‘हिंदी में तो हो ही जाएगा’: हिंदी पट्टी के केंद्र में 8 लाख विद्यार्थी फेल

दुनिया में लगभग सभी देशों में हिंदी बोलने वालों की संख्या एक अरब तीस करोड़ के पार पहुंच चुकी है जो कि दुनिया में बोली जाने वाली किसी भी भाषा से अधिक है. दुनिया के 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है. यह सिर्फ एक भाषा की पढ़ाई से जुडा हुआ सवाल नहीं है बल्कि भाषा के जरिए वहाँ की संस्कृति को जानने व समझने का भी प्रश्न है. भाषा संस्कृति की संवाहक होती है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 26, 2020, 9:40 AM IST
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‘हिंदी में तो हो ही जाएगा’: हिंदी पट्टी के केंद्र में 8 लाख विद्यार्थी फेल
देश में हिंदी के प्रति एक तरह की उपेक्षा देखने को मिलती है.
हिंदी पट्टी की पहचान में ‘हिंदी’ महत्वपूर्ण है. भाषा के तौर पर यही इसकी व्यापक पहचान निर्मित करती है. भाषा के बतौर हिंदी की पहचान आज हिंदी पट्टी या देश तक ही सीमित नहीं बल्कि विदेशों में भी हिंदी बोलने, पढ़ने, समझने और लिखने वालों की बड़ी संख्या है. इस संख्या पर हम समय -समय पर गर्व भी करते रहते हैं. राजनीति का पूरा ताना-बाना भी इसी भाषा में अभिव्यक्ति पाता है. हिंदी को हम गर्व और पहचान के साथ जोड़ते हैं. संवैधानिक रूप से हिंदी हमारी राजभाषा और जन आकांक्षों के रूप में राष्ट्र भाषा भी है. इसलिए यह स्वाभाविक भी है कि हिंदी की प्रगति पर हमें गर्व होना चाहिए. विदेशों में जब हिंदी का प्रयोग बढ़ने लगे और इसे दूसरी सबसे बोली-समझे जाने वाली भाषा के तौर पर दर्ज किया जाता है, तो हमें गर्व ही होता है.

कुछ समय पहले आई खबर के अनुसार दुनिया में लगभग सभी देशों में हिंदी बोलने वालों की संख्या एक अरब तीस करोड़ के पार पहुंच चुकी है जो कि दुनिया में बोली जाने वाली किसी भी भाषा से अधिक है. दुनिया के 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है. यह सिर्फ एक भाषा की पढ़ाई से जुडा हुआ सवाल नहीं है बल्कि भाषा के जरिए वहां की संस्कृति को जानने व समझने का भी प्रश्न है. भाषा संस्कृति की संवाहक होती है. डेनमार्क के एक विश्वविद्यालय में हिंदी की प्राध्यापिका रजनी बहल विदेशी बच्चों के द्वारा बड़ी संख्या में हिंदी सीखने के पीछे के तात्पर्य को स्पष्ट करती हुई बताती हैं कि ‘पहले सीटें भरनी बहुत मुश्किल होती थी लोग सिर्फ चाइनीज़ व जापानीज़ सीखने आते थे मगर अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार बढ़ जाने व इंडिया की इकोनॉमी सुदृढ़ हो जाने से लोग हिंदी सीखने लगे हैं. बहल बताती हैं कि उनके पास तीन तरह के विद्यार्थी हिंदी सीखने आते हैं- एक जो इंडियन कंपनियों के साथ मिलकर व्यापार कर रहे हैं.

दूसरे, जो इंडियन कुकिंग सीख रहे हैं और इस सिलसिले में उनका भारत जाना भी होता है. इन दो श्रेणी के लोगों को बस बोलचाल के लिए हिंदी जानने में रुचि है. तीसरा, युवा समुदाय जिसे भारतीय संस्कृति व दर्शन में जिज्ञासा है वह ढंग से हिंदी पढ़ना-लिखना जानना चाहता है. यह किसी भी भाषा के विकास के लिए महत्वपूर्ण है. यही नहीं 2016 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में मतदान पर्ची पर पहली बार हिंदी में मतदाताओं को धन्यवाद दिया गया था. अमेरिका के चुनावी इतिहास में पहली बार हिंदी को अन्य भाषाओं के साथ शामिल किया गया था. यह एक भाषा के बढ़ते दायरे का प्रतीक तो है ही इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्वीकार्यता का प्रमाण भी है. दुनिया के कई देशों में 10 जनवरी की तारीख को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. यह भी वैश्विक स्तर पर हिंदी की ताकत और उसकी शक्ति का ही परिचायक है. इन सब बातों पर हम गर्व करते हैं और इन्हें जगह-जगह उद्धृत भी करते रहते हैं. इस गर्व के भाव को थोड़ा अपने भीतर भी झांकने की कोशिश की जानी चाहिए. हम हिंदी भाषा को लेकर कितने गंभीर हैं ? हमारे यहाँ हिंदी की क्या हालत है? हिंदी पट्टी की पहचान के तौर पर इंगित की जाने वाली भाषा का वहां क्या हाल है ?

यह सारे प्रश्न समय-समय पर उठते हैं और फिर नेपथ्य में चले जाते हैं क्योंकि हम भाषा को न बरतते हैं, न गंभीरता से लेते हैं और न ही उसके इतिहास, व्याकरण को जानने-समझने की कोशिश करते हैं. हम सिर्फ हिंदी भाषा पर गर्व करते हैं और हिंदी पट्टी में जन्म लेने से ही स्वयं को हिंदी भाषा का ज्ञाता भी मान लेते हैं. जब ज्ञाता हो ही गए तो फिर जानने-समझने और पढने की गुंजाइश खत्म हो जाती है. इसी का परिणाम हाल में उत्तर प्रदेश की बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट में देखा गया. इस परीक्षा परिणाम के बाद ही हिंदी को लेकर फिर से तमाम प्रश्न खड़े हो गए. इस वर्ष घोषित उत्तर प्रदेश बोर्ड के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं में 8 लाख से ज्यादा विद्यार्थी हिंदी में फेल हो गए. इतना ही नहीं 2 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने हिंदी की परीक्षा ही नहीं दी. यह आंकड़ा हिंदी पट्टी के केंद्र का है. यहाँ हिंदी प्राथमिक स्कूल से लेकर 10वीं तक अनिवार्य है. हिंदी भाषा को लेकर इस तरह के आंकड़े कोई इसी साल नहीं आए हैं बल्कि पिछले सालों के परीक्षा परिणाम में भी ऐसी ही स्थिति रही है.
पिछले वर्ष यानि 2019 के परिणामों में भी 10 लाख से ज्यादा बच्चे हिंदी के पेपर में फेल थे. हिंदी की यह स्थिति वहां है जिसे हिंदी का गढ़ कहा जाता है. हिंदी पट्टी का केंद्र बिंदु उत्तर प्रदेश है. ऐसे में फिर सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति के पीछे क्या कारण होंगे ? एक ओर जहाँ विदेशों में भी हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ रही है वहीं हिंदी अपनी ही जमीन से कटती क्यों जा रही है ! क्या यह गर्व की बात है ? क्या हिंदी को लेकर हम उदासीन हैं ? इस स्थिति को लेकर अभिभावक, स्कूल, समाज और सरकार कितने जिम्मेदार हैं? क्या हिंदी को लेकर कोई पिछड़ेपन का भाव हमारे अंदर भर दिया गया या पैदा हो गया है ? उच्च शिक्षा में हिंदी की अनिवार्यता का न होना, क्या इस स्थिति का बड़ा कारण है ? इन सारे प्रश्नों पर विचार करना चाहिए. तभी हिंदी की इस स्थिति को समझा जा सकता है. सिर्फ गर्व करने से हिंदी का ‘ढाई आखर’ भी भला नहीं होगा.

हिंदी पट्टी के लगभग सभी राज्यों में पहली कक्षा से लेकर 10वीं तक हिंदी अनिवार्य होती है. भाषिक व्यवहार और ज्ञान के पठन-पाठन में स्कूल की बड़ी भूमिका होती है. अगर विद्यार्थियों को आरम्भ से ही हिंदी के व्याकरण को लेकर सचेत किया जाए और उनमें भाषा की बारीकियों को जानने-समझने की ललक पैदा की जाए तो, शायद यह स्थिति न आए. हिंदी को जब तक स्कूल और विद्यार्थी ‘यूँ ही हो जाएगा’ तथा ज्ञाता के भाव से लेंगे तब तक हिंदी की कम से कम परिणामों के स्तर पर तो यही परिणिति देखने को मिलेगी. स्कूलों ने हिंदी को हेय बना दिया है. इसी हिंदी पट्टी के बहुत सारे प्राइवेट स्कूलों में विद्यार्थियों के हिंदी बोलने पर जुर्माना लगता है. वहीं सरकारी स्कूल में हिंदी को भाषा से ज्यादा पाठ के रूप में पढाया जाता है. इसलिए अन्य विषयों के मुकाबले हिंदी को लेकर अगम्भीरता आरम्भ से ही बरती जाती रही है. सबको लगता है कि हिंदी में तो पास हो ही जाएंगे. इस भाव ने हिंदी को कमजोर किया है. हिंदी के प्रति इस भाव में अभिभावकों की भी महती भूमिका रही है. वह भी हिंदी को कामचलाऊ भाव में लेते हैं. इसलिए बच्चों को हिंदी भाषा के प्रति सचेत नहीं किया जाता है. महानगरों में तो अभिभावक ‘मेरे बच्चे को हिंदी नहीं आती है’ गर्व से बोलते हैं. ऐसे में हिंदी की यह स्थिति लाजमी है. इसके साथ ही मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे विषयों का पठन- पाठन हिंदी में न होना, इसका एक बड़ा कारण है. इस कारण से स्कूल, अभिभावक और विद्यार्थी सभी आरंभ से ही हिंदी भाषा को लेकर लापरवाह रहते हैं. इसी लापरवाही का नतीजा यह परीक्षा परिणाम है.

भाषा का सवाल सिर्फ परीक्षा परिणाम में पास और फेल होने का नहीं बल्कि उससे कहीं आगे का है. यह पास और फेल होना भाषा के प्रति हमारी चेतना को प्रदर्शित करता है. हिंदी को मातृ भाषा कहा गया है. खासकर हिंदी पट्टी में तो हिंदी को पहचान के तौर पर देखा जाता है. यह पहचान भाषा के साथ-साथ संस्कृति से भी जुडती है. इसलिए हिंदी पट्टी में हिंदी का यह हाल विचलित करता है क्योंकि भाषा का अपने समाज के साथ गहरा नाता होता है. भाषा की इस स्थिति के लिए समाज और सरकार भी बराबर के दोषी हैं. हिंदी पट्टी के समाज और सत्ता के लोगों ने कभी भाषा को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई. उसी का यह असर है. सत्ता की नीति और नीयत ने हिंदी को लगातार कमजोर किया है. किसी भी समाज के लिए भाषा का कमजोर होना दरअसल उसकी सांस्कृतिक दरिद्रता का द्योतक है. इसलिए भाषा के सवाल पर गंभीरता से चिंतन करना चाहिए. हिंदी जैसी भाषा बहुत सारी क्षेत्रीय बोलियों और अन्य भाषा के शब्दों से समृद्ध हुई है. यही हिंदी की ताकत और वैश्विक पहचान का प्रमुख कारण भी है. अगर इस पहचान को बनाए और बचाए रखना है तो हिंदी को लेकर ‘हो ही जाएगा’ के भाव को त्यागना होगा.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: July 26, 2020, 9:17 AM IST
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