बच्चों पर गर्व कीजिए न कि अंकों पर

सीबीएसई ने इस बार टॉपर की घोषणा नहीं करने का फैसला लिया है. यह एक सकारात्मक कदम है. इससे टॉपर बच्चों पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव से मुक्ति मिल सकती है. साथ ही अन्य बच्चों पर पड़ने वाला सामाजिक कहा, अनकहा तनाव भी कम होगा.

Source: News18Hindi Last updated on: July 15, 2020, 5:24 PM IST
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बच्चों पर गर्व कीजिए न कि अंकों पर
सीबीएसई ने इस बार टॉपर की घोषणा नहीं करने का फैसला लिया है. यह एक सकारात्मक कदम है. इससे टॉपर बच्चों पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव से मुक्ति मिल सकती है. साथ ही अन्य बच्चों पर पड़ने वाला सामाजिक कहा, अनकहा तनाव भी कम होगा.
सीबीएसई ने कुछ रोज पूर्व 12वीं कक्षा का परीक्षा परिणाम घोषित किया. उसके बाद आज 10वीं कक्षा का परिणाम भी घोषित कर दिए है. इन दोनों परिणामों में पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष अधिक बच्चे पास हुए हैं. 10वीं और 12वीं के परीक्षा परिणामों का बच्चों के लिए खासा महत्व होता है. इन परिणामों के आधार पर ही वह भविष्य की राह चुनते हैं. बच्चों पर इन कक्षाओं में अच्छे अंक लाने का दबाव स्कूल से लेकर परिवार तक सबका होता है. हर टीचर और माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे टॉप ही करें. इससे कम किसी को मंजूर नहीं होता है. परन्तु सीबीएसई ने इस बार टॉपर की घोषणा नहीं करने का फैसला लिया है. यह एक सकारात्मक कदम है. इससे टॉपर बच्चों पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव से मुक्ति मिल सकती है. साथ ही अन्य बच्चों पर पड़ने वाला सामाजिक कहा, अनकहा तनाव भी कम होगा. सीबीएसई ने इस बार 10वीं में अंक देने की जगह पर ग्रेड देने का फैसला किया है.

यह भी नंबरों की होड़ के बीच एक सार्थक पहल है. ग्रेड में एक- एक अंक का हिसाब नहीं होता है. इससे बच्चों और माता-पिता में कुछ हद तक अंकों के प्रति आग्रह और उसी आधार पर मूल्यांकन की तात्कालिक प्रवृति से भी निजात मिल सकती है. यह पद्धति समरूपता का अधिक प्रतिनिधित्व करती है. इसके साथ ही सीबीएसई ने इस बार ‘अनुत्तीर्ण’ की जगह पर ‘आवश्यक पुनरावृत्ति’ शब्द के प्रयोग करने की बात कही है. सीबीएसई ने यह स्पष्ट किया कि ‘अनुत्तीर्ण शब्द का प्रयोग विद्यार्थियों को जारी किए जाने वाले किसी भी दस्तावेज में नहीं किया जाएगा’. शब्दों का अपना महत्व होता है. शब्दों के प्रयोग का मानसिक व्यवहार से भी संबंध होता है.

सीबीएसई के इस कदम से परीक्षा परिणाम देखने वाले बच्चों की मनः स्थिति पर तत्काल तो सकारात्मक असर ही पड़ेगा लेकिन इसकी अर्थवत्ता संदिग्ध हो सकती है. इसे शब्दों के तनाव को कम करने की एक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है लेकिन इन शब्दों की व्याख्या के इतर अंकों की जो होड़ दिखाई देती है, वह बच्चों के लिए किसी भी स्थिति में ठीक नहीं है. इस होड़ के कारण बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा का हनन भी होता है और वो जो करना चाहते हैं वह कर भी नहीं पाते हैं बल्कि उन्हें वह करना पड़ता है जो उनके माता-पिता चाहते हैं. यहीं से बच्चों में मानसिक तनाव की शुरुआत होती है. यह तनाव परीक्षा में सफलता, विफलता और अंकों के प्रतिशत के साथ बढ़ता जाता है.  

पिछले कुछ वर्षों से अंकों के प्रतिशत से ही बच्चों की सफलता और विफलता को आंका जा रहा है. हर चीज को  प्रतिस्पर्धा की नजर से देखा जा रहा है. इसमें बच्चों की रूचि कहीं भी नहीं है. सब देखा-देखी के दबाव में हो रहा है. उनके अंक ही उनका व्यक्तित्व भी तय कर रहे हैं. यह परिवार के स्तर से लेकर समाज के स्तर तक देखा जा सकता है. कुछ रोज पहले सीबीएसई ने जब 12वीं कक्षा परीक्षा परिणाम घोषित किया तो फिर एक बार अंकों के प्रतिशत से सफलता और विफलता का आंकलन किया जाने लगा. बहुत से माता-पिता अपने बच्चों की मार्कशीट, फोटो और अंकों के प्रतिशत को सोशल मीडिया पर साझा करके उन पर गर्व करने की बात लिख रहे थे. किसी भी माता-पिता को अपने बच्चों की सार्थक मेहनत पर गर्व होना ही चाहिए. इस गर्व को वो किस रूप व माध्यम से साझा करते हैं, यह उनका निजी मसला है. परन्तु मैं, यहाँ एक अलग दृष्टिकोण से बात करना चाहता हूँ. यह इसलिए कि कल से जो भी बधाई व गर्व की बातें और मार्कशीट की फोटो सोशल मीडिया पर साझा की गई हैं उनमें लगभग सभी 90% से ऊपर अंक लाने वाले बच्चों की हैं. आज के अख़बारों में भी सफलता का पैमाना वही अंक थे. उन्हीं बच्चों की फोटो और जिक्र हैं जिनके अंक 100 प्रतिशत हैं या उससे कुछ ही कम रह गए हैं. 
इन अंकों के आंकलन की रीत में उनका कहीं जिक्र नहीं है जो उनसे कुछ प्रतिशत पीछे रह गए हैं और न ही उनका जिक्र है जो मेहनत करने के बावजूद निर्धारित अंक नहीं ला पाए हैं. ऐसे में इस इकहरे विमर्श को ही सफलता मान लिया जा रहा है. अंकों से बच्चों के वर्तमान और भविष्य का अंकन किया जा रहा है. अंकों को ही सफलता मान लेने की इस कवायद में शिक्षक, परिवार, समाज से लेकर ओपिनियन निर्धारित करने वाले लोगों तक की अहम भूमिका है. ये सब मिलकर बच्चों के दिमाग से खेलते हुए उन्हें अंकों की दौड़ में लगा रहे हैं. अब इस दौड़ में जो पिछड़ जाता है वह, शिक्षक, समाज और परिवार की नज़रों में असफल है. बच्चे भी मान लेते हैं कि 100 प्रतिशत अंक लाने वाली दौड़ में वो 60 या 70 प्रतिशत अंक ला रहे हैं तो पिछड़ गए हैं. यह भाव उनके अंदर भर भी दिया जाता है. इससे उनके नैसर्गिग विकास पर तो प्रभाव पड़ता ही है साथ ही सामाजिक व मानसिक ताने व तनाव का भी सामना करना पड़ता है. इस ताने व तनाव के कारण ही भारत में 100 में से 2 आत्महत्याएँ परीक्षा में फेल होने के कारण होती हैं. एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि 100 आत्महत्याओं में से 8 स्टूडेंट्स के द्वारा की जाती हैं. इसमें से भी 25% परीक्षा में असफल होने और मानसिक तनाव के कारण होती है. इन बातों के बावजूद भी हम अंकों की रेस में बच्चों को दौड़ाने से बाज नहीं आते हैं और उनकी प्रतिभा को समझे बिना उन्हें जबरन धकेल देते हैं. इसका एक उदाहरण कोचिंग हब के तौर प्रसिद्ध हो चुका कोटा शहर  है. वहां से आने वाली ख़बरों से कोई भी अनभिज्ञ नहीं होगा. इन सब बातों के बावजूद हम अंकों को गर्व, प्रतिष्ठा और सफलता की गारंटी मानकर नुमाइश करते हैं. इससे कम प्रतिशत अंक लाने वाले बच्चों पर क्या मानसिक व सामाजिक असर पड़ता होगा, उसको हम बिल्कुल नजरअंदाज कर देते हैं.

अंकों के इस पूरे खेल में यह बात समझनी जरुरी है कि अंक कहीं से भी सफलता का पैमाना नहीं हैं. 90 प्रतिशत अंक लाने वाले बच्चे ही सफल होंगे ऐसा नहीं होता है. दुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण आपको मिल जाएंगे जो औसत अंक लाने के बावजूद भी बेहतर जिन्दगी जी रहे हैं. आप उन्हें सफल भी कह सकते हैं. वैसे सफलता के सबके अपने पैमाने होते हैं. हर छोटी से छोटी चीज़ जो आप स्वयं से अर्जित करते हैं, वही आपकी सफलता होती है. अंक कहीं से आपकी सफलता को परिभाषित नहीं करते हैं. गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने हर्षा भोगले के साथ एक इन्टरव्यू में, जब उनसे यह पूछा गया कि 12वीं में आपको कितने प्रतिशत अंक मिले थे तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "अब क्या बताऊं, इतना समझ लीजिए कि मुझे श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मेरिट के आधार पर ऐडमिशन नहीं मिला था". उनके इस जवाब से अंकों की रेस और सफलता की दुनिया को समझा जा सकता है. इसलिए जिनके कम अंक हैं उन्हें निराश नहीं होना चाहिए बल्कि अपने भीतर की प्रतिभा को समझते हुए उसे विकसित करना चाहिए. आज हम सुंदर पिचाई को जानते हैं जो न तो 90 प्रतिशत वाली श्रेणी में थे और न ही टॉपर. हम उस समय के किसी टॉपर को नहीं जानते हैं. ऐसे और भी बहुत से उदाहरण आपको अपने आस-पास ही मिल जाएंगे. इसलिए इस बात को समझना जरुरी है कि भविष्य अंकों से तय नहीं होता है और न ही अंक सफलता की गारंटी हैं.  

यह बात उन माता-पिता को भी समझनी चाहिए जो बच्चों पर लगातार अंकों का दबाव बनाते हैं. उनकी सफलता और विफलता को अंकों से जोड़ कर देखते हैं. यह एक आत्मघाती दौड़ है. इससे सबको बचना चाहिए. आप अपने बच्चों को मशीन मत समझिए और न ही बनाने की कोशिश कीजिए. बच्चों की रूचि को समझकर उन्हें वह करने दीजिए जिसे वो बेहतर कर सकते हैं. आप उनमें तार्किक क्षमता विकसित कीजिए और उनको अपने पंखों पर उड़ने दीजिए. अंकों के दबाव से उनकी उड़ान को कमजोर मत कीजिए. अपने बच्चों पर गर्व कीजिए न की उनके अंकों पर.  गर्व और सफलता के इन आंकड़ों व प्रतिशत के बीच 12वीं के 11.22 प्रतिशत तथा 10वीं के 8.54 प्रतिशत उन बच्चों को भी बधाई जो सफलता के खांचों फिट नहीं बैठ पाए. यह तो सिर्फ शुरुआत है, रास्ता अभी बहुत दूर है.  समय- समय पर सफलता के ये खांचे बदलते रहेंगे. इसलिए निराश होने की जगह इसे एक और मौके के तौर देखना चाहिए.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: July 15, 2020, 5:24 PM IST
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