा सब्जी या कुछ और नहीं बेच सकता. यह कोई लिखित कानून नहीं है पर इस बात का सब लोग ध्यान रखते हैं. कई महिला आंदोलनों का गवाह रहा यह बाज़ार मणिपुर की आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनैतिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र है.

पूर्वोत्तर का यह छोटा सा राज्य अपने भीतर असीम संभावनाएँ समेटे हुए है. ज़रूरत है तो यहाँ के लोगों और भौगोलिक स्थितियों को समझने की. शेष भारत से कटा यह राज्य अपनी सांस्कृतिक विरासत में श्रेष्ठ है. दुनिया को गोल्फ़ जैसा खेल देने वाला यह राज्य दिल्ली की सत्ता की उदासीनता को वर्षों से सहता आ रहा है. उत्सवधर्मी मणिपुर विभिन्न समुदायों (मैतेयी, नागा, कुकी ) की साझी विरासत का बेजोड़ नमूना है.

जिस मणिपुर को शेष भारत के लोग जानते हैं दरअसल वह टीवी की स्क्रीन और अखबार के पन्नों का मणिपुर है जबकि वास्तविक मणिपुर की तस्वीर उससे भिन्न है. पर्यटन के लिहाज से मणिपुर में ‘लोकटक झील’ का जिक्र बार-बार आता है लेकिन मणिपुर को समझने के लिए यहाँ के हाट,‘लैकई’(मोहल्ले) और बड़े-बड़े खेल के मैदानों को देखना चाहिए तभी मणिपुर की वास्तविक तस्वीर से रु-ब-रु हुआ जा सकता है. चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा यह राज्य एक आस भरी नज़र से हर दिल्ली से आने वाले को देखता है और उसका स्वागत करता है.

3 महीने की नॉर्थ ईस्ट यात्रा के 26 दिन इस यात्री के मणिपुर में बीते. इन 26 दिनों में ही नॉर्थ ईस्ट को लेकर जो छवि पहले से बनी थी वह धुंधली होने लगी और भारत के इस खूबसूरत राज्य को जितना जाना उतना ही इसकी सामाजिक, सांस्कृतिक परम्परा से परिचित होता गया. ‘काश सभी इससे परिचित हो पाते’ की टीस के साथ यहाँ से वापस कोहिमा के लिए विंगर ले लिया. वापसी में विंगर न खराब हुआ न किसी ने रोका- टोका. इसके बाद 18 दिन की यात्रा नागालैंड की रही. जिस पर फिर कभी...
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: September 27, 2020, 9:14 AM IST
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