गांधी कहते थे- मेरी चले तो हमारा गवर्नर जनरल किसान हो

Gandhi Jayanti: गांधी सवाल और चुनौती भी हैं तो जवाब भी हैं. इसलिए भारत को अपनी समस्याओं से पार पाने और उनके उत्तर तलाशने के लिए बार-बार गांधी की तरफ लौटना ही होगा. आने वाले कई वर्षों तक गांधी न तो राजनीति में अप्रासंगिक हो सकते हैं न ही समाजविज्ञान में.

Source: News18Hindi Last updated on: October 2, 2020, 6:04 AM IST
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गांधी कहते थे- मेरी चले तो हमारा गवर्नर जनरल किसान हो
गांधी की चिंता पिछले 74 वर्षों में और पुख्ता होती गई है.
‘मेरी चले, तो हमारा गवर्नर जनरल किसान होगा, क्योंकि यहां का राजा किसान है’ यह सपना देखने वाले गांधी को कहां पता था कि उनके सपनों का भारत उनके शिष्यों द्वारा ही ध्वस्त कर दिया जाएगा और जिस किसान को वो राजा कह रहे थे उसकी स्थिति रंक से भी बदतर होगी. यह स्थिति ‘बनते हुए भारत’ से लेकर ‘न्यू इण्डिया’ तक में है. आज किसान सड़क पर है. यह कोई पहला मौका नहीं है जब किसान अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं. दरअसल गांधी का अंतिम जन तो गोदान के गोबर की तरह शहर में खो गया था. विकास की तेजी में उसकी बिसात ही मिट गई. होरी किसान था लेकिन गोबर मजदूर हो गया. वह किसानी के संकट से जूझते हुए शहरों में मजदूरी करने आ गया. यह स्थिति जिस तेजी के साथ बढ़ी उसी के साथ संघर्ष भी बढ़ा. आजाद भारत की राजनीति और नीति में खेती- किसानी बड़ा मुद्दा नहीं रहा.
पहले जमींदार थे तो अब वह कॉर्पोरेट व्यवस्था आ गई है जहां कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात की जा रही है. इस व्यवस्था में किसान अपने ही खेत में मजदूर और मजबूर दोनों होगा. गांधी अपने समय में इस तरह के सवालों से टकराते रहे हैं. वह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के भाषण में कहते हैं, "जब कहीं मैं कोई आलीशान इमारत खड़ी हुई देखता हूं; तब ही मन में आता है; हाय यह सारा रुपया किसानों से ऐंठा गया है. जब तक हम अपने किसानों को लूटते रहेंगे या औरों को लूटने देंगे, तब तक स्वराज्य की हमारी तड़पन सच्ची नहीं कही जा सकती है. देश का उद्धार किसान ही कर सकता है."

74 सालों में और पुख्ता हुई गांधी की चिंता
गांधी की चिंता पिछले 74 वर्षों में और पुख्ता होती गई है. इन वर्षों में किसानी और खेती, विकास और आलीशान इमारतों के नाम पर हाशिए पर धकेल दी गई. इसलिए हम देखते हैं कि पिछले कुछ दशकों से किसानों का संघर्ष बढ़ा है. इसका बड़ा कारण खेती की अनदेखी और किसान विरोधी नीतियाँ हैं. किसानी और खेती पर बढ़ते संकट ने पिछले 4 दशकों में कई बड़े आंदोलनों को जन्म दिया. उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक के किसान सड़कों पर उतरे और किसान विरोधी नीतियों का विरोध किया. इस दौरान सरकारें बदलती रही परन्तु किसान विरोधी नीतियां जारी हैं. नेताओं ने भाषण दिए और किसानों ने वोट लेकिन नीतियाँ कॉर्पोरेट के पक्ष में बनती चली गईं. इसी का परिणाम वर्तमान में चल रहा किसान आंदोलन भी है. याद कीजिए चम्पारण का किसान आंदोलन और उसमें गांधी की भूमिका. गांधी ने किस तरह ब्रिटिश शासन को फैसला वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया था.
कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में चंपारण के एक किसान राजकुमार शुक्ला गांधी से मिले और उनको अपनी आपबीती सुनाई. गांधी उनकी बात सुनकर चंपारण पहुंच गए. उस समय चंपारण के किसानों को अपनी जमीन का 3 बटा 20 हिस्से में नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जा रहा था. यह नील उन्हें अंग्रेज जमीदारों को देना होता था. इसे ‘नील कठिया प्रथा’ कहा जाता था.


नील कठिया किसान गांधी से सिर्फ इतना चाहते थे कि वह चंपारण आकर उनकी बदहाली को अपनी आंखों से देखें और गांधी वहां केवल गए ही नहीं बल्कि किसानों के पक्ष में सत्याग्रह भी किया और इस प्रथा का जमकर विरोध किया. किसानों का शोषण तब भी हो रहा था और आज भी हो रहा है लेकिन आज कोई गांधी नहीं है जो उनके बीच में खड़ा होकर किसान विरोधी नीतियों की मुखालफत करे. इस दौर में भी बहुत से गांधीवादी हैं लेकिन उनके लिए गांधी सिर्फ पहनावे में हैं न कि आचार और व्यवहार में क्योंकि गांधी सवाल भी हैं और जवाब भी. उनके विचारों से असहमत हुआ जा सकता है लेकिन उनको ख़ारिज नहीं किया जा सकता है.

भारत छोड़ो आंदोलन में किसानों की अहम भूमिकासन् 1917 के चंपारण सत्याग्रह से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक में किसानों की एक बड़ी भूमिका रही. गांधी ने ब्रिटिश शासन द्वारा समय-समय पर थोपे जाने वाले नाजायज कर और लगान को लेकर आंदोलन किए और किसानों की आवाज को मजबूत किया. गांधी के ग्राम स्वराज में किसान की बड़ी भूमिका थी. वह 4 अप्रैल 1935 के ‘हरिजन’ के अंक में लिखते हैं, "मेरा विश्वास है और मैंने इस बात को असंख्य बार दुहराया है कि भारत अपने चंद शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांव में बसा हुआ है. लेकिन हम भारतवासियों को ख्याल है कि भारत शहरों में ही है और गांव का निर्माण शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिए ही हुआ है. हमने कभी यह सोचने की तकलीफ ही नहीं उठाई कि उन गरीबों को पेट भरने जितना अन्न और शरीर ढकने जितना कपड़ा मिलता है या नहीं." यह कभी सरकारों की चिंता में नहीं रहा. विकास की अंधी दौड़ ने खेती ही नष्ट नहीं की बल्कि किसान को मजदूर बना डाला. गांव धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं और जो बचे हैं वह आज भी संघर्ष कर रहे हैं. किसानों का संघर्ष नया भी नहीं है. अवध का किसान आंदोलन से लेकर आज के आंदोलन तक की एक लंबी श्रृंखला है लेकिन अंतर यह कि तब भारत ब्रिटिश शासन व्यवस्था का गुलाम था परन्तु स्वतंत्र भारत में किसानों की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद सब को थी. अफ़सोस कि आज भी किसान अपनी लागत से लेकर उपज तक के लिए संघर्ष ही कर रहा है.

याद कीजिए सन् 1928 का बारडोली का किसान आंदोलन जो 30% लगान लगाने के खिलाफ हुआ था. इस आंदोलन के प्रमुख नेता वल्लभभाई पटेल थे लेकिन गांधी ने इसी आंदोलन के संदर्भ में कहा था- “किसान जो धरती की सेवा करता है वही तो सच्चा पृथ्वी का पति है उसे जमींदार या सरकार से क्यों डरना है”. किसान की यह अहमियत गांधी समझ रहे थे लेकिन आधुनिक भारत के हुक्मरानों के लिए उद्योगपति ही इस धरा के स्वामी हैं. किसान तो बस भाग्य भरोसे है.


गांधी की कांग्रेस के साथ कई असहमतियों में एक मुद्दा किसानों को लेकर भी थी. वह किसानों के सवालों पर कांग्रेस की नीति से कई मौकों पर अलग राय रखते थे. जमींदारों के हितों को लेकर गांधी का हमेशा टकराव रहा. आज बड़े-बड़े पूंजीपति जो किसान को नष्ट करने पर लगे हैं वह उस जमींदार का ही आधुनिक संस्करण हैं. अपने दौर में गांधी भीतर और बाहर किसानों के मुद्दों पर लड़ रहे थे. तब ‘जय जवान और जय किसान’ के मायने थे. यह मात्र नारा नहीं था बल्कि भारत की आत्मा को व्यक्त करने वाली उक्ति थी लेकिन आज स्थिति एकदम विपरीत है. इसलिए गांधी की तरफ लौटना इस दौर में आसान नहीं है. गांधी एक दिन की मूर्तिपूजा और पुष्पांजलि के विषय नहीं हैं बल्कि हर दिन के अभ्यास का विषय हैं.

गांधी की तरफ लौटना होगा
गांधी सवाल और चुनौती भी हैं तो जवाब भी हैं. इसलिए भारत को अपनी समस्याओं से पार पाने और उनके उत्तर तलाशने के लिए बार-बार गांधी की तरफ लौटना ही होगा. आने वाले कई वर्षों तक गांधी न तो राजनीति में अप्रासंगिक हो सकते हैं न ही समाजविज्ञान में. आगत समय के संकटों को लेकर उनकी चिंता और चिंतन किसी कुशल समाजशास्त्रीय से भी महत्वपूर्ण नज़र आती है. मानवीय दुर्बलताओं से गांधी परे नहीं है लेकिन दुर्बलताओं को ताकत बना डालना ही गांधी होना भी है. इस दौर में यही संभव नहीं है. तभी तो जिसे गांधी गवर्नर जनरल बनाना चाहते थे वह कई दिनों से सडकों पर है लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है. किसान के हितों को अनदेखा करके क्या यह कृषि प्रधान, गांधी का देश विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है ? समय हो तो 2 अक्टूबर को ही सोच लीजिए ! (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
प्रकाश उप्रेती

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड के खोपड़ा गाँव में जन्म। पहाड़, दिल्ली होते हुए वर्धा से पढ़ाई-लिखाई। हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं व अखबारों में लेखन। पहाड़ों में विशेष रुचि। मिजाज़ से घुमक्कड़, पेशे से अध्यापक। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में तदर्थ अध्यापक के तौर पर अध्यापन कार्य।

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First published: October 2, 2020, 6:04 AM IST
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